अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस 2025: बाघों के संरक्षण की चुनौतियां और भारत की उपलब्धियां
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अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस 2025: बाघों के संरक्षण की चुनौतियां और भारत की उपलब्धियां

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस 2025 पर जानें बाघों के संरक्षण की चुनौतियों, भारत की प्रोजेक्ट टाइगर जैसी पहलों की सफलता और पारिस्थितिकी तंत्र में बाघों के महत्व के बारे में।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Jul 29, 2025, 12:06 pm IST
in विश्लेषण
World tiger day-2025

प्रतीकात्मक तस्वीर

बाघों के संरक्षण और उनके अस्तित्व को बचाने के लिए हर वर्ष 29 जुलाई को ‘अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस’ मनाया जाता है, जो न केवल इस सुंदर और शक्तिशाली प्राणी के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है बल्कि यह भी बताता है कि यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो बाघ जैसी करिश्माई प्रजाति सदा के लिए पृथ्वी से लुप्त हो सकती है। बाघ केवल ताकत, सौंदर्य और साहस का प्रतीक नहीं है बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने वाला एक प्रमुख शिकारी है, जिसकी उपस्थिति पूरे जैविक तंत्र को स्थायित्व और शक्ति प्रदान करती है। दुर्भाग्यवश, बाघों की यह अहमियत मानव गतिविधियों की निरंतर बढ़ती आक्रामकता के सामने लगातार कमजोर होती जा रही है और कई देशों में तो यह विलुप्ति की कगार तक पहुंच चुका है।

1970 में शुरू हुआ बाग संरक्षण का प्रयास

बाघों के संरक्षण का पहला वैश्विक प्रयास 1970 के दशक में हुआ था, जब 1973 में ‘साइट्स’ संधि पर हस्ताक्षर हुए लेकिन इस दिशा में वास्तविक वैश्विक एकजुटता 2010 के सेंट पीटर्सबर्ग बाघ शिखर सम्मेलन में देखने को मिली, जब बाघ रेंज वाले 13 देशों ने यह संकल्प लिया कि वर्ष 2022 तक बाघों की संख्या दोगुनी की जाएगी। भारत, बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, चीन, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, नेपाल, रूस, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देश इस वैश्विक प्रयास में शामिल थे।

विश्व के 75 फीसदी बाघ भारत में

परंतु इस मिशन में केवल भारत ही ऐसा देश साबित हुआ है, जिसने इस लक्ष्य को न केवल पूरा किया बल्कि दुनिया को यह दिखाया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक प्रबंधन और समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल कैसे विलुप्त होती प्रजातियों को पुनर्जीवित कर सकते हैं। आज भारत ही अकेला देश है, जहां विश्व के कुल बचे हुए बाघों का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है और यही कारण है कि भारत को बाघों की आखिरी बड़ी उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है।

खतरे में बाघों का अस्तित्व

बाघों के समक्ष संकट अनेक हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ती जनसंख्या के कारण बाघों के प्राकृतिक आवास का तेजी से सिकुड़ना, उनके शरीर के अंगों के लिए अवैध शिकार, तस्करी, जलवायु परिवर्तन और मनुष्य-बाघ संघर्ष ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो इनकी घटती संख्या के लिए जिम्मेदार हैं। बाघों की खाल, हड्डियां और अन्य अंग पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और सजावटी वस्तुओं के रूप में अवैध बाजारों में बहुत ऊंची कीमतों पर बिकते हैं, जिससे इनका शिकार एक संगठित आपराधिक उद्योग का हिस्सा बन चुका है। जलवायु परिवर्तन भी एक अप्रत्यक्ष लेकिन गंभीर खतरा बन चुका है, जो विशेषकर सुंदरबन जैसे मैंग्रोव आवासों में रहने वाले बाघों को प्रभावित कर रहा है। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और तापमान में बदलाव इन बाघों के रहने और शिकार करने के क्षेत्रों को नष्ट कर रहे हैं, जिससे उनके अस्तित्व पर खतरा गहराता जा रहा है।

इसे भी पढ़ें: UP हिंदू कन्वर्जन: VHP ने इसे बताया गहरी साजिश, संगठित तरीके से चलाया जा रहा है नेटवर्क

बाघों की अनूठी विशेषता यह है कि वे अनेक भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों में स्वयं को ढ़ालने में सक्षम हैं। ये घने वर्षा वनों, शुष्क जंगलों, बर्फीले क्षेत्रों, दलदली मैंग्रोव जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और समतल घास के मैदानों तक में रह सकते हैं लेकिन विडंबना यह है कि इतनी अनुकूलन क्षमता के बावजूद 20वीं सदी की शुरुआत से अब तक इनकी वैश्विक आबादी में 95 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ चुकी है। एक सदी पहले जहां पूरी दुनिया में एक लाख से अधिक बाघ थे, वहीं आज यह संख्या घटकर मात्र 4-5 हजार तक सीमित रह गई है। ‘विश्व वन्यजीव कोष’ की रिपोर्ट के अनुसार, अब बाघों को प्राकृतिक आवास में केवल भारत, नेपाल, भूटान, रूस और कुछेक अन्य देशों में ही देखा जा सकता है। बाकी देशों में बाघ या तो पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं या फिर उनकी मौजूदगी अत्यंत सीमित हो गई है।

यदि बाघ पृथ्वी से विलुप्त हो जाते हैं तो इसका असर केवल एक प्रजाति के अंत तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि समूचे पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। बाघ अपने क्षेत्र के सबसे ऊंचे शिकारी होते हैं और उनका अस्तित्व जंगलों में शिकार और शिकारियों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक होता है। जब यह संतुलन बिगड़ता है तो इससे अन्य प्रजातियों की संख्या असंतुलित हो सकती है, जिससे वनस्पति और पारिस्थितिक ढांचे पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, बाघों की अनुपस्थिति में हिरण या जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीवों की संख्या अत्यधिक बढ़ सकती है, जो जंगल की वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाते हैं और खाद्य श्रृंखला में असंतुलन पैदा करते हैं।

बाघ संरक्षण के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम

भारत ने बाघ संरक्षण के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। वर्ष 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत हुई थी, जो विश्व का सबसे बड़ा और सबसे पुराना बाघ संरक्षण कार्यक्रम है। इस परियोजना के प्रारंभ में केवल नौ टाइगर रिजर्व थे लेकिन आज इनकी संख्या बढ़कर 55 हो चुकी है और ये भारत के कुल 78735 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को कवर करते हैं। इन अभयारण्यों में बाघों के साथ-साथ जैव विविधता के अनेक अन्य स्वरूपों को भी सुरक्षित संरक्षण प्रदान किया गया है।

1972 में जब पहली बाघ जनगणना हुई थी, तब भारत में केवल 1827 बाघ होने का अनुमान लगाया गया था लेकिन 2018 तक यह संख्या बढ़कर 2967 और 2022 में 3682 हो गई, जो यह दर्शाता है कि संरक्षण की दिशा में भारत की नीतियां और प्रयास सही दिशा में हैं। एनटीसीए, डब्ल्यूआईआई, राज्य वन विभागों और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों के समन्वय से हर चार वर्ष में होने वाली बाघ गणना, भू-आधारित और कैमरा ट्रैप पद्धति से की जाती है, जो दुनिया की सबसे बड़ी वन्यजीव गणना प्रणाली मानी जाती है।

उपलब्धियों के बीच चिंताजनक आंकड़े भी 

हालांकि इन उपलब्धियों के बीच कुछ चिंताजनक आंकड़े भी सामने आते हैं। वर्ष 2019 से 2022 के बीच भले ही बाघों की संख्या में 715 की वृद्धि दर्ज की गई हो लेकिन इसी अवधि में 628 बाघों की मृत्यु भी हुई, जो कि एक बहुत बड़ा आंकड़ा है। ये मौतें प्राकृतिक कारणों, आपसी संघर्षों, बीमारियों, मानव हस्तक्षेप और सबसे अहम, अवैध शिकार के कारण हुई हैं। यह स्पष्ट करता है कि यदि इन मौतों को रोका जा सकता तो भारत में बाघों की आबादी में और बड़ी वृद्धि संभव थी। इस अवधि में 349 लोगों की भी मौत बाघों के हमलों के कारण हुई, जो यह दर्शाता है कि बाघ और मानव का संघर्ष कितना गंभीर रूप ले चुका है। यह संघर्ष तब और बढ़ जाता है, जब बाघों के प्राकृतिक आवासों में अतिक्रमण होता है या जब मानव बस्तियां जंगल के बहुत निकट पहुंच जाती हैं। प्रायः देखा गया है कि भोजन या सुरक्षित क्षेत्र की तलाश में बाघ गांवों में प्रवेश करते हैं और यह आमने-सामने की टकराहट कभी-कभी घातक रूप ले लेती है।

सामाजिक भागीदारी जरूरी

बाघों के संरक्षण की दिशा में सरकार द्वारा अनेक कानून और योजनाएं लागू की गई हैं लेकिन केवल सरकारी प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। जब तक समाज की भागीदारी, जन जागरूकता और स्थानीय समुदायों का सहयोग नहीं मिलेगा, तब तक इन प्रयासों को टिकाऊ सफलता नहीं मिल सकती। आज आवश्यकता इस बात की है कि बाघों के संरक्षण को केवल वन विभागों की जिम्मेदारी न मानकर इसे नागरिक दायित्व के रूप में देखा जाए। बच्चों में पर्यावरणीय शिक्षा को बढ़ावा देना, स्थानीय समुदायों को रोजगार के वैकल्पिक साधन प्रदान करना ताकि वे शिकार जैसे अवैध कार्यों से दूर रहें, और संरक्षण क्षेत्र के आसपास के लोगों को बाघों के महत्व के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है।

तकनीक की मदद से भी बाघों के संरक्षण को और प्रभावी बनाया जा सकता है। रिमोट सेंसिंग, जीआईएस आधारित निगरानी, ड्रोन सर्विलांस, कैमरा ट्रैपिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करके बाघों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। साथ ही, बाघों के स्वास्थ्य की नियमित जांच, उनके जीन पूल का संरक्षण और प्रजनन केंद्रों का निर्माण भी लंबे समय में कारगर उपाय हो सकते हैं।

बाघों का संरक्षण वैश्विक जिम्मेदारी

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलु यह भी है कि बाघों के संरक्षण को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह केवल भारत की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि उन सभी देशों की नैतिक और पारिस्थितिक जिम्मेदारी बनती है, जहां कभी बाघ पाए जाते थे या अब भी सीमित संख्या में मौजूद हैं। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, सूचनाओं का आदान-प्रदान और साझा रणनीतियां ही इस संकट का टिकाऊ समाधान प्रस्तुत कर सकती हैं। इसके अतिरिक्त, बाघों के अंगों के अंतर्राष्ट्रीय अवैध व्यापार को रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर कठोर कानूनों के क्रियान्वयन की आवश्यकता है ताकि इस संगठित अपराध के नेटवर्क को ध्वस्त किया जा सके।

बाघों के संरक्षण का अर्थ केवल एक प्रजाति को बचाना नहीं है बल्कि यह पृथ्वी के पूरे पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित और स्वस्थ बनाए रखने का प्रयास है। यदि बाघ सुरक्षित हैं तो इसका सीधा संकेत यह है कि जंगल स्वस्थ हैं, जल स्रोत संरक्षित हैं, जैव विविधता समृद्ध है और अंततः मानव जीवन भी सुरक्षित है। अतः विश्व बाघ दिवस केवल एक प्रतीकात्मक दिवस नहीं बल्कि संकल्प लेने का अवसर है कि हम इस अद्भुत जीव के संरक्षण हेतु हरसंभव प्रयास करें और भावी पीढ़ियों के लिए एक संतुलित, समृद्ध और जैव विविध पृथ्वी सुनिश्चित करें।

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के स्वयं के विचार हैं। आवश्यक नहीं कि पाञ्चजन्य उनसे सहमत हो)

Topics: बाघ संरक्षणजलवायु परिवर्तनअंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवसClimate changeअवैध शिकारवन्यजीव संरक्षणभारत में बाघपारिस्थितिकी तंत्रPoachingproject tigerTigers in Indiaप्रोजेक्ट टाइगरTiger ConservationEcosystemInternational Tiger DayWildlife Conservation
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