100 वर्ष की संघ यात्रा: सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत का ऐतिहासिक व्याख्यान पढ़िए, भाग-2
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100 वर्ष की संघ यात्रा: सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत का ऐतिहासिक व्याख्यान पढ़िए, भाग-2

हिंदवी कहने से बुरा नहीं लगता। भारतीय कहने से बुरा नहीं लगता। सनातन का भी कुछ लोग स्वीकार करते हैं। ये शब्द क्या है? समानार्थी शब्द है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 27, 2025, 02:18 pm IST
in भारत
100 वर्ष की संघ यात्रा: संघ यात्रा नए क्षितिज

100 वर्ष की संघ यात्रा: संघ यात्रा नए क्षितिज

भाग- 2

हिंदवी कहने से बुरा नहीं लगता। भारतीय कहने से बुरा नहीं लगता। सनातन का भी कुछ लोग स्वीकार करते हैं। ये शब्द क्या है? समानार्थी शब्द है। और इसलिए हम लोग ऐसा नहीं कहते की आप हिन्दू ही कहो। आप हिन्दू हो ये हम बताते हैं। नहीं, भाई हम हिन्दवी है, हम भारतीय हैं, ठीक है। इसका कंटेंट समझो। इन शब्दों के पीछे केवल शब्दार्थ नहीं है एक कंटेंट है। वो कंटेंट geographical नहीं है। उस कंटेंट में एक भक्ति है- भारत माता की जय। उस कंटेंट में एक परंपरा है- पूर्वजों की जो हम सब समान है। डीएनए को भी देखो वही है।40 हजार वर्ष पूर्व से भारतवर्ष के लोगों का डीएन एक है। अखंड भारत की भूमि पर जो जो है और हमारी संस्कृति है मिलजुल कर रहने की। ये बातें अलग-अलग रूप जो है वो हममें अलगाव पैदा नहीं करते। क्योंकि हम ये मानते ही नहीं कि एक होने के लिए यूनिफॉर्म होना पड़ता है। यूनिफॉर्मिटी से यूनिटी आती है, ऐसा नहीं है। डाइवर्सिटी में भी यूनिटी है क्योंकि डाइवर्सिटी भी यूनिटी का ही प्रोडक्ट है। लेकिन कोई परीक्षा है और प्रश्न आ गए 4, दो तो बड़े कठिन है, वो दो आसान है। पहले कौन सा? पहले आसान प्रश्न छोड़ो।

इसलिए जो अपने आपको हिन्दू कह रहे हैं, पहले उनको संगठित करो, उनका जीवन अच्छा बनाओ। तो किसी कारण जो अपने आपको हिन्दू नहीं कहते वो भी कहने लगेंगे। वो तो होने लगा है। और किसी कारण जो भूल गए उनको भी याद आएगा। वो भी होगा। लेकिन करना क्या है? संपूर्ण समाज का संगठन, संपूर्ण हिंदू समाज का हिन्दू शब्द का आग्रह क्यों है हमारा क्योंकि ये जो कंटेंट है, ये कंटेंट पूर्णतः व्यक्त करने वाला वो एक ही शब्द है। और हिन्दू कहने से हिंदू Vs all ऐसा नहीं होता है। हिंदू बनाम कोई ऐसा नहीं है। क्योंकि हिन्दू इसका मतलब inclusive, inclusivity की मर्यादा क्या है? कोई मर्यादा नहीं है। जब आगे एक व्यक्ति नहीं पूरा परिवार पूरा परिवार नहीं, पूरा गाँव, गाँव नहीं भैया जनपद, जनपद नहीं भैया प्रांत, प्रांत नहीं देश, देश नहीं विश्व, मानवता नहीं केवल सृष्टि भी अनंत के साथ एक हो जाओ।

ये अपना अपना मन है। ऐसे अनेक पथ हैं रुचि नाम वैचित्र्या रुजु कुटिल नामना पथताम नम नणाम यानी आदमियों का एक गम्या एक ही जगह जाना है सबको भगवान को कहते हैं तमसी यानि तुम ही हो जो सबके गंतव्य धणाको गम्यस्त त्वमसी कैसे पसाम अरणव। विश्व में कहीं भी पृथ्वी पर वर्षा होती है तो अंत में सागर में जाती है यह श्रद्धा रखने वाले सबको उन्होंने एक नाम दिया हिंदू।

हिंदू कौन है?

तो हिंदू यानी क्या? इसमें जो विश्वास करता है। अपने-अपने रास्ते से चलो भाई अपना जो रास्ता मिला है स्वाभाविक रूप से उस पर श्रद्धा रखो। बदलो मत, दूसरों को बदलो। इस पर श्रद्धा रखो, दूसरों के बीच श्रद्धा है उसका पूर्ण सम्मान करो उसका स्वीकार करो उसका अपमान कभी मत करो। और रास्तों को लेकर झगड़ा मत करो आपस में मिलजुल कर चलो। ये परंपरा जिनकी है ये संस्कृति जिनकी है वो हिन्दू है और ये परंपरा संस्कृति ऐसी क्यों बनी इसका कारण भारतवर्ष है। भारत का भूगोल ऐसा था की हम प्रोटेक्टिड थे चारों तरफ से। पहले आक्रामक आते ही नहीं थे, कौन आएगा? सागर लांघकर कौन आएगा वो जहाज नहीं थे। तो इतनी बर्फीली चोटिया लांघकर कौन आएगा?

पूरा सैन्य लेकर तो नहीं नहीं आ सकता। इसलिए हम सुरक्षित थे और अंदर भरपूर था। जनसंख्या भी इतनी नहीं थी जितनी आज है और इसलिए सब लोग इस वृत्ति के बने की भाई मिलजुल कर रहो फालतू झगड़ा क्यों करते हो। दुनिया को शायद परिस्थिति मिली होगी। struggle for existence or survival of the fittest इसकी। लेकिन हमारे प्राचीन समय में भारत में ये स्थिति नहीं थी। There was no struggle It was abundant for everybody और जो परंपरा थी उसमें संयम था।

इसलिए there was abundance, तो झगड़ा क्यों करना है? क्यों नहीं करना है। क्यों जीना है ना तो मिल जुलकर जी सकते हैं। झगड़ा कौन करेगा और इसलिए हमको फुर्सत भी मिली, हमको सुरक्षा भी मिली, हमको समृद्धि भी मिली। तो हमने जो एक ह्युमन सर्च जो सारी दुनिया में चलता है और दुनिया बाहर का देख कर रुक गयी। जो दिखता है उसके आगे कुछ नहीं है। माइक्रोस्कोप लगाओ तो ज्यादा दिखता है उसके पर कुछ नहीं है। ऐसा सोच के दुनिया रुक गयी हम वहाँ रुके नहीं हमने दृष्टि को अंदर कर लिया और अपने अंदर की सत्य को खोजा। और उसने हमको बताया कि सर्वत्र एक ही है दिखता अलग-अलग है सब एक है और इसलिए अपना स्वाभाविक धर्म क्या है?

समन्वय संघर्ष नहीं। तो ये जो संस्कृति थी उस संस्कृति का उपजाव क्यों हुआ वो इसी के कारण हुआ है और इसलिए इस मातृभूमि के प्रति भक्ति है। माँ ने हमको अन्न पोषण केवल इतना नहीं दिया संस्कार दिए हैं। भारत माता ने हमको ये संस्कार दिया है। तो वो हमारी माँ है और ये केवल कपोलकल्पित बात नहीं है इसके आधार पर प्राचीन समय से हमारे पूर्वज जीते आए हैं ऐसा जीवन खड़ा करने के लिए उन्होंने खून पसीना सब बाया प्राणदान भी किया है। इस भूमि के संरक्षण संवर्धन के लिए भी बलिदान दिया है,परिश्रम किया है।

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100 वर्ष की संघ यात्रा: सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत का ऐतिहासिक व्याख्यान पढ़िए

वो इतिहास हमको प्रेरणा देता है वो पूर्वज हमारे पूर्वज है। इनको मानने वाला वास्तव में हिन्दू है लेकिन जब संग शुरू हुआ तब ये परिस्थिति थी की ऐसे सब लोग अपने आपको हिन्दू नहीं कहते थे और आज भी नहीं कहते कुछ लोग। तो हिंदू के हम प्रकार मानते है जो जानते है वो हिन्दू हैं,उनको गौरव है। जो जानते है वो हिन्दू है लेकिन गौरव क्या करना भाई दुनिया में होते हैं। हम हिन्दू है, चलो और जो जानते हैं लेकिन किसी कारण नहीं कहते। कारणों में नहीं जाता नहीं कहते और जो जानते नहीं है की वो हिन्दू है। लेकिन ऐसे लोगों को भी, जो जानते नहीं है। हिंदवी कहने से बुरा नहीं लगता। भारतीय कहने से बुरा नहीं लगता। सनातन का भी कुछ लोग स्वीकार करते हैं। ये शब्द क्या है? समानार्थी शब्द है और इसलिए हम लोग ऐसा नहीं कहते की आप हिंदू ही कहो। आप हिंदू हो ये हम बताते हैं। नहीं भाई हम हिंदू ही हैं। हम भारतीय हैं ठीक है। इसका कंटेंट समझो। इन शब्दों के पीछे केवल शब्दार्थ नहीं है एक कंटेंट है। वो कंटेट ज्योग्राफिकल नहीं है। उस कंटेंट में एक भक्ति है भारत माता की, उस कंटेंट में एक परंपरा है पूर्वजों की जो हम सब समान हैं। डीएनए को भी देखो वही है। चालीस हज़ार वर्ष पूर्व से भारत वर्ष के लोगों का DNA एक है। अखंड भारत की भूमि पर जो है। और हमारी संस्कृति है मिल-जुल कर रहने की। ये बातें अलग अलग-अलग रूप जो हैं वो हमें अलगाव पैदा नहीं करते। क्योंकि हम ये मानते ही नहीं की एक होने के लिए यूनिफोर्म होना पड़ता है।

यूनिफॉर्मिटी से यूनिटी आती है ऐसा नहीं है डायवर्सिटी में भी यूनिटी है क्योंकि डायवर्सिटी भी यूनिटी का ही प्रोडक्ट है। लेकिन कोई परीक्षा है और प्रश्न आ गया चार। दो तो बड़े कठिन हैं। वो दो आसान हैं। पहले कौन-सा पहले आसान प्रश्न छेड़ो।

इसलिए जो अपने आपको हिन्दू कह रहे हैं पहले उनको संगठित करो, उनका जीवन अच्छा बनाओ। तो किसी कारण जो अपने आपको हिन्दू हो के भी नहीं कहते वो भी कहने लगेंगे। वो तो होने लगा है और किसी कारण जो भूल गए उनको भी याद आएगा, वो भी होगा। लेकिन करना क्या है संपूर्ण समाज का संगठन। संपूर्ण हिंदू समाज का संघ हिंदू शब्द का आग्रह क्यों है हमारा क्योंकि ये जो कंटेंट है ये कंटेंट पूर्णतः व्यक्त करने वाला वो एक ही शब्द है और हिंदू कहने से हिंदू वर्सेस ऑल ऐसा नहीं होता है। हिंदू बनाम कोई ऐसा नहीं है क्योंकि हिंदू इसका मतलब इनक्लूसिव इसकी की मर्यादा क्या है, कोई मर्यादा नहीं है। जब आगे एक व्यक्ति नहीं पूरा परिवार, पूरा परिवार नहीं पूरा गाँव, गाँव नहीं भैया जनपद, जनपद नहीं भैया प्रांत प्रांत नहीं देश, देश नहीं विश्व मानवता नहीं केवल सृष्टि भी अनंत के साथ एक हो जाओ।

वहाँ जो पहुँचा उसको सर्वश्रेष्ठ मानने वाला अपना समाज है और इसलिए ये कोई संकुचित बात नहीं है। उल्टा ये अपने सारे विकास को संपूर्ण विश्व के साथ एक रूप होने को एक खुला रास्ता देने वाली बात है। उनका संगठन करना इसलिए संघ निकला क्योंकि पूरा समाज ऐसा होगा तभी होगा। लेकिन होने के लिए तो कुछ करना पड़ेगा केवल तैयार होने से काम नहीं चलता तैयारी का उपयोग करना पड़ता है। तो ये विचार किया गया की तैयारी जो करनी है उसके दो भाग हैं। एक तो मनुष्यों को तैयार करना, दूसरा मनुष्यों ने काम करना। तो जो मेथोडोलॉजी डेवलप हुई मनुष्यों को बनाने की उसपर लग कर काम करने वाला एक संगठन। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उसको दूसरा कुछ नहीं। उसकी शाखा है, उसके स्वयं सेवक हैं। और बाकी सब जो होना है तैयारी के चलते वो करने वाले स्वयं सेवक रहेंगे। संघ, संघ के नाते उसमें जाएगा नहीं। स्वयंसेवक बहुत है संग चलाने के लिए जो लगते हैं, उनको छोड़ दिया तो भी बहुत सारे स्वयंसेवक हैं वो सक्रिय हो जाए समाज जीवन में जहां जिसकी आवश्यकता है वो करें।

ये तो सपने से भी ज्यादा दुष्प्राप्य बात लगती थी। स्वयंसेवक भी पूछते थे कैसे होगा? डॉक्टर साहब कहते थे वो होगा। संग कुछ नहीं करेगा सब कुछ होगा और हो रहा है। अनेक क्षेत्रों में अपने स्वयं सेवक काम कर रहे हैं।वो जो विचार मिला है जो संस्कार मिला है उसके आधार पर उस उस क्षेत्र की आवश्यक है वहाँ पुनर्रचना करके आगे बढ़ रहे हैं। भारतीय मजदूर संघ में स्वयं सेवक काम करने के लिए गए। उन्होंने पूरी दुनिया के लिए लेबर फील्ड का एक नया दर्शन दिया है। हर जगह वहां के परिवेश में सकारात्मक सुधार और अपने देश के स्वत्व के आधार पर वहाँ की पुनर्रचना। क्यों ये पुनर्रचना आवश्यक है? उस उसमें कल जाएंगे हम। लेकिन ये वो स्वयं करते हैं वो उनका है स्वतंत्र हैं, अलग हैं स्वायत्त हैं। उसका क्रेडिट उनको है संघ को नहीं। डिस्क्रेडिट वो संघ को शेयर करना पड़ता है क्योंकि माल हमारे यहाँ से गया है। क्रेडिट उनका है। संघ उनको कंट्रोल नहीं करता डायरेक्टिली भी नहीं रीमोटली भी नहीं। एक ही बात है स्वयं सेवकों का संबंध संघ से अटूट है। जन्म जन्मांतर का है।

वो संघ की प्रार्थना कहीं भी गा लेंगे। वो टूटता नहीं है। उसके चलते स्वयं सेवक मिलते हैं बात करते हैं, हम भी बात करते हैं पूछते है हम बताते हैं हमको ध्यान में आया बताते हैं। मदद मांगते है मदद देते हैं। अच्छे काम को सर्वत्र मदद करते है हम केवल स्वयं सेवकों को ही करते है ऐसा नहीं है किसी को भी कर सकते हैं। की है बहुत उदाहरण है। परन्तु हमारा कहा वो माने ही ये उन पर हमारा दबाव नहीं है। हमारा कहना वो समझेंगे, समझने के बाद उनको जो लगता है वो करेंगे। क्योंकि उनके क्षेत्र में वो काम कर रहे हैं उनका अनुभव है, उनकी एक्सपर्टाइज है। हमारी नहीं है ऐसा नहीं है लेकिन करना तो उनको है।

जो करने वाला है। वो उसको जो स्वतंत्रता मिलनी चाहिए करने की तो उनको मिलती है और संगठन में केवल स्वयं सेवक नहीं है। उनके साथ बहुत सारे लोग हैं। संगठन तो संघ के नहीं है वो जनता के है। स्वयं सेवकों ने खड़े किए हैं अथवा पहले से जो थे उसमें स्वयं सेवक है। उसमें उनका प्रभाव कम ज्यादा होता है। अन्य लोग भी साथ है, सबको साथ लेकर चलना स्वयं सेवकों के नाते यही सिखाया हमने। मतभेद हो तो भी मनभेद ना हो साथ में लेकर सबको चले, ये स्वभाव सबका रहे, इसी को तो संगठन कहते हैं। हमारी अपेक्षा उनकी संगठन ठीक रहे स्वयं सेवक ठीक रहे। वो करते है हम बताते रहते हैं। वो स्वतंत्र अलग स्वायत्त और धीरे धीरे स्वावलंबी होते हैं, मदद मांगने की स्थिति नहीं रहती उनकी।

विचार, संस्कार और आचार ये ठीक रहे। इतनी हम स्वयं सेवक की चिंता करते हैं। संगठन की चिंता वो करते हैं वो हमारी नहीं है। इस प्रकार हम आगे जाते हैं और ये हमको एक दबाव गुट नहीं बनाना है सबका मिलके भारत में। पूरे भारत में सबको संगठित करने के लिए संग्रह है। तो आपको भी अनुभव आया होगा की तीस साल चालीस साल पहले शायद आप में से बहुत लोग संघ के घुर विरोधी रहे होंगे और शायद उनमें से कुछ लोग आज संघ के समर्थक बन गए। आप घुर विरोधी थे तब भी अपने थे और आज हमारे है तब भी अपने ही हैं। एक देश है, एक सौ बयालीस करोड़ का देश है। कितने मत होंगे, बहुत मत होते हैं। मत अलग होना ये अपराध नहीं ये तो प्रकृति ने दिया हुआ गुण है। अलग-अलग विचार एक साथ जब सुनते हैं और कोई सहमति बनती है। तो उसमें से प्रगति होती है, अंग्रेजी में एक वाक्य बताते है। coming together, staying together and working together coming together is beginning, staying together is progress, and working together is success तो ये जो बात है इसको संगठन कहते हैं और पूरे समाज का ही हमको संगठन करना है। क्योंकि संघ के मन में ये बात है की अगर इस देश में ऐसा लिखा गया कि भाई संघ के कारण देश बच गया या देश का उद्धार हो गया तो ये हमारे लिए ठीक नहीं है। की ये हम करना नहीं चाहते, ये करना चाहते तो बहुत है पहले से रावण से त्रस्त दुनिया राम नहीं होते तो क्या होता?

शिवाजी नहीं होते तो क्या होता? कब तक आएंगे शिवाजी, कब तक आएंगे राम। भगवान भी god helps those who help themselves हमको इसके कारण जो ठेका देने की आदत लग गयी है। नेता को ठेका दो पार्टी को ठेका दो, सरकार को ठेका दो, तुम देश का कल्याण करो। हम क्या करेंगे। हम तुम जो कर रहे हो उसमें से निकालते ही चर्चा करते बैठेंगे। ये ठीक नहीं है। देश का जिम्मा हम सबका मिलकर है। जैसे हम है वैसे हमारे प्रतिनिधि होंगे। वैसे हमारी पार्टियाँ होंगी वैसे हमारे नेता होंगे। तो हम अच्छे बनें और हम करे देश के लिए। संपूर्ण समाज का संगठन इसके लिए। हम कहते हैं प्रार्थना में विजय त्री च संत: कार्यशक्ति हमारी संगठन शक्ति के आधार पर हमारी यानि किसकी?

संपूर्ण हिंदू समाज की क्योंकि हमने परिचय दिया है उसके पहले वयम हिंदू राष्ट्रांग भूत। हम हिंदू राष्ट्र के अंगभूत है।तो पूरे हिंदू समाज का दायित्व है तो पूरा हिंदू समाज ऐसा बनना चाहिए। हमारी संगठित कार्यशक्ति यानि पूरे समाज की संगठित कार्य और हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं हम तब भी प्रश्न खड़े हो जाते हैं। क्योंकि राष्ट्र का हम ट्रांसलेशन करते हैं नेशन वो वेस्टर्न कॉन्सेप्ट है। नेशन के साथ स्टेट जुड़ता है। राष्ट्र के साथ स्टेट आवश्यक नहीं है। हमारा राष्ट्र है पहले से। हिंदू शब्द निकाल के आप विचार करो हमारा राष्ट्र पहले से गांधी जी ने भी कहा है।

एक राष्ट्र के नाते हम लड़े हैं बार बार लड़े। उत्तर से दक्षिण पूर्व से पश्चिम हमारा संचार रहा है। पूरे देश के साथ हमारी सेंसीटीविटी जुड़ी है। हम एक राष्ट्र है। इस राष्ट्र में हम सर्वदा स्वतंत्र नहीं थे लेकिन राष्ट्र था। सदा हमारे राजा नहीं थे, अंग्रेज भी राजा हो गए। तुर्क अरब भी राजा हो गए लेकिन राष्ट्र था। एक राजा नहीं था अनेक राजा थे अनेक राज्य थे अनेक व्यवस्थाएं थी लेकिन राष्ट्र था। मंत्र पुष्पांजलि में हम कहते है ना कि स्वस्ती साम्राज्यम भजम, स्वराज्यम वैराज्यम राज्य पार महाराज महागणाधिपत्य। स्वस्ती साम्राज्यम। वैराजम पूरी लम्बी मालिका। राज्य व्यवस्थाओं की इतने इतने प्रकार है और फिर भी आगे कहते है पृथ्वी समुद्र पर्यन्त एक विराट थी। समुद्र पर्यंत जो पृथ्वी है पृथ्वीराज यानी कृषि योग्य बनाई भूमि उसमें। एक विराठ है और चक्रवर्ती थे।

तब भी हम यही कहते थे। चक्रवर्ती नहीं थे अलग अलग राज्य थे तब भी हम यही कहते थे. अंग्रेज राजा थे तब भी हम यही कहते थे। विदेशी आकर राज करते थे तब भी हम यही कहते थे। राष्ट्र था सत्ता बदलती रही। हिंदू राष्ट्र शब्द का सत्ता से कोई मतलब नहीं है और हिंदू राष्ट्र के। प्रखर होते विद्यमान रहते जो जो शासन रहा है वो शासन हमेशा पंथ संप्रदाय का विचार करने वाला शासन नहीं है। उसमें सबके लिए न्याय समान है। पंथ संप्रदाय, भाषा कुछ भी नहीं, कोई भी भेद नहीं प्रजा के लिए समान है।

इसलिए जब हम हिन्दू राष्ट्र कहते हैं तो हम किसी को छोड़ रहे हैं ऐसा नहीं है। हम हिंदू कहते हैं तो किसी का विरोध कहते हैं ऐसा नहीं है। संघ इसमें से हुआ ही नहीं है। संघ किसी विरोध में प्रतिक्रिया में नहीं निकला है। गुरुजी के प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुरुजी को पूछा गया की हमारे गाँव में तो मुसलमान और इसाई है नहीं हमारे यहाँ शाखा का क्या काम है। गुरुजी ने कहा की भैया तुम्हारे गांव की छोड़ दो पूरे दुनिया में भी मुसलमान ईसाई नहीं होते तो भी हिंदू समाज अगर इस अवस्था में रहता तो संघ की शाखा की आवश्यकता थी क्योंकि संगठन किसी के विरोध में नहीं होता। आप सब लोग कुछ ना कुछ तो व्यायाम करते होंगे। कम से कम मॉर्निंग वॉक, इवनिंग करते होंगे। आपको कोई पूछे और हिंदू कहने से हिंदू VS ऑल ऐसा नहीं होता है। हिंदू बनाम कोई ऐसा नहीं है क्योंकि हिंदू इसका मतलब inclusive, inclusivity की मर्यादा क्या है कोई मर्यादा नहीं है। जब आगे एक व्यक्ति नहीं पूरा परिवार, पूरा परिवार नहीं, पूरा गाँव, गाँव नहीं भैया जनपद, जनपद नहीं भैया प्रांत, प्रांत नहीं देश, देश नहीं विश्व, मानवता नहीं केवल सृष्टि भी अनंत के साथ एक हो जाओ। वहां जो पहुंचा उसको सर्वश्रेष्ठ मानने वाला अपना समाज है और इसलिए ये कोई संकुचित बात नहीं है उल्टा ये अपने सारे विकास को संपूर्ण विश्व के साथ एक रूप होने को एक खुला रास्ता देने वाली बात है। उनका संगठन करना इसलिए संघ निकला क्योंकि पूरा समाज ऐसा होगा तभी होगा। लेकिन होने के लिए तो कुछ करना पड़ेगा केवल तैयार होने से काम नहीं चलता, तैयारी का उपयोग करना पड़ता है। तो ये विचार किया गया कि तैयारी जो करनी है उसके दो भाग हैं। एक तो मनुष्यों को तैयार करना, दूसरा मनुष्यों ने काम करना। तो जो मेथडोलॉजी डेवलप हुई मनुष्यों को बनाने की, उसपर लग कर काम करने वाला एक संगठन- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, उसको दूसरा कुछ नहीं। उसकी शाखा है, उसके स्वयं सेवक है।

बाकी सब जो होना है तैयारी के चलते वो करने वाले स्वयं सेवक रहेंगे। संघ, संघ के नाते उसमें जाएगा नहीं। स्वयं शोक बहुत है संग चलाने के लिए जो लगते हैं उनको छोड़ दिया तो भी बहुत सारे स्वयं शोक है वो सक्रिय हो जाए समाज जीवन में जहां जिसकी आवश्यकता है वो करेंगे।

ये तो सपने से भी ज्यादा दुष्प्राप्य बात लगती थी। स्वयंसेवक भी पूछते थे कैसे होगा डॉक्टर साहब कहते थे होगा। संघ कुछ नहीं करेगा सब कुछ होगा, और हो रहा है। अनेक क्षेत्रों में अपने स्वयं सेवक काम कर रहे हैं।

जो विचार मिला है, जो संस्कार मिला है उसके आधार पर उस-उस क्षेत्र की आवश्यक है वहां पुनर्रचना करके आगे बढ़ रहे हैं। भारतीय मजदूर संघ में स्वयं सेवक काम करने के लिए गए उन्होंने पूरी दुनिया के लिए लेबर फिल्च का एक नया दर्शन दिया है। हर जगह वहां के परिवेश में सकारात्मक सुधार, और अपने देश के स्वत्व के आधार पर वहां की पुनर्रचना। क्यों ये पुनर्रचना आवश्यक है, उसमें कल जाएंगे हम लोग। लेकिन ये वो स्वयं करते हैं वो उनका है स्वतंत्र है अलग है, स्वायत्त है। उसका क्रेडिट उनको है। संघ को नहीं डिसक्रेडिट वो संघों को शेयर करना पड़ता है। क्योंकि माल हमारे यहां से गया है।

क्रेडिट उनका है संघ उनको कंट्रोल नहीं करता डायरेक्टली भी नहीं रिमोटली भी नहीं। एक ही बात है स्वयं सेवकों का संबंध संघ से अटूट है। जन्म जन्मांतर का है। संघ की प्रार्थना कहीं भी गालेंगे।

वो, वो टूटता नहीं कभी। इसके चलते स्वयं सेवक मिलते है बात करते है। हम भी बात करते हैं पूछते है हम बताते हैं, हमको ध्यान में आया बताते हैं। मदद मांगते हैं, मदद देते हैं। अच्छे काम को सर्वत्र मदद करते हैं हम केवल स्वयं सेवकों ही करते है, ऐसा नहीं है किसी को भी कर सकते हैं। यही है बहुत उदाहरण है। परंतु हमारा कहा वो माने ही, ये उन पर हमारा दबाव नहीं है। हमारा कहना वो समझेंगे, समझने के बाद उनको जो लगता है वो करेंगे। क्योंकि उनके क्षेत्र में वो काम कर रहे हैं उनका अनुभव है उनकी expertise है। हमारी नहीं है, ऐसा नहीं है लेकिन करना तो उनको है। करने वाला है, वो उसको जो स्वतंत्रता मिलनी चाहिए करने की तो उनको मिलती है और संगठन में केवल स्वयं सेवक नहीं है उनके साथ बहुत सारे लोग है। संगठन तो संघ के नहीं है वो जनता के है। स्वयंसेवकों ने खड़ी की है अथवा पहले से जो थे उसमें स्वयं सेवक है। उसमें उनका प्रभाव कम ज्यादा होता है। अन्य लोग भी साथ है सबको साथ लेके चलाना स्वयं के नाते यही सिखाया हमने। मतभेद हो तो भी मनभेद ना हो, साथ में लेकर सबको चले। ये स्वभाव सबका रहे। इसी को तो संगठन कहते हैं। हमारी अपेक्षा उनसे ये संगठन ठीक रहे स्वयं शोक ठीक कर रहे। वो करते हैं, हम बताते रहते हैं। वो स्वतंत्र अलग स्वायत्ता और धीरे धीरे स्वावलंबी होते हैं, मदद मांगने की स्थिति नहीं रहती उनकी। विचार संस्कार और आचार। ये ठीक रहे। इतनी हम स्वयंसेवक की चिंता करते हैं, संगठन की चिंता वो करते हैं, वो हमारी नहीं है। इस प्रकार हम आगे जाते हैं और ये हमको एक दबाव गुट नहीं बनाना है सबका मिलके भारत में, पूरे भारत में, सबको संगठित करने के लिए संघ है।

तो आपको भी अनुभव आया होगा कि तीस साल, चालीस साल पहले शायद आप में से बहुत लोग संघ के घुर विरोधी रहे होंगे और शायद उनमें से कुछ लोग आज संघ के समर्थक बन गए। आप धुर विरोधी थे, तब भी अपने थे और आज हमारे हैं. तब भी अपने ही है। एक देश है, एक सौ बयालीस करोड़ का देश है। कितने मत होंगे, बहुत मत होते हैं। मत अलग होना ही अपराध नहीं। ये तो प्रकृति ने दिया हुआ गुण है। अलग-अलग विचार एक साथ जब सुनते है और कोई सहमति बनती है तो उसमें से प्रगति होती है। अंग्रेजी में एक वाक्य बजाते है। coming together, Staying together and working together, coming together is beginning. Staying together is progress and working together is success. तो ये जो बात है इसको संगठन कहते हैं और पूरे समाज का ही हमको संगठन करना है। क्योंकि संघ के मन में ये बात है कि अगर इस देश में ऐसा लिखा गया कि भाई संघ के कारण देश बच गया या देश का उद्धार हो गया तो ये हमारे लिए ठीक नहीं है। कि ये हम करना नहीं चाहते, ये करना चाहते तो बहुत हैं, पहले से। रावण से त्रस्त दुनिया राम नहीं होते तो क्या होता?

शिवाजी नहीं होते तो क्या होता?

कब तक आएंगे शिवाजी कब तक आएंगे राम। भगवान भी god helps those who help themselves. हमको इसके कारण जो ठेका देने की आदत लग गई है। नेता को ठेका दो, पार्टी को ठेका दो, सरकार को ठेका दो, तुम देश का कल्याण करो, हम क्या करेंगे। हम तुम जो कर रहे हो, उसमें से निकालते ही चर्चा करते बैठेंगे। ये ठीक नहीं है। देश का जिम्मा हम सबका मिलकर है। जैसे हम हैं, वैसे हमारे प्रतिनिधि होंगे वैसे हमारी पार्टियां होंगी वैसे हमारे नेता होंगे। तो हम अच्छे बने और हम करे देश के लिए, संपूर्ण समाज का संगठन इसके लिए, हम कहते हैं प्रार्थना में विजय तृच् संता कार्य शक्ति हमारी संगठन शक्ति के आधार पर हमारी यानि किसकी? संपूर्ण हिंदू समाज की, क्योंकि हमने परिचय दिया है उसके पहले वयम हिंदू राष्ट्रांगता। हम हिंदू राष्ट्र के अंगभूत है।

पूरे हिंदू समाज का दायित्व है तो पूरा हिंदू समाज ऐसा बनना चाहिए। हमारी संगठित कार्यशक्ति यानि पूरे समाज की संगठित कार्य शक्ति। हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं हम, तब भी प्रश्न खड़े हो जाते हैं। क्योंकि राष्ट्र का हम translation करते हैं नेशन। वो concept western concept है। Nation के साथ state जुड़ता है।

राष्ट्र के साथ state आवश्यक नहीं है। हमारा राष्ट्र है। पहले से। हिंदू शब्द निकाल के आप विचार करो हमारा राष्ट्र पहले से, गांधी जी ने भी कहा है। एक राष्ट्र के नाते हम लड़े हैं, बार बार लड़े हैं। उत्तर से दक्षिण पूर्व से पश्चिम हमारा संचार रहा है। पूरे देश के साथ हमारी sensitivity जुड़ी है। हम एक राष्ट्र हैं। इस राष्ट्र में हम सर्वदा स्वतंत्र नहीं थे लेकिन राष्ट्र था। सदा हमारे राजा नहीं थे, अंग्रेज भी राजा हो गए। तुर्क अरब भी राजा हो गए लेकिन राष्ट्र था। एक राजा नहीं था, अनेक राजा थे, अनेक राज्य थे, अनेक व्यवस्थाएं थीं, लेकिन राष्ट्र था। मंत्र पुष्पांजलि में हम कहते है ना। स्वस्ति, साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ट्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं। पूरी लम्बी मालिका। राज्य व्यवस्थाओं की इतने इतने प्रकार हैं और फिर भी आगे कहते है पृथ्वी समुद्र पर्यन्त आया, एक रात समुद्र पर्यंत जो पृथ्वी है पृथ्वीराज यानी कृषि योग्य बनाई भूमि उसमें। एक रात है और चक्रवर्ती थे, तब भी हम यही कहते थे, चक्रवर्ती नहीं थे अलग अलग राज्य थे तब भी हम यही कहते थे, अंग्रेज राजा थे तब भी हम यही कहते थे।

विदेशी आकर राज करते थे तब भी हम यही कहते थे, राष्ट्र था। सत्ता बदलती रही। हिंदू राष्ट्र शब्द का सत्ता से कोई मतलब नहीं है और हिंदू राष्ट्र के प्रखर होते विद्यमान रहते जो जो शासन रहा है वो शासन हमेशा, पंथ संप्रदाय का विचार करने वाला शासन नहीं है। उसमें सबके लिए न्याय समान है। पंथ संप्रदाय, भाषा कुछ भी नहीं कोई भी भेद नहीं, प्रजा के लिए सामान्य है। और इसलिए जब हम हिन्दू कहते हैं तो हम किसी को छोड़ रहे हैं, ऐसा नहीं है। हम हिंदू राष्ट्र कहते हैं तो किसी का विरोध कहते है ऐसा नहीं है। संघ इसमें से हुआ ही नहीं है। संघ किसी विरोध में प्रतिक्रिया में नहीं निकला है। गुरूजी के प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुरूजी को पूछा गया कि हमारे गाँव में तो मुसलमान और इसाई है नहीं, हमारे यहाँ शाखा का क्या काम है?

गुरु जी ने कहा की भैया तुम्हारे गांव की छोड़ दो पूरे दुनिया में भी मुसलमान, इसाई नहीं होते तो भी हिंदू समाज अगर इस अवस्था में रहता तो संघ की शाखा की आवश्यकता थी। क्योंकि ये संगठन किसी के विरोध में नहीं होता। आप सब लोग कुछ ना कुछ तो व्यायाम करते होंगे। कम से कम मॉर्निंग वॉक, इवनिंग वॉक करते होंगे। आपको कोई पूछे कि आप ये व्यायाम कर रहे हैं किसको पिटने का इरादा है। अरे भाई व्यायाम अपने आपको तंदुरुस्त कहने के लिए अब कभी मारपीट होती है तो व्यायाम का शरीर काम में आता है ये बात अलग है। लेकिन व्यायाम का उद्देश्य किसी को मारने के लिए नहीं है। स्वस्थ होना, शरीर की स्वाभाविक अवस्था है। संगठित होना, समाज की स्वाभाविक अवस्था है बिना उसके कोई काम सफल नहीं होता है। इसलिए संपूर्ण समाज का संगठन ये करता है। और ये 100 साल से कर रहा है। और 100 साल की यात्रा के बारे में कहे तो क्या बताए? पहले ही हमको डॉक्टर हेडगेवार ने बताया कि संगठन के जीवन में तीन स्थितियाँ रहती है वो पार करनी पड़ती है उसके बाद फिर कार्य सिद्धि होती है। पहली अवस्था रहती उपेक्षा की। संघ की भी उपेक्षा, विचार की मान्यता नहीं थी संघ शुरू हुआ तब। डॉक्टर हेडगेवार को प

हिंदू राष्ट्र बिल्कुल मान्य नहीं था। अच्छे-अच्छे हिंदू लोग कहते थे कि हिंदू तो अब मरने जा रहा है छोड़ो। ‘This is a dead society’ ऐसा बोलते थे। तो इसलिए वो उपेक्षा थी। हमारे प्रचारक थे। संघ कार्य के लिए निकले। कोई प्रचार के शब्द नहीं था लेकिन अंदर एक चिंगारी जग गई निकल गए। निकल गए तो कुछ था ही नहीं, ठाव-ठिकाना, भागलपुर में बिहार में पहली बार प्रचारक गए नागपुर से। जैसे-तैसे जुगाड़ करके उनको टिकट का पैसा तो डॉक्टर साहब ने दिया। कुछ उस समय तीन रुपया बारहना भागलपुर तक का टिकट था। तो उनके पास में सवा रुपया बचा है। भागलपुर में कोई परिचित नहीं, बिहार में कोई परिचित नहीं। काम शुरू नहीं हुआ था शायद। रहने का ठिकाना नहीं कुछ नहीं। तो पटना से भागलपुर एक पैसेंजर जाती थी रात को पहुँचती थी वहाँ, रात भर पड़ी रहती थी सुबह निकल आती थी उस पैसेंजर में रात को सोते थे। स्टेशन पर ही सारा सुबह वाला निपटते थे और फिर गाँव में घूमते रहते थे रात तक। इसके घर जाओ उसके घर जाओ, इसकी बात करो, उससे बात करो। खाने को कुछ नहीं था। तो एक भुना चना बेचने वाला था उससे दोस्ती कर ली, एक पैसे का वो थोड़ा ज्यादा चना उनको रोज देता था, उस पर उनका भोजन चलता था। शाखा शुरू हो गई तो एक बाल स्वयं सेवक के घर कोई पर्व था भोजन के लिए कोई चाहिए था, इसने उनको पूछा आप ब्राह्मण है क्या?

उसने कहा हां, तो बोले चलिए हमारे यहां एक ब्राह्मण चाहिए। तो इसलिए उसके घर गए उसके माता जी को पता चला कि ये M.com है और सब छोड़कर हिंदू समाज को संगठित देश के लिए आया है। तो उस माताजी ने बताया कि भागलपुर में ग्यारह बजे दोपहर रात को आठ बजे तुम्हारा भोजन होना चाहिए कहीं नहीं, तो हमारे यहाँ आओ। मैं ग्यारह बजे के बाद एक घंटा रहा देखूँगी फिर गाँव में घूमूंगी तुम्हारा भोजन हुआ की नहीं देखूँगी, हुआ होगा तो मैं करुँगी, नहीं तो नहीं करूँगी।

अभी अभी मैं वहां क्षेत्र प्रचारक बनके गया तब मैंने देखा वो जो बालक था आठवीं में उस समय वो हमारे विभाग संघचालक बन गए थे उनके घर में ये चलता था। उस समय तो हमारी ये हालत नहीं थी। एक बड़े प्रसिद्ध नेत्र शल्य विशारद के यहाँ हमारा भोजन था, वहाँ हमारा भोजन हो रहा था वहाँ से हमारे विभाग संघचालक जी बैठे थे। मैंने बोला आइए बोले नहीं, मेरा घर में भोजन है। तो फिर जाइए, समय हो गया क्यों गया। उन्होंने कहा नहीं आपका भोजन पूरा होने के बाद मुझे रिपोर्ट करना पड़ेगा तब घर में बहु भोजन करेगी। समाज ने हमको संभाला। जैसा संभाला वैसा हम रहे। किसी बात की मान्यता नहीं है एक श्रद्धा लेकर चले, डॉक्टर हेडगेवार पर विश्वास रखकर चले और फिर विरोध शुरू हुआ। क्या विरोध हुआ? किसी स्वयंसेवी संगठन का इतने लंबे समय तक इतना कड़ा विरोध और कटु विरोध। इसका भी कोई पुस्तक आप देख के तैयार कर सकते हैं। क्या-क्या नहीं हुआ। झूठे आरोप मढ़े गए, हत्याएँ हुई, संघर्ष हुआ। अपने को बचाने को जितना लड़ना था उतना हम लड़ते थे लेकिन हमको बताया जाता था कि ये अपना ही समाज है। गुरुजी के घर पर हमला हुआ, फरवरी में 1948 में। तो सब एक स्वयंसेवक रक्षण करने गए। उन सबको गुरूजी ने घर भेज दिया जो अपना समाज है, इस समाज ने जब अपने को सराहा तब अच्छा लगा ना, वही अगर मारने को आता है। तो मेरे घर के आंगन में मेरा रक्त बहेगा समाज का नहीं बहेगा आप सब लोग जाओ वापस। ये वृति थी क्योंकि आधार क्या है हमारा संघ के कार्य का आधार कोई विरोध कोई प्रतिक्रिया नहीं, शुद्ध सात्विक प्रेम, हमारे अपने कार्य का आधार है। जिस आधार पर हम विविधता में एकता देखते हैं वो तो सत्य रूप है, प्रेम रूप है, करुणा रूप है। संघ के स्वयंसेवकों ने हमेशा यही मन में बात रखी कि ये सब होगा लेकिन सब अपने हैं। और जैसा मैं कहता हूं संघ, हिंदू के नाते चलता है तो हिंदू का ये अपनापन केवल हिंदू के लिए नहीं है ‘वसुधैव कुटुंबकम’ है। वही men money and ammunition’। हमारे पास कार्यकर्ता नहीं थे। हमने रेडीमेड[कार्यकर्ता नहीं लिए, हमने अपने कार्यकर्ता खुद बनाए वो बन रहे हैं। कार्यकर्ता बनते है वो शाखाएं चलाते है, शाखाएँ चलती है। कार्यकर्ता बनते है वो बनते है अधिक शाखाएं खुलते हैं अधिक कार्यकर्ता बनते है।

स्वयं सेवक साल में एक बार गुरुदक्षिणा करते हैं

हमारे स्वयं सेवक साल में एक बार गुरुदक्षिणा करते हैं। संघों को चंदा नहीं देते, दान नहीं देते। देश के लिए समर्पित होने की मेरी प्रतिज्ञा है। तो वास्तव में समर्पण मेरा कितनी भावना की दृष्टि से कितनी उत्कटता पर है, इसका टेस्ट करते हैं वो। साल भर जमा करते हैं। बढ़ता रहे इसलिए सब्जी खाना छोड़ देते हैं, दाल खाना छोड़ देते हैं, चाय पीना बंद कर देते हैं। बच्चा अपना एक एक पाई कहीं से मिले जमा करके उसको गुरुदक्षिणा में डालता है। शामू पवार नाम का स्वयंसेवक था, नौवीं में पढ़ता था। माता-पिता दोनों मजदूर थे। रोज की रोटी रोज बनती थी, रोज की कमाई से। ऐसा घर, ऐसी झोपड़ी और गुरुदक्षिणा में उसके गण ने तय किया कि देखो प्रत्येक ने 21 रुपया गुरुदक्षिणा तय करनी चाहिए। अपने गण का ये टारगेट है। तो उसने माता जी से मूंगफली बनवाई। चीना बादाम या क्या salted peanuts, और तीन महीना इंटरवल में में cinema talkies में जाके वो बेचता था। 21 रुपए जमा हो गए बंद कर दिया। घर में इक्कीस रुपए रख दिए पंद्रह दिन बाद था गुरुदक्षिणा समर्पण का कार्यक्रम। घर को बताया गुरुदक्षिणा है। पंद्रह दिन उस घर में जहाँ हाथ पर उनका पेट था वहाँ पर वो इक्कीस रुपया पड़ा रहा किसी ने हाथ नहीं लगाया। उसने वो गुरु दक्षिणा में डाला। एक-एक स्वयंसेवक ऐसा करता है। नागपुर में डॉक्टर साहब का स्मारक स्मृति मंदिर खड़ा हुआ। मैं बचपन में शाखा में जाता था तो मुझे याद है वहाँ एक डिब्बा रखा था। हम कुछ मिलता है उस समय तो ज़्यादा मिलता नहीं था घर से, लेकिन कभी मिल गया, कोई मेहमान आ गए जाते समय कुछ रख दिया हाथ पर, रखते भी ज्यादा नहीं थे। वो पुराना एक छेद वाला पैसा रहता था तांबे का। तो वो हम उस डिब्बे में डालते थे। पूरा रेशिमबाग का परिसर जो बना है या कहीं का भी यहाँ दिल्ली का कार्यालय स्वयंसेवकों ने बनाया है। स्वयंसेवक चलाते संघ को चलाने के लिए संघ किसी के सामने हाथ नहीं पसारता। संपूर्ण स्वावलंबी संगठन है। और इसलिए हम लोग जो है, हमारी दृष्टि से विचार करके जो अच्छा लगता है वो बोल सकते हैं। जो खराब लगता है वो भी बोल सकते हैं लेकिन उस बोलने के पीछे कोई विरोध की भावना नहीं है। ‘ना काहू से दोस्ती ना काह से बैर’ और दोस्ती कहे तो सब अपने है, सबके प्रति प्रेम है। उस प्रेम के आधार पर और स्वयंसेवकों की निष्ठा तपस्या के आधार पर हम यहाँ पर पहुँचे हैं। कितने बड़े त्याग हुए कितने बड़े बलिदान हुए हैं। उस पर हम खड़े हैं। ये हम जानते हैं। उनके प्रति मन में और एक उस भाव का वर्णन मैं नहीं कर सकता। ऐसे भाव हमारे सबके मन में है। और इस संघ को हमको आगे ले जाना है क्यों ले जाना है? क्योंकि भारत को खड़ा करना है। भारत का अपना योगदान है वो योगदान क्या है? उसकी चर्चा हम कल के व्याख्यान में करेंगे। बहुत बहुत धन्यवाद।

 

 

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