100 वर्ष की संघ यात्रा: सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत का ऐतिहासिक व्याख्यान पढ़िए
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100 वर्ष की संघ यात्रा: सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत का ऐतिहासिक व्याख्यान पढ़िए

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। संघ के इस कार्यक्रम का विषय है 'संघ यात्रा के 100 वर्ष: नए क्षितिज'।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 27, 2025, 01:41 pm IST
in भारत
100 वर्ष की संघ यात्रा: संघ यात्रा नए क्षितिज

100 वर्ष की संघ यात्रा: संघ यात्रा नए क्षितिज

भाग- 1

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस अवसर पर नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला का आयोजन किया जा रहा है। संघ के इस कार्यक्रम का विषय है ‘संघ यात्रा के 100 वर्ष: नए क्षितिज’। पहले दिन कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम से हुई। कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले, पवन जिंदल (उत्तरी क्षेत्र के क्षेत्रीय संघचालक), डॉ. अनिल अग्रवाल (दिल्ली के प्रांतीय संघचालक) शामिल हुए।

इस अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ की 100 वर्षों की अविस्मरणीय यात्रा और उसके अनुभवों पर प्रकाश डाला, उनका पूरा व्याख्यान नीचे पढ़ें।

माननीय सरकार्यवाह जी। माननीय क्षेत्र संघचालक जी। माननीय प्रांत संघचालक जी। उपस्थित सभी संघ के माननीय अधिकारी गण और राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले सभी गणमान्य जन। विदेशों का प्रतिनिधित्व भारत में करने वाले सभी डिप्लोमेट्स, पूज्य संतचरण, माता भगिनी। 2018 में इसी प्रकार का एक कार्यक्रम इसी सभागृह में हुआ था। संघ के बारे में बहुत सारी चर्चाएं चलती ही हैं। ध्यान में आया है कि चर्चा में जानकारी कम है, जो जानकारी है वो ऑथेंटिक नहीं है और इसलिए अपने तरफ से संघ की सत्य और सही जानकारी देना। जो भी संघ के बारे में चर्चा हो वह परसेप्शन के आधार पर ना हो। फेक्ट्स के आधार पर हो। वो मालूम होने के बाद निर्णय क्या करना, निष्कर्ष क्या निकालना वह तो जो सुनेगा उसका अपना अधिकार है।

किसी को कन्विंस नहीं करना है। बस बताना है। इस उद्देश्य से वो संवाद हुआ और वह संवाद अपेक्षाकृत बहुत अच्छी तरह हुआ। संघ के बारे में सत्य जानने के बाद बहुत सी बातें जो मन में बिना कारण थी वह चली गईं। उस सभा में आए हुए सब लोग संघ के बन गए। ऐसा नहीं कह सकते लेकिन वो उद्देश्य भी नहीं था। अभी शताब्दी के कार्यक्रमों का विचार जब हो रहा था तब फिर से यह कल्पना आई कि फिर से ऐसा एक संवाद उस समय एक ही स्थान पर हुआ था। देश में चार स्थानों पर हो ताकि अधिक लोग उसमें सहभागी हो सके। बाद में प्रश्न पूछ सकें। लेकिन जो पहले बताया है उस समय भी मीडिया ने बहुत अच्छी तरह उसको सारे देश में पहुंचाया था। तो वही सारी बातें फिर से बतानी हैं क्या?

संघ एक विषय है तो संघ के बारे में हर साल नया बताने का कुछ नहीं रहता है। तो इस बार यह हुआ कि 100 वर्ष पूरे हो गए हैं। आगे हम संघ के कार्य को कैसा देखते हैं? हमारे मन में क्या चल रहा है? यह भी रखा जाए। इसलिए न्यू होराइजंस (नए क्षितिज) ऐसा शब्द व्याख्यानमाला के टाइटल में है। और दूसरा यह किया जाए कि 70-75% नए लोगों को बुलाया जाए। तो इसलिए जो दो व्याख्यान होने वाले है उसमें आज के व्याख्यान में संघ के बारे में मैं बताऊंगा। पिछली बार जो दो भाषणों में बताया वह एक भाषण में बताऊंगा।

“100 वर्षों की यात्रा: संघ का उद्देश्य मात्र संगठन नहीं, राष्ट्र की साधना है”

100 साल की संघ की यात्रा हो रही है। क्यों हो रही है? संघ चलाना है ऐसा नहीं है। संघ चलाने का एक उद्देश्य है। और यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्यों शुरू हुआ? इतनी सारी बाधाएं आईं। स्वयंसेवकों ने सारी कठिन परिस्थितियों में से रास्ता निकालकर इसको चलते क्यों रखा? और 100 साल चलने के बाद भी नए क्षितिजों की बात क्यों कर रहा है? इसका अगर एक वाक्य में आपको उत्तर देना है, तो वह वाक्य संघ की प्रार्थना के अंत में हम स्वयंसेवक लोग रोज कहते हैं- भारत माता की जय। अपना देश है। उस देश की जय जयकार होनी चाहिए। उस देश को विश्व में एक अग्रगण्य स्थान मिलना चाहिए। लेकिन क्यों मिलना चाहिए? अग्रगण्य स्थान तो एक ही देश प्राप्त करेगा। और विश्व में सैकड़ों देश है। उसके लिए भी एक नई स्पर्धा उत्पन्न करनी है क्या? तो ऐसा कोई इरादा नहीं है। लेकिन उसके पीछे एक सत्य है। दुनिया में इतने देश है। क्यों है? विश्व बहुत पास आ गया है। अभी ग्लोबल बात होती है। विश्व पास आ गया है इसलिए ग्लोबल विचार करना ही पड़ता है। तो एक देश के बड़े होने का महत्व क्या है? तो यद्यपि सारे विश्व का जीवन एक है। मानवता एक है। फिर भी वो एक जैसी नहीं है। उसके अलग-अलग रूप है। अलग-अलग रंग है और ऐसा होने के कारण विश्व की सुंदरता बढ़ी है। क्योंकि हर एक रंग का अपना-अपना कंट्रीब्यूशन है, योगदान है। और अगर विश्व के इतिहास को देखते हैं तो स्वामी विवेकानंद का वो कथन ‘Every Nation has a Mission to Fulfill’ प्रत्येक राष्ट्र को एक मिशन होता है दुनिया में जो फुलफिल करना है। प्रत्येक राष्ट्र का विश्व में कुछ योगदान होता है, जो समय-समय पर उसको करना पड़ता है।

वैसे भारत का भी अपना एक योगदान है। विश्व के किसी देश को बड़ा होना है। अपने बड़प्पन के लिए नहीं होना है। उसके बड़े होने से विश्व के जीवन में जो एक आवश्यक नई गति चाहिए वह पैदा होती है। उसका उस प्रकार का योगदान होता है, इसलिए योगदान करने लायक उसको बनना है। इसलिए बड़ा होना है। और इसलिए संघ के निर्मित का प्रयोजन भारत है। संघ के चलने का प्रयोजन भारत है। और संघ की सार्थकता, भारत के विश्व गुरु बनने में है। क्योंकि भारत का एक योगदान दुनिया में वह योगदान उसको देना है। उसका समय आ गया है। इसके बारे में कल हम अधिक चर्चा करेंगे। परंतु यह भारत के उत्थान की शुरुआत कब हुई? तो एक धीमी और लंबी प्रक्रिया है जो अभी भी चल रही है।

“क्या यह वही भारत है जिसकी कल्पना की थी?”

हमारे इतिहास में हम जानते हैं कि हम वैभव के शिखर पर थे, स्वतंत्र थे। फिर आक्रमण हुए, हम परतंत्र हुए और दो बार बड़ी परतंत्रता झेलकर हम स्वतंत्र हुए। उस परतंत्रता में से मुक्त होना यह पहला काम था। अपने देश को बड़ा करना है तो स्वतंत्रता आवश्यक है। श्रृंखलाओं में बंधा आदमी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकता। और इसलिए अपने लिए कुछ कर भी नहीं सकता है। तो ये स्वातंत्र्य के लिए प्रयास शुरू हुए और एक व्यापक अखिल भारतीय प्रयास उसके लिए युद्ध 1857 में हुआ। वह युद्ध कुल मिलाकर विफल हुआ और उस विफलता के कारण देश में विचार शुरू हुआ की ये हमारा देश है। हमारी जनसंख्या प्रचंड है। हमारे अपने राजा महाराजा हैं। हजारों मील दूर से आकर मुट्ठी भर लोग जो इस देश को जबरदस्ती चला रहे थे उनके सामने हम हार कैसे गए? हार क्यों गए?

तो बहुत आशावादी लोगों का उत्तर था कि इस बार हार गए तो क्या हो गया? फिर से एक बार ऐसा ही प्रयास करना चाहिए- सशस्त्र क्रांति। तो एक धारा वो फिर से बह चली। क्रांतिकारियों की धारा। देश के लिए अपना जीवन, अपना यौवन हवन करने वाले लाखों उदाहरण उस धारा में से निकले जो हम सबके आज भी प्रेरणा स्रोत हैं, आदर्श हैं जीवन के बारे में। देश समर्पित जीवन कैसा होता है। परंतु उस धारा का प्रयोजन समाप्त हो गया।

स्वतंत्रता मिलने के बाद और इसलिए सावरकर जी उस धारा के एक ददीप्यमान रत्न थे। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद पुणे में अपने उस क्रांतिकारक अभियान का समापन विधिवत कर दिया सार्वजनिक कार्यक्रम करके। तो वह धारा अब नहीं है। उसकी आवश्यकता भी नहीं है। परंतु देश के लिए जीने मरने के लिए प्रेरणा स्रोत वो धारा बनी है। लेकिन कुछ लोगों को लगा कि ये लड़ाई में हम कम थे इसलिए नहीं आ रहे हैं। हमको राजनीति का पता नहीं है। लोगों में राजनीतिक जागृति नहीं है। केवल सैनिक लड़ेंगे तो काम नहीं होता है। सामान्य व्यक्ति भी खड़ा होना चाहिए और इसलिए हम परतंत्र है, इसका उनको भान करा देने वाला राजनीतिक उपक्रम करना चाहिए।तो उस स्वतंत्रता के युद्ध के बाद 1857 के बाद भारतीय असंतोष ठीक से व्यक्त हो और वह हानि ना करे, इसलिए कुछ व्यवस्था हो रही थी लेकिन इन सब लोगों ने उसको अपने वश में कर लिया और उसको स्वतंत्रता के लड़ाई का हथियार बनाया। इंडियन नेशनल कांग्रेस के नाम से वह धारा चली। उसी में से अनेक प्रकार के राजनीतिक प्रवाह निकलकर आज हम देखते हैं इतने सारे राजनीतिक दल अपने देश में हैं।

स्वतंत्रता के पहले स्वतंत्रता के लिए लोगों की राजनीतिक जागृति ये लक्ष्य उनका था और वो अच्छी तरह से हो गई। सामान्य व्यक्ति भी चरखा तो अपने देश का परंपरागत है वो नई बात नहीं थी लेकिन देश के लिए चरखा चलाना ये बात सिखाई उस राजनीतिक आंदोलन ने। देश के लिए जीना मरना, हर काम में देश का विचार करना। यह वातावरण सारे देश में हो गया। फलस्वरूप स्वतंत्रता मिली, सशस्त्र संघर्ष भी चल रहा था उनका भी बड़ा योगदान था कुछ दुनिया की परिस्थिति भी थी। स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद उस धारा को जिस प्रकार जैसे प्रबोधन करना चाहिए। उस प्रकार होता तो आज का दृश्य का कुछ अलग होता लेकिन वैसा हुआ नहीं। ये हम सब लोग देख रहे हैं। दोषारोपण करने की बात नहीं। यह फैक्ट है।

एक धारा थी उन्होंने कहा की ये सब होगा लेकिन अपने समाज में कुछ कमियां है रूढ़ि कुरीतियों से ग्रस्त अपना समाज है उसको आधुनिक शिक्षा का स्पर्श नहीं है। अंधविश्वासों से भरा है उसको ठीक करना चाहिए और इसलिए तरह तरह के सुधार आंदोलन अपने देश में हुए और कुछ आज भी चल रहे हैं। उनका परिणाम तो हुआ, प्रभाव तो हुआ। लेकिन सब कुछ ठीक नहीं हुआ अभी भी ऐसे सुधार के उपक्रम सुधार के अभियान सुधार के आंदोलन करने पड़ते हैं और एक धारा थी जिन्होंने कहा कि पहले अपने मूल पर चलो फिर से हम उसको भूल गए। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद दो मुख्य नाम उसमें लिए जाते हैं, जिन्होंने अपने मूल पर समाज को खींचने का प्रयास किया उसके चलते जो जो हुआ। पहले की तीन धाराओं सहित भारत में आज जो कुछ चल रहा है उस पर इनका प्रभाव है कहीं ना कहीं प्रेरणा स्रोत वहाँ पर है कहीं ना कहीं विचार का जो प्रवाह है वो वहां से जुड़ता है। परंतु ये चारों धाराएं चली जैसा भारत हमको चाहिए। पचहत्तर वर्ष आजादी के पूरे हुए। लेकिन हम अभी ऐसा नहीं कह सकते कि वो ऐसा खड़ा हुआ। इसका कारण क्या है?

डॉ. हेडगेवार: बाल्यकाल से क्रांति तक – एक जन्मजात देशभक्त की प्रेरणादायक यात्रा

संघ के निर्माता जो थे डॉ. हेडगेवार वो इन चारों धाराओं में काम कर चुके थे। उनको हम जन्मजात देशभक्त कहते हैं क्योंकि बचपन से ही ये चिंगारी उनके मन में थी कि देश के लिए जीना चाहिए, देश के लिए मरना चाहिए। स्वयं बचपन में ही अनाथ हो गए थे। दरिद्रता में आगे बढ़ना पड़ा। लेकिन देश के लिए चलने वाले कामों में भाग लेना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा और विद्यार्थी के नाते उनका जो कर्तव्य था अपनी पढ़ाई अच्छी तरह से पूर्ण करना उसमें अपने विद्यालय में पहले दस में आना ये भी कभी उनका छूटा नहीं।

वंदे मातरम आंदोलन उन्नीस सौ पांच-छह में जो हुआ। उस समय उन्होंने नागपुर के सारे विद्यालयों में उस आंदोलन का संगठन किया। जब इंस्पेक्टर लोग स्कूल इंसपेक्शन के लिए आते थे तो हर क्लास में उनका स्वागत ‘वंदे मातरम’ से होता था। चिढ़कर उन्होंने सारे विद्यालय बंद कर दिए। कौन है इसके पीछे पता लेना, लगाने का प्रयास किया। चार महीने स्कूल बंद रहे पता नहीं लगा। अंत में कॉम्प्रोमाइस हो गया। जो अभिभावक गार्डियंस थे और सरकारी में, कि एक nominal apology हो जाए स्कूल में एंटर करते समय गेट पर और शिक्षक खड़ा रहे, वो पूछे गलत हुआ ना? माफी चाहते हो ना? तो मुंडी हिलाना। nominal apology, स्कूल शुरू हुए लेकिन दो छात्र नागपुर के थें, जिन्होंने ये भी करने का इंकार कर दिया। भाई भारतवासी हम हैं- भारत माता हमारी, उसके स्वतंत्रता की बात को नकारना सपने में भी हम नहीं कर सकते। वो हमारा श्रद्धा स्थान है, वंदे मातरम कहना ये हमारा अधिकार है और इसलिए हम सपने में भी उसको ना नहीं कह सकते तो हम माफी कैसे मांगेगे, तो स्वाभाविक वो दोनों रस्टिकेट हुए, उसमें एक डॉ. हेडगेवार थे, जो बाद में डॉक्टर बनें। फिर उस समय राष्ट्रीय विद्यालय चलते थे, उनमें जाके उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करी, मैट्रिक में इस परिस्थिति में भी वो फर्स्ट क्लास में पास हुए। नागपुर के लीडर लोगों ने उनका ये स्पार्क देखकर, ये चिंगारी देख कर तय किया कि इनको कलकत्ता जाना चाहिए, मेडिकल पढ़ना चाहिए, मेडिकल की पढाई का बहाना है, परंतु करना है वहां क्या, क्रांतिकारकों की coordination committee वहां है- अनुशीलन समिति, उससे संबंध स्थापित करना और क्रांतिकार्य पश्चिम भारत में भी शुरू करना। तो उनकी योजना के अनुसार पास में पैसा न होते हुए भी चंदा करके जो थोड़ा जमा हुआ, उसके आधार पर डॉक्टर साहब कलकत्ता गए, किसी लॉज में जगह नहीं थी तो अपने दो मित्र एक कमरे में रहते थे, उनके बिस्तर के बीच की जगह में अपना बिस्तर लगाया और उन्होंने मेडिकल की पढाई भी अच्छी तरह पूरी की, फर्स्ट क्लास में हो गए. और क्रांतिकारक समिति से संबंध भी स्थापित कर लिया। स्वर्गीय त्रैलोक्यनाथ जी चक्रवर्ती, स्वर्गीय राज बिहारी बसु इनके लिखे पुस्तकों में, उनका उल्लेख आता है, उनका कोड नेम कोकेन था। कोकेनचंद्र एक जीवित वास्तविक व्यक्ति थें जो चंद्रनगर में रहते थे लेकिन उनके नाम से इनका वहां का चलता, CID को पता लगा तो कोकेन को अरेस्ट करने, वो चंद्रनगर जाके उनको लेके आए दूसरे को, ऐसी कहानी भी है वो। ये सब उन्होंने किया लेकिन क्रांतिकारक आंदोलन भी बंद हो गया

अनेक लूपहोल्स (loopholes) के कारण, अनेक कमियों के कारण अंग्रेज सरकार ने उसको दबाने में यश प्राप्त किया। इनके मेडिकल की पढ़ाई भी पूरी हो गयी। तीन हजार रुपए, मासिक की एक नौकरी बर्मा में उनके लिए तैयार थी, प्रिंसिपल ने कहा, इन्होंने कहा मैं नौकरी करने के लिए नहीं आया हूं, मैं तो अपने देश के लिए काम करने वाला हूं और इसलिए नागपुर वापस आए। चाचा जी ने विवाह के बारे में पूछा, चाचा जी को पत्र लिखा कि इस जीवन में मुझे दूसरा कोई काम करना नहीं है. क्योंकि उन्होंने प्रतिज्ञा की थी, अनुशीलन समिति में प्रवेश करने के पहले कि यह जन्म मेरा देश के लिए है, अपने सुख का विचार अगले जन्म में करेंगे और इसलिए कांग्रेस का जो आंदोलन चल रहा था, उसमें उन्होंने भाग लिया। 1920 में उस आंदोलन का प्रचार करते समय जो भाषण किए उसके चलते सेडिशन का मुकदमा उन पर चला और उसमें उन्होंने अपना डिफेंस दिया, डिफेंस देते नहीं थे लेकिन उन्होंने कहा कि मैं डिफेंस दूंगा, तो कोर्ट में मेरा और एक भाषण होगा। पत्रकार वगैरह आएंगे और एक बार मेरे प्रचार की मुझे संधि मिलेगी और उन्होंने भाषण किया वो भाषण करने के बाद जो जजमेंट आया, उसमें जज ने लिखा कि जिन भाषणों के कारण इनको आरोप लगा है, इन पर उन भाषणों से इनका बचाव का भाषण ज्यादा सेडिशियस है। क्योंकि उन्होंने यहीं से शुरुआत की कि अंग्रेज लोग हमारे ऊपर राज कर रहे हैं, ये किस कानून के तहत कर रहे हैं, उनको किसने अधिकार दिया। स्वतंत्रता तो प्रत्येक व्यक्ति का जन्म सिद्धक का है। मैंने लोगों को यही बताया है स्वतंत्रता प्राप्त करने के उपाय बताए हैं, किसी के विरोध में कुछ नहीं कहा है। जो आपके भाषण लिखने वाले लोग हैं उनको मराठी भी ठीक से नहीं आता, मेरे भाषण मराठी में हुए। आरोप तो आपका झूठा है लेकिन ये कोर्ट भी बेकानूनी है। इस न्याय को इस न्यायाधीश को इस न्यायालय को मैं नहीं मानता- ऐसा उन्होंने कहा। और इसलिए उनको एक वर्ष सश्रम कारावास हुआ।

सब ऐसे जो आंदोलन थे क्रांतिकारकों का आंदोलन था, राजनीतिक जागृति के आंदोलन थे, समाज सुधार के काम थे, धर्म जागृति के काम थे, अपने मूल पर वापस आने के लिए। इन सब में उन्होंने प्रामाणिकता से निस्वार्थ बुद्धि से कार्यकर्ता के नाते काम किया। कार्य पद्धति जान ली, कैसा काम करते हैं, समाज की स्थिति क्या है? ये करने से समाज में क्या होता है? ये सब उन्होंने जान लिया. अनुभव लिया और इस लंबे समय के दौरान उनका इन सब काम में काम करने वाले जो श्रेष्ठ लोग थे, धुरीण थे, leader लोग थे, उनसे संपर्क आया चर्चा भी हुई।

उनकी ये सक्रियता संघ स्थापना के बाद भी कायम थी। संघर्ष शुरू होने के बाद 1930 में जंगल सत्याग्रह हुआ। उस जंगल सत्याग्रह में भी वो संघ के सर संघचालक हो गए थे, उसको छोड़कर नया सरसंघचालक नियुक्त करके आंदोलन में गए। वहां भी उनको एक वर्ष सश्रम कारावास की सजा हुई। वो काट कर वापस आए फिर जो सरसंघचालक बने थे, उन्होंने अपना कार्यभार वापस कर लिया, फिर संघ का नेतृत्व किया। तो उनका अनुभव था और इस दौरान सबसे बात हुई, सुभाष बाबू से, महात्मा जी से, लोकमान्य तिलक से, चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह, राजगुरु जी को तो महाराष्ट्र में अंडरग्राउड उन्होंने रखा, नागपुर में रखा, बाद में लगा की नागपुर सेफ नहीं उनके लिए तो अकोला में भेजा।

ये सब करते हुए इन सब लोगों से चर्चा होती थी तो उनको ध्यान में आया कि सब लोगों को ऐसा लगता है कि हमारे उपाय अधूरे रहेंगे, अगर इस समाज के जो कुछ दुर्गुण हैं, जो घुस गए हैं इसमें उसको दूर ना किया जाए क्योंकि एक बात तो स्वतः सिद्ध है कि देश को बड़ा करना है, देश को स्वतंत्र करना है, कुछ भी करना है तो नेताओं के भरोसे, संगठनों के भरोसे नहीं होता, वो सहायक जरूर होते हैं लेकिन सबको लगना पड़ता है। सब में एक गुणवत्ता आनी पड़ती है, पूरे समाज के प्रयास से कोई भी परिवर्तन आता है। आज अपने देश को बड़ा करना हम चाह रहे हैं, वो किसी के भरोसे छोड़ के नहीं होगा। सब सहायक होंगे। नेता, नीति, पार्टी, अवतार, विचार, संगठन, सत्ता सब-सब इनका रोल असिस्टेंस का है लेकिन मुख्य कारण जो बनता है वो समाज का परिवर्तन है। समाज की गुणात्मक उन्नति है और बिना उसके हुए हमारे काम फुलफिल नहीं होंगे, जो इश्यूज लिए है वो शायद रिजॉल्व हो जाएंगे लेकिन वो फिर से खड़े नहीं होंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि स्वतंत्रता की बात ले तो हम देखते हैं कि कितना लंबा तांता है आक्रमकों का, हर बार कोई आता था। हमको देखते-देखते जीत लेता था, फिर हम जागृत होकर उसको खदेड़ देते थे, दूसरा आता था, ये सब बार बार क्यों होता है? क्योंकि कुछ ऐसे दोष है जिनको निकालना चाहिए, कुछ ऐसे गुण हैं, जिनको विकसित करना चाहिए। और इसलिए ये काम किसी को करना पड़ेगा। हम लोग नहीं कर सकते, क्योंकि हमने अपना अपना काम चुन लिया है।

इनका भी अध्ययन डॉक्टर हेडगेवार का भी अध्ययन, चिंतन वो इसी निष्कर्ष पर आया था। जिन महानुभावों के मैंने नाम लिए हैं उन सबको आप पढ़ लीजिए तो आपको ये भाव मिलेगा। उसके बारे में बहुत लोगों ने लिखा है। स्वदेशी समाज नाम का श्री रविंद्रनाथ ठाकुर जी का निबंध पढ़िए है। उसमें उन्होंने कहा है कि समाज की जागृति राजनीति से नहीं होगी, हमारे समाज में समाज का स्थानीय नेतृत्व खड़ा करना पड़ेगा, उन्होंने शब्दों किया है- नायक। जो स्वयं शुद्ध चरित्र है, जिसका समाज से निरंतर संपर्क है, समाज जिस पर विश्वास करता है और जो अपने देश के लिए जीवन मरण का वर्ण करता है, ऐसा नायक चाहिए, ऐसा उन्होंने कहा है। इतने बड़े खंडप्राय देश में, गांव-गांव में, गली-गली में ऐसा नायक चाहिए। जिसके जीवन से एक वातावरण बनता है, वातावरण में समाज अपनी कृति बदलता है। ऐसे नायकों का निर्माण होना चाहिए। रवींद्रनाथ ठाकुर ने स्वदेशी समाज में बहुत स्पष्ट रूप से ये बताया है।

इन सब के बोलने में, लिखने में ये बात आयी है कि राष्ट्र को खड़ा करना है तो अपना राष्ट्र नया नहीं बनाना है, हमारे यहां पहले से है, हिन्द स्वराज्य में गांधी जी ने लिखा है कि युवा वृद्धों को प्रश्न पूछता है कि अंग्रेजों के आने के कारण रेल लाइन वगैरह आ गयी, सारा देश एक बन गया। तो वृद्ध के रूप में वो गांधी जी उत्तर देते हैं हिंद स्वराज में, कि ये भी बात तुमको अंग्रेजों ने ही सिखाई है। अंग्रेजों के आने के बहुत पहले हमारा देश एक था। तो हमारे देश का अस्तित्व ये बहुत प्राचीन है।

परिस्थितियां बदलती है। उसमें परिस्थिति बदलती है, इसलिए वो एकत्व नहीं बदलता, स्वदेशी समाज में ही। रविंद्रनाथ जी ने लिखा है कि कोई नया व्यक्ति हम में आने से हम भारत के लोग डरते नहीं क्योंकि सबके प्रति अपनेपन का हमारा स्वभाव है। इस देश में हिंदू, मुसलमान, बौद्ध आदि-आदि आपस में संघर्ष नहीं करेंगे इसी देश के लिए जिएंगे इसी देश में मरेंगे।आपस में संघर्ष करते- करते कोई एक हल वो इसका निकाल लेंगे और साथ में जिएंगे, आगे वो कहते है की ये हल अहिंदू ना होकर विशिष्ट रूप से हिंदू होगा, ये उन्होंने लिखा है।

उस शब्द के बारे में क्या है बाद में बताता हूं। परंतु ये विचार सब में था कि अपना देश प्राचीन समय से एक है। अपने समाज को उन्नत बनाना चाहिए, वो सदा के लिए संकट परंपरा का निवारण करने का एकमात्र उपाय है लेकिन फुर्सत नहीं है तो डॉक्टर हेडगेवार ने सोचा कि किसी को फुर्सत नहीं है। तो मैं इसके प्रयोग करता हूं। ये बात उन्होंने त्रिलोकनाथ चक्रवर्ती जी को बहुत पहले, 1911 से 14 वो कलकत्ता में रहे शायद उस समय बताई थी।

और नागपुर वापस आने के बाद मेडिकल की पढाई पूरी करके आंदोलनों में भाग लेते-लेते उन्होंने इसके कई प्रकार के प्रयोग किए की ये कैसे हो सकता है, संपूर्ण देश को जोड़ा कैसे जा सकता है, संपूर्ण देश को बड़ा कैसे किया जा सकता है देश के व्यक्ति में गुणवत्ता का निर्माण कैसे किया जाता है।

इसके अनेक प्रयोग किए उन्होंने, उन्होंने भारत सेवाश्रम संघ के काम को देखा था। वो जिस अनुशीलन समिति के सदस्य थे उनके भी कई ऐसे मनुष्य निर्माण के कार्यक्रम चलते थे। ये सारा अनुभव लेकर उन्होंने एक चिंतन किया, एक उपाय निकाला उसका प्रयोग किया और उस प्रयोग के यशस्वी होने के बाद उसकी चर्चा की, उनके जो तरुण साथी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय तो थे हीं तो बहुत सारे तरुण, उनके व्यक्तित्व के कारण उनके साथ रहते थे, उनसे चर्चा की और 1925 में घोषणा की।

सौ वर्ष हम आज मना रहे हैं लेकिन प्रत्यक्ष ये इस संघ का बीजारोपण उसके कई वर्ष पहले डॉक्टर साहब के मन में हुआ था। मन में उस बीज ने एक आकार धारण किया। अंदर एक अंकुर धारण किया और 1925 के विजयादशमी के बाद डॉक्टर साहब ने घोषणा की कि आज से यह संघ हम प्रारंभ कर रहे हैं। उद्देश्य उन्होंने कहा संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन। अब यहां प्रश्न खड़ा होता है, बाकी लोगों को क्यों छोड़ा। तो पहली तो बात है कि जिनको हम हिंदू समाज कहते है आजकल, हिंदू समाज हिंदू नाम लगाना जिसको है उसको इस देश के प्रति जिम्मेवार रहना पड़ेगा।

ये रिस्पांसिबल समाज है क्योंकि इसको नाम मिला है इस देश के लोगों को वो नाम मिला है बहुत पहले मिला है। महावीर प्रसाद जी द्विवेदी है। उन्होंने लिखा है कि जरथुस्त्र के काल में, बाहर के लोगों ने हमको ये नाम दिया हमको तो जरूरत नहीं थी अलग नाम की।

हमने अपना धर्मशास्त्र लिखा तो मानव धर्मशास्त्र यही उसका नाम है क्योंकि हमारे यहां यही कहते थे ‘माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वर बांधवा शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रया’ या ‘अम निज परोवेति गणनाम लघुचेतसाम उदार चरित नाम तु वसुधव कुटुम्बकम’ हम मनुष्यों में अंतर नहीं करते थे, सारे मानव। विचार तो हमारा ऐसा था कि व्यक्ति, मानवता, सृष्टि ये सब परमात्मा के कारण जुड़ी है एक दूसरे से संबंधित है, एक का जो होता है वो दूसरे पर भी परिणाम करता है और इसलिए मनुष्य को अपने विकास का विचार करना है, तो इन तीनों के विकास में अपना विकास है, ये मानकर अपने विकास का प्लान करना पड़ता है। इस देश का स्वभाव है। तो हमको अलग नाम की जरुरत नहीं थी लेकिन जरथुस्त्र वहां गए उनको पूछा गया कौन हो?

तो उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज किर्गिस्तान में भारत से गए थे, सिंधु नदी के उस पार से गए थे। अब उस समय ईरान के लोग सिंधु नदी के उस पार वालों को हनत कहते थे उसका हनदू हो गया, हिंदू हो गया। ये एक कथा है। दूसरी कथा है कि ऐसा कहने के बाद। ईरान के लोगों ने इजरायल के लोगों के पूछने पर यहूदियों को कहा कि हमारा एक हिंदू गुरु है और वो बात घूमते घूमते अपने पश्चिम किनारे पर व्यापार के जरिए आ गयी, व्यापारियों ने पकड़ा वो शब्द लेकिन ठीक है उनको शब्द से क्या करना है सौदा पटने से काम है, व्यापार चलता रहा। intellectual लोगों के पास वो आ गया तब अपने पुराणों में आ गया। तम देव निर्मित देश हिंदुस्थानम प्रचक्षते, लोकभाषा में आने को बहुत समय लगा और लोकभाषा में जो शब्द आते है वो संतों की पकड़ में आते हैं इसलिए गुरु नानक देव जी के वाणी में पहले ये मिलता है। खुरासान खसमाना किया हिंदुस्तान डराया। उन्होंने वर्णन किया है बाबर के अत्याचारों का। और नागपुर वापस आने के बाद मेडिकल की पढाई पूरी करके आंदोलनों में भाग लेते- लेते उन्होंने इसके कई प्रकार के प्रयोग किये कि ये कैसे हो सकता है? संपूर्ण देश को जोड़ा कैसे जा सकता है? संपूर्ण देश को बड़ा कैसे किया जा सकता है? देश के व्यक्ति में गुणवत्ता का निर्माण कैसे किया जाता है? इसके अनेक प्रयोग किये उन्होंने। उन्होंने भारत सेवाश्रम संघ के काम को देखा था। वो जिस अनुशीलन समिति के सदस्य थे, उनके भी कई ऐसे मनुष्य निर्माण के कार्यक्रम चलते थे। ये सारा अनुभव लेकर उन्होंने एक चिंतन किया, एक उपाय निकाला उसका प्रयोग किया और उस प्रयोग के यशस्वी होने के बाद उसकी चर्चा की। उनके जो तरुण साथी, सार्वजनिक जीवन में सक्रिय तो थे ही। तो बहुत सारे तरुण, उनके व्यक्तित्व के कारण उनके साथ रहते थे। उनसे चर्चा की। और 1925 में घोषणा की। 100 वर्ष हम आज मना रहे हैं लेकिन प्रत्यक्ष ये इस संघ का बीजारोपण उसके कई वर्ष पहले डॉक्टर साहब के मन में हुआ था। मन में उस बीज ने एक आकार धारण किया। अंदर एक अंकुर धारण किया और 1925 के विजयादशमी के बाद डॉक्टर साहब ने घोषणा की कि आज से यह संघ हम प्रारंभ कर रहे हैं। उद्देश्य, उन्होंने कहा संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन। अब यहाँ प्रश्न खड़ा होता है। बाकी लोगों को क्यों छोड़ा?

हिंदू नाम लगाना जिसको है उसको इस देश के प्रति जिम्मेदार रहना पड़ेगा

तो पहली तो बात है कि जिनको हम हिन्दू समाज कहते हैं आजकल। हिंदू नाम लगाना जिसको है उसको इस देश के प्रति जिम्मेदार रहना पड़ेगा। ये रिस्पांसिबल समाज है क्योंकि इसको नाम मिला है, इस देश के लोगों को वो नाम मिला है बहुत पहले मिला है महावीर प्रसाद जी द्विवेदी है। उन्होंने लिखा है कि जतुष्ट के काल में बाहर के लोगों ने हमको ये नाम दिया। हमको तो ज़रूर नहीं थी अलग नाम की। हमने अपना धर्मशास्त्र लिखा तो मानव धर्मशास्त्र यही उसका नाम है, क्योंकि हमारे यहाँ यही कहते थे हम। ‘माता च पार्वती देवी, पिता देवो महेश्वर बांधवा शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रय’। ‘या अम निज परोवेति गणनाम लघुचेतसाम उदार चरित नाम तु वसुधव कुटुम्बकम।’ हम मनुष्यों में अंतर नहीं करते थे सारे मानव। विचार तो हमारा ऐसा था कि व्यक्ति,मानवता, सृष्टि- ये सब परमात्मा के कारण जुड़ी है। एक दूसरे से सम्बंधित है। एक का जो होता है वो दूसरे पर भी परिणाम करता है और इसलिए मनुष्य को अपने विकास का विचार करना है तो इन तीनों के विकास में अपना विकास है। ये मान कर अपने विकास का प्लान करना पड़ता है। इस देश का स्वभाव है। तो हमको अलग नाम की जरुरत नहीं थी। लेकिन जतुष्ट वहाँ गए उनको पूछा गया। कौन हो? तो उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वज किर्गिस्तान में भारत से गए थे। सिंधु नदी के उस पार से गए थे। अब उस समय ईरान के लोग सिंधु नदी के उस पार वालों को हनत कहते थे, उसका हनद हो गया, हिन्दू हो गया। ये एक कथा है। दूसरी कथा है कि ऐसा कहने के बाद ईरान के लोगों ने इस्राइल के लोगों के पूछने पर यहूदियों को कहा कि हमारा एक हिंदू गुरु है और वो बात घूमते घूमते अपने पश्चिम किनारे पर व्यापार के जरिए आ गई। व्यापारियों ने पकड़ा वो शब्द, लेकिन ठीक है उनको शब्द से क्या करना है? सौदा पटने से काम है। व्यापार चलता रहा। intellectual लोगों के पास वो आ गया। तब अपने पुराणों में आ गया। ‘तम देव निर्मित देश हिंदुस्थानम प्रचक्षते’ लोकभाषा में आने को बहुत समय लगा और लोकभाषा में जो शब्द आते है वो संतो की पकड़ में आते हैं। इसलिए गुरु नानक देव जी के वाणी में पहले ये मिलता है- ‘तुर्किस्तान खस्माना खुरासान खस्माना किया हिंदुस्तान डराया’। उन्होंने वर्णन किया है, बाबर के अत्याचारों का। और कहा है कि ना ही हिंदू महिलाओं का शील बचा ना मुस्लिम महिलाओं की अस्मत बची। अब ये सोचते है तो ध्यान में बात आती है कि उन्होंने दो क्यों शब्द उपयोग किये? क्योंकि जैसे उस समय मुसलमान थे हमारे देश में हमारे देश के कनवर्टेड मुसलमान थे। लेकिन दूसरी तरफ मुसलमान क्यों कहा होगा तो स्वाभाविक है- अल्लाह को मानते हैं, कुरान को मानते हैं, पैगम्बर साहब को मानते हैं। वही होते हैं मुसलमान। तो हिन्दू कहने से कोई मान्यता नहीं है। एक ईश्वर को मानने वाला हिन्दू नहीं है। नहीं ईश्वर के अनेक रूप है हिन्दुओं में 33 करोड़ है ऐसा कहते है।और एक ग्रंथ नहीं है। ना कोई एक गुरु है तो अनेक थे उस समय बौद्ध थे, जैन थे, शैव थे, शाक्त थे। अनेक प्रकार के पंथा संप्रदाय, रिलीजन अनेक थे लेकिन एक स्वभाव था जो इन सबको जोड़ता था वो स्वभाव ये था कि इन सबको स्वीकार करते थे।

विश्व में जितने तरीके है पूजा के, वो सब एक ही जगह पहुँचेंगे। कोई तरीका गलत नहीं है। हाँ, ये हो सकता है- कहीं देर से पहुंचेंगे, कहीं जल्दी पहुँचेंगे, कोई तरीका बड़ा सरल है, कोई तरीका बड़ा जटिल है। ‘रुचिन वैचित्रत रुजु कुटिल नाना पथयुताम’ मनुष्य अलग अलग होते है, बुद्धि अलग अलग होती है, रुचि अलग अलग होती है, रुचि के वैचित्र्य के कारण रुजु कुटिल अनेक प्रकार के रास्ते होते हैं। अब यहाँ इस सभागृह में आने के लिए कहाँ से चले? एक ही रास्ता थोड़ी था। जहाँ से चले वैसा रास्ता था। और कोई रास्ता ठीक भी था, कोई रास्ता खराब भी था। रास्ता खराब है इसलिए आप घूम कर भी आये होंगे। रास्ता खराब है तो भी समय पर पहुँचेंगे इसलिए उसी खराब रास्ते से भी आये होंगे। ये अपना-अपना मन है। ऐसे अनेक पथ है ‘रुचि नाम वैचित्रत रुजु कुटिलाना पत न नृणाम यानि आदमियों का एक गम्या’ एक ही जगह जाना है सबको। भगवान को कहते है- त्वमसी। तुम ही हो जो सबके गन्तव्य हो। कैसे- ‘पैसाम अरण युवन। विश्व में कहीं भी पृथ्वी पर वर्षा होती है तो अंत में सागर में जाती है। ये श्रद्धा रखने वाले, सबको उन्होंने एक नाम दिया- हिंदू।

“भारतीय संस्कृति की समन्वयवादी परंपरा और हिंदू दृष्टिकोण का मूलस्वर”

तो हिंदू यानी क्या? इसमें जो विश्वास करता है। अपने-अपने रास्ते से चलो भाई, अपना जो रास्ता मिला है स्वाभाविक रूप से। उस पर श्रद्धा रखो, बदलो मत, दूसरों को बदलो मत। इस पर श्रद्धा रखो। दूसरों की भी श्रद्धा है। उसका पूर्ण सम्मान करो, उसका स्वीकार करो, उसका अपमान कभी मत करो। और रास्तों को लेकर झगड़ा मत करो, आपस में मिलजुल कर चलो। ये परंपरा जिनकी है, ये संस्कृति जिनकी है वो हिन्दू है। और ये परंपरा -संस्कृति ऐसी क्यों बनी? इसका कारण भारतवर्ष है। भारत का भूगोल ऐसा था की हम प्रोटेक्टेड थे चारों तरफ से। पहले आक्रामक आते ही नहीं थे। कौन आएगा? सागर लांघकर कौन आएगा? जहाज नहीं थे। तो इतनी बर्फीली चोटिया लांघकर कौन आएगा? पूरा सैन्य लेकर तो नहीं आ सकता। इसलिए हम सुरक्षित थे और अंदर भरपूर था। जनसंख्या भी इतनी नहीं थी जितनी आज है। और इसलिए सब लोग इस वृत्ति के बने कि भाई मिलजुल कर रहो फालतू झगड़ा क्यों करते हो? दुनिया को शायद परिस्थिति मिली होगी। ‘struggle for existence or survival of the fittest’ इसकी लेकिन हमारे प्राचीन समय में भारत में ये स्थिति नहीं थी। ‘There was no struggle It was abundant for everybody’ और जो परंपरा थी उसमें संयम था। इसलिए ‘there was abundance’ तो झगड़ा क्यों करना है? क्यों नहीं करना है? जीना है ना तो मिलजुलकर जी सकते हैं। झगड़ा कौन करेगा? और इसलिए हमको फुर्सत भी मिली, हमको सुरक्षा भी मिली, हमको समृद्धि भी मिली। तो हमने जो एक human search सारी दुनिया में चलता है और दुनिया बाहर का देख कर रुक गई। जो दिखता है उसके आगे कुछ नहीं है।

माइक्रोस्कोप लगाओ तो ज्यादा दिखता है उसके पर कुछ नहीं है। ऐसा सोच के दुनिया रुक गयी। हम वहाँ रुके नहीं, हमने दृष्टि को अंदर कर लिया और अपने अंदर की सत्य को खोजा हमने। और उसने हमको बताया कि सर्वत्र एक ही है। दिखता अलग-अलग है, सब एक है। और इसलिए अपना स्वाभाविक धर्म क्या है? समन्वय, संघर्ष नहीं। तो ये जो संस्कृति थी उस संस्कृति का उपजाव क्यों हुआ? वो इसी के कारण हुआ है और इसलिए इस मातृभूमि के प्रति भक्ति है। माँ ने हमको अन्न पोषण केवल इतना नहीं दिया। संस्कार दिए है, भारत माता ने हमको ये संस्कार दिया है, वो हमारी माँ है। और ये केवल कपोलकल्पित बात नहीं है। इसके आधार पर प्राचीन समय से हमारे पूर्वज जीते आये हैं। ऐसा जीवन खड़ा करने के लिए उन्होंने खून पसीना सब बहाया, प्राणदान भी किया है। इस भूमि के संरक्षण, संवर्धन के लिए भी बलिदान दिया है। परिश्रम किया है। वो इतिहास हमको प्रेरणा देता है, वो पूर्वज हमारे पूर्वज है। इनको मानने वाला वास्तव में हिन्दू है। लेकिन जब संघ शुरू हुआ तब ये परिस्थिति थी कि ऐसे सब लोग अपने आप को हिंदू नहीं कहते थे और आज भी नहीं कहते कुछ लोग। तो हिन्दू के हम प्रकार मानते है, जो जानते है वो हिन्दू है। लेकिन ऐसे लोगों को भी जो जानते नहीं है।

 

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