इतिहास की देहरी पर यह संवाद
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रा.स्व.संघ के 100 वर्ष : इतिहास की देहरी पर यह संवाद

नई दिल्ली में सरसंघचालक के ऐतिहासिक व्याख्यान ने समाज को संघ के चिंतन और संगठन के सूत्रों से परिचित कराया, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों की विभूतियों की जिज्ञासाओं का भी सटीक समाधान प्रस्तुत किया

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Aug 30, 2025, 09:31 am IST
inविश्लेषण, सम्पादकीय, संघ @100, दिल्ली

दिल्ली के विज्ञान भवन में हुए इस कार्यक्रम का साक्षी होना असाधारण अनुभव था। यह संवाद एक साधारण कार्यक्रम भर नहीं था। यह तो जैसे संघ की शताब्दी यात्रा का संक्षिप्त दिदर्पण था, जिसमें अतीत का सार, वर्तमान की सच्चाई और भविष्य की दिशा-तीनों एक साथ उभरकर आए। सरसंघचालक का उद्बोधन केवल भाषण नहीं लगा, बल्कि वह तो समाज के समक्ष संघ के ध्येय, कार्य और दृष्टि का अकादमिक किंतु आत्मीय प्रतिपादन था।

संघ की उत्पत्ति को समझना, उसके उद्देश्य को समझने की पहली शर्त है। डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया था कि केवल राजनीतिक आंदोलन से परिवर्तन संभव नहीं, वास्तविक बदलाव तो समाज की गुणवत्ता सुधार से ही होगा। इसी भावना से 1925 में संघ की स्थापना हुई। तब से लेकर अब तक उसकी यात्रा उपेक्षा, विरोध और अंततः व्यापक स्वीकार तक, तीन स्पष्ट पड़ावों से होकर गुज़री है। आज संघ समाज के विश्वास का केंद्र है और राष्ट्र की धड़कन से जुड़ा हुआ है।

इस संवाद में बार-बार यह तथ्य सामने आया कि संघ किसी प्रतिक्रिया या विरोध से नहीं जन्मा, बल्कि समाज की एकता और संगठन की आवश्यकता से उपजा। उसका ध्येय केवल हिंदू समाज का संगठन भर नहीं, बल्कि वसुधैव कुटुंबकम् की भावना से विश्वमानवता की शांति और समरसता का संवर्धन है। यही कारण है कि भारत का राष्ट्र-परिचय पश्चिमी Nation-State की सत्ता-आधारित परिभाषा से अलग है। यहां राष्ट्र साझा संस्कृति और एकात्म चेतना पर आधारित है।

कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि संघ पर लगे आरोपों का तथ्यात्मक निराकरण किया गया। साम्प्रदायिकता या जातिभेद के आरोप उसके कार्य से मेल नहीं खाते। उदाहरण दिए गए कि आपदा हो, महामारी हो या मुस्लिम बस्तियों में सेवा कार्य-हर जगह स्वयंसेवक बढ़-चढ़कर आगे रहे। उनका दृष्टिकोण यही रहा,’हम किसी को पराया नहीं मानते, मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं।’

शिक्षा और अर्थनीति पर संघ की सोच भी स्पष्ट रूप में सामने आई। शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा और गुरुकुल मॉडल के तत्वों की आवश्यकता बताई गई। अर्थनीति के स्तर पर संघ ने केवल डिग्री-नौकरी मानसिकता का विरोध कर श्रम की प्रतिष्ठा, स्वावलंबन और स्थानीय कौशल के सम्मान पर बल दिया। जनसंख्या, कन्वर्जन और घुसपैठ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी संतुलित किंतु स्पष्ट विचार रखे गए। धर्म को संकीर्ण परिभाषा में न देखकर उसे संयम और संतुलन का सार्वभौमिक नियम बताया गया, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करता है।

यह संवाद ऐतिहासिक भी था और बहुआयामी भी।
शिक्षा, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, राजनीति और वैश्विक दृष्टि,
सब इसमें समाहित थे

महिला सहभागिता, अनुसूचित जाति-जनजाति समाज में कार्य और सामाजिक समरसता की पहलें भी विशेष रूप से रेखांकित हुईं। राष्ट्र सेविका समिति हो या विभिन्न समाजघटक वर्गों में संगठन,ये सब संघ की सर्वसमावेशी दृष्टि के प्रमाण हैं। इसी प्रकार विदेशों में प्रवासी भारतीय समाज के बीच शाखाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम भारत की सांस्कृतिक चेतना को सीमाओं से परे ले जाते हैं।

विज्ञान भवन का यह संवाद संघ की उस परंपरा का विस्तार था, जिसमें आलोचना से भागने के बजाय खुले संवाद का मार्ग अपनाया जाता है। स्वयं सरसंघचालक द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते बुद्धिजीवियों के 218 सीधे-तीखे प्रश्नों का उत्तर (और वह भी उस सभा मंडप में जहां 70 से 75% ऐसे श्रोता हों जिनका संघ से अब तक संपर्क-सम्बन्ध नहीं आया); ऐसे में यह भाषण नहीं, बल्कि अत्यंत आश्वस्तिपूर्ण सजीव संवाद बन गया। प्रतिभागियों में नए लोगों की जिज्ञासाओं का स्तर और उत्तर मिलने पर संतोष की मुस्कान विशेष थी, यह संघ के विषय में भ्रांतियां के बादल छंटने का बड़ा संकेत था।

इस कार्यक्रम की गूंज केवल सभागार तक सीमित नहीं रही, बल्कि मीडिया और अकादमिक जगत तक पहुंची। यह स्पष्ट हुआ कि यह संवाद केवल संघ की बातें रखने भर का नहीं, बल्कि संघ के बारे में फैली मिथ्या धारणाओं को तोड़कर तथ्य और अनुभव के आधार पर विमर्श स्थापित करने का प्रयास था। निस्संदेह, विज्ञान भवन का यह संवाद ऐतिहासिक भी था और बहुआयामी भी।

शिक्षा, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, राजनीति और वैश्विक दृष्टि, सब इसमें समाहित थे। अंततः संदेश यही रहा कि ‘संघ किसी विरोध या प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि सात्त्विक प्रेम और समस्त समाज के संगठन के भाव से उपजा है।’ यही भाव इस संवाद को संघ की शताब्दी यात्रा में मील का एक पत्थर बनाता है।

X@hiteshshankar

Topics: पाञ्चजन्य विशेषeducation100 years of RSSसरसंघचालकहिंदू समाज का संगठनSarsanghchalakOrganization of Hindu Societyविज्ञान भवनthoughts of Sanghpoliticsरा.स्व.संघ के 100 वर्षreligionसंघ के चिंतनधर्मशिक्षासमाजVasudhaiva Kutumbakameconomy
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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