श्रावण में शिवभक्ति का अनोखा संगम: जानिए देवघर के श्रावणी मेले की अद्भुत कथा
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श्रावण में शिवभक्ति का अनोखा संगम: जानिए देवघर के श्रावणी मेले की अद्भुत कथा

हमारे धर्म शास्त्रों में जल को ‘नारायण‘ का स्वरूप कहा गया है। श्रीमद्भागवत, ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद से लेकर उपनिषदों और पुराणों तक; सभी में जल तत्व को दैवीय चेतना का संवाहक माना गया है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Aug 8, 2025, 09:11 am IST
in धर्म-संस्कृति
Deoghar Shravani Mela 2025

Deoghar Shravani Mela 2025

जल सृष्टि के प्रत्येक जीवधारी के जीवन का आधार है। इसीलिए हमारी सनातन हिन्दू संस्कृति में जल को मात्र भौतिक तत्व नहीं, अपितु देवता की संज्ञा दी गयी है। देवता यानी देने वाला। हमारे महान वैदिक मनीषियों के अनुसार जब इस विश्व ब्रह्मांड की रचना हुई थी तो सबसे पहले आपः (जल तत्व) प्रकट हुआ था।

यही कारण है कि हमारे धर्म शास्त्रों में जल को ‘नारायण‘ का स्वरूप कहा गया है। श्रीमद्भागवत, ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद से लेकर उपनिषदों और पुराणों तक; सभी में जल तत्व को दैवीय चेतना का संवाहक माना गया है। शेषशायी भगवान विष्णु की शैया जल में ही है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने सेतु समुद्रम के निर्माण के लिये से जल (महासागर) से मार्ग माँगा था। श्रीकृष्ण ने कालिंदी (यमुना) का शुद्धिकरण किया था। भगवान राम के वंशज राजा भगीरथ अपने पुरखों की मुक्ति के लिए महादेव की कृपा से देवलोक के जलअमृत ‘गंगा’ को धरती पर लाने में सफल हुए थे। सागर मंथन से निकले हलाहल को समष्टि के हित में अपने कंठ में धारण करने के कारण जब महादेव की देह का ताप बहुत अधिक बढ़ गया था; तब जलाभिषेक द्वारा उनका ताप शांत किया गया था। बताते चलें सागर मंथन की वह पौराणिक घटना श्रावण मास में हुई थी। इसी लिए श्रावण ऋतु में देवाधिदेव के जलाभिषेक की परंपरा है।

हम धरतीवासियों को दैवीय प्रसाद के रूप में जल तत्व का यह अमृत सर्वाधिक मात्रा में श्रावण मास में प्राप्त होता है। और हम सनातनधर्मी श्रद्धालु इस उपहार के प्रतिदान रूप में महादेव के सभी प्रमुख तीर्थों में देवाधिदेव को जल अर्पित करते हैं। महादेव के इसी जलार्चन का एक प्रमुख उत्सव है देवघर का विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला। श्रावणी पूर्णिमा को संपन्न होने वाले इस मेला उत्सव में शामिल लाखों की कांवरियों की अद्भुत श्रद्धा को गंगाजल और शिव के प्रति समर्पण का महाअनुष्ठान कहा जाता है।

श्रावण में शिवभक्ति की महायात्रा

कारण कि क्योंकि कोई भी बाजार अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी संख्या में लोगों को पैदल नहीं चलवा सकती। प्रत्येक वर्ष श्रावण के पावन महीने में लगने वाले इस विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में सुल्तानगंज की उत्तर वाहिनी गंगातट पर स्थित अजगैबीनाथ धाम से लेकर देवघर के द्वादश ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ धाम के करीब 110 कि.मी. के विस्तार में मानों शिव का विराट लोक मंगलकारी स्वरूप साकार हो उठता है और समस्त वातावरण कांवरियां शिव भक्तों के जयकारे से गूंजायमान रहता है। भगवान शंकर, जो देवों के देव महादेव कहलाते हैं, के बारे में धार्मिक मान्यता है कि श्रावण मास में जब समस्त देवी-देवतागण विश्राम पर चले जाते हैं, वहीं भगवान भूतनाथ गौरा पार्वती के साथ पृथ्वी-लोक पर विराजमान रहकर अपने भक्तों के कष्ट-कलेश हरते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। ऐसी लोक-आस्था है कि श्रावण मास के दिनों में भगवान शंकर बैधनाथ धाम और अजगैबीनाथ धाम में साक्षात विद्यमान रहते हैं जहाँ उनकी अर्चना द्वादश ज्योतिर्लिंग और अजगैबीनाथ महादेव के रूप में होती है।

उत्तरवाहिनी गंगा और अजगैबीनाथ धाम का पौराणिक महत्व

यही कारण है कि औघड़दानी शिव के पूजन हेतु लाखों भक्त सुल्तानगंज अजगैबीनाथ धाम और देवघर बैद्यनाथ की ओर उमड़ पड़ते हैं। सुल्तानगंज में गंगा उत्तरवाहिनी है, जिसका विशेष महात्म्य है। भगवान शंकर को गंगा का जल अत्यन्त प्रिय है। यदि यह जल उत्तरवाहिनी का हुआ तो सर्वोत्तम। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में यहां ऋषि जह्नु का आश्रम था। जब भगीरथ गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर ला रहे थे तो देवनदी के कोलाहल से क्रोधित होकर ऋषि जह्नु ने आचमन कर गंगाजल पी लिया। किन्तु बाद में भगीरथ के अनुनय विनय करने पर अपनी जंघा से गंगा को प्रवाहित किया जिसके कारण पतित पावनी गंगा जाह्नवी कहलायी।

आनंद रामायण में वर्णित है कि भगवान श्रीराम ने सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा के जल से बैद्यनाथ महादेव का जलभिषेक किया था। तभी से यह परिपाटी कायम हो गयी। कहा जाता है कि श्रावण महीने में सुल्तानगंज से देवघर तक करीब 100 कि.मी. के विस्तार में कांवरिया तीर्थयात्रियों के कांवरों में लचकती मचलती गंगा मानों बहती-सी जाती हैं- जैसे दो -दो गंगा बहती है श्रावण में- एक कांवरों में सवार होकर देवघर की ओर और दूसरी अविरल बहती हुई बंगाल की खाड़ी की ओर। ऐसा चमत्कार सिर्फ भगवान भोले शंकर ही कर सकते हैं।

कांवर यात्रा सांस्कृतिक संगम का प्रतीक

श्रावण पूर्णिमा पर सुल्तानगंज से बैद्यानाथ की कांवर-यात्रा मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, वरन इसमें भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक मान्यताएं भी समाहित हैं। यदि हम पौराणिक संदर्भ लें तो वह कांवड़-यात्रा आर्य और अनार्य संस्कृतियों के मेल और संगम को दर्शाता है। कहाँ आर्य मान्यताओं की देवी गंगा और कहाँ अनार्यों के देव महादेव पर गंगा-जल का अर्पण! यह परंपरा आर्य और अनार्य संस्कृतियों के काल क्रम में हुए समागम को दर्शाती है। सुल्तानगंज से देवघर की यह तीर्थ यात्रा मात्र एक धार्मिक यात्रा ही नहीं वरन शिव और प्रकृति के साहचर्य की यात्रा है। कांवर-मार्ग में हरे-भरे खेत, पर्वत, पहाड़, घने जंगल, नदी, झरना, विस्तृत मैदान-सभी कुछ पड़ते हैं।

रास्ते में जब बारिश की बौछारें चलती हैं तो बोल बम का निनाद करते हुए कांवरिया भक्तगण मानों भगवान शंकर के साथ एकाकार हो उठते हैं। देवघर में जल अर्पण करके लौटते समय न सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से अपने को परिपूर्ण पाता है, वरन प्रकृति के सीधे साहचर्य में रहने के कारण वह अपने अंदर एक नयी सात्विक उर्जा महसूस करता है। इस अवसर पर महादेव शिव यह संदेश देते हैं कि मुझपर सिर्फ गंगा जल और बेलपत्र चढ़ाओ और वरदान में मुझसे जीवन की सारी खुशियाँ ले जाओ। श्रावणी पूर्णिमा का दिन करीब आते ही शिवभक्तों के मन में बाबा के दर्शन की उमंगें हिलोरे लेने लगी हैं। आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन से प्रारम्भ होने वाले इस मेले का चरमोत्कर्ष श्रावणी पूर्णिमा पर होता है। इस दिन जलाभिषेक के लिए देशभर से शिवभक्तों की भारी भीड़ इस शिव धाम पर उमड़ उठती है। झारखंड के देवघर में लगने वाले इस मेले का सीधा सरोकार बिहार के सुल्तानगंज से है। यहीं गंगा नदी से जल लेने के बाद बोल बम के जयकारे के साथ कांवड़िये नंगे पाँव देवघर की यात्रा आरम्भ करते हैं। वर्तमान के अत्याधुनिक घोर विलासी परिवेश में जहाँ ‘संतोषम परम सुखम’ जैसी अवधारणा ध्वस्त होती जा रही है, देवघर के शिवधाम का यह मेला उत्सव निःसंदेह एक अपवाद ही माना जाना चाहिए।

खास बात है कि देवघर स्थित शिवलिंग का भी अपना खास महत्त्व है क्योंकि शास्त्रों में इसे मनोकामना लिंग कहा गया है। यह देश के 12 अतिविशिष्ट ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। यह वैद्यनाथ धाम के नाम से भी जाना जाता है। ऐसे शिवभक्तों की संख्या हजारों में है जो बीस-पचीस वर्षों से हर वर्ष कांवड़ लेकर बाबा के दरबार पहुँचते हैं। ऐसे शिवभक्त अपनी इस श्रद्धा का पूरा श्रेय महादेव की कृपा को ही देते हैं। धर्मशास्त्रों में शिव के जिस अलमस्त व्यक्तित्व का वर्णन है, कमोवेश उनके भक्त कांवड़ियों में भी श्रावणी मेले में यह नजर आता है। वैसे यहाँ आने वालों में हठयोगी शिवभक्तों की भी कमी नहीं है। इतनी लम्बी दूरी तक दंड प्रणाम करते पहुँचने वाले शिवभक्तों की कमी नहीं है।

वहीं एक ही दिन में इस यात्रा को पूर्ण करने वाले भी हजारों में हैं। पिछले कुछ वर्षों में यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं में महिलाओं और नौजवानों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। धार्मिक आस्था और गहरी होने के अलावा इसमें एक अलग तरह के पर्यटन का आनंद भी है। घर-परिवार और इलाके से इतर प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण रास्तों में चार-पाँच दिन पैदल चलने पर शिवभक्तों को कुछ अलग साहसपूर्ण करने की अनुभूति भी होती है। देवघर में श्रावणी मेले के दौरान कांवड़ियों की सात से आठ किलोमीटर लम्बी कतार लग जाती है। घंटों खड़ा रहने के बाद कुछ पल के लिए मंदिर में प्रवेश मिल पाता है। बावजूद इसके; यह ऐसा लोक उत्सव है जो हममें जल को पूजने, संरक्षित करने तथा उसकी दुर्लभता को प्रचुरता में बदलने की सीख देता है।

Topics: Kanwar YatraSanatan Hindu CultureConstruction of Shri Ram SetuSagar Manthan and MahadevShravan month and JalabhishekDeoghar Shravani FairDeoghar Shravani Mela 2025
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