विदेशी फंडिंग, शहरी नक्सल और सोनिया गांधी: क्या ग्रेटर निकोबार प्रोजेक्ट को रोकने की चाल चल रही है?
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विदेशी फंडिंग, शहरी नक्सल और सोनिया गांधी: क्या ग्रेटर निकोबार प्रोजेक्ट को रोकने की चाल चल रही है?

हाल ही में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने द हिंदू में अपने संपादकीय लेख में ग्रेटर निकोबार परियोजना की आलोचना करते हुए इसे एक "नियोजित दुस्साहस" करार दिया है।

Written byदिव्यांश कालादिव्यांश काला — edited by Mahak Singh
Sep 14, 2025, 03:16 pm IST
in भारत
Sonia Gandhi

Sonia Gandhi

हाल ही में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्षा सोनिया गांधी ने द हिंदू में अपने संपादकीय लेख में ग्रेटर निकोबार परियोजना की आलोचना करते हुए इसे एक “नियोजित दुस्साहस” करार दिया है। उन्होंने दावा किया कि यह परियोजना “बिना संवेदनशीलता के आगे बढ़ाई जा रही है, जिससे सभी कानूनी और सोची-समझी प्रक्रियाओं का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।”

उन्होंने आगे तर्क दिया कि “यह परियोजना द्वीप पर बड़ी संख्या में लोगों और पर्यटकों का आगमन कराएगी। अंततः, शोम्पेन जनजाति अपने पूर्वजों की ज़मीनों से कट जाएगी और अपनी सामाजिक व आर्थिक पहचान को बनाए नहीं रख पाएगी।”
सोनिया गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने कानून और नियमों की उचित प्रक्रिया को नज़रअंदाज किया है। उन्होंने कहा, “देश के कानूनों का खुलेआम मज़ाक उड़ाया जा रहा है। और दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, देश के सबसे संवेदनशील समुदायों में से एक को इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।” उन्होंने यह आलोचना भी की कि परियोजना के अंतर्गत प्रस्तावित बंदरगाह “विवादास्पद” है क्योंकि इसका कुछ हिस्सा तटीय विनियमन क्षेत्र (Coastal Regulation Zone – CRZ) 1A में आता है।

अपने लेख के समापन में उन्होंने अपील की, “हमें इस अन्याय और हमारे राष्ट्रीय मूल्यों के साथ हुए विश्वासघात के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए,” ताकि केंद्र सरकार ग्रेटर निकोबार परियोजना को रोक सके। लेकिन सवाल यह उठता है कि लोकतंत्र की इस सबसे पुरानी पार्टी को उस परियोजना से आपत्ति क्यों है, जो भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री वर्चस्व दिलाने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है? ग्रेटर निकोबार द्वीप विकास परियोजना एक 9 अरब डॉलर की मेगा परियोजना है, जिसे नीति आयोग द्वारा परिकल्पित किया गया है और अंडमान व निकोबार द्वीपसमूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDC) द्वारा लागू किया जा रहा है। इस परियोजना में एक बंदरगाह, हवाई अड्डा, विद्युत और टाउनशिप सुविधाओं का विकास शामिल है। यह परियोजना भारत की समुद्री सुरक्षा और व्यापार को सुदृढ़ करने के लिए एक उत्प्रेरक (कॅटालिस्ट) का कार्य करेगी।

आज हिंद महासागर क्षेत्र 21वीं सदी का वैश्विक शक्ति केंद्र बन चुका है। वर्तमान में भारत का 80% विदेशी व्यापार और 100% ऊर्जा आयात इसी क्षेत्र के माध्यम से होता है। ग्रेट निकोबार द्वीप बंगाल की खाड़ी में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के दक्षिणी छोर पर स्थित है और यह सिक्स डिग्री चैनल के पास है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के निकट एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इस मार्ग से 30-40% वैश्विक व्यापार और चीन के अधिकांश ऊर्जा आयात होते हैं। ऐसे सामरिक स्थान पर बंदरगाह का निर्माण भारत को अपने कार्गो परिवहन लागत में भारी कमी लाने में मदद करेगा। वर्तमान में भारत के प्रमुख पूर्वी बंदरगाहों की गहराई मात्र 8-12 मीटर है, जिससे वे बड़े जहाजों को संभाल नहीं पाते, जबकि अन्य वैश्विक बंदरगाहों की गहराई 12-20 मीटर होती है, जिससे वे 1,65,000 टन या उससे अधिक भार वाले जहाजों को भी आसानी से संभाल सकते हैं।

लगभग 25% कार्गो के लिए भारत को विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे हर वर्ष लगभग ₹1,500 करोड़ का प्रत्यक्ष बंदरगाह राजस्व और ₹3,000-4,000 करोड़ की कुल आर्थिक क्षति होती है। जिस गैलेथिया बे में यह नया बंदरगाह प्रस्तावित है, वहाँ प्राकृतिक गहराई 18-20 मीटर है, जिससे हमारी अन्य बंदरगाहों पर निर्भरता कम हो जाएगी। यह परियोजना सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में चीन, कोलंबो बंदरगाह के एक टर्मिनल को नियंत्रित करता है, जो भारत के 25% कार्गो और 40% व्यापार को संभालता है। इससे चीन को हमारे व्यापारिक माल की निगरानी करने का अवसर मिलता है। इस नए बंदरगाह का विकास चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति को भी नियंत्रित करने में सहायता करेगा , जिसके अंतर्गत वह हिंद महासागर क्षेत्र में बंदरगाह और सुविधाएं बनाकर प्रभाव बढ़ा रहा है ।

इस बंदरगाह का निर्माण भारत की समुद्री चौकसी क्षमता को भी मजबूत करेगा, क्योंकि यह प्रमुख समुद्री चोकपॉइंट्स पर भारत की निगरानी को सुनिश्चित करेगा और इस महत्वपूर्ण व्यापारिक क्षेत्र में भारत को एक लॉजिस्टिक्स हब बनाने में मदद करेगा। इस प्रकार, हम केवल एक बंदरगाह नहीं बना रहे बल्कि अपनी समुद्री अवसंरचना की दशकों पुरानी कमजोरी को सुधार रहे हैं। लेकिन कुछ शक्तियाँ ऐसी भी हैं जो भारत के इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं। इसलिए वे इस क्षेत्र में हमारे प्रभाव को रोकने के लिए विभिन्न हथकंडे अपना रही हैं। पर्यावरणीय चिंताओं और आदिवासी कल्याण की कथित चिंता को हथियार बनाकर भारत के प्रभाव को रोकने का प्रयास किया जा रहा है। सोनिया गांधी के लेख से ठीक एक सप्ताह पहले, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्रीय जनजातीय कल्याण मंत्री जुयाल ओराम को एक पत्र लिखकर इस परियोजना को रोकने की माँग की थी, यह कहते हुए कि यह द्वीप की आदिवासी आबादी को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करेगा। हालांकि, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने द हिंदू में ही लेख लिखकर माँ-बेटे की तथाकथित “जवाबदेही वाली चिंताओं” का सटीक और तथ्यों पर आधारित उत्तर दिया।

लेकिन लगता है कि इस परियोजना को बाधित करने के पीछे एक और बड़ा षड्यंत्र काम कर रही है, और इसका केंद्र एक NGO है जिसका नाम है सर्वाइवल इंटरनेशनल । अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर यह संगठन दावा करता है कि वह “जनजातीय लोगों के विनाश को रोकने और उनकी ज़मीनों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए काम करता है। हम दुनिया भर की जनजातियों के साथ काम करते हैं, और हमारे अडिग अभियान इन गहरे और स्थायी रिश्तों पर आधारित हैं। हम उन्हें एक मंच प्रदान करते हैं जिससे वे दुनिया को उस जातीय हिंसा और नस्लवाद के बारे में बता सकें, जिसका वे रोज़ सामना करते हैं।” यह संस्था अपने लक्ष्यों को पाने के लिए लॉबिंग, एडवोकेसी और जनसंपर्क अभियानों पर निर्भर करती है।

इस परियोजना की घोषणा के बाद से ही सर्वाइवल इंटरनेशनल ने जनजातीय अधिकारों के नाम पर इसके विरोध में अभियान चलाया है। अप्रैल 2024 में, बारह शिक्षाविदों और एनजीओ कार्यकर्ताओं ने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह एकीकृत विकास निगम को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि यह परियोजना वहाँ के जनजातीय अधिकारों की अनदेखी कर रही है और उन्होंने इस अत्यंत महत्वपूर्ण परियोजना को रद्द करने की माँग की। विडंबना यह है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भी इस परियोजना को रोकने के लिए ठीक वही आधार अपनाया है, जो इस अंतरराष्ट्रीय एनजीओ द्वारा प्रस्तुत किया गया है! बाद में, इन कार्यकर्ताओं द्वारा लिखे गए पत्र को सर्वाइवल इंटरनेशनल ने अपनी वेबसाइट पर एक लेख में उद्धृत किया, जिसका शीर्षक था: “भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि मेगा-परियोजना से अविकसित द्वीप जनजाति का ‘विलुप्त होना’ तय है।”

वर्ष 2025 में, सर्वाइवल इंटरनेशनल ने संयुक्त राष्ट्र की जातीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें भारत सरकार को मजबूर करने की कोशिश की गई कि वह “ग्रेट निकोबार परियोजना की सभी वर्तमान और भविष्य की योजनाओं को त्याग दे।” इस रिपोर्ट के शुरुआती पन्नों में, पर्यटकों की आमद के कारण स्थानीय जनजातियों पर पड़ने वाले काल्पनिक नकारात्मक प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में अप्रैल 2024 में ANIIDCO को भेजे गए तथाकथित विशेषज्ञों के पत्र का भी उल्लेख किया गया। यदि इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों की गंभीर समीक्षा की जाए, तो आदिवासी कल्याण और पारिस्थितिकीय चिंताओं की आड़ में छिपे असली और खतरनाक एजेंडे का पर्दाफाश हो जाएगा। उसी पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक थे आशीष कोठारी। कोठारी कल्पवृक्ष और विकल्प संगम के संस्थापक हैं। वे नर्मदा बचाओ आंदोलन से भी जुड़े हुए थे — यह आंदोलन भारत की कृषि अवसंरचना के विकास में बाधा डालने वाला नव-मार्क्सवादी अभियान माना जाता है। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कोठारी, नर्मदा डैम विरोधी होने के बावजूद, सरकार की नदी घाटी परियोजनाओं पर पर्यावरण मूल्यांकन समिति और जैव विविधता अधिनियम के लिए विशेषज्ञ समितियों में भी शामिल रहे हैं! दुनिया भलीभांति जानती है कि यूपीए का दस साल लंबा शासन दिल्ली दरबार में शहरी नक्सलियों को सत्ता के गलियारों में स्थान देने के लिए बदनाम था। लेकिन जो बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है वह यह कि आशीष कोठारी एक तथाकथित स्वतंत्र मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ओपन डेमोक्रेसी से भी जुड़े रहे हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यह मीडिया प्लेटफॉर्म लगातार जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन , ओमिदयार नेटवर्क , फोर्ड फाउंडेशन जैसी विवादास्पद संस्थाओं से फंडिंग प्राप्त करता रहा है।

  • 2021 में, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (ओएसएफ) ने “ट्रेकिंग द बैकलैश ” प्रोजेक्ट के लिए 24 महीनों की अवधि के लिए $6,00,000 की ग्रांट दी थी।
  • उसी वर्ष, ओएसएफ ने ओडीआर प्रोजेक्ट को समर्थन देने के लिए फिर से 24 महीनों के लिए $1,60,000 की ग्रांट दी।
  • इसके अलावा ओएसएफ ने “जलवायु संकट और चिली में संवैधानिक सुधारों के इर्द-गिर्द जागरूकता और बहस को समृद्ध करने” के लिए $25,000 की सात महीने की ग्रांट प्रदान की थी।
  • 2020 में, सोरोस की एक और संस्था ओपन सोसाइटी पालिसी सेंटर ने €40,000 से €60,000 की ग्रांट ओपन डेमोक्रेसी को दी थी।
  • 2012 से 2021 के बीच, भारत की विकास यात्रा को बाधित करने वाले कई संस्थानों द्वारा इस तरह की फंडिंग बार-बार की गई।
  • किसी भी एनजीओ को मिलने वाली फंडिंग उसे अपने फंडिंग करने वालों के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए बाध्य कर देती है। ग्रेटर निकोबार द्वीप परियोजना के मामले में भी यही खेल खेला जा रहा है।
  • यह पहली बार नहीं है जब सर्वाइवल इंटरनेशनल ने भारत की विकास यात्रा को बाधित करने का प्रयास किया है! इसके 2021 और 2022 के वार्षिक रिपोर्टों में एक अभियान का उल्लेख मिलता है — “आदिवासीस अगेंस्ट कोल ” ।
  • इस अभियान की आड़ में, इसने भारत की ऊर्जा अवसंरचना को बाधित करने और हमारी ऊर्जा सुरक्षा को कमजोर करने का प्रयास किया।
  • आयकर विभाग (आईटी) ने एन्वायरोनिक्स ट्रस्ट को एक 104 पन्नों का नोटिस भेजा, जिसमें एनजीओ की फंडिंग गतिविधियों और कॉरपोरेट-विरोधी प्रदर्शनों में संलिप्तता को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए।

इस पत्र में आरोप था कि एन्वायरोनिक्स ट्रस्ट ने लंदन स्थित सर्वाइवल इंटरनेशनल के साथ मिलकर झारखंड के गोड्डा स्थित अडानी प्लांट के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन भड़काए, ताकि एंटी-अडानी आंदोलन को मजबूत किया जा सके।
यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत के खिलाफ एक सुनियोजित पैटर्न चल रहा है- जिसकी मंशा है भारत की विकास यात्रा को बाधित करना। शक्तियाँ झूठे नैरेटिव गढ़कर भारत के खिलाफ प्रचार को हथियार बनाती हैं।

दुष्प्रचार प्रोपेगंडा का उद्देश्य ही होता है-

जनता का राज्य पर से भरोसा कम करना और वैकल्पिक लेकिन झूठे नैरेटिव के माध्यम से भ्रम और अविश्वास का वातावरण तैयार करना। गलत जानकारियाँ और नैरेटिव्स ऐसे माध्यम बन जाते हैं, जिनके ज़रिये लोगों की सोच और विचारों को विकृत किया जाता है।लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस लोकतंत्र की सबसे पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस, आखिर क्यों भारत की विकास गति को रोकने की इस गहरी और खतरनाक साजिश का हिस्सा बनती जा रही है?

Topics: Adani Project ProtestRahul GandhiNarmada Bachao AndolanAnti-India narrativeGreater Nicobar ProjectSonia Gandhi CriticismANIIDCIndia's Maritime SecurityAnti-Corporate Movement
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