Explainer: क्या है चीन का Ethnic Unity Law ? ऐक्टिविस्ट क्यों हैं परेशान?
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Explainer: क्या है चीन का Ethnic Unity Law ? ऐक्टिविस्ट क्यों हैं परेशान?

चीन अब उन नागरिकों का विरोध करने का अधिकार भी छीनने वाला है, जो देश के बाहर जाकर उसके अत्याचारों के विषय में बोलते हैं।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 29, 2026, 05:38 pm IST
inविश्व
चीन के नए कानून को लेकर ऐक्टिविस्ट परेशान

चीन के नए कानून को लेकर ऐक्टिविस्ट परेशान

भारत में अक्सर चीन प्रेमी लोग चीन को लेकर बेचैन रहते हैं। चीन आम नागरिकों को जीने तक का अधिकार नहीं देता है, इस पर वे चर्चा भी नहीं करते। चीन अब उन नागरिकों का विरोध करने का अधिकार भी छीनने वाला है, जो देश के बाहर जाकर उसके अत्याचारों के विषय में बोलते हैं। वह अब ऐसा कानून लेकर आने वाला है।

चीन का Ethnic Unity Law (Law of the People’s Republic of China on Promoting Ethnic Unity and Progress) एक ऐसा कानून है, जो अब विरोध करने के अधिकार को तो छीनेगा ही, साथ ही चीन की स्थानीय भाषाओं, स्थानीय संस्कृति को भी नष्ट करेगा।

क्या है यह कानून?

चीन का यह विवादास्पद कानून मार्च में पारित हुआ था और 1 जुलाई से लागू होगा। उसके मुख्य प्रावधानों में मंदारिन भाषा की अनिवार्यता, साझा राष्ट्रीय पहचान, बाहरी हस्तक्षेप पर रोक, और सबसे बढ़कर वैश्विक क्षेत्राधिकार हैं। इसमें 65 धाराएं हैं, जो आने वाले चीन की सामाजिक संरचना का पूरा ताना-बाना प्रस्तुत करती हैं। अब आइए समझते हैं कि इनसे क्या खतरा है।

मंदारिन भाषा की अनिवार्यता

सबसे पहले तो मंदारिन भाषा की अनिवार्यता। इस कानून के लागू होने के बाद से अपने आप ही मंदारिन भाषा स्कूलों की आधिकारिक भाषा हो जाएगी और तिबत्ती, उयघुर, और मंगोलियन आदि सभी भाषाएं स्कूलों से बाहर हो जाएंगी।

‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट के अनुसार इस कानून में यह भी प्रावधान है कि सार्वजनिक साइनबोर्ड पर अल्पसंख्यक जातीय लिपियों की तुलना में मंदारिन को ज़्यादा प्रमुखता से दिखाया जाए। मंगोलिया से हाल ही की रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ सार्वजनिक साइनबोर्ड को पहले ही बदल दिया गया है ताकि मंगोलियाई लिपि की तुलना में मंदारिन अक्षरों को ज़्यादा प्रमुखता से दिखाया जा सके।

साझा राष्ट्रीय पहचान के नाम पर खेल

साझी राष्ट्रीय पहचान के नाम पर इसमें अन्य पहचानों को समाप्त करने का कार्य किया है। एनपीसी ऑबसर्वर की वेबसाइट पर है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सिस्ट एथेनीक थ्योरी को चीन के नस्लीय मुद्दों और चीन की परंपरागत संस्कृति की विशेष स्थितियों के साथ मिलाना चाहती है, और चूंकि पार्टी ने चीनी लोगों के बीच समुदाय की मजबूत भावना को अपने जातीय कार्यों और जातीय क्षेत्रों में होने वाले कामों का मुख्य आधार बनाया है तो मार्क्सवादी जातीय सिद्धांत को ढालने के लिए एक नया रास्ता खुला है। इसका अर्थ यह हुआ कि चीन में अब विभिन्न जातीय समूहों की जैसे कि तिब्बती, मंगोलियन आदि की सांस्कृतिक पहचान केवल “नई” चीनी राष्ट्रीय पहचान के तले दब जाएगी

अन्तर्जातीय विवाह को बढ़ावा या स्थानीय संस्कृति पर अंकुश

एक जो सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान है वह हालांकि एकीकरण के नाम पर, साझा राष्ट्रीय पहचान के नाम पर ही है कि अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित किया जाएगा। इसमें उन बच्चों के अभिभावकों पर भी मुकदमे का प्रावधान है, जो बच्चों के भीतर नुकसानदायक सोच डाल सकते हैं और जिससे जातीय सद्भाव पर असर पड़े। इस कानून में आपसी तौर पर जुड़े हुए सामुदायिक माहौल की बात की गई है। इसको लेकर आशंका व्यक्त की जा रही है कि अब कोई भी जातीय समूह अपनी स्थानीय संस्कृति को बिल्कुल भी अपने बच्चों को प्रदान नहीं कर पाएगा और अब संस्कृति भी केवल और केवल मार्क्सवादी सरकार द्वारा संचालित होगी।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, ‘चीन की सरकार ने 2000 के दशक के आखिर में माइनॉरिटी ग्रुप्स के “सिनिसाइज़ेशन” (चीनीकरण) पर ज़ोर देना शुरू किया और एथनिक ग्रुप्स को मुख्य हान कल्चर में मिलाकर एक ज़्यादा एक राष्ट्रीय पहचान बनाना शुरू किया। देश की 1.4 बिलियन आबादी में से 90% से ज़्यादा हान चीनी हैं।’ तो क्या यह माना जाए कि इस कथित एकीकरण के नाम पर हान समुदाय की ही संस्कृति अब हावी होगी या फिर नई मार्क्सवादी एथिनिक संस्कृति?

वैश्विक क्षेत्राधिकार

अन्य प्रावधानों के अतिरिक्त जो इसमें सबसे महत्वपूर्ण और खतरनाक है, वह है इसका क्षेत्राधिकार वैश्विक होना। चीन अब उन लोगों पर कार्रवाई कर सकता है, जो चीन के नागरिक हैं और जिनके कार्यों से चीन को ऐसा लगता है कि सरकार को नुकसान हो रहा है। फिर वे चाहे दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हों?

इसमें एक प्रावधान (Article 63) है, जिसके अनुसार चीन अब अपने देश से बाहर रहने वाले व्यक्तियों और संगठनों पर भी कार्रवाई कर सकता है, यदि उनके कार्य चीन की “राष्ट्रीय एकता” को नुकसान पहुंचाने वाले माने जाते हैं तो!

इसे लेकर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। यूरोपीय संघ ने इसे लेकर चिंता जताई है और कहा है कि यह कानून चीन को “सीमा पार दमन” (transnational repression) का कानूनी आधार प्रदान करता है तो वहीं यूरोप में रहने वाले तिब्बती, उइगर और ताइवानी कार्यकर्ताओं को डर है कि चीन इस कानून का उपयोग कर उन्हें कानूनी या राजनीतिक दबाव में ला सकता है।

इस कानून को लेकर जहां विदेशों में विरोध के स्वर उठ रहे हैं तो वहीं भारत में चीनी गुलाम अभिव्यक्ति की आजादी के इस विध्वंसात्मक कानून पर एकदम मौन हैं!

 

Topics: चीनEthnic Unity Lawचीनी ऐक्टिविस्टचीन का कानूनमंदारिन भाषा
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