यूरोप, जिसे कभी अपने सुहावने मौसम, ठंडी हवाओं और हरी-भरी वादियों के लिए जाना जाता था, आज एक अभूतपूर्व प्राकृतिक संकट से जूझ रहा है। महाद्वीप के कई देश इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की चपेट में हैं। पारा 40 से 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है, जिसने न केवल आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि एक भयानक मानवीय त्रासदी को भी जन्म दिया है। इस जानलेवा गर्मी के कारण अब तक 1,300 से अधिक मौतें हो चुकी हैं और यह आंकड़ा निरंतर बढ़ रहा है।
चिंता का विषय है कि संकट बढ़ता ही जा रहा है। पश्चिमी यूरोप को झुलसाने के बाद अब यह जानलेवा गर्मी तेजी से यूरोप के पूर्वी हिस्सों की ओर बढ़ रही है। पोलैंड, हंगरी, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे देशों में भी अब ‘रेड अलर्ट’ जारी कर दिया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रमुख टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने हाल ही में गर्मी के कारण होने वाले शारीरिक तनाव को ‘साइलेंट किलर’ करार दिया है। उन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण और कटु सत्य की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करते हुए स्पष्ट किया है, “यूरोपीय घर, कार्यस्थल और स्कूल इस तरह के अत्यधिक तापमान को सहने के हिसाब से नहीं बनाए गए थे।”
ऐतिहासिक रूप से यूरोपीय देशों का बुनियादी ढांचा ठंड से बचने और गर्मी को अंदर रोकने के लिए डिजाइन किया गया था। वहां के भवनों में ‘वेंटिलेशन’ और ‘एयर कंडीशनिंग’ की व्यवस्था भारत या मध्य-पूर्व जैसे गर्म देशों की तुलना में बहुत सीमित है। जब बाहर का तापमान 40 डिग्री से ऊपर जाता है, तो कंक्रीट के ये भवन ‘ओवन’ की तरह काम करने लगते हैं। रात के समय भी तापमान कम नहीं होता, जिससे मानवीय शरीर को सामान्य होने का अवसर नहीं मिलता। यह शारीरिक तनाव विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
सामान्यतः लोग अत्यधिक गर्मी को एक सामान्य ‘मौसमी चक्र’ मानकर अनदेखा कर देते हैं, परंतु पर्यावरण वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों का स्पष्ट रूप से कहना है कि यह केवल एक सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है। यह मानव-जनित जलवायु परिवर्तन का एक अत्यंत गंभीर और प्रत्यक्ष परिणाम है।
धरती का तापमान पिछले कुछ दशकों में जितनी तेजी से बढ़ा है, उसने मौसम के पूरे संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है। जेट स्ट्रीम (ऊपरी वायुमंडल में 20,000 से 50,000 फीट की ऊंचाई पर पश्चिम से पूर्व की ओर बहुत तेज गति से बहने वाली संकरी हवा की धाराएं) के कमजोर पड़ने और वायुमंडलीय दबाव में आए बदलावों के कारण ‘हीट डोम’ (एक मौसम संबंधी घटना, जिसमें वायुमंडल में उच्च दबाव का एक ऐसा क्षेत्र बन जाता है, जो गर्म हवा को किसी ढक्कन या गुंबद की तरह एक ही जगह पर फंसा लेता है) जैसी स्थितियां बन रही हैं, जो गर्म हवाओं को एक ही जगह पर कई सप्ताह तक कैद कर देती हैं।
बहुआयामी दुष्प्रभाव
यूरोप का यह संकट केवल स्वास्थ्य प्रभाव तक सीमित नहीं है, इसके बहुआयामी दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं-
कृषि संकट : भीषण गर्मी और सूखे के कारण यूरोप में फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। नदियों का जलस्तर घटने से सिंचाई व्यवस्था ठप हो रही है, जिससे आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा का संकट पैदा हो सकता है।
ऊर्जा संकट : एयर कंडीशनर और कूलिंग सिस्टम की मांग अचानक बढ़ने से बिजली ग्रिडों पर भारी दबाव है। कई देशों में पावर फेलियर (ब्लैक आउट) का खतरा मंडरा रहा है।
जंगल की आग : अत्यधिक गर्मी और सूखे के कारण स्पेन, ग्रीस और पुर्तगाल जैसे देशों के जंगलों में भयानक आग लग रही है, जिससे अमूल्य जैव विविधता नष्ट हो रही है। हाल ही मेें वेनेजुआ में आया भूकंप इन्हीं कारणों का प्रभाव और परिणाम है।
ऐसे बच सकते हैं
यूरोप की यह स्थिति पूरी दुनिया के लिए चेतावनी की घंटी है। यदि वैश्विक समुदाय ने अभी भी कड़े कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में यह स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है। इसके समाधान के लिए निम्नलिखित रणनीतियों पर तुरंत काम करने की आवश्यकता है-
- ‘ऊर्जा परिवर्तन- जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को तुरंत खत्म कर सौर, पवन और जल ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों को अपनाना होगा।
- ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर-भविष्य की इमारतों को ‘कूल रूफ’ तकनीक, बेहतर वेंटिलेशन और हरित वास्तुकला के आधार पर डिजाइन करना होगा।
- वनीकरण- शहरों के भीतर ‘मियावाकी पद्धति’ जैसी तकनीकों से लघु-जंगल विकसित करने होंगे, ताकि ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव को कम किया जा सके।
- नीतिगत बदलाव-पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों को सख्ती से लागू करना, कार्बन उत्सर्जन पर भारी जुर्माना लगाना होगा।
भारत के लिए नई बात नहीं
यूरोप का यह संकट भारत के लिए कोई नई बात नहीं है, बल्कि भारत पिछले कई वर्षों से इस ‘साइलेंट किलर’ का सामना कहीं अधिक बड़े पैमाने पर कर रहा है। भारत की भौगोलिक स्थिति, घनी आबादी और आर्थिक ढांचा इसे ‘हीटवेव’ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाते हैं।
गत वर्षों में भारत के उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भागों में मार्च-अप्रैल से ही तापमान 45° सेल्सियस से 49° सेल्सियस के बीच पहुंचने लगा है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्य हर साल भीषण गर्मी की चपेट में आते हैं। जहां यूरोप के लिए 40° सेल्सियस एक अभूतपूर्व संकट है, वहीं भारत में यह तापमान सामान्य से अधिक दिनों तक बना रहता है, जिससे ‘थर्मल स्ट्रेस’ का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है।
गंभीर चुनौती
भारत के महानगरों में अनियंत्रित शहरीकरण ने ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव को चरम पर पहुंचा दिया है। झुग्गी-बस्तियों और कम आय वाले क्षेत्रों में टिन की छतों और वेंटिलेशन की कमी के कारण घर ‘तंदूर’ जैसे गर्म हो जाते हैं। भारत की एक बहुत बड़ी आबादी (मजदूर, किसान, रेहड़ी-पटरी वाले और डिलीवरी बॉय) सीधे धूप में काम करने को मजबूर है। इनके पास ‘वर्क फ्रॉम होम’ या वातानुकूलित कमरों में बैठने का विकल्प नहीं है, जिससे इन पर जान का खतरा सबसे अधिक रहता है।
भारत ने इस आपदा से निपटने में वैश्विक स्तर पर कुछ बेहतरीन उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं। 2010 की जानलेवा ‘हीटवेव’ के बाद अमदाबाद ने दक्षिण एशिया का पहला ‘हीट एक्शन प्लान’ तैयार किया। इसके अनुसार आरंभिक चेतावनी प्रणाली, कूल रूफ (सफेद रंग की छतें जो गर्मी को परावर्तित करती हैं), और पार्कों व अस्पतालों में विशेष व्यवस्थाएं शामिल की गईं। इस मॉडल ने मौतों के आंकड़ों को भारी कमी के साथ नियंत्रित किया। भारत के 23 से अधिक राज्यों ने अब अपने ‘हीट एक्शन प्लान’ बना लिए हैं, लेकिन इन्हें ग्रामीण स्तर तक प्रभावी ढंग से लागू करना और बिजली ग्रिडों को ‘ब्लैक आउट’ से बचाना एक निरंतर चुनौती बनी हुई है।
चाहे यूरोप की ठंडी वादियों का झुलसना हो या भारत के मैदानों का तपना-जलवायु परिवर्तन का यह सायरन पूरी मानवता के लिए एक समान है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि मानव अधिकारों, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिरता का भी है। यदि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को नहीं रोका गया, तो ‘साइलेंट किलर’ का यह दायरा पूरी पृथ्वी को अपनी चपेट में ले लेगा।


















