धर्मनिरपेक्षता की आड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण: समाजवादी पार्टी की रणनीति
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धर्मनिरपेक्षता की आड़ में मुस्लिम तुष्टिकरण: समाजवादी पार्टी की रणनीति

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सपा और अन्य दलों की मुस्लिम तुष्टिकरण की रणनीति। 2027 के यूपी चुनाव में अखिलेश यादव की रणनीति और चुनौतियों का विश्लेषण।

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Jul 24, 2025, 01:57 pm IST
inविश्लेषण
SP Muslim apeasement

प्रतीकात्मक तस्वीर

धर्मनिरपेक्षता की ओट में धर्मनिरपेक्ष दलों का मुस्लिम तुष्टिकरण एक पुरानी परंपरा रही हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी इन्हीं दलों में एक है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा मुस्लिम मतों के लिए दिल्ली के एक मस्जिद में राजनीतिक बैठक करके अपनी धर्मनिरपेक्षता की मिसाल को तार-तार कर चुके हैं। यह सपा के लिए कोई नया उदाहरण नहीं है, बल्कि समाजवादी पार्टी की 1992 में स्थापना के काल से ही उनके पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव द्वारा धर्मनिरपेक्षता की ओट में मुस्लिम तुष्टिकरण को नए ऊंचाई तक अनेक अवसरों पर पहुंचाया गया।

2027 विधानसभा चुनाव पर है अखिलेश की नजर

अब सवाल यह उठता है कि लम्बे समय से जब समाजवादी पार्टी को मुस्लिम मतदाताओं का खुला समर्थन मिल रहा है तो अखिलेश यादव को खुलेआम ऐसा करने की क्या जरूरत आन पड़ी ? क्या क्षेत्रीय तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों में सिर्फ समाजवादी पार्टी ही मुस्लिम मतों के लिए परेशान है या अन्य दल भी इसी और आगे बढ़ रहे हैं? और ये कौन कौन से दल हैं ? समाजवादी पार्टी की नज़र आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर है। अखिलेश यादव भली भांति इस तथ्य से वाकिफ हैं कि अगर 2027 के विधानसभा के चुनाव में उनका दल सत्ता नहीं प्राप्त कर सका तो उनके दल का भविष्य अधर में चला जाएगा और उनकी पार्टी राजनीतिक पारी भी समाप्ति की ओर बढ़ जाएगी। अखिलेश यादव की राह में भाजपा और योगी के अलावे भी कई अवरोध हैं जो उन्हें 2027 में सत्ता में पहुंचने से रोक सकती हैं। इन अवरोधों को कमतर करने के लिए अखिलेश यादव अभी से ही इसकी काट की तलाश कर रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी वो राहुल गाँधी अखिलेश यादव की राह के एक बड़े अवरोध हैं। राहुल गांधी मुस्लिम मतों को विभाजित करने की क्षमता रखते हैं सपा ने 2017 में सत्ता में रहते हुए मुस्लिम मतों को विभाजित होने से बचाने के लिए ही कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन किया था। इस गठबंधन के तहत जहाँ सपा ने 311 सीटों पर चुनाव लड़ा था। वहीं कांग्रेस पार्टी 114  सीटों पर चुनाव लड़ी थी। कुछ सीटों पर इन दोनों दलों का दोस्ताना संघर्ष भी देखने को मिला था। मगर जनता ने दोनों दलों को करारा तमाचा लगते हुए काफी गहरा झटका दिया। जहाँ सपा अपने स्थापना काल के न्यूनतम महज 47 सीटों पर आ गई, वहीं कांग्रेस पार्टी भी उत्तर प्रदेश में अपने न्यूनतम सीट महज 7 सीटों पर आकर सिमट गई।

सपा-कांग्रेस गठबंधन आसान नहीं

अब आगामी विधानसभा चुनाव 2027  के मद्देनज़र सपा इस तथ्य से अवगत है कि कांग्रेस पार्टी से गठबंधन आसान नहीं होगा। कांग्रेस पार्टी अपनी ब्लैकमेल नीति का उपयोग करते हुए अपनी क्षमता से कई गुनी सीटों की मांग करेगी। फिर अखिलेश यादव के समक्ष 2017 में कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन का भी अनुभव है। अतएव अखिलेश यादव 2027 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी से इतर छोटे दलों के सहयोग से ही चुनावी वैतरणी पार करने का प्रयास करेंगे। उस स्थिति में अखिलेश यादव को मुस्लिम मतों की बड़े पैमाने पर जरूरत पड़ेगी। इस स्थिति से निपटने के लिए अखिलेश यादव अभी से मुस्लिम वर्ग को अपने पाले में करने का प्रयास कर रहे हैं।

अखिलेश यादव इस तथ्य से भी अवगत हैं कि मायावती और अन्य छोटे दल भी मुस्लिम मतों को आकर्षित करने के लिए अन्य हथकंडे अपनाएंगे। अखिलेश यादव के इस कदम के बाद अब अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल कांग्रेस पार्टी, बसपा भी इसी तरह के कई कदम उठाएगी। उत्तर प्रदेश में इन दलों के लिए मुस्लिम मतों के लिए एक नई चुनौती असदुदीन ओवैसी लेकर आ रहे हैं। 2022 के विधानसभा के चुनाव में ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा और 58 सीटों पर कांग्रेस पार्टी से आगे रही थी। इससे अखिलेश यादव और भी विचलित हैं।

बिहार में RJD भी मुस्लिम तुष्टिकरण में जुटी

ऐसा नहीं है कि सिर्फ सपा, बल्कि बिहार में जहां इस साल के अंत में विधानसभा के चुनाव आहूत हैं, वहां राजद भी इसी द्वन्द से गुजर रही है। राजद भी मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए हर तरह के यत्न कर रही है। अभी हाल ही में एक सभा में राजद नेता वो विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने अपने पार्टी के दो दिवंगत नेताओं शाहबुद्दीन और तस्लीमुद्दीन के नामों के नारे लगाए। यह सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में बनाये रखने की कवायद थी। बिहार में ओवैसी की पार्टी भी बड़े पैमाने पर दस्तक देने की तैयारी कर ली है। इससे राजद और उसके सहयोगी दलों को मुस्लिम मतों के विभाजन का ख़तरा सता रहा है।

इसे भी पढ़ें: 5 सवाल? आखिर कैसे मौलाना छांगुर हिंदुओं के कन्वर्जन में सफल हुआ- कौन थे मददगार

छद्म धर्मनिरपेक्ष दलों की मुसीबत बने मुस्लिम वोटर्स के बदलते रुख

इन तमाम धर्मनिर्पक्ष दलों की सबसे बड़ी समस्या मुस्लिम मतदाताओ के बदलते रुख का कारण है। असम के मुस्लिम बाहुल्य  धुबड़ी लोकसभा सीट से 2009, 2014 और 2019  में बदरुद्दीन अजमल बड़े मतो के अंतर से चुनाव जीत रहे थे। मगर 2024 के लोकसभा चुनाव में बदरुद्दीन अजमल अपने से काफी कनिष्ठ कांग्रेस पार्टी के नेता रकीबुल हुसैन से बुरी तरह चुनाव हार गए। इतना ही नहीं, बल्कि अजमल इस लोकसभा के अंतर्गत आने वाली 11 विधानसभा की सीटों में एक पर भी प्रथम स्थान पर नहीं आ सके। बदरुद्दीन अजमल के इस बुरे हश्र के बाद इन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की दुविधा बढ़ गई है।

मुस्लिम वोटरों से लगाव

ममता बनर्जी भी इस भय से ग्रषित थी कि कांग्रेस पार्टी या वाम दलों के कारण उनका मुस्लिम वोटबैंक कमजोर नहीं पड़ जाए। अतएव उन्होंने इन दलों को इतना कमजोर कर दिया कि ये दल अपने पैरो पर खड़े ही ना हो सकें। कांग्रेस पार्टी ने 2021 के विधानसभा के चुनाव में पश्चिम बंगाल में एक भी सीट नहीं जीत सकी। मगर मुर्शिदाबाद जिले में मुस्लिम बाहुल्य सीट सागरदिघी विधानसभा की सीट पर तृणमूल कांग्रेस के विधायक के निधन के कारण हुए उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी जीतकर विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने में सफल रही। मगर ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी के उस एकलौते विधायक बायरन बिस्वास को बिना समय गवाए अपनी पार्टी में शामिल कर लिया और कांग्रेस पार्टी को फिर से विधानसभा में शून्य पर लेकर खड़ा कर दिया।

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अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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