असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार 2041 तक असम में हिंदू और मुस्लिम आबादी लगभग बराबर हो जाएगी। उनके वक्तव्य के अनुसार इसके बाद असम मुस्लिम बहुल राज्य बन जाएगा। जम्मू-कश्मीर और लक्षद्वीप के बाद असम तीसरा प्रदेश होगा, जहां हिंदू अल्पसंख्यक होंगे और मुसलमान बहुसंख्यक।
मुस्लिम आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि घुसपैठ का संकेत
जम्मू-कश्मीर और लक्षद्वीप केंद्रशासित प्रदेश हैं, अतएव राज्यों में असम ही प्रतिशत के मामले में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला राज्य है और बना रहेगा।
यह बहुत गंभीर मामला है क्योंकि जिस तेजी से असम में मुसलमानों की आबादी बढ़ी है, वैसा भारत के किसी दूसरे राज्य में कभी नहीं हुआ है। किसी भी धर्म की आबादी अगर सामान्य तरीके से बढ़ती है तो इसमें कोई अतिवादिता नहीं है, लेकिन असम में जिस रफ्तार से मुसलमानों की जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई है, उसे किसी भी लिहाज से सामान्य नहीं कहा जा सकता है।
मुस्लिम आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि और घुसपैठ का संकेत
असम में मुस्लिम जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि बहुत बड़ी घुसपैठ की तरफ इशारा करती है। हकीकत में, असम में मुस्लिम जनसंख्या के विस्फोट के पीछे एक सोची-समझी बहुत बड़ी साजिश महसूस हो रही है। यह साजिश कोई नई नहीं, बल्कि आज़ादी के तत्काल बाद शुरू हो गई थी। इसका लक्ष्य पूरे असम को पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में शामिल करने का था।
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यह साजिश आज भी अनवरत जारी है। अगर बांग्लादेश की जनसंख्या का आकलन करें तो पाते हैं कि वहां की जनसंख्या में वैसी वृद्धि नहीं देखी जा रही है। इसका निहितार्थ है कि बांग्लादेश के लोग अवैध रूप से असम और भारत के अन्य राज्यों में बस रहे हैं।
सरकार की प्रतिक्रिया और अतिक्रमण विरोधी अभियान
असम की भाजपा सरकार इस मामले की गंभीरता को भली-भांति समझती है और इसके समाधान के लिए यथोचित कदम भी उठा रही है। इसी क्रम में हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने पूरे राज्य में वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने का एक बड़ा अभियान छेड़ रखा है। इस अतिक्रमण को रोकना असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान को बचाए रखने के लिए आवश्यक है।
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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार योजनाबद्ध तरीके से राज्य में मुस्लिम आबादी सरकारी और जंगलों की जमीन पर भी कब्जा कर रही है। हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार, अगर यह प्रवृत्ति जारी रही तो 2041 तक असम के मूल हिंदू निवासी अल्पसंख्यक बन सकते हैं। यह बदलाव न केवल आंकड़ों में दिखता है, बल्कि असम के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने पर भी असर डाल रहा है।
31% मुसलमान हो सकते हैं बांग्लादेशी
हिमंत बिस्वा सरमा के अनुसार, असम राज्य की कुल मुस्लिम जनसंख्या में से सिर्फ 3% ही मूल असमिया आबादी है। यानी असम की कुल आबादी में 31% मुसलमान बांग्लादेशी हो सकते हैं। यह राज्य की जनसंख्या का एक तिहाई है।
1951 से 2011 तक मुस्लिम आबादी में वृद्धि का विश्लेषण
असम की जनसंख्या असंतुलन को समझने के लिए 1951 की प्रथम जनगणना से इस ओर विचार करना पड़ेगा। 1951 में असम में मुस्लिम आबादी 22.6% थी। 20 साल बाद 1971 में असम में मुस्लिम आबादी बढ़कर 24.6% हो गई। इसके 20 साल बाद, 1991 में असम में मुसलमानों की संख्या 28.4% हो गई।
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2001 में असम में मुस्लिम आबादी बढ़कर 31% हो गई। 2011 की जनगणना में असम में मुसलमानों की आबादी 34.2% हो गई। जानकारों के अनुसार, अगली जनगणना में राज्य में मुसलमानों की जनसंख्या 40% के आंकड़े को भी पार कर सकती है।
राष्ट्रीय औसत की तुलना में असम में ढाई गुना वृद्धि
असम में मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर अन्य राज्यों से काफी अधिक है। 1951 से 2011 के बीच पूरे भारत में मुस्लिम आबादी 4.4% बढ़ी है, जबकि इसी दौरान असम में मुसलमानों की संख्या में 11.6% की बढ़ोतरी हुई है। देश में मुस्लिम जनसंख्या की अपेक्षा असम में ढाई गुना मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि देखी गई है।
मुस्लिम बहुल जिलों की स्थिति
असम के कई जिले मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। असम में भी वैसे जिले जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं, वहां मुसलमानों की जनसंख्या की वृद्धि दर काफी अधिक होने के साथ ही वे पूर्णतः मुस्लिम बहुल बन चुके हैं।
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वर्तमान में असम के लगभग 11 जिलों में वे बहुसंख्यक बन चुके हैं, वहीं अन्य चार जिलों में उनकी प्रभावी जनसंख्या है। 2001 की जनगणना के मुताबिक असम में छह मुस्लिम बहुल जिले थे और 2011 तक यह संख्या छह से बढ़कर 11 हो गई।
बांग्लादेश सीमा से सटे मुस्लिम बहुल जिले
इन मुस्लिम बहुल जिलों में अधिकतर वैसे जिले हैं, जो बांग्लादेश से सीधे सीमा साझा करते हैं या एक जिले के बाद आते हैं। अतएव कहा जा सकता है कि इन जिलों में अवैध बांग्लादेशियों के कारण ही जनसंख्या में इतनी तेजी से वृद्धि हुई है।
| ज़िला | मुस्लिम जनसंख्या % |
|---|---|
| दक्षिण शालमारा मनकाचर | 98.03% |
| धुबरी | 79.67% |
| बरपेटा | 70.74% |
| दारांग | 64.34% |
| हैलाकांडी | 60.31% |
| गोवालपारा | 57.52% |
| करीमगंज | 57.36% |
| नगांव | 55.36% |
| होजाइ | 53.65% |
| मरिगाँव | 52.56% |
| बंगाईगाँव | 50.22% |
नोट – ये जिलेवार जनसंख्या (2011 की जनगणना के अनुसार है)
उपरोक्त जिलों में दक्षिण सलमारा, मनकाचर, धुबरी, गोवालपारा, करीमगंज जिले बांग्लादेश की सीमा से सीधे मिलते हैं।
बदरुद्दीन अजमल की पार्टी और मुस्लिम वोट बैंक
असम के मुस्लिम बहुल निचले असम में 2005 में मुस्लिमों के वोट बैंक की बहुलता को देखते हुए बदरुद्दीन अजमल ने आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम से पार्टी बनाई। इस पार्टी की स्थापना के समय के बाद से लगातार तीन लोकसभा चुनावों में पार्टी सुप्रीमो बदरुद्दीन अजमल ने धुबरी लोकसभा सीट से बड़ी जीत हासिल की।
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इस दल ने स्थापना के बाद प्रथम विधानसभा चुनाव 2006 में 10 सीटें, 2011 में 18 सीटें, 2016 में 13 सीटें और वर्तमान विधानसभा के 2021 के चुनाव में 16 सीटों पर जीत दर्ज करके एक मजबूत दल के रूप में स्वयं को स्थापित कर लिया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में अजमल की पार्टी ने तीन लोकसभा की सीटों — करीमगंज, धुबरी और बारपेटा — पर जीत हासिल करके अपनी हैसियत के साथ ही मुस्लिमों की बहुलता को भी प्रदर्शित कर दिया था।

















