असम विधानसभा की अधिकारिक भाषा हिन्‍दी : राष्ट्रीय एकता के लिए पूर्वोत्तर से हिमंत सरकार का बड़ा संदेश
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असम विधानसभा की अधिकारिक भाषा हिन्‍दी : राष्ट्रीय एकता के लिए पूर्वोत्तर से हिमंत सरकार का बड़ा संदेश

दरअसल, स्‍वाधीनता के बाद देश में यह पहला अवसर है जब असम राज्‍य ने अपनी विधानसभा में पहली बार विधायी कार्य में हिंदी को आधिकारिक कामकाज की भाषा के रूप में शामिल करने का निर्णय लिया है

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Jul 7, 2026, 12:45 am IST
in असम
हिमंत बिस्व सरमा, मुख्यमंत्री, असम

हिमंत बिस्व सरमा, मुख्यमंत्री, असम

महात्‍मा गांधी से लेकर महर्ष‍ि अरविन्‍द, वीर सावरकर, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, मदनमोहन मालवीय, सुभाष बाबू से लेकर सभी स्‍वतंत्रता सेनानियों का एक स्‍वर में यही मानना रहा है कि भारत की पहचान उसकी भाषाई विविधता है, किंतु इस विविधता को एक सूत्र में पिरोने का काम यदि किसी ने सबसे अधिक किया है तो वह भाषा ‘हिंदी’ है। यही कारण है कि देश के विभिन्न हिस्सों में हिंदी संवाद का एक सशक्‍त माध्‍यम होने के साथ ही समूचे देश को सांस्कृतिक, सामाजिक और प्रशासनिक समन्वय में पिरोनेवाला एक सशक्त माध्यम है। अब पूर्वोत्तर भारत से भी हिंदी के बढ़ते प्रभाव की ऐतिहासिक तस्वीर सामने आई है।

दरअसल, स्‍वाधीनता के बाद देश में यह पहला अवसर है जब असम राज्‍य ने अपनी विधानसभा में पहली बार विधायी कार्य में हिंदी को आधिकारिक कामकाज की भाषा के रूप में शामिल करने का निर्णय लिया है और राज्‍य की डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने इस तरह से राष्ट्रीय एकात्मता और लोकतांत्रिक समावेशन का सभी को सशक्त संदेश दिया है। इसके साथ ही छह जुलाई से शुरू हुए 16वीं विधानसभा के बजट सत्र में असमिया, अंग्रेजी और बोडो के साथ हिंदी में भी सदन की कार्यवाही संचालित होना आरंभ हो चुकी है।

उल्‍लेखनीय है कि इससे पहले तक असम विधानसभा में अब तक सिर्फ असमिया, अंग्रेजी और बोडो भाषाओं में ही विधायी कार्य संचालित किया जाता था। पहली बार हिंदी को चौथी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किया गया है। यह निर्णय विधानसभा की सामान्य प्रयोजन समिति की बैठक में लिया गया, जिसकी अध्यक्षता विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने की।

सर्वसम्मति से लिया निर्णय

बैठक में संसदीय कार्य मंत्री पिजूष हजारिका, विपक्ष के नेता वाजेद अली चौधरी, मंत्री केशब महंता, विधायक कमलाख्या डे पुरकायस्थ, चक्रधर गोगोई, सबहराम बसुमतारी तथा जय प्रकाश दास सहित विभिन्न दलों के जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। इसके साथ ही सर्वसम्मति से लिए गए इस निर्णय ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र में भाषा संवाद का माध्यम है, न कि विभाजन का, इसलिए इस निर्णय का राष्ट्रीय महत्व भी देखा जा रहा है।

ज्ञात हो कि पूर्वोत्तर भारत लंबे समय तक भौगोलिक दूरी और भाषाई विविधता के कारण मुख्यधारा से अलग होने की चर्चाओं में रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वहां संपर्क, शिक्षा, पर्यटन और व्यापार के विस्तार के साथ हिंदी की स्वीकार्यता भी तेजी से बढ़ी है। ऐसे में विधानसभा जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच पर हिंदी को स्थान मिलना इस बात का संकेत है कि यह कदम पूर्वोत्तर और देश के अन्य हिस्सों के बीच संवाद को और सहज बनाएगा।

सहज स्‍वीकारोक्‍ति के साथ हिंदी का बढ़ता क्षेत्र

इसके साथ ही हिंदी भाषा को लेकर एक महत्‍वपूर्ण तथ्‍य यही है कि यह आज देश के लगभग हर राज्य में संपर्क भाषा के रूप में समझी और बोली जाती है। सरकारी योजनाओं से लेकर सिनेमा, मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, शिक्षा, पर्यटन और व्यापार तक हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

देश के लाखों युवा शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से हिंदी से जुड़ रहे हैं। स्‍वभाविक है ऐसे में पूर्वोत्तर राज्यों में भी हिंदी सीखने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अत: असम विधानसभा का यह निर्णय बदलते भारत की भाषाई वास्तविकता को स्वीकार करने वाला कदम माना जा रहा है।

भाषाई सम्मान के साथ राष्ट्रीय संवाद

इस निर्णय की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें किसी भाषा को हटाकर दूसरी भाषा को स्थान नहीं दिया गया है। असमिया, अंग्रेजी और बोडो पहले की तरह विधानसभा की कार्यवाही का हिस्सा बनी रहेंगी। हिंदी अतिरिक्त भाषा के रूप में जोड़ी गई है, जिससे विधायी कार्य और अधिक समावेशी बन सके। हिंदी के शामिल होने से अब उन जनप्रतिनिधियों और नागरिकों को सुविधा मिलेगी जो हिंदी में अपनी बात बेहतर ढंग से रख सकते हैं या कार्यवाही को समझना चाहते हैं। इससे सदन की कार्यवाही का दायरा भी विस्तृत होगा और राष्ट्रीय स्तर पर विधायी संवाद को नई गति मिलेगी।

डिजिटल युग में विधानसभा की नई पहचान

भाषाई विस्तार के साथ असम विधानसभा ने अपनी डिजिटल पहचान को भी नया स्वरूप दिया है। अब तक ‘एएलए (असम विधानसभा)’ के नाम से संचालित चैनल को सोमवार से ‘असम विधानसभा टीवी’ के नाम से जाना जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में इस चैनल को लोकसभा टीवी और राज्यसभा टीवी की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। यदि इस मंच पर बहुभाषी प्रसारण और हिंदी सामग्री को भी स्थान मिलता है तो विधानसभा की कार्यवाही देश के अधिक व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचेगी और लोकतांत्रिक पारदर्शिता को नई मजबूती मिलेगी।

हिन्‍दी है संपूर्ण भारत को जोड़ने का माध्यम

असम विधानसभा में हिंदी का प्रवेश वास्‍तव में आज के समय में उस भारत की तस्वीर है, जहां अपनी-अपनी मातृभाषाओं का सम्मान करते हुए एक साझा संवाद की भाषा को भी स्वीकार किया जा रहा है। असमिया अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की भाषा है, बोडो अपनी पहचान की, अंग्रेजी प्रशासनिक सुविधा की और हिंदी देश के व्यापक संवाद का माध्यम बन रही है।

पूर्वोत्तर से आई यह पहल बताती है कि नया भारत भाषाई विविधता को संरक्षित रखते हुए राष्ट्रीय एकता को और अधिक मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, नई शिक्षा नीति-2020, जिसमें त्री-भाषा फार्मुला भारत की एक अन्‍य क्षेत्रीय भाषा को सीखने के लिए है, उसका भी सकारात्‍मक असर देशभर में इन दिनों दिखना आरंभ हो गया है। ऐसे में असम विधानसभा का यह निर्णय देखा जाए तो भारतीय लोकतंत्र के उस स्वरूप का प्रतीक है, जिसमें विविध भाषाएं मिलकर राष्ट्र की आवाज को और अधिक सशक्त, व्यापक और समावेशी बनाती हैं।

 

Topics: हिंदी आधिकारिक भाषाहिमंत बिस्वा सरमाअसम विधानसभा
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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