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ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अश्लीलता अस्वीकार

मनोरंजन की आड़ में इंटरनेट के जरिए ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दृश्यों और संवादों के माध्यम से दिखाई जा रही अश्लीलता समाज के लिए घातक है। सरकार द्वारा ऐसे ही कुछ एप को प्रतिबंधित किया जाना सराहनीय

Written byअनंत विजयअनंत विजय
Aug 7, 2025, 07:05 am IST
in भारत, विश्लेषण, मनोरंजन, सोशल मीडिया

हाल ही में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 25 ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म के प्रसारण पर रोक लगा दी। इनमें ‘उल्लू’ जैसे प्लेटफॉर्म भी हैं जहां अश्लील सामग्री दिखाई जाती थी। इसके अलावा ‘ऑल्ट’ और ‘देसीफ्लिक्स’ जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी पाबंदी लगाई गई है। इन प्लेटफॉर्म पर बच्चों और महिलाओं से संबंधित अश्लील सामग्री परोसी जा रही थी। लड़कियों या छोटी बच्चियों को वस्तु की तरह पेश करने (ऑब्जेक्टिफाई करने) का खेल भी इस देश ने देखा है।

ओछेपन की हद

कुछ वर्ष पहले एक वेबसीरीज आई थी ‘रसभरी।’ उसमें एक बच्ची को उत्तेजक नृत्य करते हुए दिखाया गया था। इतना ही नहीं, इन प्लेटफॉर्म पर इस तरह की लगभग अश्लील सामग्री में वीडियो के साथ जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा था, वह द्विअर्थी थी।

अनंत विजय
वरिष्ठ पत्रकार

वर्तमान में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन प्रसून जोशी ने तब इस वेबसीरीज को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज की थी। दृश्य के साथ अगर संवाद भी लगभग अश्लील या द्विअर्थी हो, तो वह दर्शकों को अधिक खींचता है। इन प्लेटफॉर्म का उद्देश्य ही अधिक से अधिक हिट्स हासिल करना होता है। इसके लिए ही इस तरह की सामग्री परोसने में इन्हें किसी प्रकार का गुरेज नहीं होता।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बहुत सोच-विचार और काफी समय देने के बाद इन प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगाई। यहां तो बरसों से इस तरह की अश्लील सामग्री दिखाई जा रही थी। ‘उल्लू’ की वेबसाइट पर जाकर तो सहज ही अनुमान हो जाता था कि वहां किस तरह की सामग्री पेश की जाती रही होगी।

क्या थी ऑल्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स की मंशा ?

जब ऑल्ट एप की शुरुआत हुई थी, तब गूगल पर ऑल्ट सर्च करने से जो पेज खुलता था, उसमें यह बताया जाता था कि यह प्लेटफॉर्म मुख्यधारा के मनोरंजन का विकल्प है। उसके नीचे लिखा होता था, ‘रागिनी एमएमएस, गेट हॉट विद रागिनी’। फिर एक पंक्ति होती थी -हॉट, वाइल्ड एंड लस्टफुल ब्यूटी (सुंदरी)। इसके आगे कहने को कुछ रह नहीं जाता। इससे यह मंशा साफ हो जाती है कि प्लेटफॉर्म अपने दर्शकों को क्या दिखाना चाहता है।

नियम होने जरूरी

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर रेगुलेशन या प्रमाणन की बात लंबे समय से चल रही है। प्रकाश जावड़ेकर जब सूचना प्रसारण मंत्री थे, तब भी यह बात उठी थी। उनके कार्यकाल में सूचना और प्रसारण मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मंत्रियों ने एक संयुक्त पत्रकार वार्ता में ओटीटी के नियमन को लेकर कई तरह की बातें की थीं। उसके बाद जब अनुराग ठाकुर सूचना और प्रसारण मंत्री बने, तो उस समय भी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के प्रतिनिधियों के साथ उनकी कई दौर की बातचीत हुई थी। इन प्लेटफॉर्म्स के प्रतिनिधियों ने तब स्वनियमन पर जोर दिया था। उन बैठकों के बाद एक त्रिस्तरीय व्यवस्था बनी थी जिससे स्वनियमन के तंत्र को प्रभावी बनाया जा सके। प्रतीत होता है कि स्वनियमन का तंत्र भी दिखाने के दांत बनकर रह गया है।

गालियों और अश्लीलता की भरमार

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अब भी मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही है। यथार्थ के नाम पर नग्नता से भरपूर इन वेबसीरीज में गालियों की भरमार रहती है। इस तरह की सीरीज के निर्माताओं का तर्क होता है कि समाज में भी लोग आपसी बोलचाल में गालियों का प्रयोग करते हैं। यह उनकी कहानी की मांग है कि वे गालियां बकते हुए पात्रों को दिखाएं। ऐसे तर्कों की आड़ में वेबसीरीज निर्माता बचकर निकलना चाहते हैं।

फिल्मों पर प्रतिबंध, वेबसीरीज पर छूट क्यों?

फिल्मों में गाली हो तो उस अंश को बीप करना होता है क्योंकि वहां प्रमाणन की व्यवस्था है। फिल्मों को रेगुलेट करने के लिए सिनेमैटोग्राफी एक्ट माैजूद है। चूंकि वेबसीरीज पर किसी प्रकार का कोई नियमन या नियंत्रण नहीं है, लिहाजा वहां गालियों की भरमार होती है। वेबसीरीज में कहानी की मांग के नाम पर अश्लील दृश्य दिखाने वाले निर्माताओं या प्लेटफॉर्म्स के कर्ताधर्ताओं का तर्क होता है कि इंटरनेट पर भी ‘पोर्न साइट’ उपलब्ध है। जिन्हें हस तरह के दृश्य देखने होंगे, वे वहां बहुत आसानी से देख सकते हैं। इस तरह के तर्क देने वालों को यह सोचना चाहिए कि इंटरनेट पर मौजूद ‘पोर्न’ सामग्री और इस तरह के वैध प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध ‘पोर्न’ को देखने में फर्क है। यहां इसको कहानी की शक्ल में दिखाया जाता है, वह कहानी जिसे भारतीय समाज का चित्रण बताया जाता है। देखने वाले को लगता है कि इस तरह की चीजें सामान्य हो सकती हैं।

विशेषकर अगर दर्शक अपरिपक्व है, तो उसके मस्तिष्क पर इसका प्रभाव गहरा हो सकता है। दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर वेबसीरीज देखने वाले लोग जानते हैं कि वे क्या देख रहे हैं। वे इनकी सदस्यता लेते हैं, शुल्क अदा करते हैं और उसके बाद वेबसीरीज देखते हैं। किसी को भी क्या सामग्री देखनी है, यह चयन करने का अधिकार तो होना ही चाहिए। यह बात सामान्य तौर पर ठीक लग सकती है कि हर किसी को अपनी रुचि की सामग्री देखने का अधिकार होना चाहिए। पर यहां यह प्रश्न खड़ा होता है कि अपरिपक्व दिमाग वाले किशोरों का क्या जिनके हाथ में बड़ी संख्या में स्मार्टफोन हैं। उसमें इंटरनेट कनेक्शन भी है। इतने पैसे तो हैं कि वे इन ‘ओवर द टॉप’ प्लेटफॉर्म की सदस्यता ले सकें।

जिज्ञासा का खतरनाक मोड़

इंटरनेट पर किशोरों के लिए स्वस्थ सामग्री भी है। डिजिटल युग में शिक्षा के कई प्रकल्प इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। छात्रों या किशोरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे एजुकेशन एप का उपयोग करें। जब उनके हाथ में आठ इंच का मोबाइल फोन है, तो उनके मन में मनोरंजन को लेकर सहज जिज्ञासा उत्पन्न होती है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि एक किशोर मन में कुछ भी नया देखने-जानने की उत्सुकता अपेक्षाकृत अधिक होती है। किशोर मन अगर कुछ नया देखता है, तो बिना उसकी अच्छाई-बुराई के बारे में विचार किए वह उसके बारे में जानने को उत्सुक हो जाता है।

वह वेबसीरीज के पोस्टर या प्रचार सामग्री में अर्धनग्न तस्वीरें देखता है, तो किशोर मन उस बारे में अधिक से अधिक जानने को उत्सुक होता है। यही मन उसको अश्लील सामग्री देखने की ओर ले जाता है। वेबसीरीज एक नेविगेशन का काम करती है। किशोर मन वहां से संतुष्ट नहीं होता और पोर्न साइट्स की ओर जाता है। यहीं आकर उसकी उत्सुकता समाप्त होती है। क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर सामग्री देने वाली संस्थाएं यह चाहती हैं कि हमारे देश के किशोर मन को अपरिपक्वता की स्थिति से ही इस तरह से मोड़ दिया जाए कि आगे चलकर इस तरह की सामग्री को देखने वाला एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग तैयार हो सके?

विदेशी कंटेंट भी खतरा

इसके अलावा जो एक और खतरनाक बात यहां दिखाई देती है, वह यह कि इन प्लेटफॉर्म्स पर कई तरह की विदेशी सीरीज भी उपलब्ध हैं, जहां पूर्ण नग्नता परोसी जाती है। इनमें ऐसी हिंसा दिखाई जाती है जिसमें मानव शरीर को काटकर उसकी अंतड़ियां निकाल कर प्रदर्शित की जाती हैं। जिस कंटेंट को भारतीय सिनेमाघरों में नहीं दिखाया जा सकता है, उस तरह का कंटेंट वहां आसानी से उपलब्ध है। चूंकि वेब सीरीज के लिए किसी तरह का कोई नियमन नहीं है, लिहाजा वहां स्वतंत्र नग्नता का प्रदर्शन होता है, बगैर यह सोचे-समझे कि क्या भारतीय दर्शकों का मानस इस तरह की सामग्री को देखकर सामान्य व्यवहार कर सकता है। आज इस तरह के समाचार आते रहते हैं कि दुष्कर्म के पहले बलात्कारियों ने इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री देखी।

अभिव्यक्ति की भी है सीमा

जब भी भारत में ओटीटी पर नियमन की बात होती है, तो एक विशेष इकोसिस्टम से जुड़े लोग शोर मचाने लगते हैं वे तत्काल संविधान की दुहाई देने लगते हैं। तर्क यह दिया जाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने का प्रयास किया जा रहा है। यह कहकर एक भ्रम का वातावरण बनाया जाता है।

अगर हम देखें तो हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात तो है, लेकिन उसकी सीमा भी तय की गई है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इस अनुच्छेद की आड़ लेने वाले अधिकतर समय अर्धसत्य ही बताते हैं। संविधान के ही अनुच्छेद 19(2) में सरकार को यह अधिकार है कि वह समाज हित में इस स्वतंत्रता की सीमा तय करे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो ठीक है, लेकिन जब अभिव्यक्ति अराजक होने लगे तो सरकार को दखल देना ही चाहिए।

अन्य देशों में हैं नियम

ऐसा नहीं है कि अगर ओटीटी को लेकर कोई नियमन बनाया जाता है, तो भारत ऐसा करने वाला विश्व का पहला देश होगा। कई देशों में ओटीटी के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। सिंगापुर में एक प्राधिकरण है। सभी सेवा प्रदाताओं को ब्रॉडकास्टिंग एक्ट के अंतर्गत इस प्राधिकरण से लाइसेंस लेना पड़ता है। ओटीटी, वीडियो ऑन डिमांड और विशेष सेवाओं के लिए एक विशेष कंटेंट कोड है। इसमें सामग्रियों के वर्गीकरण की स्पष्ट व्यवस्था है। सिंगापुर की इस संस्था के पास अधिकार है कि अगर ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाने वाली सामग्री कानून सम्मत नहीं है, तो उसका प्रसारण रोक सके। जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है।

किशोरों के लिए यूट्यूब प्रतिबंधित

ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कड़ा रुख अपनाते हुए यूट्यूब पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। इससे पहले टिकटॉक, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व में ट्विटर) और स्नैपचैट पर भी यही बैन लगाया जा चुका है। दिसंबर 2025 से यह नियम प्रभाव में आएगा, जिससे लगभग दस लाख बच्चों का सोशल मीडिया इस्तेमाल प्रतिबंधित हो जाएगा।

सरकार द्वारा 2024 में पेश ऑनलाइन सुरक्षा संशोधन (सोशल मीडिया न्यूनतम आयु) विधेयक के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अकाउंट बनाने या उसे एक्सेस करने से रोकें। किशोर अब यूट्यूब पर केवल वीडियो देख सकेंगे, लेकिन न तो अपना अकाउंट बना सकेंगे और न ही कंटेंट अपलोड या चैट कर पाएंगे। सरकार आयु-जांच तकनीकों की टेस्टिंग रिपोर्ट का इंतजार कर रही है, जो इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाएगी।

ऑस्ट्रेलिया में तो इन प्लेटफॉर्म्स पर नजर रखने के लिए ‘ई-सेफ्टी कमिश्नर’ हैं। उनका दायित्व है कि वे डिजिटल मीडिया पर चलने वाली सामग्री वहां पर नजर रखें। वहां तो विनियमन इस हद तक है कि ई-सेफ्टी कमिश्नर दंड के तौर पर सामग्री के प्रसारण को प्रतिबंधित कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में ओटीटी पर चलने वाली सामग्री की शिकायत मिलने पर उसके निस्तारण की एक तय प्रक्रिया है। इसके अलावा भी दुनिया के कई देशों में किसी न किसी तरह के दिशा-निर्देश लागू हैं।

स्पष्ट है कि केंद्र सरकार को इस बारे में कोई फैसला लेना होगा। स्वनियम की व्यवस्था संतुलित नहीं हो पा रही है। जिस तरह का ट्रेंड देखा जा रहा है, उसमें ओटीटी कंटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था बनाने की दिशा में सरकार को निर्णय लेना होगा। इस व्यवस्था को लागू करने के लिए वृहद संसाधन की आवश्यकता होगी लेकिन आज नहीं तो कल सरकार को इस पर निर्णय लेना ही होगा। इस मसले को अब और नहीं टाला जा सकता। इस तरह की कोई ऐसी स्वायत्त संस्था बनाने पर भी विचार किया जा सकता है जो वेब सीरीज पर दिखाए जाने वाले कंटेंट की शिकायत मिलने पर विचार करे और निर्णय ले। इस संस्था को इतना अधिकार देना होगा कि उसके निर्णयों का सम्मान हो। उसे लागू करवाने के लिए उसके पास वैध अधिकार हों।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषओवर द टॉपसूचना और प्रसारण मंत्रालय नेटफ्लिक्स नोटिसविदेशी कंटेंटओटीटी प्लेटफॉर्मउल्लू प्लेटफॉर्मअश्लील सामग्रीMinistry of Information and BroadcastingPornographic contentporn siteover the topभारतीय समाजforeign contentOTT Platformullu platformIndian Societyपोर्न साइट
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