महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस : स्वदेश के लिए सबसे कम उम्र में फांसी पर चढ़े
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महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस : स्वदेश के लिए सबसे कम उम्र में फांसी पर चढ़े

11अगस्त: क्रांतिकारी खुदीराम बोस के बलिदान दिवस पर समर्पित

Written byडॉ आनंद सिंह राणाडॉ आनंद सिंह राणा
Aug 11, 2025, 04:04 pm IST
inभारत, विश्लेषण
‘एक बार विदाई दे माँ, घूरे आसी..हंसी हंसी पोरबो फांसी देखबे भारतवासी!

(ओ माँ मुझे एक बार विदा दो तनिक घूमकर आता हूं..हंसता हंसता फांसी के फंदे में चढ़ जाऊंगा और सारे भारतवासी देखेंगे)। महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस की ये शब्द जहां एक ओर मार्मिक संवेदना उत्पन्न करते हैं तो दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध स्वदेश के लिए सर्वस्व अर्पित करने की प्रेरणा देते हैं।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद महारथी खुदीराम बोस ही प्रथम क्रांतिकारी थे जो सबसे कम उम्र (18 वर्ष 8 माह 8 दिन ) में फांसी पर चढ़ा दिये गये थे। ये वही बंगाल है जहां से राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हुई थी, परंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बंगाल बिखर रहा है। अपने ही अपनों को मिटा रहे हैं, यह देख कर खुदीराम बोस की आत्मा भी रोती होगी। इसलिए स्वाधीनता के अमृत काल में महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस के बलिदान की गाथा जन- जन तक पहुंचनी ही चाहिए।

स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारी रणबांकुरे कौन थे? कौन थे? ये दीवाने, कौन थे? वे, जिन्हें केवल एक प्रेम, देश प्रेम था। जिन्हें केवल एक धुन राष्ट्र धुन थी और जिनका केवल एक लक्ष्य था भारत मां की स्वतंत्रता! फिर चाहे स्वयं का शरीर बेड़ियों में जकड़ कर कोड़ों से क्यों न उधेड़ दिया जाए, लेकिन तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें गाते हुए फांसी पर झूल जाने वाले कई नामों को हम जानते भी नहीं। जिन्हें जानते हैं उन्हें भी प्रकारांतर से कभी आतंकवादी, लुटेरा, डकैत और फासिस्ट कहा गया। इसी कड़ी में खुदीराम बोस भी आते हैं।18 साल 8 माह 8 दिन की बांकी उम्र में फांसी का फंदा चूम लिया।

इस उम्र में जब वर्तमान पीढ़ी के अधिकतर युवा यारी-दोस्ती और मौज-मस्ती को ही जीवन का ध्येय और पर्याय समझ रहे हैं तब उन्हें एक बार खुदीराम बोस की वीरोचित कहानी अवश्य पढ़नी चाहिए। ताकि उनको भी तो पता चले कि स्वतंत्रता संग्राम के समय में इसी उम्र का युवा हाथ में गीता लेकर भारत माता की जय बोलते हुए फांसी के फंदे पर झूल गया।

पं. बंगाल के मिदनापुर जिले में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस धर्मात्मा कायस्थ थे। उनकी पत्नी लक्ष्मीप्रिया देवी भी एक हाथ से धैर्य-धर्म को थामें रखतीं और दूसरे हाथ में स्वदेश प्रेम की डोर लिए चलतीं। यह शुभ संस्कारों का ही प्रभाव था कि 3 दिसम्बर 1889 के दिन जब बोस दंपती के घर बालक ने जन्म लिया तो उसका नाम रखा खुदीराम, अर्थात् शुभ लक्षणों वाला यह राम खुद्दारी की परिभाषा सार्थक करने वाला था। तो फिर वह अंग्रेजों की दासता को कैसे स्वीकार कर लेता।

जैसे शुक्ल पक्ष का चंद्रमा एक-एक दिन करके बढ़ता रहता है, बालक भी एक-एक वर्ष बढ़ता गया और हर उम्र के साथ उसमें देश को स्वतंत्र करा लेने की जिजीविषा बढ़ती गई। यह जिजीविषा एक दिन इतनी बढ़ी की नवीं कक्षा के छात्र खुदीराम बोस ने पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। परंतु यह केवल प्रारंभ था, बालक बोस को अभी लंबी दूरी तय करनी थी।

स्वदेशी आंदोलन जारी तो था, लेकिन बोस के विचारों में केवल इतना होना ही पर्याप्त नहीं था। यह आवश्यक था कि समग्र जनता में चेतना आए और वह घरों से निकल पड़ें और ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ फेकें। स्वदेशी आंदोलन में अनेक ऐसे ही क्रांतिकारियों का साथ बोस को मिला और मां के सपूतों का कारवां बढ़ चला।

सन् 1906 में अंग्रेज सिपाही को मुक्का मारने के साथ ही खुदीराम बोस में क्रांतिकारी बदलाव आया। मिदनापुर में एक औद्योगिक तथा कृषि प्रदर्शनी लगी हुई थी। खुदीराम ने इस प्रदर्शनी में आए लोगों को सोनार बांग्ला जिसे कि सत्येंद्रनाथ ने लिखा था (यह बेहद ज्वलंत विषय पर लिखा गया पत्रक था), एक पुलिस वाले ने उन्हें यह पत्र बांटते देखा तो पकड़ने दौड़ा। तेजतर्रार खुदीराम बोस ने सिपाही के मुंह पर घूंसा मार दिया और पत्रक को लेकर वहां से आसानी से भाग निकले। प्रकरण पर अभियोग चलाया गया, लेकिन गवाह न मिलने पर बोस निर्दोष छूट गए।

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर दिया।लॉर्ड कर्जन इसे अंजाम देने वाला था, जिसके विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए थे। इन क्रांतिकारियों के दमन के लिए मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को भेजा गया। किंग्सफोर्ड के तरीके बेहद क्रूर थे। उसने कई निर्दोषों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेजी सरकार ने इस दरिंदे को बदले में सम्मान देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश बना दिया। अत: युगांतर समिति ने बदले की योजना बनाई। बंगाल में क्रांतिकारियों की एक समिति युगांतर इस पूरी दमनकारी नीति से रोष में थी। बोस पहले ही इससे जुड़ चुके थे।

एक गुप्त बैठक में तय हुआ कि किंग्सफोर्ड को उसके किए की सजा तो मिलनी ही चाहिये और तब दो नाम क्रमशः प्रफुल्लकुमार चाकी और खुदीराम बोस के तय हुए। खुदीराम को एक बम और पिस्तौल दी गई। प्रफुल्लकुमार को भी एक पिस्तौल दी गई। अब दोनों को अपना लक्ष्य साधने के लिए रवाना किया गया।

बच गया था क्रूर किंग्सफोर्ड

किंग्सफोर्ड को भी अपने विरुद्ध हो रही इस योजना की जानकारी कहीं से मिल गई थी। दोनों ही क्रांतिकारी बेहद सतर्क थे। पहले दोनों ने किंग्स फोर्ड के बंगले की निगरानी की। बघ्घी और घोड़े की पहचान की, खुदीराम तो किंग्स फोर्ड के कार्यालय तक भी हो आए थे। अगले दिन योजना के अनुसार दोनों अपनी-अपनी जगह तैनात हो गए। 30 अप्रैल 1908 को दोनों क्रांतिकारी किंग्सफोर्ड के बंगले के बाहर जमे थे। रात साढ़े आठ बजे क्लब से एक बघ्घी निकली, खुदीराम बोस उसके पीछे भागने लगे। रास्ते में अंधेरा था, उन्होंने निशाना साधकर आगे जा रही बघ्घी पर बम फेंक दिया। यह सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद हिंदुस्तान में किया गया पहले बम विस्फोट के तौर पर देखा जा सकता है।

इतिहासकारों के अनुसार , इसकी आवाज तब तीन मील दूर तक सुनी गई और फिर कुछ दिनों बाद तो लंदन तक में सुनी गई। लेकिन उस दिन किंग्सफोर्ड बच गया क्योंकि उसकी बघ्घी क्लब से कुछ देर बाद निकली थी। खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार दोनों ही रातों – रात नंगे पैर 24 मील भागते चले गए और वैनी रेलवे स्टेशन जाकर रुके। अंग्रेज अफसर भी चुप नहीं बैठे थे। वैनी स्टेशन पर उन्हें घेर लिया गया। प्रफुल्लकुमार चाकी ने युगांतर का कोई भेद न खुल जाए इसलिए खुद को गोली मारकर वीरगति का मुख चूमा।

11 अगस्त 1908 को दी गई फांसी

इधर खुदीराम बोस गिरफ्तार कर लिए गए कई बार अंग्रेजों को छकाने वाले खुदीराम को अब अंग्रेज नहीं छोड़ने वाले थे, इसलिए 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी दे दी गई। खुदीराम बोस की वीरगति का असर भारत के नौजवानों पर ऐसा पड़ा कि बोस क्रांतिकारी वीरता के पर्याय बन गए। उनका नाम लेकर नौजवान स्वाधीनता की कसमें खाने लगे और बंगाल में लड़के खुदीराम नाम लिखी किनारी की धोती पहनने लगे थे। यह धोती स्वदेशी और स्वतंत्रता आंदोलन का पर्याय बन गई।

वीरांगना मैना बाई का बलिदान

आज जो हम तिरंगा लहरा रहे हैं और उसकी छांव के नीचे खड़े हैं, इसके भगवा रंग में वीर अमर बलिदानी खुदीराम बोस का लहू शामिल है। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे कम 13 वर्ष की उम्र में महान वीरांगना मैना बाई का बलिदान हुआ था।

इन महारथियों को भी पढ़ें

यद्यपि 1872 में कूका आंदोलन में 68 सेनानी बलिदान हुए थे जिसमें 13 वर्ष का बालक जिसका 50वां नंबर था, उसने लुधियाना के डिप्टी कमिश्नर कावन की दाढ़ी पकड़ ली थी और तब तक नहीं छोड़ी जब तक उसके हाथ नहीं काट दिए गए फिर उसका बलिदान हुआ, यह उस समय तक का सबसे कम उम्र में बलिदान था परंतु दुर्भाग्य है कि बड़े नामों के आगे इस बालक का नाम ज्ञात नहीं है जो शोध का विषय है। अब 12 वर्षीय महारथी बाजी राऊत का नाम सबसे कम उम्र में बलिदान देने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में दर्ज है (सन् 1938)। उपरोक्तानुसार अज्ञात महारथी बालक को तोप के मुंह बांधकर उड़ाया गया था और महारथी बाजी राऊत गोलियों से भून दिया गया था। अतः फांसी की सजा के दृष्टिकोण से, महारथी खुदीराम बोस सबसे कम उम्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिन्हें फांसी दी गई थी।

Topics: स्वतंत्रता आंदोलनपाञ्चजन्य विशेषखुदीराम बोससबसे कम उम्र में फांसीभारत की स्वाधीनता संग्रामभारत के क्रांतिकारी11 अगस्त का इतिहास
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