बात तब की है जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ पूरे देश में असहयोग आंदोलन चरम पर था। गुलामी की बेड़ियों में जकड़े राष्ट्र की पीड़ा से आगरा जिले के आंवलखेड़ा गांव के बालक श्रीराम का भावनाशील हृदय भी अछूता नहीं था। आगरा में स्वयंसेवकों की भर्ती का समाचार मिलते ही घरवालों के भारी विरोध के बावजूद वह किशोर कई किलोमीटर का रास्ता पैदल तय कर अपना नाम दर्ज कराने उस शिविर तक जा पहुंचा। 1927 से 1933 तक की अवधि के मध्य एक राष्ट्रनिष्ठ स्वयंसेवक के रूप में देश की स्वतंत्रता के लिए अहिंसक संघर्ष में सक्रिय योगदान करने वाले उस सत्याग्रही किशोर को श्रीराम ‘मत्त’ के नाम से जाना जाता है। बाद में वह मां गायत्री के सिद्ध साधक और अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक के रूप में विख्यात हुए।
कोड़े खाए पर ध्वज का अपमान नहीं होने दिया
श्रीराम ‘मत्त’ ने नमक आंदोलन के दौरान आगरा में फिरंगियों के बेतहाशा कोड़ों की मार से बेहोश हो जाना स्वीकार कर लिया पर आजादी के ध्वज को अपमानित नहीं होने दिया। सिपाहियों ने जुलूस निकालने वाले सत्याग्रहियों पर लाठी व कोड़े बरसाये और राष्ट्रध्वज को पैरों तले कुचलने व जलाने का कुत्सित प्रयास किया। सिपाही उसे पीटते और झंडा छीनने का प्रयास करते रहे, लेकिन उस वीर ने ध्वज का अपमान नहीं होने दिया। अंग्रेज सिपाही लाख कोशिशों के बाद भी उसके मुंह से झंडे का टुकड़ा नहीं निकाल सके। जब चिकित्सकों द्वारा उसे होश में लाया गया तभी झंडे के उस टुकड़े निकाला जा सका।
क्या है जरारा कांड
आगरा के जिला गजेटियर में आजादी के आन्दोलन की यह घटना ‘जरारा कांड’ के नाम से दर्ज है। उक्त घटना के उपरांत वह नवयुवा ‘मत्त’ नाम से आजादी के मतवाले के रूप में समूचे क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गया। एक अहिंसक स्वयंसेवक के रूप में सक्रिय रहने के बावजूद जब क्रांतिकारी भगत सिंह व उनके साथियों की फांसी के विरोध में देशभर में जगह जगह उग्र प्रदर्शन होने लगे तो श्रीराम भी श्री अरविन्द के किशोरकाल के क्रान्तिकारी जीवन से प्रेरित होकर अपने मित्रों के साथ भूमिगत होकर टेलीफ़ोन केबिल काटने व ट्रेन रोकने जैसी तमाम घटनाओं में शामिल हुए।
आजादी के आंदोलन में हुई जेल
आजादी के संघर्ष के दौरान श्रीराम ‘मत्त’ को कई बार छह-छह माह की जेल की सजा भी हुई थी। उन दिनों देश में राजनीतिक गतिविधियां गैरकानूनी थीं। अंग्रेजों के खिलाफ़ असहयोग आन्दोलन के क्रम में बापू के आह्वान पर वर्ष 1933 में कलकत्ता में कांग्रेस का एक बड़ा अधिवेशन होने वाला था। उस अधिवेशन में शामिल होने के लिए देशभर से सत्याग्रही कलकत्ता जा रहे थे। श्रीराम भी कुछ साथियों के साथ कलकत्ता जाने के लिए आगरा रेलवे स्टेशन से ट्रेन से रवाना हुआ। पकड़े जाने के भय से कई ट्रेनें बदलीं, लेकिन आसनसोल स्टेशन पर आगरा के ही सब इंस्पेक्टर ने पहचान कर उतार लिया व उसी जेल में बन्द कर दिया जहां महामना मदन मोहन मालवीय, स्वरूप रानी, गांधी जी के बड़े पुत्र देवीदास गांधी व रफी अहमद किदवई के साथ शोभालाल गुप्त, कन्हैयालाल खादीवाला और गोपीनाथ श्रीवास्तव जैसे सत्याग्रही पहले से मौजूद थे।
आसनसोल जेल की घटना
आसनसोल जेल में श्रीराम ने न सिर्फ निरक्षर साथियों को अक्षर ज्ञान दिया अपितु अंग्रेजी दैनिक ‘लीडर’ की एक पुरानी प्रति से लोहे के तसले पर कोयले से लिख लिख कर स्वयं भी अंग्रेजी सीखी। अपने दीक्षा गुरु महामना पंडित मदनमोहन मालवीय से जन- जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियां चलाने का मूलमंत्र भी लिया, जो बाद में करोड़ों की भागीदारी वाले अखिल विश्व गायत्री परिवार का मूल आधार बना। अंग्रेजी दासता के विरुद्ध संघर्ष के उस दौर में लगानबंदी के आंकड़े एकत्र करने का एक अन्य अत्यधिक उल्लेखनीय काम श्रीराम ‘मत्त’ ने किया था।
संयुक्त प्रांत में लगान माफी
उस दौर में गांधी इर्विन समझौते के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण विषय ‘लगानबंदी’ का भी था। श्रीराम ‘मत्त’ ने अकेले गाँव- गाँव घूम-घूम कर किसानों के नाम, रकबा लगान की रकम आदि की पूरी छान-बीन कर सारे आंकड़े तैयार किये। इतनी विस्तृत, प्रामाणिक जानकारी जब संयुक्त प्रान्त के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्दवल्लभ पंत के पास पहुंची और जब उन्हें यह मालूम हुआ कि यह काम एक ग्रामीण स्वयंसेवक का है तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। स्वयं महात्मा गांधी ने उस युवा के इस कार्य की प्रशंसा करते हुए कार्यकर्ताओं से कहा था कि कांग्रेस के हर कार्यकर्ता को इसी स्तर का होना चाहिए तभी हम अपने लक्ष्य को पूरा कर पाएंगे।
महात्मा गांधी ने की प्रशंसा
महात्मा गांधी ने अपनी प्रशस्ति के साथ वे प्रामाणिक आंकड़े ब्रिटिश पार्लियामेंट भेजे थे तथा उन्हीं आंकड़ों के आधार पर पूरे संयुक्त प्रान्त में लगान माफी का आदेश पारित हुआ था। श्रीराम ने देशवासियों में स्वराज्य की चेतना फूंकने वाले उस दौर के लोकप्रिय दैनिक ”सैनिक” में श्रीकृष्ण दत्त जी पालीवाल और बाबू गुलाबराय के साथ सहयोगी संपादक के रूप में भी लम्बे समय तक काम किया। उन दिनों आये दिन प्रेस पर छापे पड़ते रहते थे, ऐसे में नियमित रूप से संयत भाषा में सेंसर से बचाते हुए पत्र निकालने का काम उन्होंने पूरी कुशलता से किया। उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रकाशित आगरा संभाग के स्वतंत्रता सेनानी पुस्तक में कई महत्वपूर्ण कार्यों के साथ श्रीराम मत्त के नाम का उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है।
गायत्री महाविद्या के सिद्ध साधक
श्रीराम मत्त ही कालांतर में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के नाम से गायत्री महाविद्या के सिद्ध साधक और वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रणेता के रूप में लोकविख्यात हुए। देश के आजाद होने के 50 साल बाद जब भारत सरकार ने अपने प्रतिनिधि के द्वारा उन्हें स्वतंत्रता सेनानी को मिलने वाली सुविधाओं व पेंशन का पत्रक सौंपा तो उन्होंने पूरी विनम्रता से वे सुविधाएं लेने से इंकार करते हुए अपनी पेंशन प्रधानमंत्री राहत कोष के लिए समर्पित कर दी और राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के अभिनव अभियान में संलग्न हो गये।
















