इसमें संदेह नहीं कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यकाल में चीन और अमेरिका के बीच ‘ट्रेड वॉर’ ने दुनिया को सकते में डाल दिया था। दोनों देश व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में एक दूसरे को मात देने की ठाने हुए थे। आज भी वह स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। अमेरिका और चीन के बीच संबंधों में नरमी—गरमी के मिलेजुले भाव दिखते रहे हैं। ट्रेड वॉर के अलावा तकनीकी प्रतिस्पर्धा या राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भी दोनों के मन एक दूसरे के प्रति शंकालु रहे हैं। मैड्रिड में कल अमेरिका—चीन की बहुप्रचारित वार्ता के संकेत ट्रंप के अनुसार, ‘बहुत अच्छे’ रहे हैं। अमेरिका जिस टिकटॉक एप को लेकर एक लंबे समय से शंकाएं व्यक्त करता आ रहा था और चीन के विरुद्ध आरोप लगाता आ रहा था उसे लेकर अब कल के बाद से तनाव कुछ कम होता दिख रहा है। तब अमेरिका ने चीन पर इस एप के माध्यम से डेटा सुरक्षा और जासूसी के आरोप लगाए थे, जिसकी वजह से टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया शुरू भी की गई थी।
लेकिन अब, मैड्रिड में सम्पन्न उच्चस्तरीय वार्ता ने इन संबंधों में एक नई नजदीकी का संकेत दिया है। बताया गया है कि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और चीन के उप प्रधानमंत्री हे लीफेंग के नेतृत्व में दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने व्यापार और तकनीकी मुद्दों पर गहन चर्चा की है।
टिकटॉक को लेकर अमेरिका की चिंता मुख्यतः डेटा प्राइवेसी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी थी। अमेरिकी संसद ने एक कानून पारित किया था जिसके तहत टिकटॉक की मूल कंपनी ‘बाइटडांस’ को अपनी अमेरिकी हिस्सेदारी बेचनी थी अन्यथा ऐप पर प्रतिबंध लग जाता।
हालांकि, मैड्रिड वार्ता के बाद एक मसौदा समझौता सामने आया है जिसमें टिकटॉक को अमेरिका में कार्य करते रहने की अनुमति मिल सकती है। यह समझौता इस बात का संकेत है कि दोनों देश अब टकराव की बजाय समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन क्या ऐसा है, विशेषज्ञों के मन में यह सवाल भी है।

डोनाल्ड ट्रंप ने भी सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में संकेत दिए कि यह समझौता ‘हमारे देश के युवाओं के लिए खुशी की बात होगी’। इससे स्पष्ट है कि अमेरिका अब टिकटॉक को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय एक संतुलित मार्ग पर चलना चाहता है।
टिकटॉक के अलावा, मैड्रिड वार्ता में व्यापारिक बाधाओं को कम करने, निवेश को प्रोत्साहित करने और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने पर भी चर्चा हुई। चीन ने स्पष्ट किया कि वह अपने वैध हितों की रक्षा करेगा लेकिन साथ ही सहयोग के लिए तैयार है।
यह वार्ता ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका को ‘रेअर अर्थ मैटिरियल्स’ की आपूर्ति में देरी, सेमीकंडक्टर उद्योग में दबाव और महंगाई जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चीन के साथ सहयोग इन समस्याओं का हल करने में मददगार हो सकता है।
बेशक, इस समझौते को एक सकारात्मक संकेत कहा जा सकता है, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इसे स्थायी बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। अमेरिका और चीन के बीच कई मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं—जैसे साइबर सुरक्षा, मानवाधिकार, ताइवान और दक्षिण चीन सागर में सैन्य तनाव।
लेकिन यह वार्ता इतना तो साफ करती है कि दोनों देश अब टकराव की बजाय संवाद और समझौते की ओर बढ़ना चाहते हैं। यह वैश्विक स्थिरता के लिए एक शुभ संकेत कहा जा सकता है। मैड्रिड वार्ता ने यह भी साफ किया है कि दोनों देश अब एक-दूसरे को केवल प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि संभावित साझेदार के रूप में भी देख रहे हैं।
वैश्विक संदर्भों में देखें तो यह बदलाव न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अहम मायने रखता है, क्योंकि अमेरिका और चीन की साझेदारी वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीक और सुरक्षा को स्थिरता प्रदान कर सकती है। दूसरे, कुछ विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस ‘वार्ता’ की ‘सफलता’ के पीछे इस बार के एससीओ सम्मेलन में भारत, रूस और चीन की निकटता की तस्वीरों का बड़ा योगदान हो सकता है। अमेरिका ने निश्चित ही खुद को हाशिए पर देखा होगा और अपनी महत्ता में कमी आती देखी होगी।

















