नेपाल इन दिनों जिस राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहा है, वह केवल उसकी आंतरिक परिस्थिति नहीं है। यह भारत के लिए भी उत भारत नेपाल संबंधों नी ही महत्वपूर्ण परीक्षा है।
भारत नेपाल संबंधों में भ्रंश रेखाएं यानी ‘फॉल्ट लाइंस’ खोजने-बढ़ाने वाले विदेशी और वैचारिक विरोधी तत्व इस उथल-पुथल का लाभ दोनों देशों के सदियों पुराने सामाजिक ताने-बाने को स्थायी तौर पर बड़ी क्षति पहुंचाने के लिए उठा सकते हैं। इसलिए यह समय भौगोलिक समीकरण या शक्ति संतुलन की चर्चा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सौहार्द और सभ्यता-निरंतरता को स्थिरता देने का है।
भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणियों से भी यह स्पष्ट संदेश सामने आया है कि नेपाल की स्थिति को भारत पूरी संवेदनशीलता और प्रभुसत्ता के सम्मान के साथ देख रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी और दोनों देशों का समाज इस समय की अपेक्षा को समझते हुए संबंधों को स्वाभाविक सहयोग से दृढ़तापूर्वक सहेजें।
प्रश्न यह नहीं है कि बाहरी लोग भारत और नेपाल के परस्पर संबंध की व्याख्या कैसे और क्यों करते हैं, समझने वाली बात यह है कि भारत-नेपाल संबंध किसी राजनीतिक आवश्यकता अथवा भू-रणनीतिक समीकरण पर आधारित नहीं है। यह गंगा-गौरी, राम-सीता और पशुपतिनाथ-काशी जैसे अटूट सांस्कृतिक बंधनों से जुड़ा हुआ है। नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू-बहुल राष्ट्र है, जहां लगभग 81 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू है। पशुपतिनाथ मंदिर, जनकपुर का राम-जानकी विवाह मंडप और काठमांडू घाटी की सांस्कृतिक परंपराएं इस पूरे क्षेत्र की मूल सांस्कृतिक धारा का अनमोल भाग और स्रोत भी हैं।
2018 में जब अयोध्या-जनकपुर ‘रामायण बस सेवा’ आरम्भ हुई और दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने मिलकर इसे हरी झंडी दिखाई, तो यह एक संकेत था कि यह रिश्ता सीमाओं से परे है। भारत और नेपाल का ‘रोटी-बेटी’ का रिश्ता पीढ़ियों से जीवंत है। हर वर्ष हजारों विवाह और लाखों लोगों का पारिवारिक आदान-प्रदान इसका प्रमाण है।
सुरक्षा और साझा जिम्मेदारी के बिंदु इस संबंध को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। भारत-नेपाल के बीच 1,770 किमी. लंबी खुली सीमा है। यह सीमा दोनों देशों के लिए सुविधा भी है और चुनौती भी। यदि नेपाल अस्थिर होता है, तो उसका असर सीधे भारत के सीमावर्ती प्रदेशों, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और सिक्किम तक पहुंचता है।
1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि ने दोनों देशों के नागरिकों को बिना वीजा आने-जाने और काम करने का अधिकार दिया। यही कारण है कि नेपाल की हर ‘धड़कन’ भारत के भीतर सुरक्षा, व्यापार और सामाजिक संबंधों को भी स्पंदित करती है। नेपाल से लगभग 80 लाख लोग भारत में काम करते हैं और लाखों भारतीय व्यापारी नेपाल में सक्रिय हैं। नेपाल को भारत में काम कर रहे प्रवासियों से हर साल 1.2 अरब डॉलर का ‘रेमिटेंस’ मिलता है। जानकार इस आर्थिक प्रवाह को इन आंकड़ों से भी बहुत अधिक और दोनों समाजों के जीवंत ताने-बाने का प्रमुख संकेतक मानते हैं। स्पष्ट है, कोई भी अस्थिरता दोनों समाजों के दैनंदिन जीवन को प्रभावित करती है।
बाहरी हस्तक्षेप और चुनौतियों का उल्लेख भी इस संदर्भ में आवश्यक है, क्योंकि नेपाल की अस्थिरता को बाहरी शक्तियां बार-बार भड़काती रही हैं। 2017 में नेपाल के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से जुड़ने के बाद चीन उस देश में सड़क, बिजली और जलविद्युत परियोजनाओं में अरबों डॉलर निवेश की योजना बना रहा है। अनेक विश्लेषक मानते हैं कि इसका उद्देश्य आर्थिक सहयोग से अधिक नव-साम्राज्यवाद विस्तार और क्षेत्र में रणनीतिक पकड़ बनाना है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान भी गुप्त एजेंसियों के माध्यम से भारत-विरोधी एजेंडा नेपाल में जगह बनाने की कोशिश करता है। इस संदर्भ में मिर्जा दिलशाद बेग की कुख्यात कड़ी किसे याद नहीं होगी? कम चर्चित, किंतु अधिक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पश्चिमी शक्तियों से संचालित एनजीओ नेटवर्क सेकुलरिज्म और मानवाधिकार के नाम पर नेपाल में कन्वर्जन और राजनीतिक दखल से विभिन्न मुद्दे उभारता और इस शांत निर्दोष समाज को उद्वेलित करता रहा है। 2010 के दशक में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों को लेकर नेपाल में गहन बहस हुई थी। यह भी एक कारण है कि भारत के लिए नेपाल केवल ‘पड़ोसी’ नहीं, बल्कि सभ्यतागत अनन्य सहयोगी है।
यह स्मरण रखना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में काठमांडू संसद को संबोधित करते हुए कहा था, ‘‘भारत-नेपाल संबंधों में कोई बड़ा-छोटा नहीं, केवल साझेदारी है।’’ यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि यह दृष्टिकोण भारत की नीति का स्थायी और अविचलित आधार है।
नेपाल की संप्रभुता का सम्मान करना और वहां स्थिरता को समर्थन देना भारत की भूमिका का केंद्र है। जन आकांक्षाओं को समझना ही नेपाल की स्थिरता और भारत-नेपाल साझेदारी का सबसे ठोस मार्ग है। यदि नेपाल स्थिर, दृढ़ और जन भावनाओं के अनूकूल होगा, तो यह भारत की सुरक्षा और दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए भी लाभकारी होगा। दोनों देशों के मध्य सभ्यतागत निरंतरता की यह ऐसी धारा है, जिसे बाहरी दृष्टिकोण या सामाजिक जुड़ाव के बिना विशिष्ट राजनीतिक हित के लिए गढ़े गए किसी मीडिया विमर्श के झरोखे से नहीं समझा जा सकता। अंतरराष्ट्रीय या किसी भी मीडिया को इन संबंधों का सातत्य, गरिमा और संवेदनशीलता समझे बिना इन आंतरिक स्थितियों को ‘टकराव, खंडन, दूरी या विचलन’ के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
भारत के लिए पशुपतिनाथ की देहरी और मां जानकी का मायका उन शाश्वत संबंध मणियों की मंजूषा है, जिसमें भारत-नेपाल रूपी रत्न एक-सी आभा से आलोकित है। इसे किसी पश्चिमी अकादमिक मॉडल या आयातित आघाती कूटनीतिक आधार पर समझा या सीमित नहीं किया जा सकता। भारत-नेपाल, दोनों के सत्ता प्रतिष्ठानों और उससे भी बढ़कर दोनों ही देशों के समाजों की साझेदारी को सांस्कृतिक और सभ्यतागत दृष्टि से समझना ही समाधान की कुंजी है।
नेपाल की स्थिरता सीधे भारत की सुरक्षा, सांस्कृतिक सौहार्द और सामाजिक ताने-बाने से जुड़ी है। यह समय भौगोलिक शक्ति संतुलन की राजनीति का नहीं, बल्कि साझा सभ्यता को स्थिरता देने का है।
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