हजरतबल विवाद : राष्ट्रीय प्रतीक पर संकीर्ण राजनीति की परछाईं
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हजरतबल विवाद : राष्ट्रीय प्रतीक पर संकीर्ण राजनीति की परछाईं

आखिर राष्ट्रीय प्रतीक किसी का विरोधी कैसे हो सकता है? वही प्रतीक जो संसद भवन, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रपति भवन और मुद्रा पर अंकित है, वही जब दरगाह की दीवार पर दिखा तो अचानक “मूर्ति” कैसे बन गया?

Written byअनिल पांडेयअनिल पांडेय
Sep 11, 2025, 06:53 pm IST
in भारत, विश्लेषण

कश्मीर की हजरतबल दरगाह, जिसे कश्मीर घाटी का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है, इन दिनों एक संगमरमर की पट्टिका को लेकर देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। दरगाह के जीर्णोद्धार के अवसर पर वक्फ बोर्ड ने एक पट्टिका लगवाई। जिस पर भारत का राष्ट्रीय प्रतीक “सिंहचिह्न” और “अशोक चक्र” अंकित था। कुछ ही दिनों में भीड़ ने उस पट्टिका को तोड़ डाला और देखते ही देखते यह विवाद राजनीति का अखाड़ा बन गया। नेशनल कॉन्फ्रेंस, महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी और अन्य मुस्लिम परस्त दलों ने इस मुद्दे को धार्मिक भावनाओं से जोड़कर राजनीतिक रंग देने में देर नहीं लगाई।

लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर राष्ट्रीय प्रतीक किसी मजहब का विरोधी कैसे हो सकता है? वही प्रतीक जो संसद भवन, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रपति भवन और मुद्रा पर अंकित है, वही जब दरगाह की दीवार पर दिखा तो अचानक “मूर्ति” कैसे बन गया? इस प्रश्न का उत्तर हमें केवल धार्मिक तर्कों में नहीं, बल्कि उस संकीर्ण राजनीति में मिलेगा जो बार-बार कश्मीर की राष्ट्रीय पहचान को आस्था और भावनाओं की धुंध में धकेलने का काम करती रही है।

भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों का महत्व

भारत का “सिंहचिह्न” और “अशोक चक्र” केवल सरकारी निशान भर नहीं हैं। ये इस देश की आत्मा हैं और संविधान की पहचान हैं। इनका इतिहास किसी एक धर्म से नहीं जुड़ा, बल्कि समूची भारतीय सभ्यता से जुड़ा है। अशोक चक्र बौद्ध धर्म से प्रेरित धम्मचक्र है, जो न्याय, सत्य और शांति का प्रतीक है। सिंहचिह्न भारत की प्राचीन संस्कृति से लिया गया है, जो साहस और धर्मनिष्ठा का संदेश देता है। संविधान सभा ने इन्हें अपनाते समय यही संदेश दिया था कि भारत धर्म और जाति से ऊपर उठकर न्याय और सत्य का देश होगा। कश्मीर, जो कभी बौद्ध संस्कृति और शिक्षा का केंद्र रहा है, वहां इस प्रतीक का विरोध करना न केवल ऐतिहासिक भूल है, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविस्मृति भी है।

संविधान और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान

संविधान में यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान हर नागरिक का कर्तव्य है। अनुच्छेद 51ए कहता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय प्रतीकों का आदर करे। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय सम्मान का अपमान निवारण अधिनियम- 1971 इस व्यवस्था को और सख्त बनाता है। इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति यदि राष्ट्रीय ध्वज या संविधान द्वारा स्वीकृत प्रतीक का अपमान करता है, तो उसे तीन वर्ष तक की सज़ा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस दृष्टि से हजरतबल में पट्टिका तोड़ना केवल धार्मिक असहमति नहीं, बल्कि सीधा संवैधानिक अपराध है। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि कश्मीर की राजनीति ने इसे अपराध के रूप में देखने के बजाय भावनाओं की राजनीति का साधन बना लिया।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और दोहरा रवैया

मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने यह कहकर विवाद को हवा दी कि दरगाह में राष्ट्रीय प्रतीक लगाने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। तो पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने इसे धार्मिक भावनाओं से छेड़छाड़ करार दे दिया। लेकिन न उमर अब्दुल्ला ने यह पूछा कि दरगाह में राष्ट्रीय प्रतीक तोड़ने की हिम्मत किसने की और क्यों की, न महबूबा मुफ़्ती ने यह कहा कि राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान अस्वीकार्य है। सबकी कोशिश यही रही कि राष्ट्र और धर्म के बीच एक झूठा संघर्ष खड़ा किया जाए और जनता की भावनाओं को भड़काकर धारा 370 हटने के बाद कमजोर हुई अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की जाए। यही कश्मीर की पुरानी बीमारी है, जहां राष्ट्रहित हमेशा वोटबैंक की राजनीति के आगे बौना हो जाता है।

प्रशासनिक असावधानी और संवाद की कमी

वक्फ बोर्ड ने पट्टिका लगाने से पहले स्थानीय धार्मिक विद्वानों से संवाद नहीं किया। यह प्रशासनिक असावधानी है। लेकिन प्रशासनिक चूक का समाधान हिंसा या राष्ट्रीय प्रतीक को तोड़ने से नहीं हो सकता। संवाद की कमी का समाधान बातचीत और सहमति से ही निकलता है। राष्ट्रीय प्रतीक सभी भारतीयों के लिए समान रूप से सम्माननीय हैं। लेकिन प्रतीक का अपमान राष्ट्र की आत्मा को चोट पहुंचाना है। दुखद तो यह है कि जिन नेताओं ने संविधान की रक्षा की शपथ ली है, वही आज राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर चुप्पी साधे बैठे हैं। कश्मीर की राजनीति में यह प्रवृत्ति कोई नई नहीं है। कभी तिरंगे को जलाया गया, तो कभी राष्ट्रगान का विरोध किया गया। और अब अशोक चक्र को “मूर्ति” कहकर नकारा जा रहा है। हर बार यही तर्क दिए जाते हैं कि यह आस्था का मामला है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह आस्था नहीं, बल्कि राजनीति है। यदि आज दरगाह की दीवार पर राष्ट्रीय प्रतीक पर आपत्ति जायज़ मान ली जाएगी तो कल स्कूलों और दफ्तरों में तिरंगे पर भी सवाल खड़े किए जाएंगे!!! यही वह रास्ता है जो धीरे-धीरे राष्ट्र की एकता और अखंडता को कमजोर करता है।

राष्ट्रीय प्रतीकों की सार्वभौमिकता

यह भी ध्यान देने योग्य है कि “अशोक चक्र” और “सिंहचिह्न” किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि सभी धर्मों का प्रतीक हैं। बौद्ध परंपरा से निकला धम्मचक्र किसी मुसलमान की आस्था का विरोधी नहीं है। सिंहचिह्न किसी हिंदू की पूजा का विषय नहीं है। ये केवल राष्ट्र के प्रतीक हैं। इन्हें धर्म की कसौटी पर परखना न केवल गलत है बल्कि खतरनाक भी है। धर्म का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन धर्म के नाम पर राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता।

विपक्ष की विफलता और वोटबैंक की राजनीति

सबसे बड़ी विफलता विपक्ष और मुस्लिम परस्त नेतृत्व की यही है कि उन्होंने जनता को शांत करने के बजाय भड़काया। उन्होंने दोषियों की निंदा नहीं की, बल्कि उनके कृत्य को मौन समर्थन दिया। उन्होंने संविधान से ऊपर आस्था का तर्क दिया। यही मानसिकता कश्मीर को बार-बार मुख्यधारा से दूर करती है। यदि वे वास्तव में जनता का भला चाहते तो बताते कि राष्ट्रीय प्रतीक किसी धर्म के नहीं हैं, बल्कि सबके लिए समान हैं। लेकिन उन्होंने यह करने की बजाय वही किया जो हमेशा से करते आए हैं। राष्ट्रहित की बलि चढ़ाकर वोटबैंक की राजनीति को साधना। आज आवश्यकता यह है कि कश्मीर की जनता और नेता, दोनों यह समझें कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। यदि राष्ट्रीय प्रतीकों को धर्म की कसौटी पर परखा जाने लगा तो फिर कोई साझा आधार नहीं बचेगा जो भारत की विविधता को एकता में बांध सके।

राष्ट्रीय अस्मिता और कश्मीर की राजनीति

हजरतबल विवाद हमें यही सिखाता है कि राष्ट्रहित और संविधान की गरिमा से ऊपर कुछ भी नहीं हो सकता। संवाद की कमी का समाधान बातचीत है, आहत भावनाओं का समाधान संवेदनशीलता है। लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं। कश्मीर को यदि विकास और शांति की राह पर बढ़ना है तो वहां की राजनीति को यह त्याग करना होगा कि वह हर राष्ट्रीय प्रश्न को वोटबैंक के चश्में से देखे। राष्ट्रीय प्रतीकों की रक्षा राष्ट्र की आत्मा की रक्षा है। जो लोग इन्हें धर्म और राजनीति की संकीर्ण खांचों में बांधने का प्रयास कर रहे हैं, वे न केवल संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं बल्कि राष्ट्र की आत्मा को भी चोट पहुंचा रहे हैं।

संदेश और समाधान

समय की मांग है कि भारत की संसद, न्यायालय और सरकार इस घटना को केवल एक विवाद न मानें, बल्कि इसे राष्ट्रीय अस्मिता के प्रश्न के रूप में देखें। दोषियों को क़ानून के अनुसार सज़ा मिले और राजनीतिक दलों को यह सिखाया जाए कि राष्ट्रहित से ऊपर कोई वोटबैंक नहीं हो सकता। यही संदेश हजरतबल विवाद से निकलना चाहिए कि राष्ट्रीय प्रतीकों की मर्यादा सर्वोपरि है और उनकी रक्षा करना हर भारतीय का सबसे बड़ा धर्म है।

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अनिल पांडेय
अनिल पांडेय
मीडिया रणनीतिकार और राजनीतिक विश्लेषक [Read more]
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