RSS के 100 साल : भारत में जन्मीं और विकसित सभी भाषाएं हैं राष्ट्रभाषा
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RSS के 100 साल : भारत में जन्मीं और विकसित सभी भाषाएं हैं राष्ट्रभाषा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के केंद्रीय कार्यक्रमों में हिंदी का ही प्रयोग होता है, लेकिन वह सभी भारतीय भाषाओं के विकास और चलन का पक्षधर है। यही कारण है कि प्रचारक जहां भी जाते हैं, वे पहले स्थानीय भाषा सीखते हैं। इससे संपर्क और कार्य दोनों आसान हो जाते हैं

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 12, 2025, 08:02 am IST
inभारत, संघ @100

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सब भारतीय भाषाओं तथा बोलियों का समर्थक है। उसकी मान्यता है कि भारत में जन्मीं तथा विकसित सभी भाषाएं राष्ट्रभाषा हैं और उन्हें सम्मान मिलना चाहिए। जो प्रचारक या पूर्णकालिक कार्यकर्ता अपने प्रांत से बाहर भेजे जाते हैं, वे शीघ्र ही स्थानीय भाषा और बोली सीख लेते हैं। संघ के केंद्रीय कार्यक्रमों में कार्यवाही हिंदी में ही होती है, यद्यपि आंकड़े अंग्रेजी में भी दिए जाते हैं। इस संबंध में कई प्रसंग प्रेरक और रोचक हैं।

विजय कुमार
वरिष्ठ प्रचारक, रा.स्व.संघ

आजादी के बाद दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी आंदोलन हुआ। वहां के कुछ नेताओं और बुद्धिजीवियों को भय था कि उत्तर भारत वाले हिंदी के बहाने हम पर हावी हो जाएंगे। उन्हीं दिनों कोयम्बतूर के एक कार्यक्रम में सरसंघचालक श्रीगुरुजी मुख्य वक्ता तथा हिंदी विरोधी पूर्व केंद्रीय मंत्री षणमुगम् शेट्टी अध्यक्ष थे। श्रीगुरुजी ने कहा कि कि भारत की हर भाषा राष्ट्रभाषा है; पर संस्कृतनिष्ठ हिंदी संपर्क के लिए सबसे अच्छी है। श्री शेट्टी चकित हो गए। उन्होंने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि यदि संघ का यह दृष्टिकोण है, तो मैं उसका समर्थन करता हूं।

इस बारे में श्रीगुरुजी के दो साक्षात्कार दिसंबर, 1957 तथा अक्तूबर, 1967 के ‘आर्गनाइजर’ में प्रकाशित हुए हैं। भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष डॉ. रघुवीर भी हिंदी के प्रबल समर्थक थे। एक बार जब वे दक्षिण में गए, तो लोगों ने उनका विरोध किया। उन्होंने कहा, “मैं जितना हिंदी का समर्थक हूं, उतना ही आपकी स्थानीय भाषा का भी हूं। आइए, हम सब मिलकर विदेशी भाषा अंग्रेजी को हटाएं।” विरोधी चुप हो गए। संघ के वरिष्ठ प्रचारक तथा उड़ीसा में संघ कार्य के सूत्रधार स्व. बाबूराव पालधीकर कई रोचक संस्मरण बताते थे। संघ के शुरू में नागपुर के शिविर आदि में पूरे देश से स्वयंसेवक आते थे।

वहां कार्यक्रम हिंदी में ही होते थे; पर उसे न जानने वाले स्वयंसेवक जब हिंदी बोलते थे, तो बड़ा विनोद निर्माण होता था। भोजन के लिए सब अपनी थाली, कटोरी आदि लेकर आते थे। सूचना देने वाले कार्यकर्ता हिंदी न जानने के कारण मराठी शब्द तोड़-मरोड़कर बोलते थे। हिंदी में माटी के लिए मिट्टी, पाटी के लिए पट्टी जैसे शब्द हैं। उसने समझा कि मराठी में थाली को ‘ताट’ कहते हैं, तो हिंदी में भी ‘तट्टी’ होगा। कभी-कभी इसका उच्चारण बिगड़ने से हंसी के फव्वारे छूट जाते थे। बाद में सही अर्थ जानकर वह लज्जित होता था। फिर भी वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते थे कि लज्जा की बात नहीं है। राष्ट्रभाषा ऐसे ही बनती है।

इस खबर को भी पढ़ें-

RSS: परमवैभव की पुनर्प्राप्ति हेतु हिंदुत्व के पुनर्जागरण का संकल्प

एक बार उनकी शाखा पर ‘भारत सेवाश्रम संघ’ के संन्यासी आए। स्वयंसेवक तथा संन्यासी महोदय को एक-दूसरे की भाषा नहीं आती थी। अपने भाषण में वे जोर से बोले, “खड़े हो जाओ, खड़े हो जाओ। भारत माता डाकता है।” स्वामी विवेकानंद के ‘उतिष्ठत् जाग्रत’ वाले उद्बोधन का उन्होंने अपनी हिंदी में यह अनुवाद किया। ‘भारत माता डाकता है’ का अर्थ कोई नहीं समझा; फिर भी कई स्वयंसेवक सचमुच खड़े हो गए।

1981 में दीपावली पर देशभर के जिला प्रचारकों का शिविर बेंगलुरु के पास चनेनहेल्ली में हुआ। उस समय कर्नाटक के प्रांत प्रचारक श्री अजीत कुमार थे। उनकी हिंदी भी रामभरोसे ही थी। प्रातःकाल शौचालयों के बाहर प्रायः लाइन लग जाती थी। एक बार किसी ने लघुशंका स्थल का ही इसके लिए उपयोग कर लिया। इस पर अजीत जी ने शाम की सभा में कहा, “कुछ लोग लघुशंका स्थान से शौच कर रहे हैं। कृपया ऐसा न करें।” हिंदी जानने वालों ने भरपूर ठहाका लगाया। संघ के तृतीय वर्ष के वर्ग (अब कार्यकर्ता विकास वर्ग दो) में सारे देश से कार्यकर्ता आते हैं।

वहां भी कई रोचक प्रसंग देखने और सुनने को मिलते हैं। मैं 1981 में नागपुर गया था। हमारे एक शरारती साथी ने एक हृष्ट-पुष्ट तमिल-भाषी स्वयंसेवक को कहा कि चूहे का अर्थ बलशाली होता है। अतः वह बार-बार अपनी भुजाएं दिखाकर कहता था, “मैं चूहा हूं।” इस पर सब हंसते थे। कई दिन बाद वह इस मजाक का अर्थ समझा। वहां ऐसी भाषायी चुहल होती रहती थी; पर कोई बुरा नहीं मानता था। वस्तुतः किसी भी भाषा का प्रचार-प्रसार उसे बोलने से ही होता है। शुरू में कुछ झिझक होती है; पर एक बार वह टूट गई, तो फिर बोलना स्वाभाविक हो जाता है।

एक समय आर्य समाज ने हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महर्षि दयानंद सरस्वती गुजराती थे; पर उन्हें लगा कि यदि देशभर में अपनी बात पहुंचानी है, तो वह हिंदी में ही पहुंचाई जा सकती है। इसलिए उन्होंने हिंदी का प्रयोग किया और अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिंदी में ही लिखा। यही अनुभव गांधी जी को भी हुआ। उन्होंने कई लोगों को हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण में भेजा। उन लोगों ने हर राज्य में हिंदी सभा बनाईं, जो आज भी किसी न किसी रूप में कार्यरत हैं। यद्यपि पूर्णतः शासनाश्रित होने के कारण उनमें वह तेजस्विता नहीं रही।

संघ ने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए वार्तालाप को ही महत्व दिया। हिंदीतर राज्यों में भी प्रचारकों आदि को इसके लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जहां एक ओर पत्र-पत्रिकाओं और दूरदर्शन पर हिंदी के विकृतिकरण का अभियान चल रहा है, वहीं दूसरी ओर अनेक लोग तथा संस्थाएं इसके प्रचार-प्रसार में लगी हैं। यदि स्वाधीन होते ही संस्कृतनिष्ठ हिंदी को प्रोत्साहन दिया जाता, तो भाषा के नाम पर हुए और हो रहे झगड़े नहीं होते।

परिणाम यह है कि अब हिंदी क्रमशः अंग्रेजी और उर्दू के बाद अरबी और फारसीनिष्ठ हो चली है। हिंदी-प्रेमियों को चाहिए कि वे हिंदी बिगाड़ने वालों का विरोध करें तथा इसके पक्षधरों को सहयोग दें। हिंदी तथा भारत की अन्य सभी राष्ट्रीय भाषाओं के समर्थक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयासों को इसी दृष्टि से देखना चाहिए।

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