संस्कृत: भाषा विवाद का समाधान, RSS सरसंघचालक के संदेश के बड़े मायने
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संस्कृत: भाषा विवाद का समाधान, भारत की ‘आत्मा’ की पहचान

भारत में भाषायी विवाद खड़े करनेवालों के लिए आएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का सन्‍देश। संस्‍कृत को 'संवाद' की भाषा बनाना ज़रूरी है।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Aug 1, 2025, 08:07 pm IST
inभारत
भाषायी विवाद खड़े करनेवालों के लिए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का सन्‍देश

भाषायी विवाद खड़े करनेवालों के लिए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का सन्‍देश

भारत में भाषायी विवाद किसी न किसी रूप में खड़ा करना कोई नया मुद्दा नहीं है, अक्सर हिंदी बनाम गैर-हिंदी भाषाओं, दक्षिण बनाम उत्तर, अंग्रेजी बनाम स्थानीय भाषाओं, जैसी बहसें उठती रहती हैं। लेकिन अभी जब से केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति में “त्रिभाषा फार्मूला” लेकर आई है, तब से यह देखने में आ रहा है कि देश के कई गैर भाषायी राज्‍यों में अंग्रेजी का विरोध नहीं हो रहा, जोकि एक विदेशी भाषा है, लेकिन हिन्‍दी भाषा का लगातार विरोध हो रहा है। यह स्‍थ‍िति निश्‍चित ही देश के एक बड़े समुदाय की गुलाम मानसिकता को भी दर्शाती है, जिन्‍हें अपने “स्‍वदेश” की भाषा प्‍यारी नहीं, विदेशी ‘अंग्रेजी’ भाषा से प्रेम है। अब ऐसे में समाधान क्‍या हो, तब राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भावगत जी ने जो रास्‍ता सुझाया है, वास्‍तव में देश को उस मार्ग पर चलने की आवश्‍यकता है। यह हमारी संस्‍कृति के संरक्षण के लिए भी सही है और भाषायी विवाद को समाप्‍त करने की दिशा में भी एक स्‍थायी हल है।

संस्‍कृत के पास है- न्यायसंगत, सांस्कृतिक और व्यावहारिक समाधान

एक दृश्य मध्‍य प्रदेश विधानसभा में देखने को मिला। भाजपा विधायक अभिलाष पांडे ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से संस्कृत में प्रश्न पूछा और स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने संस्कृत भाषा में उत्तर दिया। विधानसभा में जब ये संवाद चल रहा था तो सदन में मौजूद सभी सदस्‍यों एवं मंत्रियों ने करतल ध्‍वनि से स्‍वागत किया। तात्‍पर्य भाषायी विवाद के बीच जब हम इस परिप्रेक्ष्य में “संस्‍कृत” को देखते हैं, तो यह भाषा इस विवाद का न्यायसंगत, सांस्कृतिक और व्यावहारिक स्तर पर एक संभावित समाधान प्रस्तुत करती हुई दिखाई देती है। इसीलिए डॉ. भागवत संस्कृत भाषा के महत्व पर जोर देते हुए कहते हैं, यह भारतीय भाषाओं की जड़ है और इसे संवाद की भाषा बनाना बेहद जरूरी है। नागपुर के कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय में उन्‍होंने आज इस विषय पर विस्‍तार से प्रकाश डाला। उनका कहना है, “संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और चेतना की वाहक है। यह भारत की सभी भाषाओं की जड़ है।” संस्कृत को केवल समझना ही नहीं, बल्कि बोलने में भी दक्षता हासिल करनी चाहिए।

वे यह भी समझाते हैं कि “स्वत्व भौतिक नहीं, बल्कि यह हमारी वैचारिक और सांस्कृतिक पहचान है, और इसे व्यक्त करने के लिए भाषा का माध्यम आवश्यक है। संस्कृत को समझना, वास्तव में भारत को समझने के समान है।”भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं, बल्कि ‘भाव’ है, और हमारी असली पहचान भी हमारी भाषा से जुड़ी होती है। यहां भागवत जी यह भी स्‍पष्‍ट करना नहीं भूले हैं, “संस्कृत को संवाद की भाषा बनाने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज का सहयोग भी आवश्यक है।”

‘संस्‍कृत’ को विदेशी विद्वानों ने भी सबसे वैज्ञानिक भाषा स्‍वीकारा

वस्‍तुत: देखा जाए तो डॉ. मोहन भागवत का यह संदेश सिर्फ एक भाषण नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान को पुनः जागृत करने का आह्वान भी है । वे सही कह रहे हैं कि जो व्यक्ति संस्कृत जानता है, वह भारत को गहराई से समझ सकता है और उसकी आत्मा तक पहुंच सकता है। फिर यह कार्य सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि संस्कृत में निहित ज्ञान और दृष्टिकोण ने सदियों से मानवता को दिशा दी है। यही कारण है जो संस्कृत भाषा को विदेशी विद्वानों ने भी विश्व की सबसे वैज्ञानिक और पूर्ण भाषा होना स्‍वीकार किया है। जर्मनी के फ्रेडरिक श्लेगेल ने कहा कि “संस्कृत की व्याकरणिक रचना इतनी वैज्ञानिक है कि उसकी तुलना किसी अन्य भाषा से नहीं की जा सकती।”

दुनिया के कई विद्वान वर्षों रहे भारत, सीखा संस्‍कृत ग्रंथों में निहित ज्ञान

कई विद्वानों ने वर्षों भारत में रहकर यहां के धर्म, दर्शन, कला, भाषा, और संस्कृति का गहन अध्ययन किया और अपने ग्रंथों के माध्यम से विश्व को भारत की आत्मा से परिचित कराया। फ्रांस के रोमाँ रोलाँ ने स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण पर जीवनियां लिखीं, जिनमें उन्होंने भारत को एक जीवित आत्मा की संज्ञा दी। एनी बेसेंट ने लिखती हैं, “भारत ने दुनिया को अध्यात्म सिखाया है। उसका धर्म केवल पूजा नहीं, एक जीवन-दर्शन है जो सभी प्राणियों को अपनाता है।” उन्होंने भारत को “एक जीवंत राष्ट्र की आत्मा” कहकर संबोधित किया था ।

पश्चिम ने भारत से बहुत कुछ सीखा

अमेरिका के हेनरी डेविड थोरो और राल्फ वाल्डो इमर्सन ने वेदांत और उपनिषदों से प्रेरित होकर अपने लेखन को एक नई आध्यात्मिक दिशा दी। स्विट्ज़रलैंड के मनोविश्लेषक कार्ल युंग ने योग और तंत्र को मानव चेतना के विश्लेषण में अत्यंत उपयोगी माना और कहा कि “भारत का योग न केवल आत्मिक मुक्ति का मार्ग है, बल्कि मनोविज्ञान का भी अगला चरण है।” इस तरह के इतिहास में इसके कई जीवंत उदाहरण मौजूद हैं। वहीं सर विलियम जोन्स ने 18वीं सदी में कालिदास के “अभिज्ञान शाकुंतलम” का अंग्रेज़ी में अनुवाद कर यूरोप को भारतीय साहित्य से परिचित कराया था। अमेरिका के प्रसिद्ध इतिहासकार विल ड्यूरैंट ने अपनी चर्चित पुस्तक “The Story of Civilization” में लिखा, “भारत मानव सभ्यता की जननी है। वहां की संस्कृति, कला, धर्म और दर्शन अद्वितीय हैं। पश्चिम ने भारत से बहुत कुछ सीखा है।” वे यह भी कहते हैं कि “संस्कृत सभी भाषाओं की माता है, और भारत ने ही सबसे पहले मानवता को धर्म, दर्शन और विज्ञान सिखाया।” अमेरिका के ही महान साहित्यकार मार्क ट्वेन ने कहा, “भारत मानव इतिहास की पालना है, भाषा की जननी और परंपरा की माँ है। इतिहास, परंपरा और संस्कृति में भारत का कोई सानी नहीं।”

भारत की धार्मिक परंपराएं, बाइबिल और मिस्र की सभ्यताओं से भी प्राचीन और उन्नत

फ्रांसीसी लेखक एलेन दानिलो ने भारतीय संगीत, मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला को “चेतना की मूर्त अभिव्यक्ति” कहा। उनकी पुस्तक “The Myths and Gods of India” भारतीय देवी-देवताओं, मंदिरों और पुराणों की गहन व्याख्या करती है। वहीं, फ्रांस के ही लुई जैकोलिओ ने “The Bible in India” में स्पष्ट रूप से लिखा कि भारत की धार्मिक परंपराएँ, बाइबिल और मिस्र की सभ्यताओं से भी प्राचीन और उन्नत हैं। यही नहीं, भारत की शिक्षा प्रणाली और सामाजिक संरचना पर भी विदेशी लेखकों ने अपना मंतव्य दिया है। कोएनराड एल्स्ट जैसे बेल्जियम के विद्वान ने अपनी पुस्तक “Decolonizing the Hindu Mind” में भारतीय इतिहास को औपनिवेशिक दृष्टिकोण से मुक्त करने का आह्वान किया और कहा कि “भारत की आत्मा को केवल धर्म से नहीं, उसकी सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ा जाना चाहिए।”

मानव सभ्‍यता के लिए जो कुछ भी महत्वपूर्ण है, वह भारत से आया

भारत के विषय में फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर ने कहा था, “जो कुछ भी महत्वपूर्ण है, वह भारत से ही आया है। भारत ने ही सभ्यता की नींव रखी।” इसी बात को कई आधुनिक शोधकर्ताओं ने अपने डीएनए अध्ययन, गणित, खगोल और वैदिक विज्ञान से सिद्ध किया है कि भारत न केवल आध्यात्मिक, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अग्रदूत रहा है। इस समृद्ध परंपरा की पुनः प्रतिष्ठा आज के भारत के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही सामयिक भी है। नई पीढ़ी जब अपने अतीत को विदेशी विद्वानों की आंखों से देखती है, तब उसे अपनी जड़ों की गहराई का एहसास होता है। यह केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि चेतना की एक नई शुरुआत है; एक आत्मबोध, जो भारत को फिर से विश्वगुरु बना सकता है।

पश्चिम में जहां ज्ञान को पूंजी माना गया, वहीं भारत में ज्ञान को धर्म, मोक्ष और मानव कल्याण का माध्यम माना गया। यही कारण था कि भारत की शिक्षा प्रणाली का आधार ‘नैतिकता, अनुशासन और सार्वभौमिक कल्याण’ है। आज जबकि भारत अपने सांस्कृतिक गौरव को फिर से पहचानने की ओर अग्रसर है, यह जानना आवश्यक है कि इस संस्कृति की महत्ता केवल भारतीयों ने नहीं, बल्कि दुनिया भर के विद्वानों ने स्वीकार की है। यह सभ्यता केवल प्राचीन नहीं, ‘प्रासंगिक’ भी है, जोकि विज्ञान, दर्शन, कला, भाषा और आध्यात्मिकता में आज भी दुनिया का मार्गदर्शन कर सकती है। विद्वान Will Durant सही कहते हैं कि “यदि भारत ने वेदों को जन्म न दिया होता, तो आज की दुनिया बहुत गरीब होती – आध्यात्मिक रूप से, बौद्धिक रूप से और नैतिक रूप से।”

पश्चिम आदिम अवस्था में और भारत में वेदों का उच्चारण

इस संदर्भ में कहना यह भी होगा कि जब पश्चिमी जगत आदिम अवस्था में था, तब भारत में वेदों का उच्चारण हो रहा था, योग का अभ्यास किया जा रहा था, उपनिषदों में आत्मा और ब्रह्म की गूढ़ व्याख्याएँ की जा रही थीं, और कला-संस्कृति अपने चरम पर थी। यह कोई मिथक नहीं, बल्कि उन दर्जनों विदेशी विद्वानों की स्वीकारोक्ति है, जिन्होंने भारत को न केवल विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता माना, बल्कि यह भी बताया कि मानवता को नैतिकता, धर्म, दर्शन और विज्ञान की दीक्षा भारत ने ही दी और यह सभी कुछ जो संभव हो पाया वह संस्‍कृत भाषा के कारण हुआ। इसलिए आज जो राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत कह रहे हैं, उसके मर्म को समझकर देश के सभी राज्‍यों को अपनी शिक्षा नीति बनानी चाहिए, जिसमें कि संस्‍कृत को उसमें महत्‍वपूर्ण स्‍थान मिले, ताकि भारत का भविष्‍य अपने आप को वास्‍तविक रूप से होने के अर्थ में जान पाए और उसके कार्य भी फिर उसी दिशा में आगे बढ़ें।

 

Topics: भाषा विवादसंवाद की भाषामिस्र की सभ्यतासरसंघचालकसंस्कृतआरएसएस समाचारडॉ. मोहन भागवतबाइबिलभारत की भाषाभारत की सभ्यतापाञ्चजन्य विशेष
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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