ब्रिटेन के रॉदरहैम में ग्रूमिंग गैंग के कुछ मामलों की सुनवाई हो रही है। और इन सुनवाई में पीड़िताएं अपनी पीड़ा बता रही हैं। कैसे उन्हें फंसाया गया और कैसे एक से दूसरे इंसान के पास भेज गया, उससे भी बढ़कर जो बात आ रही है वह है श्वेत लड़कियों के विषय में नस्लीय टिप्पणियां करना।
शेफील्ड क्राउन कोर्ट में चल रही कार्यवाही के दौरान वकील एंड्रू बेली ने कहा कि उस समय जो लड़की थी, इस समय वह अपनी आयु के तीसरे दशक के अंत में है। उसके साथ 1999 से 2002 के बीच हुसैन, केसुर अजैब और मोहम्मद मखमूद ने बलात्कार किया था।
उस लड़की ने बताया कि हुसैन ने जब उसका बलात्कार किया था तो उसने कहा कि लड़की की ही गलती है कि उसने उसे आने दिया।
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मिस्टर बैली ने कोर्ट में कहा कि लड़की ने बताया था कि हुसैन ने उसे ही दोषी ठहराया। लड़की के अनुसार हुसैन ने कहा कि उसे उसके सामने वैसे कपड़े पहनकर नहीं आना चाहिए। और सबसे बढ़कर “मैं इसकी हकदार हूं और गोरी लड़कियां इसी के लिए थीं।“
डेली मेल के अनुसार मिस्टर बेली ने फिर आठ महिलाओं और चार पुरुषों की ज्यूरी को बताया कि वह उस लड़की को बार-बार ऐसी ही चीजें कहता रहा कि जैसे “गोरी तवायफ़!” यह मुकदमा तीन लोगों पर चल रहा है और उन पर शिकायतकर्ता के बलात्कार का आरोप है और हुसैन पर भी एक दूसरी किशोरी के साथ बलात्कार का आरोप है। मिस्टर बैली ने कहा कि पहली किशोरी बहुत ही अपरिपक्व और ऐसी उम्र में थी, जिसमें उसे बहलाना बहुत आसान था, जब वह रॉदरहैम यूथ क्लब में जाने लगी थी। वकील ने बताया कि उस क्लब मे कुछ युवा एशियाई लोग भी आते थे, कुछ उसकी उम्र के थे, कुछ उससे बड़े और कुछ उससे बहुत बड़े। और वे लोग उससे पूछते थे कि क्या उसे ड्रिंक चाहिए या सिगरेट चाहिए?
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वकील ने बताया कि लड़की अजैब से यूथ क्लब में मिली और वह उसका यौन शोषण तब से करने लगा जब उस लड़की ने बताया कि जब वह चौदह वर्ष की थी, तब वह किसी लड़के साथ सेक्स कर चुकी है। अजैब ने इसे एक हरा सिग्नल माना और उसके साथ बलात्कार करने लगा।
बेली ने कहा कि इस लड़की को ‘लगभग पांच या छह बार’ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया। लड़की को लगता था कि जैसे वह एक तवायफ़ है। मखमूद ने भी इसी लड़की के साथ एक पुराने कब्रिस्तान में बलात्कार किया और बलात्कार करते समय उसे वह “तवायफ़ और गंदी कुतिया” कहता जा रहा था और वह उस पर थूक भी रहा था, साथ ही वह उस पर हंस भी रहा था।
लड़की के माता-पिता अलग हो चुके थे। उसकी मां नौकरी कर रही थी जिसके कारण लड़की यह सब खुद ही झेल रही थी। वकील ने कहा कि लड़की को बार-बार धमकी दी जाती थी कि वह किसी से कुछ न कहे।
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एक तरफ जहां लड़कियां अपनी पीड़ा बता रही हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे भी लोग हैं, जो इन सब पीड़ाओं को नकार कर केवल इसे मीडिया का मामला बता रहे हैं। एक यूजर ने सोशल मीडिया पर ऐसा ही एक पोस्ट साझा किया था। जिसमें यह कहा गया था कि अरबपति मीडिया काल्पनिक आप्रवासी अपराधों के प्रति आपको पागल करना चाहता है, जिससे कि आप उनके द्वारा किये जा रहे अपराधों को न देखें।

जबकि यह बात पूरी तरह से सच है कि इस मुद्दे को मीडिया में जितना उछाला जाना चाहिए था, जिस प्रकार से शासन और प्रशासन को इस पर निर्णय लेना चाहिए था, वैसा हुआ नहीं। इस मुद्दे को भी जमकर दबाने का प्रयास किया गया। हजारों लड़कियों की पीड़ा को सालों तक सामने ही नहीं लाया गया और जिसने भी इस मुद्दे को उठाने का प्रयास किया उसे दक्षिणपंथी, श्वेत चरमपंथी या फिर इस्लामोफोबिक कह दिया गया।
sarah नाम की यूजर ने एक्स पर लिखा कि जब वह 11 वर्ष की थी, तब उसे रॉदरहैम में ग्रूमिंग गैंग ने निशाना बनाया था। उसने लिखा कि एक दिन वह स्कूल गई थी और स्कूल बंद था। तो उसे स्कूल के प्लेग्राउंड में दो लोग मिले।
वह लिखती हैं कि उस दिन ने उनकी दुनिया पूरी तरह से बदल दी। खेल के जिस मैदान पर वह खेलती थी, वहीं पर उन्हें एक लड़के के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया। वे लिखती है कि “मेरी मासूमियत चुरा ली गई, मेरी आज़ादी छीन ली गई और मुझे मेरे परिवार के खिलाफ कर दिया गया।
मेरा शोषण 5 साल तक जारी रहा…
मुझे वो काम करने के लिए मजबूर किया गया जो मैं नहीं करना चाहती थी या फिर मुझे इसके परिणाम भुगतने पड़े.”
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ऐसी एक नहीं हजारों कहानियां हैं। मीडिया में हैं, सोशल मीडिया में हैं, किताबों मे हैं, मगर विमर्श में नहीं हैं। यह हलचल ही नहीं है कि एक-दो नहीं बल्कि हजारों लड़कियां पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स का शिकार होती रहीं और पूरा विश्व शांत रहा! विश्व की बात तो तब आएगी, जब उनके देश में, उनकी मीडिया में, उनकी सरकार में हलचल होगी!

















