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विभाजन – विभीषिका : नासूर की टीस आज भी

विभाजन केवल दो देशों की सीमा का निर्धारण नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी थी। राजनीतिक षड्यंत्र, धार्मिक विभाजन और ब्रिटिश नीतियों से उभरी हिंसा ने लाखों को विस्थापित किया, परिवार बिछड़े, और सांस्कृतिक एकता टूटी

Written byआचार्य राघवेंद्र प्रसाद तिवारीआचार्य राघवेंद्र प्रसाद तिवारी
Aug 14, 2025, 09:27 am IST
in भारत, विश्लेषण
अस्पतालों में नहीं बची थी उपचार की जगह।

अस्पतालों में नहीं बची थी उपचार की जगह।

India Pakistan Partition : अगस्त 1947 में हुआ भारत का विभाजन केवल दो देशों के बीच सीमाओं का निर्धारण नहीं, बल्कि यह आधुनिक इतिहास की सबसे त्रासद और हिंसक घटनाओं में से एक था। विभाजन का उद्देश्य भले ही हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक विवाद का समाधान बताकर प्रस्तुत किया गया हो, लेकिन इसके परिणामस्वरूप पूरे उपमहाद्वीप का हृदय और शरीर रक्तरंजित हो गया। लाखों लोग अपने घर-परिवार से उजड़ गए, रिश्तेदार बिछड़ गए और सदियों से बुना गया सांस्कृतिक ताना-बाना अचानक टूट गया। महात्मा गांधी ने सितंबर 1947 की प्रार्थना सभा में कहा था, ‘‘हमने आज़ादी तो पा ली है, लेकिन यह आज़ादी लाशों के ढेर पर मिली है।’’

राजनीतिक पृष्ठभूमि

विभाजन की जड़ें दशकों पुराने राजनीतिक षडयंत्र, मजहबी ध्रुवीकरण और ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों में निहित थीं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारत के सभी समुदायों और वर्गों ने अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया। इस एकता से भयभीत होकर अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई और हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए सुनियोजित रणनीति बनाई।

आचार्य राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी,
कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा

इसका असर तब हुआ, जब ढाका में नवाब सलीमुल्लाह की पहल पर बनी मुस्लिम लीग ने शुरू में ‘मुस्लिम हितों की रक्षा’ का नारा दिया, पर धीरे-धीरे यह अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग का केंद्र बन गई। 1909 में मिंटो-मॉर्ले सुधार अधिनियम के तहत मुसलमानों के लिए अलग चुनाव व्यवस्था शुरू हुई, जिससे राष्ट्रीय एकता को बड़ा झटका लगा। 1940 के दशक में मोहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग तेज कर दी। कांग्रेस प्रारंभ में विभाजन के पक्ष में नहीं थी, लेकिन गृहयुद्ध की आशंका और सत्ता हस्तांतरण के दबाव में अंततः इसे स्वीकार कर लिया।

जून 1947 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के विभाजन की घोषणा की। दोनों देशों की सीमा तय करने के लिए सिरिल जॉन रेडक्लिफ को केवल पांच हफ्ते दिए गए, जो कभी भारत आया ही नहीं था। जल्दबाजी में बनी यह सीमा रेखा मनमानी और अन्यायपूर्ण थी। इसके कारण लाखों लोग अचानक ‘गलत’ तरफ फंस गए। ब्रिटिश इतिहासकार पैट्रिक फ्रेंच के अनुसार, “The partition was the largest and bloodiest forced migration in human history,” यानी विभाजन मानव इतिहास का सबसे बड़ा और रक्तरंजित जबरन पलायन था।

इतिहासकारों का अनुमान है कि विभाजन के दौरान लगभग 1.4 से 1.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए। पाकिस्तान से हिंदू और सिख भारत आए, और भारत से मुसलमान पाकिस्तान गए। मौतों की संख्या 10 लाख से 20 लाख के बीच मानी जाती है, जबकि कुछ आंकड़े इससे भी अधिक बताते हैं। लाखों लोग भूख, बीमारी और मानसिक आघात से जूझते रहे। मजहबी हिंसा ने विभाजन को और भयावह बना दिया। गांव जलाए गए, शरणार्थियों की लाशों से भरी ट्रेनें आईं। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को बेरहमी से मारा गया। सम्मान की रक्षा के लिए कुछ परिवारों को अपनी महिलाओं को मौत के घाट उतारना पड़ा।

विभाजन-विभीषिका: एक ऐतिहासिक त्रासदी थी भारत विभाजन…

हिंसा का केंद्र पंजाब

पंजाब क्षेत्र, जो भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित हुआ, इस हिंसक रक्तपात का सबसे बड़ा केंद्र बना। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने ‘Pakistan or the Partition of India’ में लिखा है, “मजहब को राजनीति से अलग न रखने का परिणाम अंततः एक राष्ट्र के विभाजन के रूप में सामने आता है। पाकिस्तान इसी गलती की उपज था।” रेडक्लिफ रेखा ने पंजाब को बीच में से काट दिया, जिससे केवल भूमि ही नहीं, बल्कि परिवार, रिश्ते और सदियों पुराने विश्वास भी टूट गए।

विभाजन – विभीषिका : ‘हनुमान जी ने वर्दी में आकर बचाई जान’

लाहौर के एक व्यक्ति ने 1987 में एक साक्षात्कार में कहा था, “हमने सोचा था कि लाहौर से अमृतसर जाने वाली ट्रेन सुरक्षित पहुंचेगी। लेकिन एक छोटे स्टेशन पर हथियारबंद लोग चढ़ आए और मार-काट शुरू कर दी। मैंने अपनी मां को गिरते देखा। मैं चलती ट्रेन से कूद गया और गन्ने के खेत में छिप गया। उसके बाद मैंने अपने परिवार को कभी नहीं देखा।”

खुशवंत सिंह अपनी पुस्तक ‘Train to Pakistan’ में लिखते हैं, “हमने देखा कि ट्रेनें आती थीं, लेकिन उनमें जिंदा लोग नहीं, केवल लाशें होती थीं। पुरूष, महिला, बच्चे—कोई भी नहीं बख्शा गया।” विभाजन के समय ट्रेनें भय का प्रतीक बन गई थीं। आधिकारिक विभाजन से कुछ महीने पहले, मार्च 1947 में रावलपिंडी में भीषण नरसंहार हुआ। किरपाल कौर, जो उस समय 12 वर्ष की थीं, बताती हैं, “भीड़ ने हमारे गांव को घेर लिया। मां ने मुझे और अन्य महिलाओं-बच्चों के साथ कुएं में धकेल दिया और कहा—‘मर जाना बेहतर है, अपमान सहना नहीं।’ बाद में रिश्तेदारों ने मुझे कुएं से निकाला, लेकिन मां हमेशा के लिए चली गई।” ये घटनाएं बताती हैं कि स्त्रियों के लिए अपमान और हिंसा का डर मृत्यु से भी अधिक भयावह था।

बंगाल : खामोश बहता लहू

पश्चिमी और पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) का विभाजन पंजाब जितना ही रक्तरंजित और विनाशकारी था, लेकिन इसकी भयावहता पर कम चर्चा हुई। बंगाल में हिंसा 1946 की ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ और नोआखाली नरसंहार से शुरू हुई। जिन्ना ने घोषणा की थी कि अगर पाकिस्तान की मांग नहीं मानी गई तो मुसलमान ‘डायरेक्ट एक्शन’ करेंगे। इसके बाद कलकत्ता में चार दिन तक दंगे हुए, जिनमें लगभग 4,000 लोग मरे और 15,000 घायल हुए।

अक्तूबर 1946 में पूर्वी बंगाल के नोआखाली जिले में हजारों हिंदुओं की हत्या और महिलाओं पर अत्याचार हुए। विभाजन के समय ये घाव फिर से ताजा हो गए। कोलकाता के निखिलेश चक्रवर्ती ने बताया कि उनके गांव पर हमला हुआ, घर जलाए गए और पुरुष मारे गए। वे नदी पार कर पश्चिम बंगाल आए, लेकिन मां और बहन रास्ते में खो गईं। ढाका विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा शोभा मुखर्जी कहती हैं कि हिंसा के कारण पढ़ाई बंद हो गई, ट्रेन में लूटपाट हुई और शरणार्थी शिविर में भूख और बीमारी ने कई जानें ले लीं। बारिसाल के काशीनाथ दत्त ने बताया कि खेत-खलिहान छोड़कर सीमा पार जाना पड़ा, बूढ़े पिता साथ नहीं चल पाए और उन्हें वहीं छोड़ना पड़ा। यह अपराधबोध आज भी उनके साथ है।

विभाजन का सबसे भयावह पहलू महिलाओं का अपहरण, बलात्कार, जबरन कन्वर्जन और विवाह के लिए मजबूर किया जाना था। होडसन रिपोर्ट (1948) के अनुसार, इस दौरान 75,000 से 1,00,000 महिलाएं अपहरण का शिकार हुईं। अमृता प्रीतम ने अपनी कविता ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं’ में इस पीड़ा को अभिव्यक्त किया है। 1949 में भारत-पाकिस्तान के बीच अपहृत महिलाओं की वापसी के लिए समझौता हुआ, जिसके तहत हजारों महिलाओं को बचाया गया, लेकिन कई ने लौटने से इनकार किया, क्योंकि वे मजबूर थीं या समाज द्वारा अस्वीकार किए जाने का डर था।

आर्थिक-सांस्कृतिक तबाही

पंजाब की कृषि भूमि और सिंचाई प्रणाली पूरी तरह से तबाह हो गई, हजारों गांव वीरान हो गए। बंगाल में जूट के कारखाने भारत में रहे, जूट की खेती पाकिस्तान चली गई, जिससे उद्योग बर्बाद हो गया। पंजाब के कई जिलों में विभाजन के बाद मूल आबादी का पांच प्रतिशत से कम हिस्सा ही बचा। मंदिर और गुरुद्वारे नष्ट हो गए या अन्य कार्यों में इस्तेमाल होने लगे।

सीमा पार कर शरणार्थी दिल्ली, अमृतसर, लाहौर और कराची के शिविरों में आधे-अधूरे कपड़ों में पहुंचे। भीड़, बीमारी और भूख ने हजारों की जान ले ली। कई लोगों ने अपनी जमीन-जायदाद के कागज खो दिए, इसलिए लौटकर कुछ भी हासिल नहीं कर सके। बच्चों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। कई माता-पिता से बिछड़कर अनाथालयों में पले, जिन्हें अपने गांव और बचपन की धुंधली यादें ही मिलीं।
फिर भी, विभाजन की भयावहता के बीच इंसानियत के उजले पहलू भी सामने आए। कुछ लोगों ने दूसरे समुदाय के पड़ोसियों की रक्षा के लिए जान जोखिम में डाली। कई गांवों ने मिलकर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा हेतु मानव शृंखलाएं बनाईं और उन्हें सीमा तक पहुंचाया। जालंधर में एक हिंदू परिवार ने मुस्लिम मित्रों को तीन हफ्ते तहखाने में छिपाकर रखा, फिर सुरक्षित पाकिस्तान भेजा। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि अंधकार में भी मानवता की लौ बुझी नहीं थी।

अराजकता के बीच संघ की भूमिका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो 1925 से राष्ट्र निर्माण में लगा हुआ था, विभाजन के समय एक अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ संगठन के रूप में उभरा। पंजाब, सिंध, बंगाल जैसे क्षेत्रों में हिंदू-सिखों पर अत्याचार के दौरान संघ के स्वयंसेवकों ने जान-माल की रक्षा, विस्थापितों की सहायता, राहत कार्य और सुरक्षा गश्त जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए। दिल्ली, अम्बाला, करनाल, हिसार, जालंधर, लुधियाना, पटियाला और राजस्थान के कई क्षेत्रों में उन्होंने शरणार्थियों के लिए राहत शिविर संचालित किए।

पाकिस्तान से आने वाली शरणार्थी ट्रेनों की सुरक्षा हेतु स्वयंसेवकों ने हथियारबंद गश्ती दल बनाकर काफिलों की रक्षा की। महिलाओं पर हो रहे अत्याचार रोकने में भी संघ के कार्यकर्ता साहसपूर्वक जुटे और उन्हें बलात्कारी गिरोहों से छुड़ाया।

शरणार्थियों के इलाज के लिए स्वयंसेवकों ने रक्तदान, औषधि वितरण और प्राथमिक चिकित्सा भी प्रदान की। जिनका सब कुछ उजड़ चुका था, उन्हें भोजन ही नहीं, सांत्वना और हौसला भी दिया गया। कई क्षेत्रों में संघ कार्यालय पुनर्वास केंद्र बने। दंगों की योजना बना रहे असामाजिक तत्वों की सूचनाएं गुप्त रूप से सरकार तक पहुंचाकर बड़ी घटनाओं को रोकने में मदद भी की गई।

श्री माधवराव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी, जो विभाजन के समय संघ के सरसंघचालक थे, उनका दृष्टिकोण स्पष्ट, दृढ़ और भावनात्मक था। उन्होंने कहा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक एकता का भाव है। वे मानते थे कि मजहब आधारित राष्ट्रीयता भारत की आत्मा के विरुद्ध है। कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सहमति से हुआ विभाजन उन्होंने राजनीतिक अवसरवाद, लालच और कमजोरी की राजनीति का परिणाम बताया। श्री गुरुजी का विश्वास था कि यह विभाजन स्थायी नहीं होगा और भविष्य में भारत फिर अखंड होगा, क्योंकि सांस्कृतिक एकता को कोई स्थायी रूप से बांट नहीं सकता।

विभाजन – विभीषिका : हमारे बीच ही हैं जिन्ना के पैरोकार

सीख लेना जरूरी

1947 का भारत विभाजन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी थी जिसने भारत-पाकिस्तान संबंधों में गहरी दरार बना दी, जो आज भी राजनीति को प्रभावित करती है। प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि यह विभीषिका सिर्फ भौतिक नुकसान ही नहीं, बल्कि भावनात्मक चोट भी थी, जहां जमीन-जायदाद के साथ अस्मिता और अस्तित्व भी लुप्त हो गया। आज भी बुजुर्ग अपने गांव की खुशबू, हंसते-खेलते पड़ोसी और बिछड़े रिश्तेदारों को याद करते हैं। उनके मन में आज भी वही प्रश्न गूंजता है—क्या इस विभाजन को टाला जा सकता था?

पंजाब और बंगाल, जो कभी सांस्कृतिक एकता के प्रतीक थे, इस उथल-पुथल के सबसे बड़े शिकार बने। पीड़ितों की गवाही हमें याद दिलाती है कि यह त्रासदी केवल ज़मीन का नुकसान नहीं, बल्कि विश्वास, एकता और मानवता के क्षरण की कहानी है। इसलिए यह जरूरी है कि इस दर्दनाक इतिहास को याद रखा जाए—नफरत फैलाने के लिए नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि ऐसी भयावह परिस्थितियां फिर कभी न दोहराई जाएं।

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