ऑपरेशन सिंदूर : दुश्मन का भोंपू विपक्ष!
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होम भारत

दुश्मन का भोंपू विपक्ष!

जब-जब देश की एकता और अखंडता का प्रश्न खड़ा हुआ, तब-तब विपक्ष ने राष्ट्र विरोधी बयान देकर देशवासियों और बहादुर सैनिकों की भावनाओं को क्यों आहत किया, हमें उसके कारणों और मानसिकता को समझना होगा

Written byदिनेश गौतमदिनेश गौतम
Jun 24, 2025, 08:37 am IST
inभारत, विश्लेषण, जम्‍मू एवं कश्‍मीर

“आज ऐसा वक्त है जब न कोई डेमोक्रेट है, न रिपब्लिकन-बस अमेरिकी है, जो अपने दुख में एकजुट हैं और इस चुनौती का डटकर सामना करने के संकल्प में एक हैं। हमें दुनिया को दिखाना है कि हम एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र हैं।’’ 9/11 आतंकी हमले के ठीक अगले दिन अमेरिकी संसद में यही शब्द गूंजे थे। उस समय सत्ता या विपक्ष का कोई भेद नहीं था। पूरा राष्ट्र एकजुट था। यही लोकतंत्र की परिपक्वता व राष्ट्रीय एकता का सार है। विपक्षी नेता टॉम डैशल का यह कथन केवल भाषण नहीं था, एक दर्शन था। ऐसा दर्शन, जो संकट के समय व्यक्ति की नहीं, समाज की जिम्मेदारी की बात करता है। इसी भावना ने अमेरिका को संकट से उबारने में मदद की।

युद्ध का संतुलन और भारत

दिनेश गौतम
वरिष्ठ पत्रकार

भारत में यह तस्वीर उलट है। चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो, बालाकोट एयर स्ट्राइक या हाल का ऑपरेशन सिंदूर, भारत के भीतर से ही कुछ राजनीतिक आवाजें उठने लगती हैं। कांग्रेस के नेता, खासकर राहुल गांधी जैसे लोग, सेना की कार्रवाई को चुनावी स्टंट बता देते हैं, कुछ नेता तो ‘प्रमाण’ मांगते हैं, जैसे कि देश की सुरक्षा किसी प्रेस ब्रीफिंग की मोहताज हो।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भारत को युद्ध के लिए उकसा रहे थे, लेकिन मोदी सरकार का संतुलित और नपा-तुला कूटनीतिक निर्णय, देश को ऐसे फंदे में फंसने से बचा ले गया, जिससे आज तक रूस, इस्राएल या यूक्रेन जैसे देश नहीं निकल पाए हैं। साहस केवल तलवार उठाने में नहीं, बल्कि उसे म्यान में रखने की समझ में होता है। विनाश की अंतिम सीमा तक जाकर कोई भी देश विजयी नहीं होता, बल्कि उस क्षण जब वह समय के साथ, विवेक से, अपने विरोधियों को भी संवाद के लिए बाध्य कर देता है, वही असली जीत होती है। इसलिए आज के दौर में युद्ध कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि शांति की तैयारी में की गई अंतिम कार्रवाई है। भारत इसी संतुलन को साध रहा है।

भारत की नई युद्ध नीति

सम्राट अशोक से लेकर अब्राहम लिंकन तक, चाणक्य से लेकर नेल्सन मंडेला और चार्ल्स दी गॉल तक, नेताओं ने हमेशा यही सिखाया है कि युद्ध छेड़ना आसान होता है, लेकिन उसे समय रहते सम्मानपूर्वक समाप्त करना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है। प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार स्पष्ट किया है, कि “आज का युग युद्ध का नहीं है।” भारत ने एक नीति अपनाई है, जहां जवाब ज़रूरी हो, वहां सर्जिकल तरीके से दो, लेकिन देश को युद्ध में न झोंको। बालाकोट हो या ऑपरेशन सिंदूर, भारत ने जवाब भी दिया और शांत भी रहा। इसके विपरीत रूस-यूक्रेन युद्ध आज तक चल रहा है। दोनों देश तबाह हो रहे हैं, न कोई स्पष्ट विजेता है, न समाधान। इस्राएल और ईरान के बीच छिड़ी हिंसा ने पश्चिम एशिया को अराजक बना दिया है। लेकिन भारत ने, सीमित और लक्ष्यभेदी कार्रवाई करके, आतंकवाद को जवाब भी दिया और विकास की ओर लौट भी आया।

सवाल जरुरी या राष्ट्रहित

लोकतंत्र में विपक्ष का कार्य सरकार से सवाल करना है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सवाल पूछते समय विवेक और जिम्मेदारी ज़रूरी होती है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में जब संकट आता है, तो विपक्ष सरकार के साथ खड़ा होता है। ब्रिटेन में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय विपक्ष ने चर्चिल का पूरा साथ दिया था। अमेरिका में 9/11 के बाद सर्वसम्मति से सैन्य कार्रवाई की मंजूरी दी गई। लेकिन भारत में जब-जब हमारी सेना आतंकवाद के खिलाफ खड़ी होती है, कुछ नेता उसका राजनीतिक विश्लेषण करने में जुट जाते हैं।

राहुल गांधी की राजनीति आज उस विचलन का प्रतीक बन चुकी है जहां राष्ट्रहित की जगह विरोध का स्वचालित आग्रह ले लेता है। वे हर राष्ट्रीय संकट को एक चुनावी अवसर की तरह देखते हैं, मानो सैनिकों का बलिदान, सीमाओं की सुरक्षा और आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई, ये सभी केवल सरकार को घेरने के मंच भर हों। विडंबना यह कि वे उस पार्टी के नेता हैं, जिसके इतिहास में राष्ट्रीय एकता के उदाहरण दर्ज हैं। उनकी दादी इंदिरा गांधी के नेतृत्व में 1971 में जब पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छिड़ा, तो पूरा विपक्ष, वाजपेयी से लेकर मधु लिमये तक, सरकार के साथ खड़ा था। उनके पिता राजीव गांधी के समय, जब पंजाब आतंकवाद की चपेट में था या श्रीलंका में भारतीय सेना को भेजा गया, तब भी विपक्ष ने तीव्र आलोचना करने से पहले राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी थी।

विपक्ष बना दुश्मनों की ताकत

राहुल गांधी ऐतिहासिक स्मृति को या तो भूल जाते हैं या जान-बूझकर अनदेखा करते हैं। जब सर्जिकल स्ट्राइक होती है, या बालाकोट एयर स्ट्राइक तो वे सबका ‘सबूत’ मांगते हैं। जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ होता है, वे यह नहीं पूछते कि भारत ने आतंक का मुंहतोड़ जवाब कैसे दिया, बल्कि यह पूछते हैं कि सरकार का इरादा क्या था। यह राजनीति नहीं, एक असहज मानसिक संरचना की परिचायक है, जहां सत्ता विरोध ही एकमात्र उद्देश्य बन गया है, राष्ट्र के साथ खड़ा होना पराजय जैसा प्रतीत होता है। विपक्ष में होना मतलब हर कार्य का विरोध करना है, यह लोकतंत्र की आत्मा नहीं, अपितु संबंधित की विकृत मानसिकता का परिचायक है।

राहुल गांधी के सवालों में चिंता कम पूर्वाग्रह अधिक होता है। वे शायद यह नहीं समझते कि राष्ट्रीय संकट में जब विपक्ष खुद को अलग कर लेता है, तो शत्रु को सबसे बड़ी ताक़त मिलती है, विभाजन की ताक़त। लोकतंत्र में सवाल पूछना ज़रूरी है, लेकिन समय, स्थान और भावना का संतुलन बनाए रखना उससे भी अधिक आवश्यक है। राहुल गांधी जिस रास्ते पर चल रहे हैं, वह केवल सत्ता की तलाश नहीं, बल्कि राष्ट्र-चेतना से विमुख एक राजनीतिक अधीरता है, जो स्वयं को सही साबित करने के लिए देश को भी कठघरे में खड़ा कर देती है।

भारत की निर्णायक परिपक्वता

भारत अब वैश्विक शक्ति बनने की राह पर है। उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। वह जी-20 जैसे मंचों की अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे समय में आंतरिक एकता और राष्ट्रीय चेतना की ज़रूरत और बढ़ जाती है। हमें तय करना ही होगा कि हम उस अमेरिका से सीखेंगे जो संकट में एकजुट हुआ, या उस भारत की तरह रहेंगे जहां विपक्ष अपने ही सैनिकों की बहादुरी पर सवाल उठाता है? राजनीतिक मतभेद स्वस्थ लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन राष्ट्रीय संकट के समय मनभेद नहीं होना चाहिए।

भारत ने युद्ध से बचते हुए भी आतंकवाद को जवाब दिया है। यही नए भारत की ताकत है। लेकिन अगर देश के भीतर से ही विरोध की आवाज़ें राष्ट्रीय सुरक्षा की हर कार्रवाई को कठघरे में खड़ा करती रहेंगी, तो हम विश्व मंच पर एकजुट राष्ट्र के रूप में कैसे उभर पाएंगे? अब समय आ गया है कि विपक्ष भी देशहित की भावना रखे और जाने कि-पार्टी बाद में, देश पहले होता है।

Topics: सर्जिकल स्ट्राइक होदेश की एकता और अखंडताराष्ट्र विरोधी बयानराष्ट्र-चेतनाबालाकोट एयर स्ट्राइकपाञ्चजन्य विशेषऑपरेशन सिंदूर
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