प्रेमानंद जी महाराज ने कहा किआज की पढ़ाई में आधुनिकता तो है लेकिन आध्यात्मिकता नहीं है। आध्यात्मिक शिक्षा के अभाव में बच्चों में विनम्रता की भावना दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। आज के बच्चे, चाहे जितने भी पढ़े-लिखे हों, विनय से दूर होते जा रहे हैं। विडंबना यह है कि जितना कोई उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है, उतना ही उसमें अहंकार आ जाता है। जबकि होना यह चाहिए कि जितना अधिक कोई शिक्षित हो, उतना ही अधिक वह सरल, विनम्र और सभ्य हो।
एक पढ़े-लिखे व्यक्ति की पहचान उसके व्यवहार से होनी चाहिए, जैसे- वह किसी बस या गाड़ी में बैठा हो और कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति खड़ा हो, तो वह तुरंत कहे-“दादाजी, आइए आप बैठ जाइए, मैं खड़ा रह सकता हूँ।” ऐसे व्यवहार से लगे कि वह सच में पढ़ा-लिखा और संस्कारी है। आज की स्थिति यह है कि पढ़े-लिखे लोग तो बहुत हैं लेकिन उनमें से अधिकतर में न तो विनय बचा है और न ही सभ्यता। इसका मूल कारण यही है कि शिक्षा में आध्यात्मिकता नहीं है। मेरा मानना है कि इस स्थिति को आध्यात्मिक शिक्षा ही सुधार सकती है। बच्चे तो मासूम होते हैं, उन्हें स्वयं यह समझ नहीं होती कि उनके लिए क्या अच्छा है। उनके कल्याण के लिए हमें प्रयास करने होंगे — हम यदि उनके लिए नामजप करें, तो अवश्य ही परिवर्तन होगा।
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अगर हम बच्चों को प्यार और स्नेह से समझाएं, जैसे- “आओ बेटा, 10 मिनट ‘राधा-राधा’ बोलो, भगवान का नाम लो, फिर हम तुम्हारे लिए विशेष भोग बनाएंगे।” तो वे धीरे-धीरे नामजप में रुचि लेने लगते हैं। शुरू में हो सकता है कि वे एक-दो दिन करें फिर हफ्ते भर छोड़ दें लेकिन अगर वे सप्ताह में एक दिन भी करने लगें, तो वह एक शुरुआत होगी। धीरे-धीरे वे नामजप और भजन में रुचि लेने लगेंगे। कई जगह बच्चों को खेल-खेल में भजन कराया जाता है, जैसे- “जब तक ‘राधा-राधा’ नहीं बोलोगे, तब तक प्रसाद नहीं मिलेगा।” फिर बच्चे खेल-खेल में ही नाम जपते हैं- “राधा-राधा, राधा-राधा…”और यह नामजप उनके मन में उतरने लगता है। फिर जब वे भजन, कथा, संतवाणी सुनने बैठते हैं, तो धीरे-धीरे उनके संस्कार बदलते हैं। जैसे अर्जुन ने गर्भस्थ अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदन की शिक्षा दी थी, वैसे ही यदि हम भी गर्भस्थ या छोटे बच्चों को भगवान की कथाएँ, भजन व नाम सुनाएँगे, तो उनके भाव बदलेंगे, संस्कार सुधरेंगे, और उनका जीवन भी आध्यात्मिक दिशा में अग्रसर होगा।













