चंदा कोचर प्रकरण ने भारतीय बैंकिंग व्यवस्था और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में नैतिकता के संकट को उजागर कर दिया है। कभी उन्हें सशक्त महिला नेतृत्व और बैंकिंग सुधार की मिसाल के रूप में देखा जाता था। मीडिया समूहों ने उन्हें श्रेष्ठ व्यक्तियों की सूचियों में शामिल किया, बड़े उद्योगपतियों और राजनेताओं ने उनकी सफलता की प्रशंसा की। लेकिन जब आईसीआईसीआई बैंक से 300 करोड़ रुपए का ऋण जारी करने के बदले 64 करोड़ रुपए की रिश्वत लेने का आरोप सामने आया, तो यह पूरा तंत्र सवालों के घेरे में आ गया।

कोचर का वह प्रसिद्ध पत्र, जिसमें उन्होंने बेटी को ”वर्क हार्ड, डोंट टेक शॉर्टकट्स” जैसे नैतिक संदेश दिए थे, आज एक विरोधाभास बन गया है। यह प्रकरण दिखाता है कि कैसे व्यक्तिगत और संस्थागत नैतिकता की कमजोरी पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता को ध्वस्त कर सकती है। बैंकिंग क्षेत्र में यह घटना न केवल एक बड़े घोटाले की कहानी है, बल्कि यह बताती है कि वर्षों से व्याप्त भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी किस तरह जनता का विश्वास तोड़ सकती है। इस गिरावट के बहुआयामी कारण हैं, बैंकिंग तंत्र के सुराख इस प्रकार की आशंकाओं को और बढ़ा देते हैं।
भारतीय बैंकिंग तंत्र की बड़ी समस्याओं में अघोषित पूंजी का प्रवाह, राजनीतिक हस्तक्षेप और अवैध ऋण वितरण प्रमुख हैं। अध्ययन बताते हैं कि 1983 के बाद से अपराध और राजनीति के आपसी गठजोड़ में इस पैसे की भूमिका बढ़ी है। ‘टैक्स हेवन’ देशों में व्यवस्थित नेटवर्क इसे सफेद धन में बदलकर भारत लौटाता है।
अब यह स्पष्ट है कि आईसीआईसीआई बैंक जैसे निजी बैंकों में भी बड़े पदों पर राजनीतिक और व्यावसायिक दबाव बनाए जाते रहे हैं। बैंकिंग बोर्ड और प्रबंधन में जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी ने इस समस्या को और गंभीर बनाया है। यह केवल चंदा कोचर का व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि एक बड़ी संस्थागत विफलता का संकेत है।
केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का अनुमानित कालाधन सकल घरेलू उत्पाद का 20% से अधिक हो सकता है। 2015 में काला धन (अघोषित विदेशी आय और परिसंपत्तियां) तथा कराधान कानून बनाया गया जो 1 जुलाई, 2015 से प्रभावी है। इसके काफी सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
सरकार ने जनधन योजना, आधार और डिजिटल भुगतान के जरिए नकद लेन-देन को कम करने का प्रयास किया, जिससे काले धन पर रोक लगाई जा सके। किंतु आज कुछ राज्यों में यूपीआई के विरुद्ध ही माहौल बनाने का राजनीतिक खेल शुरू हो गया है जिसे मीडिया में नासमझी में ही सही, भोले-भाले लोगों पर टैक्स की मार और भय बताकर बढ़ावा भी दिया जा रहा है। इस तरह के अधूरे ज्ञान और आर्थिक अनियमितताओं की रोकथाम के प्रयासों को पलीता लगाने के खेल पर लगाम लगाना जरूरी है। यह नैतिकतापूर्ण आर्थिक तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है।
तो फिर नैतिकता और पारदर्शिता की राह कैसे निकलेगी! चंदा कोचर प्रकरण बताता है कि नैतिकता की कमी व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तरों पर गंभीर परिणाम देती है। बैंकिंग गवर्नेंस को सुधारने के लिए निम्नलिखित कदम जरूरी हैं:
कॉर्पोरेट गवर्नेंस में सुधार – बोर्ड और प्रबंधन की नियुक्तियों में पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय हो।
कानूनी सख्ती–अवैध ऋण वितरण और रिश्वतखोरी पर कठोर दंड और तेज न्यायिक प्रक्रिया हो।
देेश में अघोषित पूंजी के प्रवाह का समाधान केवल कानूनी या तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि एक नैतिक चुनौती भी है। चंदा कोचर प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि आर्थिक संस्थानों की नींव केवल वित्तीय नियमों से नहीं, बल्कि नैतिकता और पारदर्शिता से भी मजबूत होती है
डिजिटल निगरानी–डिजिटल लेन-देन और फिनटेक समाधानों के जरिए निगरानी को मजबूत किया जाए।
नैतिक नेतृत्व का चयन – ऐसे नेताओं को सामने लाना जो न केवल व्यावसायिक रूप से सक्षम हों, बल्कि नैतिकता के पैमानों पर भी खरे उतरें।
देेश में अघोषित पूंजी के प्रवाह का समाधान केवल कानूनी या तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि एक नैतिक चुनौती भी है। चंदा कोचर प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि आर्थिक संस्थानों की नींव केवल वित्तीय नियमों से नहीं, बल्कि नैतिकता और पारदर्शिता से भी मजबूत होती है।
भविष्य में सुधार के लिए डिजिटल अर्थव्यवस्था, कड़े कर कानून और पारदर्शी कॉर्पोरेट गवर्नेंस का मेल जरूरी है। जनता का भरोसा तभी लौटेगा जब वित्तीय संस्थान और सरकार निष्ठा, उत्तरदायित्व और पारदर्शिता की नई परंपरा स्थापित करेंगे। यही नैतिकता की पुनर्स्थापना की असली राह है।
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