प्रेमानंद जी महाराज से एक व्यक्ति ने पूछा कि लोग अक्सर दूसरों से कोई काम करवाने के लिए बच्चों, पति, पत्नी, भगवान या गुरुदेव की कसम दिलवा देते हैं। क्या यह सही है?
इस पर महाराज जी ने स्पष्ट किया कि कसम का मतलब होता है एक मजबूत संकल्प या प्रतिज्ञा। अगर कोई व्यक्ति खुद अपनी इच्छा से कोई कसम खाता है और उसे तोड़ता है, तो उसके पहले किए हुए पुण्य (सुकृत) भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कसम कभी हल्के में नहीं लेनी चाहिए। लेकिन जब कोई हमें अपने स्वार्थ के लिए कसम दिलवाता है, जैसे – “तुम्हें तुम्हारे बेटे की कसम है”, “तुम्हें भगवान की कसम है” तो ऐसी कसमें मान्य नहीं होतीं, जब तक हम उन्हें स्वीकार नहीं करते। अगर हम मन से उस बात को स्वीकार नहीं करते, तो उसका कोई असर नहीं होता।
“महाराज जी ने कहा कि कसम तभी मानी जाती है जब कोई इंसान खुद अपने मन से, सच्चे दिल से उसे ले। अगर किसी को डरा-धमका कर, भावनाओं का दबाव डालकर या जबरदस्ती कसम दिलाई जाए, तो उसका कोई धार्मिक या आध्यात्मिक मतलब नहीं होता। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई कहे, “तुम्हें श्रीजी की कसम है, तुम ऐसा करो”, तो अगर हमने उसे मन से स्वीकार नहीं किया है, तो वो कसम नहीं मानी जाएगी। वरना तो हर कोई दूसरों से काम निकलवाने के लिए तरह-तरह की कसमें दिलवाने लगेगा।
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महाराज जी ने यह भी कहा कि कसम कोई खेल नहीं है। यह कोई हल्की बात नहीं है, जिससे हम रोजाना खिलवाड़ करें। आज के समय में लोग बहुत जल्दी कसम खा लेते हैं और उसी तेजी से उसे तोड़ भी देते हैं। शाम को कसम खाते हैं और सुबह तोड़ देते हैं। कभी-कभी तो कुछ मिनटों में ही कसम टूट जाती है। इसलिए उन्होंने कहा कि पहले स्वयं पर नियंत्रण रखो, फिर सोच-समझकर कसम खाओ। जैसे यदि कोई शराब छोड़ना चाहता है, तो पहले एक महीने तक खुद से छोड़ कर देखे। फिर यदि मन मजबूत हो जाए, तो कसम खाए। बिना आत्मबल के कसम खाकर तुरंत तोड़ देना केवल पुण्य नाश ही करता है।













