मेरा जन्म 1930 में पाकिस्तान के जिला कैमलपुर की तहसील फतेहजंग के गांव हील कलां में हुआ था। परिवार परंपराओं, सामुदायिक मूल्यों और कारीगरी से जुड़ा था। पिता अमीर सिंह और माता सुरसती देवी गांव के सम्मानित व्यक्ति थे। आभूषण का व्यवसाय पीढ़ियों से हमारी पहचान और जीविका का आधार था। चाचा किरपाल सिंह और करम सिंह का साथ बचपन को और भी सुरक्षित और समृद्ध बनाता था।
बचपन जिज्ञासा, सामुदायिक भावना और सांस्कृतिक रंगों से भरा था। अक्सर माता-पिता के साथ गुरुद्वारा सिंह सभा जाया करता था, जहां आध्यात्मिक मूल्य और समर्पण की भावना सीखी। जब मैं पांच साल का था, तो खेलते-खेलते कुएं में गिर गया। गांव के लोगों ने मुझे बचाया था।
गांव में सिख, हिंदू और मुस्लिम साथ रहते, त्योहार मिलजुल कर मनाते थे। बैसाखी, माघी, ईद और दीवाली जैसे अवसर गांव में सामाजिक एकता के उत्सव बन जाते थे। यह आपसी सहभागिता सांप्रदायिक सद्भाव और सह-अस्तित्व की भावना को और मजबूत करती थी। लेकिन 1947 में, जब मैं 17 वर्ष का था, वह शांतिपूर्ण जीवन बिखर गया।
विभाजन की राजनीतिक आंधियों ने हमारे गांव को भी अपनी चपेट में ले लिया। सिंध से आए शरणार्थियों की भयावह कहानियों ने माहौल को भयावह बना दिया। एक दिन खबर मिली कि गांव के दो सम्मानित लोगों को उन्मादी भीड़ ने बेरहमी से मार डाला। उस क्षण हमें अहसास हुआ कि अब यहां रहना सुरक्षित नहीं रहा।
गहरे दुख के साथ हमने पुश्तैनी घर छोड़ने का फैसला लिया। गर्मी के दिन थे। गांव के कुछ लोगों के साथ हम एक काफिले में शामिल हो गए। बठिंडा पहुंचे, तो हमें सरकारी शरणार्थी शिविर में रखा गया। वहां जीवन बहुत कठिन था। भीड़भाड़, भोजन और स्वच्छ पानी की कमी थी। ऊपर से विस्थापन का मानसिक बोझ था। हमने किराए का मकान लिया और नए सिरे से जीवन शुरू किया। मैंने रसोई के बर्तन, औजार और बाद में फर्नीचर बनाना शुरू किया। स्वर्णकार से लोहार बनने का यह बदलाव मेरे जीवन की नई शुरुआत थी।
जीवन स्थिर हुआ। विवाह के बाद एक बेटे और तीन बेटियों का पिता बना। बेटे महिंदर सिंह ने शिल्पकला की विरासत को आगे बढ़ाया। आज भी विभाजन के दर्द को महसूस करता हूं। मेरे लिए यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि जीवन की एक बड़ी व्यक्तिगत चोट थी।


















