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सीएसडीएस : कांग्रेसी गठजोड़, विदेशी एजेंडा

सीएसडीएस, जो कभी निष्पक्ष था, अब कांग्रेस से जुड़ाव और विदेशी फंडिंग के सहारे समाज में दरारें डाल रहा है। इसकी डेटा छिपाने की आदत और विभाजनकारी सर्वेक्षण भारत की एकता व लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु'
Aug 26, 2025, 09:02 am IST
inभारत, विश्लेषण, दिल्ली
आईसीएसएसआर ने सीएसडीएस को नोटिस जारी कर सात दिन में जवाब मांगा है

आईसीएसएसआर ने सीएसडीएस को नोटिस जारी कर सात दिन में जवाब मांगा है

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) 1963 से सामाजिक विज्ञान और जनमत सर्वेक्षण के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित संस्थान रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में इसके कामकाज, फंडिंग स्रोतों और कांग्रेस पार्टी से कथित नजदीकियों को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह संस्थान मुख्यतः सरकारी अनुदानों और विदेशी फंडिंग पर निर्भर है, फिर भी इसके सर्वेक्षणों और रिपोर्टों में बार-बार जाति, धर्म और समुदाय आधारित विभाजन को बढ़ावा देने वाले रुझान सामने आते हैं। ये रिपोर्ट सीएसडीएस की फंडिंग, डेटा की गोपनीयता और कांग्रेस के साथ इसके कथित रिश्ते को उजागर करती है, जो देश के सामाजिक ढांचे और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है।

यह भी चर्चा में है कि सीएसडीएस से जुड़े कुछ वरिष्ठ सदस्य वर्षों से कांग्रेस से वैचारिक या व्यावहारिक रूप से जुड़े रहे हैं, जिससे इसकी राजनीतिक निष्पक्षता को लेकर शंकाएं गहराई हैं। आलोचकों का मानना है कि यदि सार्वजनिक धन से संचालित कोई संस्था समाज को विभाजित करने वाले नैरेटिव को पुष्ट करती है, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाला कदम माना जा सकता है। कई विश्लेषकों का यह भी कहना है कि सीएसडीएस द्वारा प्रस्तुत आंकड़े प्रायः एक विशेष राजनीतिक नैरेटिव को मजबूत करने की दिशा में प्रयुक्त होते हैं।

सीएसडीएस को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) से भारी वित्तीय सहायता मिलती है। 7 अगस्त, 2023 को संसद में बताया गया कि पिछले तीन वर्ष में इस संस्था को 13 करोड़ रुपये दिए गए, जिसमें से 67 प्रतिशत वित्तपोषण सीधे केंद्र सरकार से आती है। इतनी बड़ी राशि जनता के करों से आती है, इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि सीएसडीएस निष्पक्ष और पारदर्शी कार्य करेगा। फिर भी, सीएसडीएस अपने सर्वेक्षणों का कच्चा डेटा सार्वजनिक नहीं करता, जबकि वह दूसरों से, जैसे चुनाव आयोग से पारदर्शिता की अपेक्षा करता है।

सामाजिक टिप्पणीकार दिलीप मंडल का कहना है कि सीएसडीएस अपने संसाधनों का उपयोग समाज में विभाजन पैदा करने वाले कथानकों को बढ़ावा देने में कर रहा है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या वास्तव में यह संस्था जनता के हित में काम कर रही है?

सीएसडीएस और कांग्रेस से नाता

सीएसडीएस का इतिहास उन लोगों से भरा है, जिन पर कांग्रेस के साथ निकटता के आरोप हैं। इसकी संस्थापक रजनी कोठारी कांग्रेसी विचारधारा के करीब माने जाते थे। यह प्रवृत्ति योगेंद्र यादव, अभय कुमार दुबे और संजय कुमार जैसे शोधकर्ताओं तक जारी है। विशेषकर संजय कुमार, जो सीएसडीएस के लोकनीति कार्यक्रम के सह-निदेशक हैं, हाल ही में विवादों में घिरे। 17 अगस्त, 2025 को उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 के मतदाता आंकड़ों में भारी विसंगति का दावा किया। कहा गया कि नासिक पश्चिम में मतदाता संख्या में 47.38 प्रतिशत और हिंगणा में 43.08 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि रामटेक और देवलाली में भारी गिरावट दर्ज की गई।
उसी दिन, राहुल गांधी ने बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ शुरू की।

साथ ही, टाइम्स ऑफ इंडिया में संजय कुमार का एक आलेख प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था, ‘व्हाट ए क्लेश एसआईआरजी, व्हाई द अपोजिशन-ईसी फ्यूड इज अनलाइक एनी बिफोर’। अर्थात् क्या जबरदस्त टकराव है, सरजी (एसआईआरजी)! विपक्ष और चुनाव आयोग की यह लड़ाई पहले जैसी नहीं। इस लेख में संजय कुमार ने खुलकर राहुल गांधी की वकालत और चुनाव आयोग की आलोचना की। इस लेख को ‘एक्स’ पर साझा करते समय संजय कुमार ने ‘वोट चोरी’ और ‘राहुल एक्सपोज वोट चोरी’ जैसे हैशटैग का इस्तेमाल किया, जो उसी दिन कांग्रेस द्वारा भी इस्तेमाल किए जाने वाले हैशटैग थे। उन्होंने कांग्रेस विचारक योगेंद्र यादव को भी इस पोस्ट में टैग किया। इन तथ्यों, समय और हैशटैग के समन्वय से यह सवाल उठता है कि क्या यह सब सुनियोजित रूप से किया गया था?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पवन खेड़ा ने संजय कुमार द्वारा जारी किए गए डेटा और सामग्री का खुलेआम इस्तेमाल ‘वोट चोरी’ के आरोप को हवा देने के लिए किया। हालांकि, 19 अगस्त को संजय कुमार ने माफी मांगते हुए वह पोस्ट हटा ली और कहा कि 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के डेटा की तुलना में त्रुटि हुई। उनकी टीम ने डेटा को गलत तरीके से पढ़ा था। अब, जब भारतीय जनता पार्टी संजय कुमार पर कांग्रेस के ‘फर्जी कथानक’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाती है, तो इसमें क्या गलत है? यह सवाल इस पूरे मामले की पारदर्शिता और सच्चाई को लेकर उठता है। दूसरी बात, सीएसडीएस के जिस आंकड़े को राजनीतिक हथियार बनाकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग को घेरने की कोशिश की, जिसे उसके मुखपत्र नेशनल हेराल्ड ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया, लेकिन जब फर्जीवाड़ा सामने आया तो कांग्रेस ने इससे किनारा करने की कोशिश की। उसके कई नेताओं ने अपने ट्वीट और पोस्ट हटा लिए, लेकिन अब तक किसी ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक माफी नहीं मांगी।

दोहरा मापदंड

सीएसडीएस पर सबसे बड़ा आरोप है कि यह अपने सर्वेक्षण का कच्चा (रॉ) डेटा सार्वजनिक नहीं करता, जबकि यह चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग करता है और स्वयं डेटा प्रदान करने के लिए भारी शुल्क वसूलता है। इससे लाखों छात्र और शोधकर्ता, जो इस डेटा पर आधारित अध्ययन करना चाहते हैं, गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। कच्चे डेटा के अभाव में सीएसडीएस के दावों की सत्यता का स्वतंत्र जांच करना नामुमकिन हो जाता है। उदाहरणस्वरूप, 2024 के सोशल एंड पॉलिटिकल बैरोमीटर प्री-पोल सर्वेक्षण में दावा किया गया कि 56.9 प्रतिशत भारतीय चाहते हैं कि मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षण मिले। ऐसे सर्वेक्षण संवैधानिक ढांचे को कमजोर कर सकते हैं। यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह सर्वे सिखों और बौद्धों को शामिल किए बिना केवल हिंदुओं पर केंद्रित क्यों था? साथ ही, इतना महत्वपूर्ण डेटा क्यों जनता से छिपाया जा रहा है? इन तमाम सवालों का जवाब सीएसडीएस को स्पष्ट करना चाहिए। इस सर्वे का पूरा रॉ डेटा सार्वजनिक करना उसकी जिम्मेदारी बनती है।

सीएसडीएस के सर्वेक्षण, खासकर 1997 में उसके द्वारा शुरू किए गए शोध कार्यक्रम ‘लोकनीति’ कार्यक्रम के सर्वेक्षण समाज में जाति और मजहब के आधार मतभेदों को बढ़ाने वाले औजार साबित हो रहे हैं। इसके आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण किया जाता है। इसके आंकड़े जाटव, पासी, यादव, ब्राह्मण जैसे समुदायों के मतदान पैटर्न उजागर करते हुए समाज में अविश्वास और कटुता फैलाते हैं। ये आंकड़े अखबारों, किताबों, शैक्षणिक शोध पत्रों और राजनीति में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं, जिनसे समाज में विभाजन की जड़ें गहरी होती हैं।

इसका उदाहरण है 2024 का सर्वेक्षण, ऊपर जिसकी चर्चा की गई है। यह सर्वेक्षण कहता है कि बड़ी संख्या में लोग मुसलमानों को एससी आरक्षण देने के पक्ष में हैं। यह वंचितों के अधिकारों को खतरे में डाल सकता है। यह सर्वेक्षण वंचितों के संवैधानिक अधिकारों पर सीधे हमला और राजनीतिक एजेंडा आगे बढ़ाने का एक हथियार है। लोकनीति-सीएसडीएस के एक सर्वेक्षण में दावा किया गया कि चुनाव आयोग में जनता का भरोसा तेजी से घटा है। इसने मतदाता सूची के विशेष संशोधन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए, जिसे गरीब और वंचित वर्गों के मतदान अधिकारों के लिए खतरा बताया गया।

यह सवाल बहुत गंभीर है कि सीएसडीएस किस आधार पर वह सवाल उठाता है, जो चुनावी बहस का विषय कभी नहीं था? क्या इसका मकसद कांग्रेस के नीतिगत एजेंडे को तवज्जो देना है या समाज को तोड़ना? इस संदर्भ में सीएसडीएस की निष्पक्षता और उद्देश्य पर संदेह उठना स्वाभाविक है। यह संस्था अपने ‘अध्ययन’ के माध्यम से राजनीतिक हितों को साध रही है, न कि समाज के व्यापक हितों को।

देश तोड़ने की साजिश?

सीएसडीएस को विदेशी संगठनों जैसे फोर्ड फाउंडेशन, कनाडा की आईडीआरसी से भारी फंडिंग मिलती है, जिनके पीछे गेट्स फाउंडेशन, यूके की डीएफआईडी, नॉर्वे की नॉराड, ह्यूलेट फाउंडेशन और डच एजेंसियां जैसे वैश्विक सत्ता थिंक टैंक काम करते हैं। ये संस्थाएं कभी भी स्वतंत्र विकास या सुधार के लिए दान नहीं देतीं, बल्कि उनका एजेंडा स्पष्ट है—भारत को जाति और धर्म के आधार पर बांटकर कमजोर करना, एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत उनके लिए खतरा बन रहा है। उनका यह एजेंडा सीएसडीएस के सर्वेक्षण में साफ झलकता है, जो हिंदू समाज को जातिगत समूहों में विभाजित करते हैं और मुसलमानों को एक समूह के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसने न केवल समाज में गहरे तनाव को जन्म दिया है, बल्कि साम्प्रदायिक भेदभाव को भी हवा दी है।

अब पूरे देश में जबर्दस्त आवाज उठ रही है कि भारत विरोधी एजेंडों को बढ़ावा देने वाली इस संस्था को मिलने वाला विदेशी वित्तीय सहयोग तत्काल रोका जाए। साथ ही, सीएसडीएस को अपना कच्चा डेटा सार्वजनिक करने के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए, ताकि इसके अभियान की पूरी कहानी साफ हो सके। भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे बाहरी प्रभावों से देश को मुक्त रखा जाए और पारदर्शिता सुनिश्चित हो।

सीएसडीएस, जो कभी निष्पक्ष सामाजिक वैज्ञानिक संस्था था, अब जनता के करोड़ों रुपये लेकर समाज में दरारें डालने का काम कर रहा है। इसके डेटा छिपाने के खेल और कांग्रेस से घनिष्ठ संबंध इसकी विश्वसनीयता को तो तहस-नहस कर ही रहे हैं, इसके विभाजनकारी सर्वेक्षण देश की एकता और लोकतंत्र को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। सवाल है कि सरकार के पैसे से चलने वाला यह संस्थान अपना डेटा क्यों छिपाता है? वास्तव में यह किन हितों की सेवा कर रहा है? जब तक ये सवाल अनुत्तरित रहेंगे, सीएसडीएस की विश्वसनीयता और साख पर बड़ा खतरा बना रहेगा।

Topics: CSDSजनमत सर्वेक्षणAnti-India agendaमुखपत्र नेशनल हेराल्डdivisive surveyIndia's unity and democracyforeign agendamouthpiece National HeraldPolitical agendaभारत विरोधी एजेंडापाञ्चजन्य विशेषविभाजनकारी सर्वेक्षणopinion pollभारत की एकता व लोकतंत्रCongress allianceकांग्रेसी गठजोड़सीएसडीएसविदेशी एजेंडा
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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