भारत 15 अगस्त के दिन स्वतंत्रता दिवस मनाता है, वहीं बांग्लादेश के लिए भी यह दिन स्मृतियों को लेकर आता है। लेकिन, बांग्लादेश में अंतरिम सरकार आते ही स्मृतियों को जलाने का काम शुरू हुआ। शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने के बाद वहां अराजकता का माहौल बना। भारत से जुड़ी स्मृतियां भी मिटाई जाने लगीं।
बांग्लादेश में 15 अगस्त को क्या हुआ?
यह दिन बांग्लादेश का निर्माण करने वाले शेख मुजीबुर्रहमान के साथ जुड़ा हुआ है। ये शेख मुजीबुर्रहमान वही हैं, जिनके नाम पर बने मुजीवाद को मिटाने के लिए मोहम्मद यूनुस की सरकार और साथ ही अन्य राजनीतिक दल कमर कसे हुए हैं। 1971 में बांग्लादेश का जन्म हुआ था और उसके साथ ही 14 अगस्त की उसकी पहचान (पहले पूर्वी पाकिस्तान) धूमिल हो गई थी। यह भी हो सकता है कि कुछ लोगों को यह पसंद न आया हो और इसी वजह से 15 अगस्त 1975 को बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की परिवार सहित नृशंस हत्या कर दी गई। चूंकि शेख हसीना मुल्क में नहीं थी, इसलिए वे बच गई थीं।
शेख मुजीबुर्रहमान को घर से बाहर आने के लिए कहा
शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या सेना के कुछ जूनियर अधिकारियों ने की थी। बंगबंधु ने सेनाध्यक्ष को फोन करते हुए कहा था कि सेना के अधिकारियों ने उन पर हमला कर दिया है तो उन्हें वापस आने का आदेश दिया जाए। इस पर सेनाध्यक्ष ने उन्हें उनके घर से बाहर निकलकर आने के लिए कहा था। अब ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति तब अपने घर से बाहर आ सकता है, जब उसके घर को चारों ओर से सैनिकों ने घेर रखा हो।
दस साल के बेटे को भी नहीं छोड़ा
जब शेख मुजीब ने गोलीबारी की आवाज सुनी तो वे नीचे भागे और उनपर गोली चला दी गईं। वे मुंह के बल नीचे गिर पड़े और नीचे तक गिरते चले गए। इसके बाद उनकी बेगम को गोली मारी गई। फिर बारी आई उनके दूसरे पुत्र जमाल की। उनकी दोनों बहुओं को भी नहीं बख़्शा गया। यहां तक कि उनके सबसे छोटे बेटे 10 साल के रसेल मुजीब को भी मौत के घाट उतार दिया गया। उन्हें मारने के बाद किसी के कंधे पर नहीं बल्कि घसीटते हुए बाहर लाया गया और इंतजार करते हुए ट्रक मे फेंक दिया गया। अगले दिन सैनिकों ने सारे शवों को एकत्र करके मुजीबुर्रहमान के शव को छोड़कर सभी के शवों को बेनानी कब्रिस्तान में एक गड्ढे में दफनाया।
शेख हसीना ने राष्ट्रीय शोक का दिन घोषित किया
मुजीब के शव को उनके गांव टाँगीपारा ले जाया गया और सेना ने किसी को भी उनके जनाजे में शामिल नहीं होने दिया। यहां तक कि वे शव को नहलाने भी नहीं दे रहे थे। फिर मौलाना के जोर देने पर तैयार हुए और नहाने का साबुन नहीं मिला, तो कपड़े धोने वाले साबुन से ही उन्हें नहलाया गया और फिर उनके शव को उनके वालिद की कब्र के पास दफना दिया गया। जब शेख हसीना मुल्क की प्रधानमंत्री बनीं, तो इस दिन को उन्होंने राष्ट्रीय शोक का दिन घोषित किया और उसके बाद इसे सार्वजनिक अवकाश घोषित किया।
यूनुस सरकार ने लगाया प्रतिबंध
यह किसी भी मुल्क के लिए दुख का ही दिन होगा, क्योंकि उसी दिन मुल्क को पहचान देने वाले व्यक्ति की हत्या की गई थी। मगर अब मोहम्मद यूनुस की सरकार ने इसे बंद कर दिया है। हालांकि यह निर्णय पिछले ही वर्ष ले लिया गया था। पिछले वर्ष जब शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़े केवल दस ही दिन हुए थे, तभी इस दिन को मनाने पर रोक लगा दी गई थी। इस वर्ष भी किसी को यह दिन मनाने नहीं दिया गया। मीडिया के अनुसार इस वर्ष अवामी लीग के कार्यकर्ताओं ने इस दिन को मनाने का निर्णय लिया था और उन्होंने कहा कि फासीवादी यूनुस सरकार लोगों को उनके अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी से वंचित कर रही है और उन्हें राष्ट्रपिता की बरसी को भी मनाने नहीं दे रही है।
अवामी लीग का बयान
अवामी लीग ने एक बयान जारी करके कहा कि अगस्त 2024 में “पाकिस्तानी विचारधारा से पोषित मुक्ति-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी ताकतों ने गहरी घरेलू और विदेशी साजिशों के जरिये अवैध रूप से राज्य की सत्ता हथिया ली है। पार्टी ने कहा कि यूनुस शासन ने “एक समृद्ध बांग्लादेश को पटरी से उतार दिया और अवसरों के सभी द्वार बंद कर दिए।”
बंगबंधु की हर पहचान मिटा रहे
यह भी ध्यान में रखा जाए कि अगस्त 2024 की कथित क्रांति के बाद से ही शेख मुजीबुर्रहमान की हर पहचान को मिटाने का आरंभ हो चुका था, जिनमें बांग्लादेश निर्माण के स्मारकों को तोड़ना, शेख मुजीबुर्रहमान के घर में आग लगाना और फिर देश के नोटों से उनकी तस्वीर हटाना जैसे कदम शामिल है। अब कथित क्रांतिकारियों और कथित छात्रों द्वारा यह भी कहा जाने लगा है कि “मुजीवाद को हर मूल्य पर नष्ट करना है!” मुजीबुर्रहमान की बरसी लगातार दूसरे साल न मनाने देना इसी दिशा में एक और कदम है।
ये भी पढ़ें – बांग्लादेश: सौतलपारा में वनवासियों पर कट्टरपंथी BNP का टूटा कहर, घरों को लगाई आग
















