भारत विभाजन का दर्द, 14 अगस्त 1947 की भयावह कहानी
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विभाजन-विभीषिका : भारत विभाजन का दर्द, 14 अगस्त 1947 की भयावह कहानी

भारत विभाजन की त्रासदी के दौरान 15- 20 लाख लोग मारे गए। लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत आए। लगभग एक लाख महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। एक लाख से अधिक महिलाओं का या तो अपहरण हुआ या फिर उन्हें जबरन पाकिस्तान में ही रोक लिया गया।

Written byमुनीश त्रिपाठीमुनीश त्रिपाठी
Aug 14, 2025, 08:30 am IST
in भारत, विश्लेषण

India Pakistan Partition: 14 अगस्त 1947 को भारतीय पुण्यभूमि खंडित हुई, पाकिस्तान का जन्म हुआ। पिछले कुछ सालों से 14 अगस्त को भारत सरकार भारत के विभाजन की त्रासदी को लेकर स्मृति दिवस मना रही है । भारत विभाजन की विभीषिका इतनी गहरी थी जिसकी कल्पना भी उन लोगों के आज भी रोंगटे खड़े कर देती है, जिन्होंने प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष इसे देखा था, सुना है। कहा जाता है कि बड़े लोग जब गलती करते है या उनसे महत्वपूर्ण निर्णयों के आकलन में गलती होती है तो उसका दुष्परिणाम भी बहुत व्यापक और लंबे कालखंड के लिये होता है।

विभाजन की पृष्ठभूमि : 1909 से शुरू हुई प्रक्रिया

विभाजन की भूमिका का बीज 1909 में मारले मिंटो सुधार के तहत विधान परिषदों में मुसलमानों के लिये पृथक निर्वाचन अधिनियम में पड़ा था। पहले कांग्रेस ने इसका प्रखर विरोध किया लेकिन 1916 में कांग्रेस ने लीग के साथ लखनऊ समझौते में स्वीकार कर लिया। यहीं से कांग्रेस ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता के आगे घुटने टेक कर सैद्धांतिक स्वीकृत दे दी और भारत के खंडित होने तक लगातार झुकती रही । 1920 में असहयोग आंदोलन में तुर्की के अपदस्थ खलीफा के समर्थन में खिलाफत को भी इस आंदोलन में गांधी जी के प्रभाव में जोड़ दिया गया, जिसका भारतीय भूमि से कोई लेना-देना नही था। इंदुलाल याज्ञिक ने अपनी किताब ‘गांधी एज आई न्यू हिम’ के पेज 129 में लिखा कि “हमने गांधी जी यह सौदा कभी नही किया था कि हम उनके साथ किसी धार्मिक या धार्मिक राजनैतिक आंदोलन में शामिल होंगे।” आंदोलन की समाप्ति के बाद पूरे देश के छोटे बड़े शहरों में दंगे हुए । मालाबार में तो मुस्लिम मोपलाओं ने हिंदुओ का बड़े पैमाने पर नरसंहार किया। कांग्रेस कार्यसमिति में इस कुकृत्य की खुलकर निंदा तक नही हुई।

विभाजन-विभीषिका : नेतृत्व का असमंजस और आंसुओं की बाढ़

गांधी जी से पाकिस्तान के हिंदुओं ने की थी अपील

बाबा साहेब आम्बेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान औऱ भारत विभाजन ‘ के पेज 148 में लिखा कि महात्मा गांधी ने नरसंहार करने वाले मोपलाओं के बारे में कहा कि” मोपला धर्मभीरु वीर लोग है जो उनके विचार से धर्म सम्मत है।” पाकिस्तान के हिंदुओ ने सिंध को तत्कालीन बम्बई प्रान्त से अलग न करने की मांग को लेकर गांधी से कहा ऐसा करने से वे अल्पसंख्यक हो जाएंगे उनके जीवन पर पहले से अधिक खतरा हो जाएगा। इस पर गांधी जी ने 10 फरबरी 1940 के अपने हरिजन समाचार पत्र के द्वारा कहा, ” हिंदुओ को अपनी जान-माल की हिफाजत करने का तरीका खुद खोजना होगा। ” नतीजा सिंध, बंबई प्रान्त से अलग हुआ और हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक हो गए । उन पर हमलों की संख्या में जबरदस्त बढोत्तरी हुई। इसमें कोई शक नही कि गांधी ने खेड़ा, चंपारण, असहयोग, सविनय अवज्ञा आंदोलन के द्वारा भारतीय जन समुदाय को स्वतंत्रता की चेतना से जोड़ दिया परन्तु साम्प्रदायिकता के आगे वह लगातार घुटना टेकते रहे । जिससे मुस्लिम लीग को ताकत मिलती गयी और वह लगातार मजबूत होती चली गई।

तुष्टीकरण और मुस्लिम अलगाववाद : भारतीय राष्ट्रभाव के सामने कट्टरपंथी चुनौती

साम्प्रदायिकता से लड़ने में असफल रही कांग्रेस

जाने-माने इतिहासकार विपिन चंद्रा जिन्हें आमतौर पर गांधीवादी इतिहासकार माना जाता है उन्होंने अपनी किताब ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ में गांधी युग की कांग्रेस पर साम्प्रदायिकता से लड़ने में असफल बताकर कांग्रेस की खुलकर आलोचना की । उन्होंने अपनी किताब भारत का स्वतंत्रता संग्राम में 353, 387,395 पेज पर लिखा कि ” कांग्रेस ने साम्प्रदायिकता से संघर्ष नही किया और उसके मूल कारणों को नहीं समझा जिससे मुस्लिम लीग और जिन्ना मजबूत होते गए। कांग्रेस स्वतंत्रता की चेतना का प्रसार तो कर सकी परन्तु राष्ट्र से नहीं जोड़ सकी खासकर मुसलमानों को। यह कांग्रेस की बड़ी कमजोरी थी। ” भारतीय भूभाग को अलग होने और पाकिस्तान बनने की प्रक्रिया कुछ दिनों में पूरी नही हुई, यह लंबे कुटिल ,कुत्सित प्रयासों और राष्ट्रवादी विचारों की दीर्घकालीन असफलताओं के चलते हुआ है।

भारत विभाजन का दर्द झेलने वाले लेखक

अविभाजित भारत लाहौर के रहने वाले प्रोफेसर ए एन बाली जिन्होंने खुद अपनी आंखों से भारत का विभाजन देखा था। उन्होंने बंटवारे के पीछे की कुटिलताओं और राष्ट्रीय असफलताओं को भी अपनी आंखों से देखा था। उन्होंने विभाजन पर ‘नाउ इट कैन बी टोल्ड’ नामक पुस्तक लिखी है। उन्होंने इस किताब के पेज 34 में लिखा, ” कैसे लाहौर जो कि हिन्दू बाहुल्य 1941 तक था, मुस्लिम लीग ने एक हिन्दू पार्षद के वोट के चलते लाहौर नगर निगम में बहुमत प्राप्त कर नगर निगम द्वारा ग्रामीण मुस्लिम इलाकों को मिलाकर लाहौर को मुस्लिम बाहुल्य बना दिया था।” विभाजन तय होने के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने अंतिम समय तक यह तय नहीं किया था कि लाहौर, कलकत्ता और दिल्ली पाकिस्तान में रहेगा या भारत में । हिंदुओं के बहुमत के कारण कलकत्ता और दिल्ली तो भारत को मिल गए परन्तु प्रभु श्रीराम के पुत्र लव का बसाया शहर लाहौर, हिंदू अल्पसंख्यक हो जाने के कारण पाकिस्तान में शामिल कर लिया गया। साम्प्रदायिकता से नतमस्तक होने और तुष्टीकरण की नीति के चलते भारत का दुखद विभाजन हुआ और विभाजन की ऐसी विभीषिका जनमानस ने झेली जिसका वर्णन करना मुश्किल है।

भारत आने वाला जत्था 73 मील तक था

विभाजन के दौरान ब्रिटिश अधिकारी मोसले जिसने भारत के विभाजन को देखा था। उसने बताया था कि पाकिस्तान से भारत में आने वाला एक जत्था 73 मील तक का था । ये लम्बे जत्थे इसलिये चलते थे क्योकि जत्थों में शामिल लोगों को लगता था कि बड़े जत्थे के साथ चलना उनके लिये ज्यादा सुरक्षा जनक हो सकता है। फिर भी हालात इतने बुरे थे। पाकिस्तान के मुस्लिम बलवाई जत्थों पर हमला करके सामान, महिलाओं, युवतियों को लूट लेते थे फिर भी जत्था रुकता नहीं था औऱ चलता ही जाता था। विस्थापित हो रहे परिजन और पीड़ित असहाय होकर हमेशा के लिये स्वजनों से बिछड़ जाते थे। विभाजन की विभीषिका का वर्णन किताब ‘फ्रीडम मिडनाइट चिल्ड्रन’ तथा लेखक गुरुदत्त की कई पुस्तकों में जिन्होंने विभाजन स्वयं झेला था सहित कई किताबों में वर्णित है।

आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी

ज्ञात इतिहास में मात्र छह महीनों में इतनी बड़ी त्रासदी आधुनिक दुनिया में शायद ही कहीं हुई हो। हिटलर ने जरूर तीस लाख यहूदियों का कत्ल करवा दिया था परंतु उसे ऐसा करवाने में काफी समय लगा था। 14 अगस्त 1947 को देश ने बंटवारे का दर्द झेला था। पाकिस्तान जहां इसे अपनी आजादी के दिन के रूप में मनाता हैं, वहीं भारत में अभी भी लाखों लोग हैं जिनके दिलों में बंटवारे का जख्म, दर्द आज भी ताजा है। लाखों लोग अपना घर, परिवार और रिश्तेदार को छोड़कर भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से भारत आए।

एक लाख महिलाओं से बलात्कार

देश के बंटवारे के समय करीब ढाई करोड़ लोग दोनों देशों के विस्थापित हुए। भारत विभाजन की त्रासदी का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस दौरान 15- 20 लाख लोग मारे गए। लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत में आए। इस दौरान सबसे दिल दहलाने वाली घटनाएं महिलाओं के साथ हुई। बंटवारे के दौरान अनुमान के अनुसार लगभग एक लाख महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। एक से दो लाख तक महिलाओं का या तो अपहरण हुआ या फिर उन्हें जबरन पाकिस्तान में ही रोक लिया गया। सबसे ज्यादा प्रताड़ना हिन्दू समाज के वंचित वर्ग की हुई क्योकि अज्ञानता, निर्धनता के कारण ज्यादातर ये पाकिस्तान से आ ही नहीं सके, उन्हें वहां के मुसलमानों ने अपनी गुलामी करवाने के लिये बंधक बना लिया।

विभाजन – विभीषिका : भारत का नवोत्थान

विभाजनकारी ताकतों से रहना होगा सावधान

बाबा साहेब आम्बेडकर और गांधी जी ने पाकिस्तान से मार्मिक अपील भी की थी। यह अलग बात है कि पाकिस्तान पर इस अपील का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। दुर्भाग्य है कि आज के भारत में भी विभाजनकारी ताकतें मौजूद है कुछ हद तक वे अपने मंसूबों में कामयाब भी हो रहीं है। मतांतरण, अवैध घुसपैठ, जनसंख्या असंतुलन और तुष्टिकरण जैसी विभाजनकारी शक्तियों से भारत और भारत की जनता को सावधान रहना होंगा तभी भारत अखंड और सुरक्षित रह सकेगा।

Topics: विपिन चंद्राPanchjanya Specialमोपला नरसंहारबाबा साहेब आम्बेडकरTrue Stories of Partitionमहात्मा गांधीIndia Pakistan Partition Storiesविभाजन विभीषिका स्मृति दिवसHindus atrocities in Partitionमुहम्मद अली जिन्नाभारत पाक बंटवारे की कहानीअखंड भारतभारत विभाजन 1947विभाजन विभीषिकामारले मिंटो सुधारVibhajan Vibhishikaलखनऊ समझौतापाञ्चजन्य विशेष
मुनीश त्रिपाठी
मुनीश त्रिपाठी
मुनीष त्रिपाठी पत्रकार, इतिहासकार और साहित्यकार हैं। हाल ही में प्रकाशित चर्चित पुस्तक 'आंबेडकर, हिंदुत्व और भारत' के लेखक। उन्हें उनकी पुस्तक' विभाजन की त्रासदी'के लिये यूपी हिंदी संस्थान द्वारा प्रतिष्ठित "केएम मुंशी" पुरस्कार दिया गया है। औरैया जनपद प्रशासन ने उन्हें पत्रकारिता और साहित्य में 'औरैया रत्न' से विभूषित किया है। 'भरतपुर का सूरजमल' , the line which divided bharat अन्य प्रसिद्ध पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। [Read more]
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