विभाजन - विभीषिका : खून के आसू
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विभाजन – विभीषिका : दिल दहलाने वाला है हिंदू नरसंहार का वह भीषण मामला

विभाजन काल की परिस्थिति, साम्राज्यवादी शक्तियों के हित और राजनीतिक हसरतों की कहानी एक तरफ.. मगर उन लोगों से बात करना जिन पर यह आफत गुजरी, दिल दहलाने वाला है।

Written byRajpal Singh RawatRajpal Singh Rawat
Aug 22, 2025, 03:49 pm IST
inभारत

India Pakistan Partition : विभाजन काल की परिस्थिति, साम्राज्यवादी शक्तियों के हित और राजनीतिक हसरतों की कहानी एक तरफ.. मगर उन लोगों से बात करना जिन पर यह आफत गुजरी, दिल दहलाने वाला है। झुर्रियों से अटे चेहरे, धुंधलाती आखें और उस घटनाक्रम को याद कर रुंध जाने वाले गले… बुजुर्गों का अचानक फफककर रो पड़ना दबाए गए इतिहास का बांध टूट जाने जैसा है।

यह हिंदू नरसंहार का वह भीषण मामला है जिसकी दुनिया में कभी चर्चा तक नहीं होती। पाञ्चजन्य ने इसी पीड़ा को समाज के सामने लाने की ठानी है। हमारे संवाददाता दिल्ली सहित देश के विभिन्न शहरों, गांवों में महीनों से भटक रहे हैं, गलियों की खाक छान रहे हैं, तब जाकर उन लोगों तक पहुुंच पा रहे हैं, जो विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आए। बचपन में बंटवारे को अपनी आंखों से देखने वालों के बयान थर्राहट से भर देने वाले हैं। इनकी आपबीती किसी को भी रुला देती है। आज ये सभी 75-100 वर्ष के हैं, लेकिन इतने दिन बाद भी उनके मन में अपनी मिट्टी छोड़ने की कसक है। मुस्लिम गुंडागर्दी के सामने बेबस रह जाने की फांस है। अपनी मां,बहन बेटियों के साथ बलात्कारों को देखने, उनके कुंओं में छलांगें लगाने या जिहादियों द्वारा झपट लिए जाने की पहाड़ जैसी पीड़ा है।

ये दर्दनाक कहानियां लंबी और त्रासद हैं, जिन्हें हमने अपने यूट्यूब चैनल @panchjanya पर अपलोड किया है। इस विशेषांक में ऐसे ही लोगों के दर्द और संघर्ष की कहानियों को बहुत संक्षेप में उड़ेला गया है। यदि आपके आसपास भी विभाजन से पीड़ित लोग हों, तो हमें उनका वीडियो बनाकर [email protected] पर भेज सकते हैं।

‘खड़ा हुआ कष्टों का पहाड़’

-चुन्नीलाल मदान, डेरा गाजीखान

India Pakistan Partition : भारत विभाजन से पहले मेरे पिताजी बलूचिस्तान में सरकारी नौकरी करते थे। एक बार वे आए तो माताजी और मुझे साथ ले गए। अभी बलूचिस्तान गए कुछ ही दिन हुए थे कि पिताजी कहने लगे कि बेवजह घर से मत निकलना, बाहर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। जब वहां का माहौल बिगड़ गया तो पिताजी मुझे और मां को लेकर गांव आ गए। फिर कभी बलूचिस्तान नहीं लौट पाए। गांव आने के बाद देखा कि मुसलमान हिंदुओं के घरों को लूट रहे थे, उनके साथ मार-पीट कर रहे थे। हालात ऐसे बने कि एक दिन हमें गांव, घर और जमीन-जायदाद छोड़कर पलायन करना पड़ा। रास्ते में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने हिंदुओं की मदद की। भारत में उन दिनों बहुत मुश्किल से समय बीता। सरकार ने रहने के लिए तंबू की व्यवस्था की थी। बाद में लोगों ने अपनी व्यवस्था कर ली।

‘चौदह लड़कियों की ले ली जान’

-जगदीशराज बाली,जीराबाद, पाकिस्तान

India Pakistan Partition : बंटवारे के दिनों की पीड़ा मुझे आज भी दुख के गहरे सागर में डुबो देती है। आज भी मेरी आंखें भर आती हैं। हम एक साधन-संपन्न परिवार में जन्मे थे। 1947 में मैं अपनी मां के साथ मनावर में था कि अचानक एक दिन हमें फौरन वापस गांव भेज दिया गया। लड़ाई-झगड़े शुरू हुए तो गांव के हम सब लोगों को जुकालिया शिविर में भेज दिया गया। हम दो महीने तक वहीं रहे। हमारे परिवार के सभी लोग डर के साये में एक काफिले में चलते हुए भूखे-प्यासे भारत की सीमा तक पहुंचे। हमारे करीबी रिश्तेदार बख्शी मंगत राम ने मुसलमानों के डर से अपने परिवार की 14 लड़कियों को खुद ही जान से मार दिया, ताकि वे मुसलमानों के हाथ न लग सकें। पिताजी की एक फैक्ट्री थी। फैक्ट्री के मुसलमान नौकरों ने ही पिताजी को बंदी बना लिया। 20,000 रु. देने पर उन्होंने पिताजी को छोड़ा।

विभाजन – विभीषिका : 3 जून की घोषणा-सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी

‘मेरे चचेरे भाई को मार डाला’

-मुलखराज गुलाटी,बन्नू, पाकिस्तान

India Pakistan Partition : भारत का बंटवारा ऐसा दर्दनाक पल था कि जिसकी याद भुलाए नहीं भूल सकती। हमने न सिर्फ अपनी पुरखों की मिट्टी को छोड़ा, बल्कि अपनी मौत को बहुत नजदीक से अनुभव किया। मेरे कितने ही अपने इस खौफनाक घटना की भेंट चढ़ गए। हमारे खेतों में जो फसल हुआ करती थी, उसे हमारे पिताजी पख्तून के बन्नू शहर बेचने जाते थे। गांव और शहर, दोनों जगह हमारे आलीशान मकान थे। मेरे चचेरे भाई कालू राम को दंगाइयों ने मार डाला। उन्मादी हमारी बहन की ननद को खींच कर अपने साथ ले गए। जब उपद्रव बढ़ने लगा तो हमारा परिवार जान बचाने की खातिर एक दिन वहां से निकल गया। सफर में रात भर भूखे-प्यासे रहे, क्योंकि हमने सुन रखा था कि मुसलमानों ने तालाबों, कुंओं में जहर डाल दिया था। अगले दिन सुबह हम अटारी पहुंचे। उस दौरान रास्ते में जो देखा, उसे याद करके आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

‘जल्लाद हो गए थे मुसलमान’

-सूरजप्रकाश गुलाटी,बन्नू, पाकिस्तान

India Pakistan Partition : उन दिनों बंटवारे का खौफ था, लूटमार, आगजनी के रोजाना के किस्से हमारे घर के बुजुर्गों को डरा देते थे। ऐसे माहौल में घर के बुजुर्गों ने जान बचाने के लिए धीरे-धीरे परिवार के सदस्यों को भारत भेजना शुरू कर दिया। हमारे पिताजी भी परिवार के साथ भारत आने को मजबूर हो गए। हम ही नहीं, हमारे बाकी सब नाते-रिश्तेदार अपनी जान बचाकर भारत में अंबाला होते हुए कुरुक्षेत्र कैंप तक आए। वहां से हम सब बरेली गए और बाद में रुद्रपुर आकर बस गए। मुझे आज भी याद है हमारे इलाके को कट्टर मुसलमानों ने ऐसा खौफनाक बना दिया था कि हम जैसा कोई वहां कितने दिन जिंदा रह पाता! जो हुआ, बहुत गलत हुआ। कई बार तो स्थानीय मुस्लिम ऐसे जल्लाद हो जाते थे कि मौका मिलते ही गला काट दें। हमारे परिवारों की बहू-बेटियों का तो राह में निकलना तक मुश्किल हो चुका था।

‘आज भी लगता है डर’

-जवाहरलाल तनेजा,मुजफ्फरगढ़, पाकिस्तान

India Pakistan Partition : भारत के बंटवारे से पहले हम गांव महमूद दी बस्ती, तहसील अलीपुर में रहते थे। मेरे पिताजी जासुराम जी की प्रतिष्ठित परचून और किराने की दुकान थी। उसके ठीक बराबर में उनके ताऊजी घनश्याम दास तनेजा की कपड़े की दुकान थी। उनके चाचा उद्धव दास तनेजा की पंसारी की दुकान थी। वे वैद्य भी थे। बंटवारे के दिनों में जब दंगे होने शुरू हुए, तो हमारे पिता अपनी दुकान और घर अपने कर्मचारियों के हवाले करके हमारे परिवार और मामा जी के परिवार को साथ लेकर हिन्दुस्थान की ओर चल दिए। हम सब रास्ते भर भूखे-प्यासे रहे। बस एक ही चिंता थी कि कैसे भी हम भारत की सीमा तक पहुंच जाएं। हमारे चाचाजी और ताऊजी साथ नहीं आए थे, वे दोनों वहीं रुक गए। भारत आकर सबसे पहले हम लोग कुरुक्षेत्र में लगे कैंप में गए। उन दिनों को याद करके आज भी कपकंपी छूट जाती है।

‘काफिले पर हमले’

-रामप्रकाश बाठला,लायलपुर, पाकिस्तान

India Pakistan Partition : हमने बंटवारे के समय यह सोचा भी नहीं था कि अपने खेत-खलिहानों को छोड़कर जाना होगा और ऐसे शिविरों में रहना पड़ेगा। धीरे-धीरे माहौल बदलता गया। आसपास के गांवों के लोग गांव छोड़कर जाने लगे। एक दिन हमारे गांव के कुछ लोग आठ बसों में सवार होकर निकले। रास्ते में उन सबको मार दिया गया। हमने अगले दिन काफिले के साथ पैदल चलने का फैसला किया। उस भयानक दौर में कट्टर मुसलमानों के भय से हम गांव के सभी लोग एक काफिला बनाकर हिंदुस्थान की ओर चल पड़े। करीब दस मील लंबा होगा हमारा काफिला। हमारे काफिले पर भी कई स्थानों पर मुसलमानों ने आक्रमण किए, लेकिन काफिले के लोग उनका कड़ा मुकाबला करते थे। हम सुरक्षित अमृतसर पहुंच गए, लेकिन रास्ते में जो भयंकर मंजर देखे, वे शब्दों में बताए नहीं जा सकते। लाशों के अंबार लगे थे। जमकर मार-काट हुई थी।

विभाजन-विभीषिका: अलग पाकिस्तान की मांग का मुख्य वैचारिक आधार क्या था?  किसने रक्त दिया? किसने घाव दिए?

‘हिन्दू होने का मिला दंड’

– धर्मचंद खन्ना,डेरा गाजीखान, पाकिस्तान

India Pakistan Partition : एकाएक पड़ोसी मुसलमानों ने यह संदेशा दिया कि जितनी जल्दी हो, यहां से सभी लोग निकल जाओ, क्योंकि बहुत जल्दी आपके घर हमला होने वाला है और बाहरी लोग आप सबको मार डालेंगे। माहौल बिगड़ना शुरू हुआ तो डर के चलते मोहल्ले के सभी लोग एक जगह एकत्र हो गए और फिर सबने गांव छोड़ने का निर्णय लिया। हम गाड़ी में जानवरों जैसे भरे हुए थे। न पीने को पानी था और न ही खाने को खाना। बस चुपचाप बैठे हुए थे डरे-सहमे। किसी तरह हम हरियाणा के कैथल पहुंचे, जहां हम सभी को एक सराय में ठहराया गया। आज जब उस मंजर की याद आती है तो एक ही ख्याल आता है कि हम हिंदू थे, इसलिए हम सभी को अपनी जमीन और घर से बेदखल होना पड़ा, भागने को मजबूर किया गया, मारा गया, बद से बदतर हालात बना दिए गए।

गांव को घेरकर करते थे हमला

-सरदार हरबख्श सिंह बक्शी, पाकिस्तान

India Pakistan Partition : बंटवारे की पीड़ा को कभी भूल ही नहीं सकता। मुुझे आज भी अपनी माटी की सुंगध आती है। उसे चूमने का मन करता है। वह घर, गलियारा, खेत ऐसा लगता है कि बुलाते हैं। लेकिन… विभाजन के समय मैं नौ साल था। मेरे पिताजी सेना में थे। मैं वहीं के बब्बर खालसा स्कूल में पढ़ता था। तब माहौल खराब हो चुुका था। जगह-जगह से मार-काट की खबरें आती थीं। परिवार के लोग जब बाहर से आते थे तो घर में इसी सबकी चर्चा होती थी कि फलां जगह मुसलमानों ने हमला किया, उस गांव में आग लगाई, वहां से लोग पलानन करके हिन्दुस्थान जा रहे हैं, आदि, आदि। इसी दरम्यान एक दिन मुसलमानों ने हमारे गांव पर भी धावा बोल दिया। गांव के लोग भी पहले से तैयार थे। मुसलमानों ने माहौल भांपा और बिना कुछ किए लौट गए। लेकिन लोगों में डर भर चुका था। पलायन शुरू हो गया, लोग घरों को छोड़कर चले गए।

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