महंत अवेद्यनाथ जी महाराज : राष्ट्रसंत की राष्ट्र आराधना का सनातन पथ
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महंत अवेद्यनाथ जी महाराज : राष्ट्रसंत की राष्ट्र आराधना का सनातन पथ

महंत अवेद्यनाथ जी महाराज का जीवन सामाजिक समरसता, राममंदिर आंदोलन और शिक्षा में योगदान का प्रेरणास्रोत रहा। जानिए उनकी अद्भुत विरासत।

Written byप्रणय विक्रम सिंहप्रणय विक्रम सिंह
Sep 9, 2025, 07:46 pm IST
inभारत, मत अभिमत, उत्तर प्रदेश

समाज के आकाश में जब-जब अंधकार के बादल गहराए, जब अन्याय और असमानता की आंधियां जनमानस को झकझोरने लगीं, और जब सनातन संस्कृति की सरिता पर संक्रमण की छाया छाने लगी, तब कोई संत दीप बनकर दिशा दिखाने आता है, ज्योति बनकर जनपथ को आलोकित करता है। राष्ट्रसंत, ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज वही दिव्य दीप थे, जो स्वयं जलकर भी युगों तक समूचे समाज को उजियारा देते रहे।

वे उस दीपशिखा की तरह थे, जो तमस को तपाकर प्रकाश में बदल देती है। उस पावन गंगा-धारा की तरह, जो ऊंच-नीच की शिलाओं को चीरकर समरसता का समतल रचती है। और उस वज्र-संकल्प जैसे, जो राममंदिर आंदोलन के रण में आस्था को विजय का वरण कराता है।

हिमालय की उपत्यकाओं में 1921 में जन्मे कृपाल सिंह बिष्ट ने समय की धाराओं को चीरते हुए गोरक्षपीठ के महंत अवेद्यनाथ का रूप धारण किया। गुरु महंत दिग्विजयनाथ से मिली विरासत केवल मठ की परंपरा नहीं, बल्कि धर्म, समाज और राष्ट्र की दिशा दिखाने का दायित्व था। अवेद्यनाथ जी ने इस पावन ध्वज को न केवल संभाला, बल्कि उसे आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। वे तपस्वी भी थे और तर्कशक्ति से परिपूर्ण योद्धा भी। समाज के सेवक भी थे और राष्ट्रधर्म के संगठक भी।

सामाजिक समरसता के साधक : भेदभाव के विरुद्ध भव्य पुकार

महंत अवेद्यनाथ जी ने गोरक्षपीठ को केवल साधना और उपासना का केंद्र नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सेवा, संस्कार और समरसता का सशक्त सेतु बना दिया। मीनाक्षीपुरम में हुए सामूहिक धर्मांतरण ने उनके अंतर्मन को गहराई तक उद्वेलित किया। यह आघात केवल आस्था पर आक्रमण नहीं था, बल्कि समाज की संवेदना पर असमानता का असहनीय आघात था। उसी क्षण उन्होंने प्रण किया कि भेदभाव की दीवार ढहाना और भाईचारे की बुनियाद गढ़ना ही उनकी तपस्या होगी।

उन्होंने समाज को यह स्मरण कराया कि सनातन की मूल आत्मा ही समरसता है। वह संस्कृति, जो प्राणि मात्र से प्रेम का संदेश देती है, और वह जीवन-पद्धति, जो नर-सेवा को नारायण-सेवा के समतुल्य मानती है, उसमें छुआछूत और ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं हो सकता। इसी दृष्टि से आरंभ हुआ सहभोज का समरस अभियान।

वे स्वयं दलित बस्तियों में पहुंचे, संतों और आचार्यों को साथ लेकर वंचित समाज के बीच बैठे, और थालियों में प्रेम परोसकर समानता का संदेश दिया। काशी में डोमराजा के घर संत-महात्माओं के संग भोजन करना केवल परंपरा को चुनौती देना नहीं था, बल्कि यह शताब्दियों से जमी विषमता पर वज्राघात और समानता की संजीवनी, समरसता की सरस्वती का सजीव उद्घोष था। गोरखपुर और पूर्वांचल के गांवों में जब उन्होंने सहभोज किया, तो वह भोजन नहीं रहा, वह बंधुत्व का बिगुल और भाईचारे का ब्रह्मनाद बन गया।

वे बार-बार स्मरण कराते थे कि “श्रीराम ने शबरी के बेर स्वीकारे, निषादराज को गले लगाया और जटायु का संस्कार किया, यही है समरस समाज का सनातन संदेश।”

उनकी दृष्टि में दुर्गा की आठ भुजाएं केवल दैवीय आयुध नहीं थीं, बल्कि समाज के चारों वर्णों की संयुक्त शक्ति का प्रतीक थीं। वे कहा करते थे कि “जब वर्ण मिलेंगे, वर्ग संगठित होंगे और समाज एक सूत्र में बंधेगा, तभी वह दुर्गा-शक्ति की भांति दुर्जेय और अजेय बनेगा।”

इस प्रकार महंत अवेद्यनाथ जी का प्रत्येक कार्य भेदभाव के विरुद्ध भव्य पुकार, प्रत्येक अभियान समरसता का सशक्त संदेश और प्रत्येक संकल्प समानता के संग्राम का साक्षी था।

  • छुआछूत की जड़ें जलाकर,
  • समरसता का दीप जलाया।
  • भेद मिटाकर, भक्ति मिलाकर,
  • बंधुत्व का बिगुल बजाया॥
  • नर-सेवा में नारायण देखा,
  • प्राणि-मात्र में परमात्मा पाया।
  • महंत अवेद्यनाथ ने जीवनभर,
  • सनातन का सन्देश सुनाया॥

राम मंदिर आंदोलन के अग्रदूत : आस्था के अरुणोदय

महंत दिग्विजयनाथ जी से मिली परंपरा को महंत अवेद्यनाथ जी ने संकल्प की सरिता और संघर्ष की सरस्वती में रूपांतरित कर दिया। यह केवल विरासत का निर्वाह नहीं था, बल्कि उसे जन-जन की चेतना और राष्ट्र की धड़कन में बदल देने का संकल्प था। उनका योगदान संगठनात्मक कौशल से कहीं आगे, समाज की आत्मा को जाग्रत करने का अभियान था।

सन 1984 में जब श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ, तो महंत अवेद्यनाथ सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए। उद्घाटन सभा में उनका उद्घोष गूंजा “राम केवल अयोध्या के राजा नहीं, वे भारत की आत्मा हैं। जब तक जन्मभूमि बंधनमुक्त नहीं होगी, तब तक यह आत्मा चैन से नहीं बैठ सकती।”

उनकी पुकार पर शैव और वैष्णव, संत और महात्मा, धर्माचार्य और तपस्वी सभी एक मंच पर संगठित हुए। यह दृश्य ऐसा था, मानो विभिन्न नदियां मिलकर गंगा का रूप ले रही हों।

1986 में जब अदालत के आदेश से रामलला का ताला खुला, तो यह केवल एक ताले का खुलना नहीं था, बल्कि शताब्दियों से जकड़ी आस्था का कपाट खुलना था। महंतश्री ने उसी समय घोषणा की “आज अयोध्या में केवल द्वार नहीं खुले हैं, आज हिंदू समाज की आत्मा के बंधन टूटे हैं।” उनका स्वर उस क्षण आस्था का आलोक बनकर पूरे राष्ट्र में फैल गया।

9 नवंबर 1989 को शिलान्यास का शुभक्षण आया। महंत अवेद्यनाथ जी ने पहली शिला रखने का सम्मान अनुसूचित जाति के साधक कामेश्वर चौपाल को दिया। यह केवल शिलान्यास नहीं, बल्कि समरसता का शंखनाद था। उन्होंने घोषणा की “राममंदिर जाति-भेद का नहीं, समरसता और समर्पण का प्रतीक होगा। यह शिला हिंदू समाज की एकता की नींव बनेगी।”

उस दिन की शिला ईंट नहीं, एकता की आधारशिला थी। पत्थर नहीं, परस्पर प्रेम का प्रतीक थी।

1990 की कारसेवा में अयोध्या को सैनिक छावनी में बदलकर जब मुलायम सिंह यादव ने कहा कि “यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता” तो उस परिंदे के पंखों में प्राण-शक्ति फूंकने वाले महंत अवेद्यनाथ जी ही थे। जब पुलिस की गोलियां कारसेवकों पर बरसीं, तब भी महंतश्री का संकल्प अडिग रहा। 30 अक्टूबर 1991 को कारसेवकों को श्रद्धांजलि देते हुए उनका उद्घोष गूंजा कि “राम मंदिर किसी की दया से नहीं, हिंदुओं के शौर्य से बनेगा।” उनके इस वचन ने आंदोलन को अमराग्नि की ज्वाला में बदल दिया।

और फिर 6 दिसंबर 1992 का दिन आया। जब विवादित ढांचा गिरा, तो यह केवल पत्थरों का ढेर नहीं टूटा, बल्कि युगों का बोझ ढहकर गिर पड़ा। भारत की आत्मा ने शताब्दियों बाद स्वाभिमान की सांस ली। उस क्षण का अग्रदूत भी यही गोरक्षपीठ और उसके महंतश्री थे। महंत अवेद्यनाथ जी ने उस ऐतिहासिक क्षण पर कहा कि “आज अन्याय का प्रतीक टूटा है। कल इसी भूमि पर न्याय का मंदिर खड़ा होगा। रामलला का भव्य मंदिर बनकर रहेगा। यह इतिहास की नहीं, आस्था की प्रतिज्ञा है।”

महंत अवेद्यनाथ जी का यह संघर्ष केवल ईंट और पत्थर का नहीं था। यह आस्था का आंदोलन था, समरसता का संग्राम था, सनातन का स्वाभिमान था। उनके शब्दों में “राममंदिर का निर्माण केवल अयोध्या का नहीं, भारत की आत्मा का पुनर्जन्म है।”

अवेद्यनाथ अडिग रहे,
टूटी ताले की रोक।
राममंदिर की ज्योति से,
जगमग भारत लोक।।

शिक्षा में संस्कार : बीज से वटवृक्ष तक

महंत दिग्विजयनाथ जी ने जिस महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद का बीज रोपा था, उसे महंत अवेद्यनाथ जी ने अपने परिश्रम, दूरदृष्टि और दृढ़ संकल्प से वटवृक्ष में परिणत कर दिया। उनके लिए शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं थी, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला थी। वे मानते थे कि पुस्तकों में बंद ज्ञान अधूरा है, जब तक उसमें भारतीयता का भाव, राष्ट्रवाद की चेतना और संस्कारों की सुगंध न मिले। इसीलिए उन्होंने शिक्षा को केवल कक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर उसमें सेवा, अनुशासन और संस्कृति का समावेश किया।

आज उनके प्रयत्नों का परिणाम है कि गोरक्षपीठ से संचालित पांच दर्जन से अधिक विद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी और चिकित्सा संस्थान पूर्वी उत्तर प्रदेश की शिक्षा का मेरुदंड बने हुए हैं। इन संस्थानों से हर वर्ष हजारों छात्र- छात्राएं केवल डिग्रियां लेकर नहीं निकलते, बल्कि जीवन-मूल्यों, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना लेकर आगे बढ़ते हैं।

इन संस्थानों में शिक्षा का वातावरण केवल आधुनिक विषयों का अध्यापन नहीं करता, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा से भी जोड़ता है। तकनीकी और चिकित्सा महाविद्यालयों में जहां विज्ञान और शोध की साधना होती है, वहीं प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में प्रार्थना, योग, अनुशासन और राष्ट्रगान से बच्चों के भीतर ‘नैतिकता और राष्ट्रीयता’ का बीजारोपण किया जाता है।

ग्रामीण परिवेश से आए हजारों विद्यार्थियों ने यहां से शिक्षा पाकर प्रशासन, सेना, शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में देश का गौरव बढ़ाया है। इसी तरह गोरखपुर का महाराणा प्रताप इंजीनियरिंग कॉलेज और गोरखपुर मेडिकल कॉलेज उत्तर भारत की उस शिक्षा-धारा के प्रतीक हैं, जहां आधुनिक विज्ञान और भारतीय संस्कार का संगम होता है।

महंत अवेद्यनाथ जी का यह प्रयास केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाने का नहीं था, बल्कि शिक्षा को ‘संस्कार और समर्पण की संजीवनी’ बनाने का था। उनके लिए शिक्षा वही है, जो विद्या के साथ विनय और ज्ञान के साथ सेवा भी सिखाए।

राजनीति में साधुता : सत्ता नहीं, साधना का संकल्प

महंत अवेद्यनाथ जी का राजनीति में प्रवेश सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के लिए नहीं था, बल्कि समाज को समरस और राष्ट्र को सशक्त करने के लिए था। वे मानते थे कि साधुता यदि समाज तक न पहुंचे और समाज-सुधार राजनीति में न बहे, तो धर्म अधूरा रह जाता है।

उनकी राजनीति का लक्ष्य सिंहासन नहीं, सेवा थी। कुर्सी नहीं, कर्तव्य था। और शासन नहीं, शुचिता थी। इसीलिए वे कहते थे “राजनीति यदि समाज-सुधार का साधन न बने, तो वह केवल स्वार्थ का साधन रह जाती है।”

उन्होंने पांच बार उत्तर प्रदेश विधानसभा और चार बार लोकसभा में जनता का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन उनका स्वर हमेशा सत्ता के गलियारों की गूंज से परे, जनसाधारण की वेदना का व्याख्यान रहा। वे संसद और विधानमंडल की बहसों में केवल क्षेत्रीय प्रश्न नहीं उठाते थे, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और समाज-सुधार का स्वर मुखर करते थे।

अखिल भारतीय हिंदू महासभा में उपाध्यक्ष और महासचिव के रूप में उनका योगदान विशेष उल्लेखनीय रहा। उन्होंने संगठन को केवल राजनीतिक मंच नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक राष्ट्रधर्मी आंदोलन का रूप दिया। उनके नेतृत्व में महासभा ने शिक्षा के पुनर्जागरण, सांस्कृतिक स्वाभिमान और राष्ट्रीय अखंडता को अपनी प्राथमिकताओं का केंद्र बनाया।

उनकी राजनीति में साधुता का संतुलन और संघर्ष की सजगता का अनूठा संगम था। वे न कभी स्वार्थ के लिए झुके, न कभी दबाव के लिए रुके। वे राजनीति को तपस्या मानते थे, जिसमें ईमानदारी धूप की तरह तपाती है और जनता का विश्वास गंगाजल की तरह पवित्र करता है।

उनकी छवि केवल संत-नेता की नहीं थी, बल्कि ‘संत-सैनिक’ की थी, जो लोकसभा के मंच पर भी उसी साहस से बोलते थे, जिस साहस से समाज की जटिलताओं का सामना करते थे।

महंत अवेद्यनाथ जी ने सिद्ध कर दिया कि संत राजनीति को भी साधना बना सकता है। उन्होंने गोरक्षपीठ की परंपरा को संसद और विधानमंडल तक पहुंचाकर यह दिखा दिया कि जब नेतृत्व में सत्य, तप और सेवा हो, तो सत्ता भी साधना का साधन बन जाती है।

शिष्य निर्माण : योगी के रूप में युग-उपहार

यही आंदोलन, यही जनजागरण, यही संघर्ष वह भूमि थी जहां नियति ने नया इतिहास गढ़ा।

महंत अवेद्यनाथ जी का सबसे बड़ा योगदान केवल अपने युग का नेतृत्व करना नहीं था, बल्कि आने वाले युग का नेतृत्व गढ़ना था। उन्होंने समझ लिया था कि संस्था, समाज और राष्ट्र का वैभव केवल वर्तमान पर निर्भर नहीं करता, उसका भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी दूरदृष्टि से उन्होंने अजय सिंह बिष्ट को अपना शिष्य बनाया।

यह शिष्यत्व केवल धार्मिक संस्कार तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें सामाजिक सेवा की संवेदना और राजनीतिक नेतृत्व की सजगता भी थी। महंत अवेद्यनाथ जी ने उन्हें तप और त्याग की शिक्षा दी, संघर्ष और समरसता की साधना कराई, और साथ ही समाज व राष्ट्र के व्यापक नेतृत्व के लिए तैयार किया।

आज वही शिष्य योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। वे गुरु के आदर्शों को केवल मठ की परंपरा में नहीं, बल्कि शासन और समाज की नीतियों में साकार कर रहे हैं। कानून-व्यवस्था से लेकर शिक्षा, संस्कृति और विकास की योजनाओं में गुरु का मार्गदर्शन उनकी कार्यशैली में स्पष्ट दिखाई देता है।

यह गुरु-शिष्य परंपरा का एक अद्वितीय उदाहरण है, जहां गुरु ने केवल शिष्य को नहीं गढ़ा, बल्कि आने वाले समय के लिए संपूर्ण युग का उपहार दिया।

महंत अवेद्यनाथ जी का ब्रह्मलीन होना कोई सामान्य घटना नहीं था, यह तो मानो एक संत की इच्छा-मृत्यु थी। उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ के शब्दों में “मेरे गुरुदेव की इच्छा थी कि वे अपने गुरु महंत दिग्विजयनाथ जी की पुण्यतिथि पर ही मंदिर में ब्रह्मलीन हों और हुआ भी वही।”

योगी आदित्यनाथ जी ने अपने पूज्य गुरु जी के कान में कहा कि “आप मंदिर में आ चुके हैं।” और बड़े महाराज जी के चेहरे पर संतुष्टि की आभा झलक आई। आश्विन कृष्ण चतुर्थी (12 सितंबर 2014) को गोरखनाथ मंदिर में गुरु की स्मृति के दिन ही उन्होंने अंतिम श्वास ली।

विस्मृत करने वाली बात है कि 2001 में कैंसर से घिरे होने पर भी वे चौदह वर्षों तक जीवित रहे। यह केवल चिकित्सा का परिणाम नहीं, बल्कि साधना की सिद्धि और इच्छाशक्ति का चमत्कार था। राममंदिर आंदोलन को निर्णायक मोड़ देने वाले इस ‘राष्ट्रसंत’ को स्मरण करते हुए अशोक सिंघल जी ने कहा था कि “वह श्रीराम जन्मभूमि के प्राण थे। उनमें सबको साथ लेकर चलने की विलक्षण प्रतिभा थी।”

जब महंत अवेद्यनाथ जी ने अपने नश्वर शरीर का परित्याग किया, तो यह केवल एक संत का अवसान नहीं था, यह एक युग का विराम था। उनकी आंखे भव्य राम मंदिर देखने की प्रतीक्षा में थीं।

नियति ने यह स्वप्न उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ जी के माध्यम से साकार किया। 2017 में योगी जी मुख्यमंत्री बने और उनके ही कार्यकाल में अयोध्या की धरती पर श्रीराम मंदिर का भव्य निर्माण आरंभ हुआ। यह उस गुरु के अधूरे स्वप्न की पूर्ति थी, जिसने अपना जीवन राम के नाम, समाज के काम और राष्ट्र के उत्थान में अर्पित कर दिया था।

महंत अवेद्यनाथ जी का जीवन साधु की साधना, सैनिक के साहस और समाज सुधारक की संवेदना की त्रिवेणी था। वे उस दीपक की तरह थे, जो स्वयं जलकर भी समाज को आलोकित करता रहा।

उन्होंने अस्पृश्यता की दीवारें तोड़ीं, दलितों और वंचितों के घर सहभोज कर सामाजिक समरसता की राह दिखाई। उन्होंने श्रीराममंदिर आंदोलन को केवल आस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता का आंदोलन बनाया।

उनकी स्मृति हमें यह सिखाती है कि संत का संकल्प समाज की दिशा बदल सकता है। त्याग की तपिश राष्ट्र की आत्मा को गरिमा देती है। और शिष्य का निर्माण ही गुरु की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

उनकी विरासत आज उनके शिष्य योगी आदित्यनाथ के माध्यम से आगे बढ़ रही है। जहां धर्म-साधना और राज्य-साधना एकाकार होकर समाज और राष्ट्र के कल्याण का पथ प्रशस्त कर रही है।

राष्ट्रसंत, ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज समूचे राष्ट्र के सनातनियों के लिए आस्था का आलोक, समाज के समरस स्तंभ और सेवा के संकल्प बनकर युग-युगांतर तक स्मरणीय रहेंगे।

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प्रणय विक्रम सिंह
प्रणय विक्रम सिंह
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विगत डेढ़ दशक से समाज और राजनीति से जुड़े विविध विषयों पर निरंतर, गंभीर और विमर्श प्रधान लेखन कर रहे हैं। [Read more]
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डेंगू के प्रकोप के बीच हरिद्वार में RSS का बड़ा कदम: 4 अक्टूबर को विशाल रक्तदान शिविर, युवाओं से महादान की अपील!

RSS Centenary Year Gorakhpur Prant Pracharak Ramesh Speech Panchjanya

RSS Centenary Year: संघ की शताब्दी यात्रा सेवा और संस्कार का आधार, गोरखपुर में बोले प्रान्त प्रचारक रमेश

Rashtriya Seva Bharti Swavalamban Camp Varanasi Parag Abhyankar Exhibition Panchjanya

“पेट भरने के साथ व्यक्ति को स्वावलंबी बनाना उद्देश्य”: वाराणसी में राष्ट्रीय सेवा भारती वर्ग में बोले पराग अभ्यंकर

विधायक सुखबीर सिंह माइसरखाना (बाएं) और मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान।

पंजाब में शिक्षा क्रान्ति की सचाई: फूट फूट कर रोए आप विधायक, बोले – स्कूलों में अध्यापकों की कमी, सुनवाई नहीं हो रही

काशी में पाकिस्तानेश्वर महादेव का नाम सिंधु गंगेश्वर करने को लेकर सिंधी समाज ने सौंपा ज्ञापन।

काशी में पाकिस्तानेश्वर महादेव का नाम सिंधु गंगेश्वर महादेव करने की मांग, जानिये पाकिस्तान से काशी कैसे पहुंचा शिवलिंग

प्रतीकात्मक चित्र

एसआईआर के बाद अंतिम मतदाता सूची में 7158949 मतदाता

Madhav Srishti Naturopathy Centre Solan Inauguration Governor Vidya Bharti Panchjanya

सोलन में ‘माधव सृष्टि’ प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र का शुभारंभ: राज्यपाल ने की सराहना, जानें केंद्र की बड़ी बातें!

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