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जम्मू-कश्मीर : जिहादी साहित्य पर प्रहार

कश्मीर में कई आतंकी घटनाओं जांच में प्रतिबंधित पुस्तकों के उद्धरण और विचार संदिग्धों के मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और दस्तावेजों में मिले

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Aug 14, 2025, 11:19 am IST
inपुस्तकें, विश्लेषण, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
ऐसी 25 किताबों को किया गया है प्रतिबंधित

ऐसी 25 किताबों को किया गया है प्रतिबंधित

जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा 25 किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके लिए गृह विभाग की ओर से जारी एक आदेश में कहा गया कि ये पुस्तकें झूठे विमर्श को बढ़ावा देती हैं, युवाओं को भड़काती हैं और आतंकवाद का महिमामंडन करती हैं। ये किताबें घाटी में हिंसा और कट्टरता फैलाने का माध्यम बन रही थीं। प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची में मौलाना अबुल आला मौदूदी की ‘अल जिहाद फिल इस्लाम’, ए.जी. नूरानी की ‘कश्मीर डिस्प्यूट (1947–2012)’, विक्टोरिया स्कोफील्ड की ‘कश्मीर इन कॉन्फ्लिक्ट’, डेविड देवदास की ‘इन सर्च ऑफ ए फ्यूचर’, अरुंधति रॉय की ‘आजादी’ और क्रिस्टोफर स्नेडेन की ‘इंडिपेंडेंट कश्मीर’ जैसी पुस्तकें प्रमुख हैं।

इन लेखकों की विचारधाराएं और दृष्टिकोणभिन्न हैं। मौलाना मौदूदी इस्लामी राजनीतिक सिद्धांतों के समर्थक रहे हैं, जबकि अरुंधति रॉय भारतीय राष्ट्र-राज्य की आलोचक हैं और लगातार मानवाधिकारों की वकालत के नाम पर भारत की सांस्कृतिक विरासत और हिन्दू धर्म, इतिहास एवं परंपराओं पर प्रश्न उठाती रही हैं और भयंकर रूप से आलोचना करती हैं। ए.जी. नूरानी और विक्टोरिया स्कोफील्ड जैसे लेखक कश्मीर मुद्दे पर विस्तृत ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, वह भी उस संदर्भ में जो युवाओं के अंदर कहीं न कहीं धीमा अलगाव पैदा करने का कारण बन जाता है।

सुरक्षा सर्वोपरि

गृह विभाग के अनुसार, यह निर्णय जांच और विश्वसनीय खुफिया जानकारी के आधार पर लिया गया है, जो यह इंगित करता है कि इन किताबों की सामग्री ने युवाओं के मन में कट्टरपंथ और हिंसा के बीज बोने में भूमिका निभाई है। आदेश में कहा गया कि ये किताबें “ऐतिहासिक या राजनीतिक टीका-टिप्पणी” के रूप में सामने आती हैं, लेकिन धीरे-धीरे युवाओं को भारत विरोधी भावनाओं की ओर ले जाती हैं। सरकार का तर्क है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत विरोधी विमर्श या आतंकवाद को वैचारिक समर्थन देना स्वीकार्य नहीं है। गृह विभाग के सूत्रों ने दावा किया है कि राज्य में कई आतंकी मामलों की जांच में यह पाया गया कि इन पुस्तकों के उद्धरण और विचार संदिग्धों के मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और गोपनीय दस्तावेजों में मिले हैं।

प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची

ह्यूमन राइट्स वॉयलेशन इन कश्मीर, कश्मीरीज फाइट्स फॉर फ्रीडम, कोलोनाइजिंग कश्मीर, कश्मीर पॉलिटिक्स एंड प्लेबिसाइट, डू यू रिमेंबर कुननपोशपोरा,मुजाहिद की अजान, अल जिहाद फिल इस्लाम, इंडिपेंडेंट कश्मीर,रसिस्टिंग ऑक्यूपेशन इन कश्मीर, बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशन (जेंडर एंड मिललटिराइजेशन इन कश्मीर), कंटेस्टिड लैंड्स, इन सर्च आफ ए फ्यूचर ( द स्टोरी आफ कश्मीर), कश्मीर इन कनफ्लिक्ट (इंडिया, पाकिस्तान एंड द अनऐंडिंग वार),द कश्मीर डिस्प्यूट 1947-2002, कश्मीर एट द क्रॉसरोड्स (इनसाइड ए 21 सेंचुरी कनफ्लिक्ट), ए डिसमेंटल्ड स्टेट(द अनटोल्ड स्टोरी आफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370), रसिस्टिंग डिसएपेयर्स(मिलिट्री आक्यूपेशन एंड विमेन एक्टिविज्म इन कश्मीर), कनफ्रंटिंग टेरेरिज्म, फ्रीडम कैपटिविटी (नेगोशिएशन्स आफ बिलांगिंग एलांग कश्मीरी फ्रंटियर), कश्मीर (द केस फार फ्रीडम),आजादी, यूएसए एंड कश्मीर, ला एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन इन कश्मीर, गब-तारीख-ए-सियासत कश्मीर और कश्मीर एंड द फ्यूचर आफ साउथ एशिया

हर देश उठाता है ऐसे कदम

विश्व भर में किताबों पर प्रतिबंध लगाने के उदाहरण भरे पड़े हैं। ईरान, सऊदी अरब, चीन और यहां तक कि अमेरिका में भी कुछ किताबों को स्कूल पाठ्यक्रमों से हटाया गया है। अमेरिका में टोनी मॉरिसन की ‘बिलवेड’ और सलमान रुश्दी की ‘द सैटेनिक वर्सेज’ जैसी किताबें विवादास्पद रही हैं। लेकिन लोकतांत्रिक देशों में प्रतिबंध आमतौर पर अंतिम विकल्प माना जाता है। इसका अर्थ है कि जिन किताबों पर जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंध लगाया गया है, वे बेहद संवेदनशील एवं देश विरोधी दृष्टिकोण से बहुत खतरनाक हैं। कश्मीर भारत का वह संवेदनशील क्षेत्र है, जहां विचारधारा, अस्मिता और राजनीतिक संघर्ष की गूंजें कई दशकों से सुनाई देती रही हैं। अलगाववाद, आतंकवाद, में फंसा यह क्षेत्र केवल गोली-बंदूक का नहीं, बल्कि इस तरह के विचार फैलाने वालों का भी रहा है।

सकारात्मक परिवर्तन

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में शांति और विकास को गति देने के लिए बड़े कदम उठा रही है। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से राज्य की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति में बड़े परिवर्तन देखे गए हैं। सरकार का लक्ष्य है कि क्षेत्र को राष्ट्रीय मुख्यधारा में पूरी तरह से समाहित किया जाए। वहीं, 370 हटने के बाद केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में व्यापक बदलाव की दिशा में कई कदम उठाए। बाहरी निवेश को प्रोत्साहित किया गया, औद्योगिक नीति 2021 लागू की गई और शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत ढांचे और पर्यटन के क्षेत्रों में कई योजनाएं शुरू की गईं।

गुलमर्ग, पहलगाम और श्रीनगर जैसे पर्यटन स्थलों पर भारी संख्या में पर्यटक पहुंचे हैं। सरकार का दावा है कि इससे स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है। हाल के वर्षों में एम्स, आईआईटी, आईआईएम और मेडिकल कॉलेजों की घोषणा ने इस दिशा में उम्मीद जगाई है।

दिशा देना आवश्यक

केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन का ध्यान अब युवाओं पर केंद्रित है। शिक्षा, रोजगार और तकनीकी प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें आतंकवाद के विकल्प के रूप में सशक्त और सकारात्मक भविष्य की ओर मोड़ा जा रहा है। स्किल डेवलपमेंट, स्टार्टअप योजनाएं और छात्रवृत्तियों के माध्यम से युवा वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। यहां सड़कों, सुरंगों, रेल नेटवर्क और एयर कनेक्टिविटी पर विशेष ध्यान दिया गया है। श्रीनगर से जम्मू और लद्दाख तक बेहतर सड़क संपर्क के लिए ज़ोजिला टनल, चेनानी-नाशरी सुरंग और रेल लिंक जैसी परियोजनाएं तेजी से पूरी हो रही हैं। सरकार द्वारा पंचायतों को सशक्त बनाने और स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में भी प्रयास हुए हैं। कई जिलों में पंचायत चुनाव सफलतापूर्वक कराए गए हैं, जो लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं।

इस संदर्भ में ज्ञात हो कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) कुछ प्रतिबंधों की अनुमति देता है– जैसे कि राज्य की सुरक्षा, विदेशी संबंध और सार्वजनिक व्यवस्था। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद एक वास्तविक और गंभीर समस्या है। सुरक्षा एजेंसियों को इस खतरे से निपटने के लिए हरसंभव उपाय करने चाहिए। इसी तरह सरकारों को भी अपने हर प्रयास शांति एवं विकास के नजरिए से करने चाहिए, जो कि सरकार इस वक्त यहां करती दिखाई दे रही है। पुस्तकों पर रोक की कार्रवाई भी उसी दिशा में उठाया गया कदम है।

Topics: Jihadi literatureIn Search of a Futureपाञ्चजन्य विशेषArundhati Roy AzadiKashmir disputeChristopher Snedden Independent Kashmirकश्मीर इन कॉन्फ्लिक्टDr. Mayank Chaturvediडेविड देवदासअरुंधति रॉय आजादीइन सर्च ऑफ ए फ्यूचरAl Jihad Fil IslamA.G. NooraniVictoria SchofieldJammu and KashmirKashmir in ConflictFreedom of ExpressionDavid Devadas
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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