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हारी कुनबे की मक्कारी: राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोप न सबूतों में टिके, न कांग्रेस समर्थकों के बीच

राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ आरोप न सबूतों में टिके, न कांग्रेस समर्थकों के बीच। चुनाव आयोग ने भी इन्हें भ्रामक बताया। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस पर आयोग के दुरुपयोग के आरोप लग चुके है—आंबेडकर की हार, इंदिरा गांधी की अयोग्यता, सोनिया की नागरिकता, गोपनीयता उल्लंघन और पूर्व आयुक्तों को पद। यह राजनीति सच्चाई से ज्यादा भ्रम फैलाने का खेल है

Written byरमेश शर्मारमेश शर्मा
Aug 19, 2025, 07:40 am IST
in भारत, विश्लेषण
जिस मिंता देवी (बाएं) की उम्र को प्रियंका ने मुद्दा बनाने की कोशिश की, उसी ने खोली पोल

जिस मिंता देवी (बाएं) की उम्र को प्रियंका ने मुद्दा बनाने की कोशिश की, उसी ने खोली पोल

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और इंडी गठबंधन के सदस्य दल बिहार में मतदाता सूची के सत्यापन का विरोध कर रहे हैं। चुनाव आयोग पर फर्जी मतदाता बनाने का आरोप लगाकर सड़क से संसद तक राजनीतिक तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। यह वही शैली है, जो पाकिस्तान में इमरान खान व बांग्लादेश में शेख हसीना के विरुद्ध अपनाई गई थी। विपक्ष ने ऐसे समय अपना विरोध तेज किया है, जब अमेरिका ने भारत पर टैरिफ हमला बोला है। अमेरिका, जिसने अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में परमाणु परीक्षण के बाद प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन भारत अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। इस बार भी भारत की अपेक्षाकृत मजबूती के साथ उभरेगा।

विदेशी षड्यंत्र, देसी प्यादे

भारत की असली चुनौती हमेशा से आंतरिक तत्व रहे हैं, जिन्हें आज की भाषा में ‘स्लीपर सेल’ कहा जाता है। ये सीधे सामने न आकर देसी चेहरों को ‘मोहरा’ बनाते हैं। इसी कारण विदेशी षड्यंत्र सफल होते रहे हैं। मतदाता सूची के बहाने पैदा किया जा रहा राजनीतिक तनाव भी कुछ गंभीर प्रश्न खड़ा करता है, जो संभावित षड्यंत्र की ओर इशारा करते हैं।
वर्तमान स्थिति में तीन प्रमुख बिंदुओं पर विचार जरूरी है।

रमेश शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार

पहला, कांग्रेस व इंडी गठबंधन बिहार में मतदाता सूची का सत्यापन रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। आशंका है कि बिहार सहित कई राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठिए मतदाता बन चुके हैं, जिनकी गहन जांच चल रही है। इसे रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया गया है। दूसरी ओर, मीडिया के जरिए इस मुद्दे पर शोर-शराबा मचाकर भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है। फर्जी मतदाता प्रकरण में दो महिलाओं के नाम प्रमुख रूप से बताए गए।

बनारस में एक सूची भी दिखाई गई, जिसमें सभी नाम हिंदू समुदाय के थे। कांग्रेस द्वारा प्रचारित इस सूची में किसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र का जिक्र नहीं था। दूसरा पहलू इस विरोध के ‘टाइमिंग’ का है। कांग्रेस ने 8 अगस्त से अचानक तेजी दिखाई। पहले ‘प्रेजेंटेशन’ दिया, फिर उसके सांसद सड़कों पर उतर आए। 9 अगस्त को रक्षाबंधन था। इसके बाद जन्माष्टमी सहित सनातन त्योहारों का क्रम चलता है, पर कांग्रेस ने इन त्योहारों के बीच पूरे देश का ध्यान हटाकर सरकार और चुनाव आयोग पर केंद्रित करने की काशिश की है।

जमात-ए-इस्लामी का ‘बांग्लादेश मॉडल’

केरल में 8 अगस्त को जमात-ए-इस्लामी समर्थित मलयालम टीवी चैनल मीडिया वन ने एक कार्यक्रम के जरिए लोगों से चुनाव आयोग के खिलाफ राहुल गांधी के आरोपों के समर्थन में सड़कों पर उतरने का आह्वान किया। यह सीधा-सीधा नागरिक अशांति को उकसाने का प्रयास है। ‘आउट ऑफ फोकस’ कार्यक्रम में प्रस्तोता ने एक पश्चिमी विचारक का हवाला देते हुए कहा, “अगर किसी शहर में अन्याय हो, तो वह शहर सूरज उगने से पहले जल जाना चाहिए।” (यह कथन जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त का है: “जब अन्याय हो, तो शहर में विद्रोह होना चाहिए। यदि विद्रोह न हो, तो अच्छा है कि शहर रात में अग्नि में जलकर नष्ट हो।”)

कार्यक्रम के दोनों पैनलिस्टों ने कहा, “अब वक्त आ गया है कि लोग सड़कों पर उतरें।” यह भी कहा कि केरल में वामपंथी अक्सर राहुल को कमतर आंकते हैं, पर 7 अगस्त को कांग्रेस नेता की डिनर मीटिंग में माकपा-भाकपा नेताओं की मौजूदगी सकारात्मक संकेत है। प्रधानमंत्री मोदी कई बार जन आंदोलनों के दबाव में फैसले बदल चुके हैं, जैसे कृषि विधेयक 2020। इस प्रसारण का स्वरूप ‘बांग्लादेश मॉडल’ की याद दिलाता है, जहां जमात-ए-इस्लामी ने अराजकता फैलाकर गृहयुद्ध की स्थिति पैदा की थी। ऐसे संकेत खतरनाक हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।

इसी दौरान, पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर भारत को परमाणु हमले की धमकी दे रहे थे। यह धमकी भी ऐसे समय आई जब एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप टैरिफ के बहाने भारत को चेतावनी दे रहे थे और दूसरी ओर भारत की सड़कों पर यह ‘आंदोलन’ इतना तीव्र था कि आम जन का ध्यान अमेरिका और पाकिस्तान की धमकियों से हटकर ‘आंदोलन’ से उपजे आंतरिक तनाव पर केंद्रित हो गया। कांग्रेस व इंडी गठबंधन के नेताओं ने प्रशासनिक अनुमति के बिना 11 अगस्त को संसद से चुनाव आयोग मुख्यालय तक विरोध मार्च निकालकर हंगामा काटा। लिहाजा विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। इस दौरान विपक्षी नेताओं ने यह दिखाने की कोशिश की कि ‘बल प्रयोग’ से उनकी आवाज दबाई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जैसे कुछ नेता पुलिस बैरिकेड्स पर भी चढ़ गए। विदेशी मीडिया न्यूयॉर्क टाइम्स, द वाशिंगटन पोस्ट, अल-जजीरा, एबीसी आदि ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया।

सत्ता हथियाने की नई जुगत

हाल के वर्षों में दुनिया के कुछ भागों में सत्ता हथियाने की एक नई शैली उभरी है। इसमें सकारात्मक मुद्दों पर जनसमर्थन पाने के बजाय, भ्रामक व झूठे आरोप उछालकर सरकारों को अस्थिर करने का प्रयास किया जाता है और संवैधानिक संस्थाओं पर सीधा हमला बोला जाता है। सत्य, तथ्य या तर्क की बजाय भ्रम व अव्यवस्था फैलाई जाती है, ताकि जनता सड़कों पर उतर आए और सत्ता भयभीत होकर पीछे हटे। रूस में जारशाही के विरुद्ध वामपंथी आंदोलन, चीन में माओवादी उभार, पाकिस्तान में इमरान खान और बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता-परिवर्तन की घटनाएं इसी शैली के उदाहरण हैं। कांग्रेस और ‘इंडी’ गठबंधन इसी राह पर चलते दिखाई दे रहे हैं।

2014 में सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस ने लगातार नकारात्मक मुद्दे ही उठाए। पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाकर ‘चौकीदार चोर है’ जैसे नारे गढ़े, फिर सीएए पर साम्प्रदायिक तनाव भड़काने, किसान आंदोलन के नाम पर ग्रामीण असंतोष फैलाने और ओबीसी आरक्षण के बहाने सामाजिक विभाजन गहरा करने की कोशिशें हुईं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिना विचलित हुए, भारत को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में लाने के अपने संकल्प पर डटे रहे। यही कारण रहा कि विपक्ष के नकारात्मक अभियानों का सीमित असर हुआ और उनके नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनी।

2024 के चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस व सहयोगी दलों ने नकारात्मक रणनीति को और आक्रामक बनाते हुए संवैधानिक संस्थाओं पर हमले तेज कर दिए। निशाने पर ईडी, सीबीआई, एनआईए, सेना और न्यायपालिका तक आई। अब चुनाव आयोग, पूरी निर्वाचन प्रक्रिया और ईवीएम पर फोकस किया जा रहा है। पहले ईवीएम ‘हैक’ होने का शोर मचाया गया, अब मतदाता सूची को लेकर आयोग पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

कांग्रेस का इतिहास

देश के चुनावी इतिहास में कई ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जो चुनाव आयोग के दुरुपयोग पर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करती हैं। राहुल की हाल की प्रेस कांफ्रेंस का जवाब केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी एक प्रेस कांफ्रेंस में दिया और कुछ ऐतिहासिक उदाहरण पेश किए—

डॉ. भीमराव आंबेडकर की हार (1952) : बाबासाहेब आंबेडकर 14,561 वोटों से चुनाव हारे थे, जबकि उस चुनाव में 74,333 वोट रद्द किए गए थे। इस पर आंबेडकर ने 18 पन्नों की विस्तृत याचिका दायर की थी। इतनी बड़ी संख्या में वोट रद्द होना चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाता था।

इंदिरा गांधी का रायबरेली चुनाव (1971) : इस चुनाव में इंदिरा गांधी पर शासकीय संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप सिद्ध हुआ। न्यायालय ने उनके चुनाव को रद्द कर दिया था। यह घटना भी चुनावी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करती है।

सोनिया का मतदाता पंजीकरण : 1980 की मतदाता सूची में सोनिया गांधी का नाम दर्ज था, जबकि वे भारत की नागरिक नहीं थीं। 1968 में राजीव गांधी से विवाह के बाद 15 वर्ष बाद 1983 तक सोनिया गांधी इटली की नागरिक रहीं और उसी वर्ष उन्होंने भारतीय नागरिकता ग्रहण की थी।

मतदान की गोपनीयता का उल्लंघन : सोशल मीडिया पर कुछ पुरानी तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए हैं। इसमें 1991 के एक मतदान केंद्र पर राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अभिनेता राजेश खन्ना दिख रहे हैं जो सोनिया की वोट डालने में ‘मदद’ कर रहे हैं। एक अन्य तस्वीर में सोनिया गांधी और राहुल गांधी साथ खड़े मतदान करते दिख रहे हैं। मतदान की गोपनीयता कानून का उल्लंघन होने के बावजूद चुनाव आयोग ने संज्ञान नहीं लिया, जो आयोग की ‘पक्षपातपूर्ण अनदेखी’ का संकेत है।

चुनाव आयुक्तों को पद-प्रतिष्ठा : कांग्रेस शासनकाल में कई पूर्व चुनाव आयुक्तों को महत्वपूर्ण पद देकर ‘खुश’ किया गया। 8वें मुख्य चुनाव आयुक्त रामकृष्ण त्रिवेदी 1986 में गुजरात और 9वीं मुख्य चुनाव आयुक्त रमा देवी कर्नाटक की राज्यपाल बनीं। टी. एन. शेषण सेवानिवृत्ति के बाद 1999 में कांग्रेस टिकट पर गांधीनगर से लोकसभा चुनाव लड़े। 11वें मुख्य चुनाव आयुक्त एम.एस. गिल कांग्रेस में शामिल हुए, राज्यसभा सदस्य बने और बाद में यूपीए सरकार में मंत्री पद संभाला।

इन घटनाओं से उन आरोपों को बल मिलता है कि कांग्रेस के शासनकाल में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगे और संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक हितों के लिए दुरूपयोग हुआ।

शिकायत क्यों नहीं की?

मतदाता सूची बनाने की एक तय प्रक्रिया है, जो आयोग के निर्देशन में होता है। इसका संचालन राज्यों के प्रशासनिक तंत्र द्वारा किया जाता है। प्रशासनिक दृष्टि से देश के 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश करीब 780 जिलों में विभाजित हैं, जहां जिला प्रशासन का मुखिया कलेक्टर होता है। चुनाव आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है और प्रत्येक राज्य की राजधानी में ‘राज्य निर्वाचन आयोग’ कार्यालय होता है, पर उनमें इतना स्टाफ नहीं होता कि वे अपने स्तर पर पूरी प्रक्रिया संपन्न करा सकें। इसलिए चुनाव आयोग केवल गाइडलाइन तैयार करता है, जो सभी जिला कलेक्टर को भेजी जाती है। ‘जिला निर्वाचन अधिकारी’ की भूमिका में कलेक्टर घर-घर सर्वेक्षण से लेकर मतदान की पूरी प्रक्रिया का समन्वय करते हैं। इसमें शिक्षक, पटवारी, डिप्टी कलेक्टर सहित स्थानीय प्रशासनिक अमला व मान्यता प्राप्त दलों के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं। इन्हें ‘बीएलए’ (ब्लॉक लेवल एजेंट) कहा जाता है। इन्हीं के समन्वय से मतदाता सूची का मसौदा तैयार होता है। स्पष्ट है कि जहां भी मतदाता सूचियां बनी हैं, उनमें कांग्रेस के कार्यकर्ता भी बीएलए के रूप में शामिल रहे हैं। यदि कहीं गड़बड़ी थी, तो उसकी शिकायत स्थानीय स्तर पर क्यों नहीं की गई?

इसके अलावा, मतदाता सूचियां कभी पहली बार में अंतिम रूप से प्रकाशित नहीं होतीं। इन्हें पहले सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाता है और सुझाव व आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं। इसके लिए अंतिम तिथि निर्धारित होती है। इस अवधि में प्राप्त शिकायतों के निस्तारण के बाद ही अंतिम सूची प्रकाशित की जाती है। राहुल गांधी के तीखे आरोपों से पहले किसी भी राज्य में कांग्रेस के किसी नेता द्वारा इस प्रक्रिया के अंतर्गत औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई।

विरोध प्रदर्शन के दाैरान बैरिकेड लांघते सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव

… और पकड़ा गया झूठ

कांग्रेस की राजनीति हमेशा सत्ता और वोट की गणना पर केंद्रित रही है। अपने लाभ के लिए वह मुद्दों को बदलने में संकोच नहीं करती। अतीत के कुछ उदाहरण इसकी पुष्टि करते हैं। आज के राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस जिन दो प्रमुख मुद्दों पर धुंध फैला रही है, वे हैं-जाति आधारित जनगणना और ईवीएम से मतदान। कभी कांग्रेस का नारा था- ‘जात पर न पात पर, मोहर लगेगी हाथ पर’, लेकिन अब उसकी प्राथमिकता जातिवाद की राजनीति है। इसी तरह, 1989 के चुनाव बाद राजीव गांधी ने ‘बैलेट पेपर’ की जगह ईवीएम से मतदान की वकालत की थी, किंतु आज राहुल गांधी और कांग्रेस ईवीएम पर ही सवाल उठा रहे हैं। लगातार चुनावी हार से सबक लेने और सकारात्मक मुद्दों की बजाय कांग्रेस भ्रम फैला रही है।

राहुल ने मीडिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कदम उठाया। उन्होंने पहले कहा कि वह ‘बम फोड़ने’ वाले हैं, जिससे देशभर में जिज्ञासा बढ़ी। फिर लोकसभा में एक ‘प्रेजेंटेशन’ रखा, जिसमें उन्होंने कर्नाटक की महादेवापुरा विधानसभा सीट का उदाहरण देते हुए 1,00,250 वोट ‘चोरी’ होने और पांच तरीकों से फर्जी वोटर जोड़ने के आरोप लगाए। उनके अनुसार, 11,965 डुप्लीकेट वोटर, 40,009 फर्जी पते, 10,452 मतदाता एक ही पते पर दर्ज, 4,132 वोटर बिना फोटो या अवैध फोटो वाले और 33,692 नए वोटर फॉर्म-6 के दुरुपयोग से जोड़े गए।

अपने आरोपों के समर्थन में राहुल गांधी ने दो महिलाओं के नाम भी लिए—सकुन रानी और मिंता देवी। उन्होंने दावा किया कि सकुन रानी ने दो बार वोट डाला और मिंता देवी की उम्र 124 वर्ष दर्ज है। उन्होंने एक ऐसे मकान का उदाहरण दिया, जिसमें 60 मतदाता दर्ज थे और कुछ पते जहां मकान नंबर ‘0’ लिखा था। मगर मीडिया के पहुंचते ही सच सामने आने लगा। सकुन रानी ने कैमरे पर कहा कि उन्होंने केवल एक बार मतदान किया। मिंता देवी की वास्तविक जन्मतिथि 1990 है, लेकिन गलत तिथि चढ़ने के कारण कंप्यूटर ने 1900 दर्ज कर दिया। जिस मकान में 60 मतदाता दर्ज थे, उसके मालिक कांग्रेस समर्थक निकले। दरअसल, ग्रामीण इलाकों में लाखों मकानों का कोई नंबर नहीं होता, इसलिए कंप्यूटर ‘0’ अंकित कर देता है। इस तरह, राहुल गांधी के पांचों आरोप उसी दिन शाम तक झूठे साबित हो गए। बावजूद इसके, कांग्रेस अपनी बात से पीछे नहीं हटी और धुंध फैलाने की राजनीति जारी रखी।

कांग्रेस समर्थक भी नहीं सहमत

चुनाव आयोग ने राहुल के आरोपों को भ्रामक, निराधार और गैर-जिम्मेदाराना बताया है। आयोग ने साफ कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है। साथ ही, कांग्रेस की सोशल मीडिया पोस्ट साझा करते हुए कहा कि अगर राहुल गांधी को अपनी सूची पर भरोसा है, तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बिना देरी कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इसका जवाब देना चाहिए। आयोग ने उनसे आरोपों के समर्थन में हस्ताक्षरित शपथ पत्र देने या देश से माफी मांगने तक की मांग की है।

दरअसल, राहुल के दावों से कांग्रेस के ही कई सदस्य तथा भाजपा व प्रधानमंत्री के आलोचक भी सहमत नहीं हुए। इसमें पहला नाम कांग्रेस शासित कर्नाटक के सहकारिता मंत्री एन. राजन्ना का है, जिन्होंने महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र में कथित ‘वोट चोरी’ पर अपनी ही पार्टी को दोषी ठहराया और माना कि ये ‘अनियमितताएं हमारी आंखों के सामने हुईं’। यह भी कहा कि ‘यह हमारे लिए शर्म की बात है कि हम निगरानी नहीं कर सके।’ दूसरा उल्लेखनीय नाम पत्रकार राजदीप सरदेसाई का है, जिन्होंने कहा कि ‘अगर वास्तव में वोट चोरी होती, तो भाजपा मात्र 240 सीटों पर नहीं रुकती, बल्कि 340 तक जा सकती थी।’ तीसरे हैं, एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी, जिन्होंने माना कि इस तरह के आरोपों से कांग्रेस को ही नुकसान होगा। इस प्रकार, चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण और पार्टी-समर्थक आलोचकों के मत के साथ राहुल गांधी के मतदाता सूची से जुड़े आरोपों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

मान जाए वह कांग्रेस नहीं

बात यहीं खत्म होती नहीं दिख रही। धुंध फैलाने की राजनीति का एक स्थापित सिद्धांत है-‘एक झूठ को सौ बार बोलो, तो लोग उसे सच मानने लगते हैं।’ कांग्रेस के रुख को देखते हुए लगता है कि वह इसी नीति पर चलते हुए इस विवाद को आगे बढ़ाएगी। इसके दो स्पष्ट उदाहरण सामने आ चुके हैं —

कर्नाटक प्रकरण : मंत्री राजन्ना ने जब वोट चोरी के आरोपों की सच्चाई बताई और अपनी पार्टी को जिम्मेदार ठहराया तो मुख्यमंत्री ने उनसे इस्तीफा लेना चाहा। कांग्रेस महासचिव के. सी. वेणुगोपाल से चर्चा के बाद उन्हें मंत्री पद से बर्खास्त करने का निर्देश दिया गया। यह कदम साफ संकेत है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर किसी भी असहमति को बर्दाश्त नहीं करेगी, बल्कि आरोपों को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाएगी।

बनारस प्रकरण : मंत्री की बर्खास्तगी के तुरंत बाद बनारस से एक खबर आई। यहां कांग्रेसियों ने अपने पराजित प्रत्याशी अजय राय के सम्मान में जुलूस निकाला, मालाएं पहनाईं और नरेंद्र मोदी की जीत का आधार ‘वोट चोरी’ बताया। अजय राय ने राम जानकी मठ के पते पर दर्ज मतदाताओं की सूची जारी की, जिसमें 60 से अधिक नाम थे और पिता के नाम के स्थान पर ‘रामकमल दास’ लिखा था। इसे उन्होंने वोट चोरी का प्रमाण बताया। लेकिन वास्तविकता यह है कि महंत रामकमल दास जी मठ के प्रमुख हैं और सूची में दर्ज सभी मतदाता उनके शिष्य हैं, जो मठ में ही निवास करते हैं। संन्यास लेने के बाद पिता के नाम की जगह गुरु का नाम लिखने की परंपरा है और यह कानूनी रूप से भी मान्य है। यह तथ्य सर्वविदित होते हुए भी महज मीडिया में प्रचार पाने के लिए इसे मुद्दा बनाया गया।

बनारस के अलावा, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भी कुछ स्थानों पर अपने हारे हुए प्रत्याशियों का स्वागत कर, अप्रत्यक्ष रूप से इस कथा को बल देने का प्रयास किया। कुल मिलाकर विरोध की यह राजनीति सच्चाई से ज्यादा भ्रम फैलाने का खेल है, ताकि अराजकता की स्थिति पैदा की जा सके।

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