सरस्वती नदी : कलियुग के भगीरथ
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कलियुग के भगीरथ

सरस्वती को ‘मिथक’ से प्रामाणिक बनाने वालों में मोरोपंत पिंगले जी का विशिष्ट योगदान रहा। उन्होंने ही विष्णु श्रीधर वाकणकर, सतीशचंद्र मित्तल, डॉ. रत्नाकर व दर्शनलाल जैन आदि विभूतियों को अपने साथ जोड़ा, जिसका परिणाम आ ज सामने है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jul 7, 2025, 09:50 am IST
inभारत, विश्लेषण

सरस्वती को ‘मिथक’ से प्रामाणिक बनाने वालों में मोरोपंत पिंगले जी का विशिष्ट योगदान रहा। ये पिंगले जी ही थे, जिन्होंने सरस्वती नदी पर शोध और उसके यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले विभिन्न स्थलों के उत्खनन के लिए विशेषज्ञों का एक दल गठित किया। उस दल में विष्णु श्रीधर वाकणकर, इतिहासकार सतीशचंद्र मित्तल, डॉ. रत्नाकर आदि प्रमुख विभूतियां सम्मिलित हुईं, जिन्हें पिंगले जी से मार्गदर्शन ही नहीं मिला, अपितु कार्य करने की सतत प्रेरणा भी मिली।

सरस्वती शोध यात्रा के शिल्पकार थे मोरोपंत जी। उनके नेतृत्व में 1985 में सरस्वती नदी के किनारे-किनारे एक माह लंबी सर्वेक्षण यात्रा की गई। हरियाणा के आदिबद्री से गुजरात के प्रभास तक लगभग 4,000 किलोमीटर की यात्रा के दौरान 100 से अधिक स्थलों का सर्वेक्षण किया गया और पुरातात्विक सामग्री एकत्र की गई। इस अभियान ने नदी के प्राचीन मार्ग, भूगर्भीय प्रमाण और जलधारा के अवशेषों की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पिंगले जी के मार्गदर्शन में ही सरस्वती शोध संस्थान ने वैज्ञानिक शोधकर्ताओं को एकत्र कर नदी के पुनरुद्धार के लिए ठोस वैज्ञानिक आधार तैयार किया। बाद में पिंगले जी ने दर्शनलाल जी को भी इस शोध कार्य से जोड़ा, आदिबद्री में तालाब का निर्माण करवाया और शोध कार्य को आगे बढ़ाया। दर्शनलाल जी ने तो अपने जीवन के 40 वर्ष सरस्वती को पुनर्जीवित में लगा दिया। उन्होंने 1999 में सरस्वती शोध संस्थान की स्थापना की।

सतयुग में भगीरथ ने कठिन तप और परिश्रम के बाद गंगा नदी को धरती पर अवतरित किया था, उसी प्रकार इन विभूतियों ने अपना पूरा जीवन सरस्वती नदी की खोज में लगा दिया। उनकी कठिन मेहनत एवं परिश्रम का ही परिणाम है कि उनकी निशानदेही पर हरियाणा सरकार ने लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी की धारा को यमुनानगर के मुगलांवाली गांव एवं आदिबद्री से खोज निकाला। 

वहीं, सरस्वती के पुनरुत्थान परियोजना में दक्षिण भारत के प्रमुख भूगर्भीय और जल संसाधन विशेषज्ञ डॉ. रत्नाकर के वैज्ञानिक शोध और प्रयासों से यह सिद्ध हुआ कि सरस्वती नदी आज भी भूतल के नीचे प्रवाहित हो रही है। उनके अनुसंधान ने इस धारणा को चुनौती दी कि सरस्वती केवल एक पौराणिक नदी है और अपने शोध से इसके भूगर्भीय अस्तित्व के प्रमाण प्रस्तुत किए।

उनके कार्य के आधार पर ही बाद में अन्य संस्थानों-जैसे इसरो, ओएनजीसी, सीडब्ल्यूसी, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, एएसआई और सीएसआईआर ने भी सरस्वती नदी के अस्तित्व की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण, रिमोट सेंसिंग, उपग्रह चित्र और बोरवेल परीक्षण जैसी तकनीकों का उपयोग किया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप आदिबद्री से जयपुर तक 12 गहरे बोरवेल खोदे गए, जिनमें से प्राप्त जल का परीक्षण कर यह प्रमाणित किया गया कि वह सरस्वती नदी का ही जल है।

संप्रग के कार्यकाल में सरस्वती को ‘मिथक’ कह कर शोध कार्य को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 2014 में केंद्र और हरियाणा में भाजपा की पूर्ण बहुमत सरकार सत्ता में आई तो सरस्वती नदी को पुनर्जीवित करने का कार्य फिर से शुरू हुआ। 2015 में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने सरस्वती नदी के पुनरुत्थान के लिए हरियाणा सरस्वती हेरिटेज विकास बोर्ड का गठन किया।

सरस्वती को प्रवाहमान बनाने के लिए दर्शनलाल जी निरंतर प्रयासरत रहे। यमुनानगर के आदिबद्री में एक प्रदर्शनी लगाई गई थी। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को आमंत्रित किया। वहां प्रदर्शनी में सरस्वती नदी की फोटो देखकर कलाम खुशी से उछल पड़े थे। उनके मुंह से निकल था- हे! रिवर विद वाटर…। राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के पूर्व प्रांत संघचालक दर्शनलाल जैन हरियाणा के जगाधरी के रहने वाले थे।

जिस प्रकार सतयुग में भगीरथ ने कठिन तप और परिश्रम के बाद गंगा नदी को धरती पर अवतरित किया था, उसी प्रकार इन विभूतियों ने अपना पूरा जीवन सरस्वती नदी की खोज में लगा दिया। उनकी कठिन मेहनत एवं परिश्रम का ही परिणाम है कि उनकी निशानदेही पर हरियाणा सरकार ने लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी की धारा को यमुनानगर के मुगलांवाली गांव एवं आदिबद्री से खोज निकाला।

Topics: सरस्वती शोध संस्थानसरस्वती पुनरुत्थान परियोजनाआदिबद्री से गुजरातमोरोपंत पिंगलेसरस्वती नदी
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