“जय जगन्नाथ! संसद में लगेंगे पुरी रथयात्रा के पहिए, भारत की एकता का प्रतीक”
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जय जगन्नाथ! संसद में होंगे पुरी रथ-यात्रा के रथों के पहिये: भारत की एकता, परंपरा और संस्कृति का जीवंत प्रतीक

पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर और वहां होने वाली वार्षिक रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारतीय लोकजीवन की एक विराट परंपरा है

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Sudhir Kumar Pandey
Aug 31, 2025, 08:31 pm IST
inभारत
Devotees in large numbers gather to take part in the Rath Yatra of Lord Jagannath and his two siblings

पुरी रथ यात्रा, जिसमें समाज के सभी लोग बढ़-चढ़कर शामिल होते हैं।

भारत सदियों की सांस्कृतिक यात्रा का संगम है। संसद केवल कानून बनाने का स्थान नहीं है, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का प्रतिबिंब भी है। बीते कुछ वर्षों में संसद परिसर को भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों से जोड़ने की जो प्रक्रिया प्रारंभ हुई है, वह ऐतिहासिक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के नेतृत्व में संसद अब केवल लोकतांत्रिक विचारों का मंच नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का केंद्र भी बन रही है। इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हाल ही में उठाया गया है। यह निर्णय हुआ है कि जगन्नाथ पुरी की विश्वविख्यात रथ यात्रा के तीन पवित्र रथों के तीन पहिए संसद परिसर में स्थापित किए जाएंगे।

भारतीय लोकजीवन का विराट स्‍वरूप है श्रीजगन्नाथ यात्रा

पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर और वहां होने वाली वार्षिक रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि भारतीय लोकजीवन की एक विराट परंपरा है। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ, देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ और भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ, सदियों से जन-जन की आस्था का केंद्र हैं। इन रथों के पहिये संसद परिसर में स्थापित करना एक सांस्कृतिक प्रतीक होगा। यह भारत की एकता और अखंडता का भी संदेश है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपनी पुरी यात्रा के दौरान इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और अब यह पहल संसद को ऐतिहासिक आयाम देने वाली है।

एक सूत्र में पिरोने का सूत्र है ‘रथ’

यह केवल एक प्रतीकात्मक स्थापना नहीं है। भारत की परंपरा में रथ यात्रा का विशेष महत्व है। रथ यात्रा का अर्थ ही है, सबको जोड़ना। इस यात्रा में न कोई उच्च-निम्न का भेद रहता है, न जाति का, न धर्म का। हर वर्ग और हर समुदाय के लोग एक साथ मिलकर रस्सियों से रथ खींचते हैं और मानते हैं कि यह कार्य समाज को जोड़ने का, सबको एक सूत्र में पिरोने का अवसर है। यही कारण है कि संसद परिसर में इन रथों के पहियों की उपस्थिति भारतीय लोकतंत्र की चेतना को और भी स्पष्ट करेगी कि यहां सबको समान स्थान प्राप्त है।

रथ के पहिये को नमन करते श्रद्धालु।

संसद में सेंगोल की स्‍थापना

इससे पहले भी संसद परिसर में भारतीय संस्कृति से जुड़े प्रतीक स्थापित किए गए हैं। वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में स्पीकर की कुर्सी के बगल में सेंगोल स्थापित किया था। सेंगोल भारत की स्वतंत्रता के समय सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है। 14 अगस्त 1947 की रात इसे पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया था। लंबे समय तक यह आनंद भवन और फिर इलाहाबाद म्यूजियम में रखा रहा। लेकिन संसद में उसकी स्थापना ने यह संदेश दिया कि भारतीय स्‍वाधीनता का इतिहास और सांस्कृतिक धरोहरें केवल पुस्‍तकों में बंद रहने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संस्थानों में जीवंत रूप में उपस्थित रहने के योग्य हैं।

यदि हम व्यापक दृष्टि से देखें तो मोदी सरकार के ये कदम सिर्फ धार्मिक भावनाएं नहीं हैं। वास्‍तव में इस दिशा में किए जा रहे सभी प्रयास भारत की उस प्राचीन धारा को पुनर्जीवित करने के प्रयत्‍न हैं, जिसमें संस्कृति और शासन दोनों एक-दूसरे के पूरक माने जाते रहे। वेदों और उपनिषदों से लेकर लोक परंपराओं तक, हर स्तर पर भारत ने हमेशा यही कहा है कि राष्ट्र केवल राजनीतिक शक्ति से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों से भी संचालित होता है। “आनो भद्राः कृतवो यन्तु विश्वतः” जैसे वेदवाक्य संसद की दीवारों पर लिखे गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि भारत की लोकतांत्रिक परंपरा पश्चिम से आयातित नहीं, बल्कि हमारी अपनी जड़ों से उत्पन्न है।

दिखा है पिछले 11 वर्षों में सांस्‍कृतिक भारत का नया स्‍वरूप

भारतीय लोकतंत्र की यह सांस्कृतिक यात्रा मोदी सरकार के प्रयासों से और अधिक स्पष्ट हो रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस मनाया जाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज दुनिया के लगभग हर देश में 21 जून को योग दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक स्वास्थ्य पद्धति नहीं, बल्कि भारतीय जीवनदर्शन का परिचायक है। इसी तरह आयुर्वेद, खादी, भारतीय भाषाओं और लोककलाओं को जो मान्यता दी जा रही है, वह भी इसी सांस्कृतिक दृष्टि का हिस्सा है।

सेंगोल के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

लोक परंपरा और राष्ट्रीय संस्था के संगम का सेतु है ये प्रयोग

पुरी रथ यात्रा के पहियों का संसद में स्थापित होना लोक परंपरा और राष्ट्रीय संस्था के संगम का अद्वितीय उदाहरण होगा। संसद में पहले से मौजूद कलाकृतियां भारत की विविधता को दर्शाती हैं, लेकिन रथ यात्रा जैसी लोकपरंपरा से जुड़े प्रतीक का वहां स्थान मिलना इस बात का संकेत है कि अब लोकसंस्कृति को भी राष्ट्रीय स्तर पर उतना ही महत्व दिया जा रहा है जितना शास्त्रीय परंपराओं को। यह “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की अवधारणा को और मजबूत करेगा।

श्री जगन्नाथ जी की रथ यात्रा विस्तार ले चुकी है। यह अब दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता, भोपाल, ग्‍वालियर, लखनऊ, चेन्नई, जयपुर में भी दिखती है। रथ यात्रा जन-जन के उत्सव के रूप में सामने आती है। संसद परिसर में इसके पहियों की उपस्थिति यह संदेश देगी कि जो परंपरा जन-जन को जोड़ती है, वही राष्ट्रीय एकता का वास्तविक आधार है।

भारत में धर्म और संस्कृति हैं जीवन-दर्शन

भारत में धर्म और संस्कृति केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं हैं। वे जीवन-दर्शन और समाज की एकजुटता का प्रतीक हैं। जगन्नाथ का अर्थ ही है; संपूर्ण जगत के नाथ। जब संसद परिसर में उनके रथ का पहिया स्थापित होगा तो यह किसी एक धर्म विशेष का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के मार्गदर्शन का प्रतीक होगा।

धर्म और कर्म का प्रतीक है रथ

भारतीय संस्कृति में रथ को केवल साधन नहीं, बल्कि धर्म और कर्म का प्रतीक माना गया है। महाभारत में श्रीकृष्ण का अर्जुन का सारथी बनना इसी का द्योतक है। गीता का संदेश रथ पर ही दिया गया था। संसद में रथ यात्रा के पहिए स्थापित होना इस गहन प्रतीकवाद को भी सामने लाएगा कि राजनीति और शासन का उद्देश्य केवल सत्ता चलाना नहीं, बल्कि धर्म और कर्तव्य का पालन करना है।

सेंगोल और रथ यात्रा के पहिए केवल वस्तुएं नहीं हैं, ये दोनों इस बात का संदेश हैं कि भारत का लोकतंत्र अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। यह भी संदेश है कि भविष्य की राजनीति सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी रहेगी। पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार और लोकसभा अध्यक्ष के नेतृत्व में संसद परिसर को भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक बनाने की जो पहल हुई है, वह बहुत ही शुभ और ऐतिहासिक कदम है।

 

Topics: नरेंद्र मोदीलोकतंत्रसेंगोलसंसद भवनओम बिरलाजगन्नाथ रथ यात्रा
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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