संघ ‘हिंदू राष्ट्र’ क्यों कहता है, ‘सनातन राष्ट्र’ क्यों नहीं?
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रा.स्व.संघ के100 वर्ष : संघ ‘हिंदू राष्ट्र’ क्यों कहता है, ‘सनातन राष्ट्र’ क्यों नहीं?

‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने व्याख्यान दिया तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Rajpal Singh Rawat
Sep 1, 2025, 10:58 pm IST
in भारत, संघ को जानें, संघ @100
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत

‘100 वर्ष की संघ यात्रा : नए क्षितिज’। इस अवसर पर मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले, क्षेत्र संघचालक श्री पवन जिंदल और प्रांत संघचालक डाॅ. अनिल अग्रवाल उपस्थित थे। व्याख्यानमाला में पहले दिन एवं दूसरे दिन सरसंघचालक ने व्याख्यान दिया तथा तीसरे दिन ‘जिज्ञासा समाधान सत्र’ का आयोजन किया गया। यहां व्याख्यानमाला के संपादित अंश दिए जा रहे हैं-

प्रश्न-

  1. भारत बुद्ध का देश है, इसलिए शांति अपेक्षित है। फिर संघ युद्ध और शस्त्र की बात क्यों करता है ?

  2. संघ ‘हिंदू राष्ट्र’ क्यों कहता है, ‘सनातन राष्ट्र’ क्यों नहीं? क्या संघ अपने विचारों में बदलाव करता है ?

  3. आजादी के आंदोलन में संघ की भूमिका क्या रही?

  4. कुछ लोग संघ व इसके आनुषांगिक संगठनों पर हिंसा का आरोप लगाते हैं। इस पर आपका क्या विचार है?

उत्तर-

  1. भारत बुद्ध का देश है, इसलिए यहां शांति है और होनी भी चाहिए। लेकिन बाकी देश बुद्ध के देश नहीं हैं। वे युद्ध की भाषा बोलते हैं। इसलिए शस्त्र आवश्यक हैं। जैसे व्यायाम हम किसी को पीटने के लिए नहीं करते, वैसे ही शस्त्रबल हम किसी को मारने के लिए नहीं बढ़ाते। अगर मारने के लिए होते तो अब तक दिख गया होता। पर हमने बार-बार संयम दिखाया है। क्योंकि हम खून-खराबा नहीं चाहते, हम शांति चाहते हैं। संघ की प्रार्थना में कहा जाता है, ‘विश्वस्य देहीश शक्तिं।’ यानी हमें ऐसी शक्ति दो कि कोई हमें जीत न सके। इसमें दूसरों पर विजय की प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मरक्षा की मांग है।

2. “सनातन राष्ट्र” कहने से लोग कन्फ्यूज होते हैं। “हिंदू राष्ट्र” कहने से सबको तुरन्त समझ में आता है। इसलिए यह शब्द प्रयोग किया जाता है। संघ के तीन स्थिर विचार हैं, पहला, व्यक्ति निर्माण से समाज के आचरण में परिवर्तन, दूसरा समाज को संगठित करो, बाकी सब परिवर्तन अपने आप होंगे। तीसरा हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है। इन तीन के अलावा बाकी सबमें समय और परिस्थिति के अनुसार बदलाव संभव है।

3. डॉ. हेडगेवार एक क्रांतिकारी थे। कांग्रेस के आजादी के आंदोलनों में भाग लेने के कारण उन्हें दो बार सश्रम कारावास भुगतना पड़ा। उन्होंने विदर्भ क्षेत्र में आंदोलन का नेतृत्व किया। 1942 के आंदोलन में अनेक स्वयंसेवक शामिल हुए। महाराष्ट्र के आष्टी व चेम्बूर के आंदोलन प्रसिद्ध उदाहरण हैं। उस समय बलिदान देने वालों में कई स्वयंसेवक थे, कई सश्रम कारावास की सजा भुगतकर लौटे। द्वितीय महायुद्ध के बाद जब एमनेस्टी मिली तो 11 लोग छूटे, जिनमें स्वयंसेवक थे। तुकडोजी महाराज के नेतृत्व में जनजागरण व आंदोलन में स्वयंसेवकों ने भाग लिया। वे भजन-कीर्तन के माध्यम से लोगों में चेतना जगाते थे। संघ का योगदान प्रत्यक्ष संगठनात्मक नहीं था, क्योंकि संगठन को बुलाया नहीं गया था, किंतु आंदोलनकारियों को हर संभव मदद दी गई। अनेक स्वयंसेवकों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का प्रमाणपत्र भी प्राप्त हुआ। रज्जू भैया कहा करते थे कि 1942 के आंदोलन के अनुभवों से निराश होकर ही वे संघ के कार्य से अधिक जुड़े। संघ कभी भी हिंसा करने वाला संगठन नहीं रहा है। यदि ऐसा होता तो संघ का भारत के 75 लाख स्थानों तक पहुंचना संभव ही नहीं होता और न ही समाज का इतना व्यापक समर्थन मिलता। शुद्ध सात्विक प्रेम हमारे कार्य का आधार है।

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