नई दिल्ली । संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में मंगलवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के तृतीय और अंतिम दिवस पर ‘जिज्ञासा समाधान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कई प्रश्नों के उत्तर दिए।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए दिल्ली प्रांत कार्यवाह अनिल गुप्ता ने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए लगभग 218 जिज्ञासाएँ प्राप्त हुई हैं। साथ ही लगभग 148 फीडबैक और सुझाव भी प्राप्त हुए हैं। 218 प्रश्नों को विषयवार 21 समूहों में बाँटा गया है। प्रत्येक समूह में प्रश्न का मर्म और भाव सुरक्षित रखा गया है। उन्होंने पहले समूह के प्रश्नों सरसंघचालक जी के समक्ष रखें-
प्रश्न
- तकनीक और आधुनिकीकरण के युग में संस्कार और परंपराओं के संरक्षण की चुनौती को संघ किस प्रकार देखता है?
- क्या आपको लगता है कि देश की शिक्षा प्रणाली में गुलामी की मानसिकता की झलक है? शिक्षा और प्रशासनिक प्रणाली में काफी सुधार की गुंजाइश है। संघ के नाते हम इस प्रणाली में कैसे सुधार कर सकते हैं?
- मिशनरी और पब्लिक स्कूलों में शिक्षा के नाम पर हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति को जिस तरह धूमिल किया जा रहा है— जैसे रीडिंग, इंग्लिश नॉवेल्स, हिस्ट्री (जो लेफ्टिस्ट लेखकों द्वारा लिखी गई हैं)— तो उन्हें मुख्यधारा में कैसे लाया जाए?
- क्या रंगमंच (थियेटर) को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में केवल सह-पाठयक्रम गतिविधि के रूप में रखने के बजाय अनिवार्य विषय बनाया जा सकता है, ताकि छात्र बचपन से ही कला और संस्कृति से जुड़ सकें?
- भारतीय वैदिक गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने और वैदिक चौसठ कलाओं को विद्यार्थियों को सिखाने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं? जो लोग इस दिशा में कार्य कर रहे हैं, उनकी सहायता कैसे की जा सकती है?
- कक्षा 6 से 12 तक संस्कृत भाषा को अनिवार्य करने पर संघ का क्या मत है?
उत्तर –
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने उत्तर देते हुए कहा- तकनीक और आधुनिकता का शिक्षा से कोई विरोध नहीं है। जैसे-जैसे मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है, नई-नई तकनीक आती है। इसे आने से कोई रोक नहीं सकता, क्योंकि इसका उद्देश्य मनुष्य का भला करना ही होता है। तकनीक का उपयोग कैसे करना है, यह मनुष्य के हाथ में है। जब कोई नई तकनीक आती है, तो उसका मनुष्य के हित में उपयोग करना और उससे होने वाले दुष्परिणामों से बचना आवश्यक है।
तकनीक पर मनुष्य का नियंत्रण आवश्यक
इसका अर्थ है कि तकनीक की मालिकाना हकदारी मनुष्य के पास रहे। तकनीक मनुष्य की मालिक न बन जाए। पुराने जमाने में कहा जाता था कि “पहले लाठी पहलवान घुमाता है, बाद में लाठी पहलवान को घुमाने लगती है।” आज हम कहते हैं— “पहले मोबाइल को हम सुनते थे, अब मोबाइल हमें सुनाने लगा है।” ऐसा न हो, इसलिए शिक्षा आवश्यक है।
सिर्फ साक्षरता पर्याप्त नहीं
केवल लिटरेसी ही पर्याप्त नहीं है। शिक्षा का अर्थ केवल स्कूलिंग या जानकारी देना नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य है— मनुष्य को संस्कारित करना, ताकि वह वास्तविक और विवेकशील मनुष्य बन सके। ऐसी शिक्षा मिलने पर मनुष्य विष का भी औषधि के रूप में उपयोग खोज सकता है।
परंपरागत शिक्षा का नष्ट होना
हमारे देश की परंपरागत शिक्षा बहुत पहले समाप्त कर दी गई। विदेशी आक्रांताओं ने यहां शासन करने के उद्देश्य से नई शिक्षा पद्धति लागू की, जिसका मकसद भारत का विकास नहीं, बल्कि इस देश को अपने अधीन रखना था। शासन चलाने के लिए उन्होंने जो प्रणाली बनाई, उसमें देशवासियों को गुलाम बनाए रखने की मानसिकता छिपी थी।
स्वतंत्र भारत में शिक्षा का उद्देश्य
लेकिन अब हम स्वतंत्र हो गए हैं। इसलिए हमारा उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि प्रजा का पालन-पोषण करना होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों को भूतकाल की जानकारी मिले और उनमें आत्मगौरव की भावना जागृत हो— “हम भी कुछ हैं, हम कर सकते हैं और हमने करके दिखाया है।” ऐसा परिवर्तन होना आवश्यक था।
बीते कुछ वर्षों में इस विषय पर जागरूकता बढ़ी है। इसी कारण नई शिक्षा नीति में इन बातों को शामिल करने का प्रयास हुआ है। कुछ बातें लागू हो चुकी हैं और कुछ आगे होंगी। शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ प्रशासनिक ढांचे में भी बदलाव आवश्यक है।
नागपुर के अनुभव
जब मैं नागपुर में प्रचारक था, तब एक सज्जन मेरे पास आए। वे केरल से आए आईपीएस अधिकारी थे और इनकम टैक्स कॉलेज में नियुक्त थे। वे मुझसे मिलने कार्यालय आए और बोले— “मुझे अटल बिहारी वाजपेयी से मिलना है।” कार्यालय प्रमुख ने उन्हें बताया कि यह भाजपा का कार्यालय नहीं है।
फिर उन्हें मेरे पास भेजा गया। मैंने पूछा— “आपको अटल जी से क्या काम है?” उन्होंने कहा— “मैं केरल से आया हूं। वहां हम लोग लुंगी लपेटकर, कुर्ता या हाफ शर्ट पहनकर ऑफिस जाते हैं। कभी-कभी वर्दी में जाना पड़ता है। यहां नागपुर में जब मैं इसी वेश में ऑफिस गया, तो मुझे डांटा गया कि ड्रेस कोड का पालन करना होगा। मैंने खादी भंडार से कुर्ता-पायजामा और जैकेट खरीदा, लेकिन तब भी कहा गया कि यह मान्य नहीं है। यहां पूरा सूट और टाई पहनना अनिवार्य है। मुझे समझ नहीं आया कि इतनी गर्मी में यह कैसे संभव है। हम तो अंदर-ही-अंदर उबल जाएंगे। यह कब बदलेगा?”
फिर मैंने उन्हें समझाया कि अटल जी से मिलने का पत्र आपको दिल्ली भेजना होगा और भाजपा का कार्यालय अलग है। उन्होंने यह बात मान ली।
Universal Values और Good Manners
हमारे Religion अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन Society के नाते हम एक हैं। यह समझकर वह पावन है। जैसे माता-पिता को सम्मान देना— किसी Religion में इसकी मनाही नहीं है। बड़ों के सामने नम्रता रखना, अहंकार के अधीन न होना आदि बातें Universal Values हैं। Good Manners Universal हैं। बस भोजन करते समय हाथ से भोजन करना या न करना, यह अलग है। लेकिन जो Universal Values हैं, वह हर जगह समान हैं। English Novels पढ़ने से यह Values नहीं मिलेंगी। हमको English सीखने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन हमें अंग्रेज नहीं बनना है।
भाषा और साहित्य का महत्व
भाषा केवल एक माध्यम है। हमारे घर में तीन पीढ़ियों से संघ का वातावरण है और संस्कारों की कोई कमी नहीं है। मैं आठवीं कक्षा में था, तब पिताजी ने मुझे Oliver Twist और Prisoner of Zenda पढ़ाई। कई English Colleges में पढ़ चुका हूं, लेकिन इससे मेरे हिन्दुत्त्व प्रेम में कोई अंतर नहीं आया।
भाषा के नाते कथा पढ़ना गलत नहीं है, लेकिन यदि हम Oliver Twist पढ़ें और प्रेमचंद की कहानियां छोड़ दें, तो यह गलत है। हमारे यहां भी साहित्य की लंबी परंपरा है— रामायण, महाभारत और उपनिषदों की कथाएं आज तक चल रही हैं। हर भाषा में एक समृद्ध परंपरा है।
Religious Education और Social Education
मिशनरी स्कूल हो या मदरसा हो, Religious Education एक अलग बात है। लेकिन Social Merit के नाते हमारा Syllabus एक होना चाहिए। यह भारत की परंपरा है, जो प्राचीन काल से चलती आ रही है।
भारतीय संस्कृति और शिक्षा
अकोला में श्रीमान आरिफ बेग विजयदशमी उत्सव के अध्यक्ष के नाते आए थे, उस समय मैं वहां महानगर प्रचारक था। उन्होंने कहा था कि इस देश की परंपरा कैसी है, सबके लिए कितनी अच्छी है। उन्हें उदाहरण दिया- “सीता जी के आभूषण जब सुग्रीव और अन्य जानवरों के पास मिले। वह सीता जी के है कि नहीं पहचानना था। लक्ष्मण को बुलाया और कहा तुम भी पहचानों, तो लक्षमण ने कहा- मुझे केवल पैर के पायल दिखाओ, क्योंकि मैंने कभी मां सीता जी के मुख के ओर दृष्टि नहीं डाली। मैंने हमेशा उनके चरण ही देखे हैं”।
अब इसमें जो संस्कृति है, वह सबके लिए समान और आदर्श है।
नई शिक्षा नीति और पंचकोशी शिक्षा
संस्कार घर से प्रारंभ होने चाहिए। मिशनरी स्कूलों या अन्य संस्थाओं में क्या होगा, यह बाद की बात है। पहले अपने घर में यह परंपरा जीवित रहनी चाहिए।
नई शिक्षा नीति में पंचकोशी शिक्षा का सिद्धांत स्वीकार किया गया है, जिसमें कला, क्रीड़ा, योग आदि के माध्यम से सर्वांगीण विकास पर बल है। यह धीरे-धीरे विकसित होगा। पहले हम विपरीत दिशा में बहुत दूर जा चुके थे, इसलिए एकदम से बदलाव संभव नहीं। लेकिन अब बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
कला, संगीत और संस्कार
केवल पाठ्यक्रम (curricular) गतिविधियों से काम नहीं चलेगा। हर मनुष्य को कला से जुड़ना चाहिए। संगीत, नृत्य, नाटक—इनमें से किसी एक का संस्कार तो होना ही चाहिए। हमारे शास्त्रों में कहा गया है—“संगीत और कला से रहित मनुष्य, बिना पूंछ-सींग वाला पशु समान है।”
लेकिन इसे अनिवार्य (compulsory) विषय बनाने से लाभ नहीं होगा। अनुभव यही है कि जब किसी बात को जबरन थोपा जाता है, तो उसकी प्रतिक्रिया होती है। जैसे एक प्रसंग है—
“किसी व्यक्ति को अपने कुत्ते को दवा पिलानी थी। जबरन दवा पिलाने पर कुत्ता छटपटाने लगा। परंतु एक दिन दवा ज़मीन पर गिर गई और कुत्ते ने स्वयं जाकर उसे चाट लिया”। इसी प्रकार, संस्कारों और कलाओं को थोपने के बजाय उनमें रुचि जागृत करनी चाहिए।
संगीत, नाद, नृत्य जैसे विषय मनुष्य के स्वाभाविक झुकाव हैं। इनकी टेस्ट विकसित करनी चाहिए। यह घर और विद्यालय दोनों जगह संभव है।
मेरा स्वयं का अनुभव है— मेरे चाचा अच्छे गायक थे, रेडियो पर गाते थे। उनके अभ्यास के लिए घर में रिकॉर्ड आते थे, तो हमें अनायास ही संगीत सुनना पड़ता था। कविता के शिक्षक हमसे कविताएँ गवाते थे, पूरा वर्ग गाता था। इस प्रकार छंद और लय से कान तैयार हो जाते थे और स्वाभाविक आकर्षण पैदा होता था।
आजकल परिवार जीवन में यह सब कम हो गया है, इसे पुनः जागृत करना आवश्यक है।
वैदिक शिक्षा और संस्कृत
वैदिक काल की चौसठ कलाओं में से जो आज प्रासंगिक हैं, उन्हें शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। गुरुकुल शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ना चाहिए। वास्तव में मुख्यधारा को गुरुकुल पद्धति से जोड़ना चाहिए।
फिनलैंड की शिक्षा पद्धति इसका उदाहरण है। वहाँ आठवीं कक्षा तक मातृभाषा में शिक्षा दी जाती है। दस छात्रों पर एक शिक्षक होता है। पहले चार वर्षों तक बच्चों को केवल शिक्षक के साथ रहना और घूमना ही सिखाया जाता है। यह पद्धति हमारी गुरुकुल परंपरा से मिलती-जुलती है।
इसीलिए अपनी शिक्षा प्रणाली को भी गुरुकुल पद्धति से जोड़ने का प्रयोग करना होगा। संस्कृत भाषा का विषय भी इसी परिप्रेक्ष्य में है।
संस्कृत भाषा का ज्ञान आवश्यक
भारत और अपनी परंपरा को समझना है तो संस्कृत भाषा का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। संस्कृत के माध्यम से हम मूल स्रोतों तक पहुँच सकते हैं। अन्य भाषाओं में किए गए अनेक अनुवाद अपूर्ण या गलत हैं। इसलिए यदि हमें वास्तविक ज्ञान चाहिए तो संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य है।
मेरे अपने जीवन का अनुभव है—घर से मुझे संस्कृत परीक्षा देने भेजा गया था। पारडी किल्ले में परीक्षा होती थी, परंतु मेरा मन नहीं लगा। लेकिन घर में मुझे संस्कृत स्तोत्र सिखाए गए, जिन्हें मैंने याद कर लिया। बाद में जब मैंने संस्कृत भारती की पद्धति देखी, तो पाया कि संस्कृत के प्रति शंकित लोग भी उनके प्रशिक्षण वर्गों में आते हैं और मात्र दस दिन में बोलचाल की संस्कृत सीख जाते हैं, वह भी बड़े आनंद के साथ।
इसका कारण यह है कि शिक्षा केवल बाहर से दी जाने वाली चीज़ नहीं है। शिक्षा का सार यह है कि मनुष्य के भीतर विद्यमान ज्ञान को प्रस्फुटित करने की कला विकसित की जाए। इसके लिए शिक्षक में उत्कृष्टता और यह क्षमता होनी चाहिए कि वह छात्र के स्तर पर उतरकर पढ़ाए और उसमें रस उत्पन्न करे। यही संस्कृत परंपरा का वास्तविक स्वरूप है।
संस्कृत की शिक्षा केवल विद्यालय तक सीमित न रहे। घर में भी स्तोत्रों का पाठ और संस्कृत का वातावरण होना चाहिए। संस्कृत साहित्य में अनेक रोचक बारीकियाँ हैं। उदाहरण स्वरूप—कुछ श्लोकों में अंतिम पंक्ति में प्रश्नों के उत्तर छिपे होते हैं। जैसे, “जयंत किसका पुत्र है?” इसका उत्तर “इंद्र” है। “भोजन के बाद क्या पीना चाहिए?” इसका उत्तर “मट्ठा” है। इस प्रकार के श्लोक बच्चों में स्वाभाविक रुचि और आनंद उत्पन्न करते हैं। यदि ऐसे रोचक तरीकों से संस्कृत पढ़ाई जाए, तो बच्चे अपने आप सीखेंगे।
संस्कृत का केवल औपचारिक या कामचलाऊ ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जो कोई भी भारत को गहराई से समझना चाहता है, उसके लिए संस्कृत का अध्ययन आवश्यक है।
भारतीय ज्ञान परंपरा और संघ
भारतीय ज्ञान परंपरा को जीवित रखने और प्रचारित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विभिन्न क्षेत्रीय संगठन प्रयासरत हैं। संघ का एक नित्य कर्म है—एकात्मता स्तोत्रम् का गायन। इसमें पहले सच्चिदानंद रूप भगवान का वंदन है, फिर मातृभूमि का वंदन है, भारत की नदियों और ऋषि-परंपरा का उल्लेख है। इसके बाद कपिल, कणाद, चरक, सुश्रुत, वराहमिहिर, आर्यभट, नागार्जुन से लेकर जगदीशचंद्र बसु और सी.वी. रामन जैसे आधुनिक वैज्ञानिकों तक का प्रतिनिधिक स्मरण किया गया है।
इस प्रकार, प्राचीन से आधुनिक काल तक की ज्ञान परंपरा को संघ प्रतिदिन स्मरण करता है और प्रशिक्षण वर्गों में प्रत्येक नाम का परिचय भी दिया जाता है। यह परंपरा वर्षों से चल रही है और समय के साथ इसमें अद्यतन (update) भी किया जाता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा पर वर्तमान चर्चा
आज शिक्षा सम्मेलनों और विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान परंपरा पर चर्चा होना सामान्य हो गया है। पहले तो यह शब्द बोलना भी कठिन था, इसे एक प्रकार का वर्जित (taboo) विषय माना जाता था। परंतु अब नई शिक्षा नीति में भी इसे स्थान मिला है।
संघ और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठन इस दिशा में कार्यरत हैं। आगे भी इस प्रयास को और गति दी जाएगी। उद्देश्य यही है कि भारत की ज्ञान परंपरा—चाहे वह अध्यात्म हो या विज्ञान—सबको समझाई और अपनाई जाए।
















