तेजोमय जीवन का वैदिक दर्शन
(6 अप्रैल, 2025 अंक में प्रकाशित लेख की अगली कड़ी)
किसी भी कार्य की सफलता की एक शास्त्रीय पद्धति होती है तथा उसका पालन करने के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। पुरुषार्थहीन व्यक्ति का शास्त्र पद्धति पर विश्वास नहीं होता, क्योंकि उसमें परिश्रम और धैर्य का अभाव होता है। परिवार में शिक्षा देने का कार्य अत्यन्त धैर्य का है। अधीरता से असंतुष्टि और नकारात्मकता उत्पन्न होती है जिससे कलह की निष्पत्ति होती है। धैर्य या धारणा ऐसी होनी चाहिए जो मनुष्यको धर्म- मार्ग पर दृढ़ता से बनाए रखे।

पूर्व क्षेत्र कार्यवाह
उत्तर पश्चिम क्षेत्र, रा.स्व.संघ
समस्त संसार और अनन्त काल को चुनौती देने का सामर्थ्य अपने विचार पर दृढ़ निष्ठा तथा असीम धैर्य के बिना कभी उत्पन्न नहीं हो सकता। धैर्य के लिए आत्मविश्वास होना चाहिए। जो कर्त्तव्य दक्ष और कार्यकुशल होगा, उसी के हृदय में आत्मविश्वास उत्पन्न होगा।
5. युक्ति-शब्दकोश में युक्ति के बहुत से अर्थ दिए गए हैं, यथा-मेल-मिलाप, प्रयोग, व्यवहार, चलन, उपाय, उपयुक्तता, चातुर्य, हेतु (उपपत्ति), परिणाम, आधार, रचना, सम्भावना, योग। साधारणत: किसी विचार, कला, कौशल को सिखाने के लिए प्रयुक्त सरल व विविध विधाएं युक्ति-प्रयुक्ति कहलाती हैं। युक्तियुक्त का अर्थ तर्क-संगत होता है, अत: कोई भी कथन या प्रकिया जो युक्ति के अनुरूप है, वही तर्क-संगत है। युक्ति के लिए उपकरणों की आवश्यकता होती है जो व्यक्ति, विचार, वस्तु आदि हो सकते हैं। युक्ति या उपाय करने पर कोई कार्य दुष्कर नहीं रह जाता। यदि किसी कार्य की सफलता एक उपाय से संभव नहीं है तो वैकल्पिक उपायों का संधान किया जाना अपेक्षित रहता है।
सूत्रकार चाणक्य का कथन है कि कार्य पूर्ति में उपाय उद्यमी का सच्चा सहायक होता है। कहा गया है कि भाग्य पुरुषार्थ के पीछे चलता है-‘पुरुषकारमनुवर्तते देवम्।’ किंतु किसी कार्य के लिए युक्ति-प्रयुक्ति के चयन में पूरा प्रयत्न नहीं किया जाता तो वह कार्य असफल रह जाता है। परिवार में युक्ति-प्रयुक्ति के साथ ही स्वजनों का सहकार प्राप्त करना भी महत्वपूर्ण होता है और इसके लिए परिजनों की उपेक्षा तथा अपेक्षाओं का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए-‘स्वजनेष्वतिक्रमो न कर्त्तव्य:।’
काैन है मेधावी
6. बुद्धि-शब्दार्थ की दृष्टि से बुद्धि शब्द का अर्थ है जानने-समझने और विचार करने की शक्ति, अंत:करण की निश्चयात्मिका वृत्ति, प्रकृति का प्रथम परिणाम महत्तत्व। गीता (2-41) में योगीराज श्रीकृष्ण ने कहा है-‘हे अर्जुन! कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन मनुष्यों की बुद्धियां निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनंत होती हैं’। किसी विषय के समस्त विकल्पों पर विवेक बुद्धि से विचार कर एक पर दृढ़ होने को निश्चयात्मक बुद्धि कहते हैं। अस्थिर बुद्धि वाले अधिकांश समय संकल्प-विकल्प में बिताते हैं जिससे वे अनिर्णय की स्थिति में रहते हैं या आधे मन से संशयावस्था में कार्यारम्भ करते हैं, जिससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता। गीता (2-48) में श्रीकृष्ण ने कहा है, ‘सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर कर्त्तव्य कर्म कर, समत्व ही योग कहलाता है।’
विवेक बुद्धि से प्राप्त ज्ञान जब स्थाई भाव बन जाता है और व्यक्ति उसके अनुरूप व्यवहार करने लगता है तब उसे मेधावी कहते हैं। उपनिषद् का ऋ षि इसीलिए प्रार्थना करता है, ‘वह सबका स्वामी (प्रभु) मुझे धारणायुक्त बुद्धि से सम्पन्न करें-‘स मेन्द्र्रो मेधया स्पृणोतु’ (तैत्तिरीयोपनिषद् अनुवाद-4)। प्रज्ञा बुद्धि वह अवस्था है जो तर्क व अनुमान से प्राप्त ज्ञान से भी उच्चतर है, अर्थात् विवेक का शुद्धतम व सर्वोच्च रूप। संसार का समस्त ज्ञान जिस सिद्धि से साधक को प्राप्त होता है उसे प्रज्ञा सिद्धि कहते हैं। हित और अहित बुद्धि-शून्य लोग स्वभाव से सत्य द्रोही होते हैं। ऐसे बुद्धिहीन लोगों को मित्र मिलना संभव नहीं होता-‘नात्स्यधीमत: सखा।’ ऐसे असंस्कृत मन वाले अविवेकी लोगों का क्रोध उन्हीं के आत्म-कल्याण का विनाशक तो होता ही है, परिवार में भी कलह और विघटन का कारण बनता है। ‘आत्मानमेवनाशयत्यनात्मवतां कोप:।’ ऐसे अविवेकी परिजन ऐश्वर्य पाकर भी नष्ट हो जाते हैं-‘महदेश्वर्यं प्राप्याप्यधृतिमान विनश्यति।’ अत: परिवार में विवेक बुद्धि का अभ्यास सबसे महत्व का कार्य है।
त्याग गृहस्थाश्रम का परम कर्त्तव्य है, क्योंकि शेष तीनों आश्रम इस पर अवलम्बित रहते हैं। लोभ यज्ञ (सबको अपना दाय भाग देने) के मार्ग में बाधा बनकर आप-ही-आप भोग की आसुरी वृत्ति उत्पन्न करता है, क्योंकि लोभ मनुष्य की बुद्धि को ढक देता है-‘तृष्णया मतिश्छाद्यते।’ लोक व्यवहार में कुशल व्यक्ति ही वास्तव में बुद्धिमान होता है-‘लोके प्रशस्त: स मतिमान।’ सूत्र वाक्य हैं कि जैसा बीज वैसा फल, जैसी शिक्षा वैसी बुद्धि तथा जैसी बुद्धि वैसा वैभव। ‘यथा बीजं तथा निष्पत्ति, यथाश्रुतं तथा बुद्धि:, यथा बुद्धिस्तथा विभव:’ वैभव का आधार बुद्धि क्यों है? क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति सबको अपना मित्र बना लेता है, उसके शत्रु नहीं होते-‘नास्ति बुद्धिमतां शत्रु:।’ सम्यक् ज्ञान को ‘धी’ कहते हैं। सम्यक् ज्ञान संशय रहित होता है, ‘संशयात्मा विनिष्यते’। संशय विनाश का कारण होता है। सम्यक् ज्ञान से केवल मन-बुद्धि के अनुसार मनमाना आचरण करने वाले ‘वानर’ से, सदाचरण करने वाला ‘नर’ बना जाता है। महाभारत (उद्योग पर्व) में उल्लेख है कि परमात्मा हाथ में लकड़ी लेकर जैसे चरवाहा पशुओं के झुण्ड की रक्षा करता है, वैसे मनुष्यों की रक्षा नहीं करता। मनुष्य को उसने बुद्धि दी है। ईश्वर द्वारा प्रदत्त बुद्धि का सम्यक् उपयोग करने की उपयुक्त बुद्धि उसकी साधना से प्राप्त होती है-‘न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत्। यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्धया संविभजन्तितम।।’ ऐसी ईश्वर प्रदत्त विवेक बुद्धि से सम्पन्न व्यक्ति भाग्य भरोसे नहीं बैठते, अपने पुरुषार्थ से भाग्य बदलते हैं।
सज्जनों की संगति से बुद्धि-बल में वृद्धि होती है तथा बुद्धि से कई गुणों का आदान होता है। बुद्धि ही वाणी में सत्यता लाती है, प्रतिष्ठा देकर अभ्युदय करती है, मान में वृद्धि करती है, पापों को हरती है, मन को प्रसन्न करती है और दसों दिशाओं में यश फैलाती है। बुद्धिमान कौन है? भीष्म पितामह माता सत्यवती से कहते हैं, ‘जो मनुष्य धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों का बारम्बार विचार करता है तथा यह भी जानता है कि किस प्रकार अर्थ से अर्थ, धर्म से धर्म और काम से कामरूप फल की प्राप्ति होती है, और वह परिणाम में कैसे सुखद होता है तथा किस प्रकार अर्थादि के सेवन से विपरीत फल प्रकट होते हैं।
गीता (4-34) में तत्वदर्शी ज्ञानियों से ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया का भी वर्णन है-तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया, अर्थात् मंगल-संवाद की प्रक्रिया में तीर्थाटन, मठ, आश्रम में श्रेष्ठ पुरुषों के प्रति समर्पण, प्रश्न-परिप्रश्न अर्थात् जिज्ञासा तथा उनकी सेवा (सेवन/अनुसरण) से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते (गीता4-38), तथा जितेन्द्रिय व श्रद्धावान् पुरुष ही ज्ञान को प्राप्त करता है।
7. दृष्टि-दृष्टि का सामान्य अर्थ नजर, ज्ञान, बुद्धि और आंख लिया जाता है। वास्तव में भारतीय दर्शनानुसार किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान का साक्षी बनने पर जो विचार या भाव उत्पन्न होते हैं, उनका आधार मन-बुद्धि-आत्मा पर पूर्व में आलेखित संस्कारों के आधार पर होता है, इसे ही सभ्यतागत या सांस्कृतिक दृष्टि कहते हैं। हिन्दू धर्म का आचार भाग तथा संस्कृति की विशेषताएं संसार की ओर देखने की हमारी दृष्टि का परिष्कार करने के लिए ऋ षियों द्वारा दीर्घ अनुसंधान एवं अनुभूति के आधार पर किया गया विधान है।
यथा-(क) विश्व की ओर देखने की दृष्टि-ऋ षियों ने व्यष्टि से समष्टि तक एकात्म जीवन दृष्टि के आधार पर वसुधैव कुटुम्बकम् तथा स्वदेशो भुवनत्रयम् के बीज-मंत्र दिए तथा इसकी सिद्धि के लिए साधना स्थली कुटुम्ब को बनाया। (ख) प्राणियों के प्रति दृष्टि-ईशावाश्यमिदं सर्वं तथा आत्मवत् सर्वभूतेषु के घोष वाक्य सबमें ईश्वर का अंश देखने और उसी के अनुरूप व्यवहार की दृष्टि तो देता ही है, उसी के कारण सर्वे भवन्तु सुखिन: की कामना ही नहीं आती, जड़-चेतन के प्रति व्यक्ति का व्यवहार भी बनता है। (ग) आश्रम व्यवस्था-यह सार्थक जीवन जीने की अनुशासित दृष्टि है। अतिथि देवो भव: के भाव से आगन्तुक का सम्मान हो, ईश्वरोपासना-साधना हो, प्रभु प्रसाद के रूप में प्रतिदिन सात्विक व्यंजन मिलते हों, साधु-संतों का सतत सानिध्य मिलता हो, ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है और ऐसा परिवार आदर्श है। (घ) संस्कार-व्यवस्था संस्कार वह प्रक्रिया है जिससे विचार, व्यक्ति, वस्तु या स्थान की पूर्वावस्था से उन्नत अवस्था की प्राप्ति होती है।
जीवन यात्रा का प्रयोजन
व्यक्ति के संस्कारों में पंच कोशों-अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय के संस्कार की दृष्टि से हमारे यहां सोलह संस्कारों की व्यवस्था की गई है। (ङ) पुरुषार्थ चतुष्ट्य-पुरौ शेते इति पुरुष:, अर्थात् इस देह (पुरी) में निवास करने के कारण जीवात्मा को पुरुष कहते हैं। जब तक वह उसकी देह में है तब तक उसकी जीवन-यात्रा का प्रयोजन ‘पुरुषार्थ’ कहलाता है। (च) ऋ ण-मनुष्य पर जन्म से मृत्यु तक अनेक उपकारों का ऋ ण होता है। मनुष्य कर्मयोनि है अत: उसका कर्त्तव्य है कि वह ऋ ण से उऋ ण हो।
शास्त्रों में चार ऋ णों का उल्लेख है- देव ऋ ण, ऋ षि ऋ ण, पितृ ऋ ण तथा मनुष्य ऋ ण। इन ऋ णों से मुक्त होना ही वास्तविक मुक्ति है। (छ) धन की ओर देखने की दृष्टि-अर्थ पुरुषार्थ है किंतु इसके अर्जन की दृष्टि क्या हो? हिन्दू दृष्टि शुभ- लाभ की है, अर्थात् जो परिवार, समाज, राष्ट्र के लिए शुभकर हो वही लाभ लेना उचित है। बौद्ध मत के पंचशील में उल्लेख है-अदिन्नादाना वेरमणी, अर्थात् चोरी न करना। जैन धर्म के पंच महाव्रतों में अस्तेय (चोरी न करना) तथा अपरिग्रह (संचय न करना) भी शामिल है। व्यक्ति अपने पुरुषार्थ द्वारा अर्जित धन के भोग में भी स्वतंत्र नहीं है। उसने समाज से अर्जित किया है अत: उसका दाय भाग पुन: लौटाना है, यही यज्ञ है और यज्ञ शेष का भोग करने का ही व्यक्ति अधिकारी है।

गीता (3-12) में कहा गया है कि, ‘यज्ञ के द्वारा पुष्टि प्राप्त दैवी शक्तियां तुम लोगों को बिना मांगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देती रहेंगी। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए गए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है। गीता (3-13) में आगे कहा गया है, ‘यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपने शरीर-पोषण के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।’
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता:।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुक्ते स्तेन एव स:॥
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पंचन्त्यात्मकारणात्।।
इसे ही उपनिषद् में तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, त्यागपूर्वक भोग कहा गया है। चाणक्य सूत्र है-स्वजनं तर्पयित्वा य: शेषभोजी सोऽमृतभोजी, अर्थात् अपने उपार्जित धन में से स्वजनों, अतिथियों, याचकों तथा समाज कल्याणकारी संस्थाओं का भरण-पोषण करने के उपरान्त शेष से अपनी जीवन-यात्रा चलाता है, वह अमृत भोजी है।
मन में धन और धन में मन, दोनों ही दोषपूर्ण स्थितियां हैं। हमारी मान्यता है-सांई इतना दीजिए, जा महि कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय।। अपनी आवश्यकता से अधिक लेना भी चोरी है, पाप है। एक कथा है-कौत्स का अध्ययन पूर्ण हुआ। गुरु दक्षिणा के लिए अति आग्रह के उपरान्त गुरु वरतंतु ने चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांगी। कौत्स रघु के पास गया। आभूषण रहित रघु ने मिट्टी के पात्र में अर्घ्य पाद्य निवेदित किया। रघु ने यज्ञान्त में सर्वस्व दान कर दिया था। रघु ने तीन दिन का समय मांगा। मंत्रियों से पता किया तो ज्ञात हुआ कि कुबेर ने कर नहीं दिया था। रघु ने कुबेर पर चढ़ाई का आदेश दिया। भयभीत कुबेर ने जैसे धन वर्षा कर कोष भर दिया। रघु ने समस्त धन कौत्स के सम्मुख रखते हुए कहा, ‘यह द्रव्य आपके निमित्त आया है, इसमें से मैं और मेरी प्रजा अंश मात्र भी कैसे ले सकती है? कौत्स ने कहा, ‘मैं ब्राह्मण हूं। शिल या कण मेरी विहित वृति है। गुरु दक्षिणा की चौदह कोटि मुद्राओं से अधिक एक का भी स्पर्श मेरे लिए लोभ तथा पाप है।’
(ज) महिला के प्रति दृष्टि-मनुस्मृति (3-56) में कथन है, यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:, अर्थात् जहां महिलाओं का सम्मान होता है वहां दैवी शक्तियों का निवास होता है। जहां अन्यत्र अपनी सहोदर बहिन के अतिरिक्त सभी स्त्रियों में भार्या-दृष्टि स्वीकार्य है, वहां हिन्दू दृष्टि कहती है कि अपनी पत्नी के अतिरिक्त शेष सभी महिलाएं माता-भगिनी हैं-मातृवत् परदारेषु।
(झ) उपासना पद्धतियों के प्रति दृष्टि-ऋ ग्वेद (1-164-46) का मंत्र है, एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति, अर्थात् सत्य एकमेव अद्वितीय है किंतु बुद्धिमान लोग उसे भिन्न-भिन्न प्रकार से व्याख्यायित करते हैं। शिव महिम्न स्तोत्र का श्लोक-7 इस प्रकार है-
त्रयी सांख्यं योग: पशुपतिमतं वैष्णवमिति,
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमद: पथ्यमिति च।
रुचिनां वैचित्र्याऋजुकुटिलनानापथजुषां,
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।
अर्थात् वेद, सांख्य दर्शन, योग शास्त्र, शैव मत, वैष्णव मत आदि भिन्न-भिन्न मत-मतांतर हैं। इनमें (सभी लोग हमारा) यह मत उत्तम है, हमारा मत लाभप्रद है-इस प्रकार की रुचियों की विचित्रता से सीधे-टेढ़े नाना मार्गों से चलने वाले साधकों के लिए एकमात्र प्राप्तव्य (गन्तव्य) आप ही हैं। जैसे सीधे-टेढ़े मार्गों से बहती हुई सभी नदियां अन्त में सागर में ही पहुंचती हैं, उसी प्रकार सभी मतानुयायी अन्तत: उसी परमात्मा के पास पहुंचते हैं।
शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का मार्ग
इस दृष्टि के अनुसार, यदि आप किसी अन्य की उपासना पद्धति में बाधक नहीं बनते हैं तब तक आपके मार्ग में कोई बाधा नहीं आएगी-यही सर्व पंथ समादर का अर्थ है। गंतव्य एक है, मार्ग अनेक हो सकते हैं अत: शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए मेरा ही मार्ग सही की साम्प्रदायिक सोच के मुक्ति आवश्यक है।
(ञ) गुण ग्राह्यता-ऋ ग्वेद (1-89-1) का मंत्र है, आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:, अर्थात् हमारे पास चारों ओर से कल्याणकारी विचार आएं। गुणों का ग्रहण और दुर्गुणों के त्याग की यह सनातन वैदिक दृष्टि है। ये सद्गुण यदि बालक के पास हैं तो उन्हें भी विनीत भाव से स्वीकार करना चाहिए। चाणक्य-सूत्र है-बालादप्यर्थजादं शृणुयात्, अर्थात् बालकों की भी उचित बात सुनकर स्वीकार करनी चाहिए। एक अन्य सूत्र में कौटिल्य कहते हैं-गतानुगतिको लोक:, अर्थात् बुद्धिमान लोग प्रकृत विषय पर पूर्ण विचार कर, अहितकर मार्ग त्यागकर हितकर मार्ग को अपनाते हैं। सामान्य लोग उनका अनुकरण करते हैं। कुछ बिना विचारे परम्परा का अनुसरण करते हैं अत: श्रेष्ठ लोगों का यह दायित्व होता है कि वे कालातीत श्रेष्ठ परम्पराएं स्थापित करें तथा देश-काल-परिस्थिति के अनुसार पूर्व परम्पराओं की समीक्षा-संशोधन करें। गुण ग्राह्यता के लिए परिवार में आदेशात्मक, विवादात्मक तथा अस्वीकारत्मक स्थितियों से बचना चाहिए, संवादात्मक पद्धति का पालन करना चाहिए।
8. दाक्ष्य-संस्कृत शब्दकोश में दाक्ष्य या दक्षता के अर्थ चातुर्य, निपुणता तथा सत्यनिष्ठा दिए गए हैं। गीता (2-50) में कहा है, योग: कर्मसु कौशलम्, अर्थात् किसी कार्य को कुशलतापूर्वक सम्पादित करने को योग साधना कहा है। इसमें सत्यनिष्ठा से प्रयत्न, कार्य के प्रत्येक सोपान के सम्पादन में निपुणता तथा उसे करने की चातुर्यपूर्ण शैली का समावेश हो जाता है। उत्साह से कार्य में दक्षता आती है। चाणक्य सूत्र हैं-नास्त्यलसस्यैहि कामुष्किम्, अर्थात् कार्य में अनुत्साही, अकर्मण्य को वर्तमान तथा भविष्य में भी सफलता नहीं मिलती। ‘निरुत्साहाद् दैवं पतित’, अर्थात् उत्साह के बिना सफलता हाथ से फिसल जाती है।
व्यक्ति या कार्य से अनुराग मौखिक सहानुभूति से नहीं, कामों से सूचित होता है-‘अनुरागस्तु फलेन सूच्यते।’ ऐतरेय ब्राह्मण (अध्याय-3 खण्ड-3) में हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित व इन्द्र का संवाद है जो चरैवेति चरैवेति का उपदेश कहलाता है। इसके एक श्लोक का तात्पर्य है, शयन की अवस्था कलियुग के समान है, जागकर सचेत होना द्वापर के समान है, उठ खड़ा होना त्रेता सदृश है और उद्यम में संलग्न एवं चलनशील होना कृत युग के समान है। अत: तुम चलते ही रहो। इस श्लोक में मनुष्य की चार अवस्थाएं हैं, प्रथम, निष्क्रिय अवस्था; द्वितीय, जाग्रत किंतु आलस्य; तृतीय, आलस्य त्याग कर कर्म हेतु इच्छा का जागरण; तथा चतुर्थ, संकल्प एवं दक्षता के साथ कार्य में संलग्न होना।
कलि:शयानो भवति संजिहानस्तु द्वापर:।
उत्तिष्ठस्त्रेता भवति कृतं संपाद्यते चरंश्चरैवेति।।
दक्षता की प्राप्ति के लिए शास्त्रों में श्वेत काकीय उपाय का उल्लेख आता है। इसका तात्पर्य है-‘श्वा’ कुत्ता=श्वान निद्रा, ‘एत’-हरिण=हरिण जैसी चपलता, ‘काक’ कौआ, काक-चेष्टा। अत: किसी भी गुण या कौशल का दक्षतापूर्ण उपयोग सबसे महत्वपूर्ण है।















