सुप्रीम कोर्ट ने श्री बांके बिहारी मंदिर (वृंदावन) के नए ट्रस्ट पर अस्थायी रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि जब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट इस पर फैसला नहीं देता, तब तक यह ट्रस्ट काम नहीं करेगा। इस बीच मंदिर की व्यवस्था देखने के लिए एक अंतरिम समिति बनेगी, जिसकी अध्यक्षता हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त जज करेंगे। इस समिति में सरकार के अधिकारी और मंदिर से जुड़े गोस्वामी समाज के लोग भी होंगे।
मामला कैसे शुरू हुआ- 15 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को मंदिर के धन से बांके बिहारी कॉरिडोर बनाने और पास की 5 एकड़ जमीन खरीदने की अनुमति दी थी। शर्त यह थी कि जमीन भगवान ठाकुरजी के नाम पर रजिस्टर्ड होगी। इसके बाद 26 मई को यूपी सरकार ने एक अध्यादेश (कानूनी आदेश) जारी किया और श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास नाम से एक ट्रस्ट बनाने का निर्णय लिया। इस ट्रस्ट में 11 सदस्य मनोनीत होने थे, जबकि 7 सदस्य पदेन हो सकते हैं।
इसका विरोध क्यों हुआ- 27 मई को देवेंद्र गोस्वामी, रजत गोस्वामी, सोहन मिश्रा और कुछ व्यापारियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। उनका कहना था कि यह मंदिर एक निजी मंदिर है, जिसे सदियों से गोस्वामी परिवार संभालता आ रहा है। सरकार ने बिना पूछे ट्रस्ट बना दिया, जिससे पारंपरिक प्रबंधन बाहर हो गया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया कि सरकार मंदिर के फंड का इस्तेमाल कैसे कर सकती है? उन्होंने कहा कि कॉरिडोर बनाना सरकार की जिम्मेदारी है, उसके लिए मंदिर का पैसा क्यों लिया जा रहा है?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी- सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से पूछा- मंदिर भले ही निजी हो, लेकिन भगवान तो सबके हैं। लाखों श्रद्धालु वहां आते हैं। फिर उनके लिए फंड का इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता? सरकार ने सफाई दी कि उनका उद्देश्य मंदिर पर कब्जा करना नहीं, बल्कि बेहतर व्यवस्था करना है। भीड़ बढ़ने से कई बार हादसे होते हैं, इसलिए कॉरिडोर और व्यवस्था सुधारना जरूरी है।

















