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होम भारत

वैचारिक संगम और सामाजिक सरोकारों की दिशा में एक पहल

इस संवाद के माध्यम से जहां एक ओर पाञ्चजन्य की विचार यात्रा का नया सोपान तय हुआ वहीं यह समझने का प्रयास भी हुआ कि भारत में हर विषय में विवाद और राजनीति खोजने वाली दृष्टि राष्ट्र, समाज और संगठन को कैसे देखती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग में भी यह विमर्श महत्वपूर्ण था।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Aug 4, 2025, 07:46 am IST
inभारत, पाञ्चजन्य इवेंट

दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे नंदकुमार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक मुकुल कानिटकर, भारत प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण कुमार गोयल, पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर एवं महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के ताज विवान्ता के भव्य सभागार में जब उत्कल समाज की बौद्धिक चेतना का संगम हुआ, तो यह दृश्य मात्र एक आयोजन भर नहीं था। यह एक वैचारिक समागम था, जहां भविष्य को दिशा देने वाली मेधा शक्ति ने राष्ट्र, समाज और शासन की अवधारणाओं पर गहराई से विचार किया गया। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना और वैचारिक प्रवाह के पुनर्संवाद का प्रारंभ था। बहुत से आयोजन, कार्यक्रम और सम्मेलन होते रहते हैं, लेकिन यह समागम इसलिए विशिष्ट था क्योंकि यह उस वैचारिक धारा का प्रकटीकरण था, जो समाज के विमर्श को दिशा देती है, प्रश्न उठाती है, उनके समाधान ढूंढती है और भविष्य का पथ प्रशस्त करती है।

इस ‘सुशासन संवाद’ का उद्देश्य मात्र ‘गवर्नेंस’ यानी प्रशासन पर चर्चा करना नहीं था, बल्कि भारतीय शासन अवधारणा और पश्चिमी प्रशासन अवधारणा के बीच के उस मौलिक अंतर को समझने का प्रयास था, जो आज भी भारत के लोक कल्याणकारी राज्य की आत्मा को संजोए हुए है। जहां पश्चिम ‘प्रक्रिया’ आधारित सोच पर बल देता है, वहीं भारतीय दृष्टि ‘जन’ और जनहित को केंद्र में रखकर शासन की कसौटियों को परखती है। निष्पक्षता, पारदर्शिता, समाज हित में कुछ अच्छा करने की प्रबल इच्छा और ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की भावना इसका मूल है। हमारे यहां शासन का तात्पर्य केवल सत्ता का प्रबंधन नहीं, बल्कि सरोकारों का सशक्त संचालन है।

पाञ्चजन्य की यात्रा भी तो इसी वैचारिक दृष्टिकोण से जुड़ी है। स्वतंत्रता पाने से पहले समाज के अग्रदूतों यह भाव रहता था कि जन जागरण करना है तो अखबार निकालें, पत्रिकाएं निकालें। लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद संभवत: बहुत से लोगों को लगा कि अब इनकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि स्वतंत्रता तो मिल चुकी है। ऐसे दौर में जब स्वतंत्रता के बाद अधिकांश पत्र-पत्रिकाएं बंद हो रही थीं, तब पं. दीनदयाल उपाध्याय ने इस पत्रिका की नींव रखी। देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी जी जैसे युगपुरुष ने तब पाञ्चजन्य का संपादकीय नेतृत्व किया।

यह केवल एक प्रकाशन भर नहीं था, यह राष्ट्र के प्रति सरोकार का स्वर था। इसीलिए जब बाकी मीडिया संस्थान महज शासन की नीतियों या राजनीति के विवादों तक सीमित रहते हैं, तब पाञ्चजन्य भारतीय संस्कृति, परंपरा और मूल्यों की बात करता है। संस्कार और प्रबोधन की बात करता है। भारत की पत्रकारिता में पाञ्चजन्य ने जो वैचारिक यात्रा प्रारंभ की, वह आज भी जीवंत है। आज जब मीडिया शुष्क प्रबंधन और संक्रमण की तरह फैलने वाले ‘वायरल‘ समाचारों की कसौटियों पर उपलब्धियों को आंकता है, तब पाञ्चजन्य उन विमर्शों को आकार देता है जो सामान्यतः चर्चा में नहीं होते, जैसे-भारत की आत्मा क्या है ? क्या उसका प्रतिबिंब शासन में दिखता है ? क्या हमारी संस्कृति, परंपरा, आचार और व्यवहार की छवि सुशासन में उभरती है?

राष्ट्रीय स्तर के वृहद विमर्श आयोजन की श्रृंखला में इस वर्ष पहली बार पाञ्चजन्य ने उत्कल भूमि पर कदम रखा है और यह प्रवेश मात्र भौगोलिक नहीं, एक वैचारिक यात्रा की अगली कड़ी है। पाञ्चजन्य आज देश की सबसे अधिक बिकने और पढ़ी जाने वाली पत्रिकाओं में से एक है। यह सिर्फ पत्रिका के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा वैचारिक परिवार के रूप में विकसित हो रही है। फेसबुक पर लाखों लोग इससे जुड़े हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के समय इसकी डिजिटल पहुंच नए कीर्तिमान रच रही थी। यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय विचारों की स्वीकार्यता कितनी व्यापक है।

इस संवाद के माध्यम से जहां एक ओर पाञ्चजन्य की विचार यात्रा का नया सोपान तय हुआ वहीं यह समझने का प्रयास भी हुआ कि भारत में हर विषय में विवाद और राजनीति खोजने वाली दृष्टि राष्ट्र, समाज और संगठन को कैसे देखती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के प्रसंग में भी यह विमर्श महत्वपूर्ण था। यह मंच केवल विचार का नहीं, बल्कि नीतियों और उनके प्रभाव की गहराई तक जाकर विवेचन करने का था। यह आयोजन सुशासन, समाज और संस्कृति के त्रिवेणी संगम के रूप में बौद्धिक तरंगें दर्ज करा गया।

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