भावांजलि : सनातन संस्कृति के धरोहर प्रेम सागर जी, फिल्म-मेकिंग में मेरे पिता और गुरु, मेरा नाम रखना चाहते थे राम
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भावांजलि : सनातन संस्कृति के धरोहर प्रेम सागर जी, फिल्म-मेकिंग में मेरे पिता और गुरु, मेरा नाम रखना चाहते थे राम

आखिरी मिनट तक, अस्पताल में भर्ती होने से ठीक पहले तक, प्रेम सागर जी कामधेनु गौमाता शो के 52वें एपिसोड में सुधार करवा रहे थे और एडिटिंग व ग्राफिक्स टीम को क्रिएटिव्स पर निर्देश दे रहे थे।

Written byशिव सागरशिव सागर
Sep 17, 2025, 08:09 pm IST
in भारत, श्रद्धांजलि, महाराष्ट्र
स्टूडियो में प्रेम सागर जी (फाइल फोटो)

स्टूडियो में प्रेम सागर जी (फाइल फोटो)

मेरे प्यारे पिता, श्री प्रेम सागर जी ने 31 अगस्त 2025 को अपने घर पर शांतिपूर्वक अपनी देह त्याग दी। वह  कोलोन कैंसर से पीड़ित थे, जिसका पता हाल ही में चला था। देह त्याग के समय वह 81 वर्ष के थे।

हमने कभी उम्मीद नहीं की थी कि वह हमें इतनी जल्दी छोड़कर चले जाएंगे, क्योंकि वह काफी स्वस्थ और सक्रिय थे, और रोजाना ऑफिस जाते थे। उनका आखिरी शो, जिसकी परिकल्पना और निर्माण उन्होंने किया, वह था ‘कामधेनु गौमाता’ जो स्टार भारत पर सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे प्रसारित होता है। आखिरी मिनट तक, अस्पताल में भर्ती होने से ठीक पहले तक, वह इस सीमित सीरीज के 52वें एपिसोड में सुधार करवा रहे थे और एडिटिंग व ग्राफिक्स टीम को क्रिएटिव्स पर निर्देश दे रहे थे। वह हमारे बीच रहने वाले एक सच्चे कर्मयोगी थे। सनातन संस्कृति को संरक्षित करने के अपने मिशन और काम के प्रति उनका जुनून और समर्पण इतना गहरा था कि एक ऐसा इंसान शायद ही कभी देखने को मिलता है, जिसे अपनी संस्कृति, अपनी विरासत से इतना प्रेम हो, जिसे फिल्म मेकिंग से इतना लगाव हो और जो अपने पिता स्वर्गीय श्री डॉ. रामानंद सागर जी के नाम और विरासत को आगे बढ़ा रहा हो। वह एक बहुत ही समर्पित और महान सहयोगी पुत्र थे।

पौराणिक फिल्में और शो बनाए

प्रेम सागर जी, रामानंद सागर जी की लगभग सभी सुपरहिट फिल्मों जैसे ललकार, आर्जू आदि में सिनेमैटोग्राफर और डीओपी थे। वह पुणे के एफटीआईआई से गोल्ड मेडलिस्ट छात्र ते, जिसके बाद उन्होंने अपने पारिवारिक बैनर ‘सागर आर्ट्स’ को ज्वाइन किया। यहां उन्होंने कुछ ऐसी पौराणिक फिल्में और टीवी सो बनाए जो पहले कभी नहीं देखे गए थे और अपनी मौलिकता और अनूठी सामग्री के लिए मार्गदर्शक साबित हुए।

गैराज में शूट हुआ था विक्रम बेताल का शो

जब रामानंद सागर जी, टेलीविजन पर ‘रामायण’ सीरीज बनाना चाहते थे और उन्हें कई बाधाओं और रुकावटों का सामना करना पड़ा, तो यह प्रेम सागर जी ही थे जिन्होंने एक ‘टेस्ट मार्केटिंग’ की और सुपरहिट शो ‘विक्रम और बेताल’ बनाया। एक अच्छे कैमरापर्सन, लेखक, निर्देशक और निर्माता होने के कारण, वह इस शो को रिकॉर्ड-तोड़ कम लागत में बना पाए। स्पेशल इफेक्ट्स, कास्टिंग और क्रिएटिव्स के साथ कोई समझौता नहीं किया। यह पूरा शो हमारे घर, जुहू में स्थित ‘सागर विला’ गैराज में शूट किया गया। उस समय मैं आठ साल का था।

‘विक्रम और बेताल’ की सफलता के बाद, रामानंद सागर जी का इस शैली में विश्वास बढ़ा और उन्होंने ‘रामायण’ सीरीज बनाने के अपने फैसले की घोषणा की, और बाकी सब इतिहास है।

रामायण की शूटिंग के दौरान प्रेम सागर

मुझे याद है, मैं स्कूल से घर आता था, और अक्सर हमारे बड़े डबल हाइटेड हॉल में, जिसमें झाड़-फानूस लगे थे, शूटिंग चल रही होती थी। एक बार मुझे याद है कि मैं घर आया था और फिल्म सलमा की शूटिंग चल रही थी, जिसमें एक डांस सीक्वेंस को कोरियोग्राफ किया जा रहा था। उस समय मैंने अभिनेत्री सलमा आगा से मुलाकात की, वह बहुत खूबसूरत थीं। मैं उनसे बात करने में

मुझे याद है, मैं स्कूल से घर आता था, और अक्सर हमारे बड़े डबल हाइटेड हॉल में, जिसमें झाड़-फानूस लगे थे, शूटिंग चल रही होती थी। एक बार मुझे याद है कि मैं घर आया था और फिल्म “सलमा” की शूटिंग चल रही थी, जिसमें एक डांस सीक्वेंस को कोरियोग्राफ किया जा रहा था। उस समय मैंने अभिनेत्री “सलमा आगा” से मुलाकात की, जो बहुत खूबसूरत थीं। मैं उनसे बात करने में बहुत शर्म महसूस कर रहा था।

भारतीय टेलीविजन पर ऐतिहासिक शैली की शुरुआत

सागर आर्ट्स का टेलीविजन विंग, जिसे मेरे पिता प्रेम सागर जी ने शुरू किया था, वह रामायण, श्रीकृष्ण और कई अन्य शो के लिए एक मार्गदर्शक बन गया, जो बाद में इस बैनर के तहत निर्मित हुए और भारतीय टेलीविजन पर पौराणिक, काल्पनिक और ऐतिहासिक शैली की शुरुआत हुई, जिसका अस्तित्व उससे पहले नहीं था।

मेरे पिता को फिर उनके पिता ने निर्देश दिया कि वह एक निर्देशक और डीओपी के रूप में सेट की दुनिया को छोड़कर मार्केटिंग में आ जाएं। उस समय इसकी कोई मिसाल नहीं थी और भारतीय टीवी शो को कभी भी विदेशों में बेचा या वितरित नहीं किया गया था। प्रेम सागर जी ने दुनिया भर में 20 बार यात्राएं की और ‘रामायण’, ‘श्री कृष्ण’ की मार्केटिंग की और इन्हें दक्षिण अफ्रीका से सूरीनाम, फिजी और अमेरिका तक, जहां भी भारतीय आबादी थी, उन टेलीविजन चैनलों को वितरित किया, जहां इन शो को प्रीमियम कीमत मिलती थी। प्रेम सागर जी मार्केटिंग के बारे में कुछ नहीं जानते थे, लेकिन उन्होंने खुद ही इसे सीखा और मुंबई में विज्ञापन समुदाय द्वारा उन्हें “मार्केटिंग गुरु” कहा जाने लगा। यह सब सुपरहिट टीवी शो बनाकर और फिर दूरदर्शन जैसे चैनलों पर विज्ञापन स्पॉट बेचकर हुआ, जिससे प्रसारक और विज्ञापनदाता के लिए रिकॉर्ड-तोड़ राजस्व उत्पन्न हुआ।

“काकभुसुंडी रामायण – अनटोल्ड स्टोरीज” पिता जी की परिकल्पना थी

सागर आर्ट्स द्वारा बनाए गए अधिकांश सुपरहिट शो, जैसे “पृथ्वीराज चौहान”, “हातिम”, “महिमा शनि देव की”, “साईं बाबा” आदि, प्रेम सागर जी द्वारा ही परिकल्पित किए गए थे, और हाल ही में “काकभुसुंडी रामायण – अनटोल्ड स्टोरीज” भी, जो वर्तमान में दूरदर्शन और वेव्स ओटीटी पर प्रसारित हो रहा है। भारतीय दर्शकों की पसंद के बारे में उनकी सोच बहुत साहसिक और जमीनी थी। इस तरह की सामग्री को भारत के अभिजात वर्ग द्वारा नीची निगाह से देखा जाता था, लेकिन आम जनता ने इसे दिल से अपनाया और इसने उन्हें शिक्षित किया। उनमें अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना जगाई।

भारतवर्ष की जनता की मानसिकता को फिर से गढ़ने में उनका यह सबसे बड़ा योगदान था, जो औपनिवेशिक मानसिकता से जूझ रही थी।

डांटने की जगह रखा मौन व्रत

मैंने मैंने पिताजी को जीवन में कभी भी ऊंची आवाज में बात करते हुए नहीं देखा और अब मैं 48 साल का हूं। मुझे याद है कि जब मैं बच्चा था तो यात्रा करते समय मैंने कार में बहुत जिद की थी। मुझे डांटने के बजाय उन्होंने मुझसे कहा कि वह मेरे लिए मौन व्रत रखेंगे, ताकि मैं इस तरह का व्यवहार न करूं। उनके इस कार्य से मुझ पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा, जितना डांटने से कभी नहीं हो पाता। इस महान आध्यात्मिक शक्ति वाले इंसान ने इतने सारे जीवन को छुआ कि अगर कोई उनसे एक बार और संक्षिप्त रूप से भी मिला हो तो वह व्यक्ति उस मुलाकात को कभी नहीं भूलेगा।

वह वह एक महान कहानीकार, लेखक, सिनेमैटोग्राफर, दार्शनिक, पति, पिता, मार्केटिंग गुरु थे। हमेशा मुस्कराते, मजाक करते और लोगों को हंसाते हुए, सकारात्मकता फैलाते हुए इन सभी भूमिकाओं को निभाते थे। वह महान इंसान थे। वह मेरे गुरु और शिक्षक रहे हैं, और मुझे लगता है कि मानव विकास के जो मानक उन्होंने स्थापित किए हैं, उन तक पहुंचना बहुत मुश्किल होगा।

वह मेरा नाम राम रखना चाहते थे

लोग कहते हैं कि आत्मा की आगे की यात्रा तय करने के लिए धरती से जाने का समय और तरीका बहुत महत्वपूर्ण होता है। वह घर पर बहुत शांतिपूर्वक, गणेश चतुर्थी के पांचवें दिन और राधा अष्टमी के दिन चले गए। इसलिए, मेरे लिए वह वैकुंठ लोक गए, क्योंकि उन्हें विष्णु और उनके सभी रूपों जैसे राम और कृष्ण से गहरा प्रेम था। (वह मेरा नाम भी राम रखना चाहते थे, लेकिन मेरे स्वर्गीय परदादा ने उससे पहले मेरा नाम “शिव” रख दिया था)। भगवान शिव और दुर्गा के लिए उतना नहीं। लेकिन विष्णु उनके “इष्ट-देवता” थे और विष्णु की पूजा मैंने उनसे सीखी है। वह एक ऐसे व्यक्ति थे जो “गृहस्थ आश्रम”, जो सबसे कठिन आश्रम है, में रहते हुए भी एक संत का जीवन जीते थे, माया और उसके भ्रमों से अछूते थे।

 

Topics: पाञ्चजन्य विशेषप्रेम सागरप्रेम सागर का निधनशिव सागरकागभुशुंडि रामायणविक्रम बेतालरामायणरामानंद सागर
शिव सागर
शिव सागर
प्रख्यात निर्माता और निर्देशक [Read more]
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