फ्रांस की राजधानी पेरिस से आ रहीं तस्वीरें वहां कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों के उपद्रव को बयां कर रही हैं। बाजारों, संस्थानों पर कब्जे करके कट्टर मजहबी तत्व वहां अव्यवस्था फैला रहे हैं बल्कि पुलिसकर्मियों को भी नहीं बख्श रहे हैं। फ्रांस ही नहीं, यूरोप के अनेक देशों में कट्टर मजहबी आप्रवासियों की मनमानी चरम पर है। यूरोप के कूटनीतिक और नीतिकार उन सरकारों को कोस रहे हैं जिन्होंने ‘बड़ा दिल’ दिखाते हुए ‘मुसीबत में फंसे शरणार्थियों’ के लिए अपने देश के दरवाजे खोले। फिर तो वे तेजी से फैलते गए। फ्रांस के संदर्भ में यह इसलिए ज्यादा चिंता की बात है कि वहां लगभग बीस एक दिन पहले एक रिपोर्ट आई थी जिसमें सरकार को चेताया गया था कि इस्लामी तत्व फ्रांस के लोकतांत्रिक संस्थानों में घुसपैठ कर चुके हैं और यह देश की एकता के लिए खतरा हैं।
दो वरिष्ठ सिविल अधिकारियों द्वारा तैयार की गई उक्त रिपोर्ट फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को सौंपी गई थी। उस रिपोर्ट में स्कूलों और स्थानीय सार्वजनिक निकायों में ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ द्वारा मजहबी तत्वों को घुसाने की चाल का सबूत मिलने का दावा किया गया था। रिपोर्ट मिलने के बाद राष्ट्रपति मैक्रों सरकार से उस रिपोर्ट के निष्कर्षों की गंभीरता को देखते हुए जून की शुरुआत में “नया प्रस्ताव” लाने के लिए कहा था।
यहां यह स्पष्ट रहे कि अलगाववाद का मतलब फ्रांस में समानांतर समाज में रहने वाले मुसलमानों से है, जो बुनियादी लोकतांत्रिक ढांचे में घुसपैठ कराने की चाल से अलग है। इसका मकसद होता है ढांचे में अंदर से बदलाव लाने की कोशिश करना। इसके लिए छल-कपट की आवश्यकता होती है और यह नीचे से ऊपर की ओर काम करता है।

फ्रांस के प्रसिद्ध ला फिगरो अखबार में रिपोर्ट का एक हिस्सा छापा गया था। उस आलेख को लिखने वालों ने फ्रांस के मुसलमानों के संघ एफएमएफ को ऐतिहासिक मुस्लिम ब्रदरहुड के मुख्य फ्रांसीसी उद्भव के रूप में पहचाना, जिसकी स्थापना ‘सौ साल पहले के मूल इस्लामी मूल्यों की वापसी को बढ़ावा देने’ के लिए की गई थी। यानी उस देश को वापस पाषाणयुग में लौटाने की चाल चली जा रही है। उन्होंने लिखा कि फ्रांस में मुसलमानों का यह संघ 139 मस्जिदों को नियंत्रित करता है, और 68 अन्य मस्जिदें इससे संबद्ध हैं। यह संगठन ने खेल, शिक्षा, दान और अन्य क्षेत्रों में लगभग 280 अन्य संगठनों के साथ-साथ 21 स्कूलों का भी संचालन करता है।
इस संगठन का उद्देश्य ही है “स्थानीय स्तर पर ऐसा ईकोसिस्टम स्थापित करना जिससे “जन्म से लेकर मृत्यु तक मुसलमानों के जीवन की रूपरेखा तैयार की जा सके”। संस्थानों में इनकी घुसपैठ का तरीका यह है कि इसके कट्टर कार्यकर्ता स्थानीय प्रशासन के साथ रिश्ते गांठते हैं। फिर जैसे जैसे उस प्रशासनिक तंत्र पर इनकी पकड़ कसती जाती है वैसे वैसे, वे वहां हिजाब, लंबी दाढ़ी, वेशभूषा, रोजा आदि के फरमान लागू करवाए जाते हैं। फिर मजहबी चाल—चलन मानने की सख्ती होती जाती है, लड़कियों को बुर्का पहनाया जाने लगता है, छोटी बच्चियों को हिजाब पहनने को मजबूर किया जाता है। फ्रांस के कट्टरपंथी तत्व इस बात से नाराज हैं कि वहां की सरकार ने स्कूलों में ‘अबाया’ यानी बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया था।
एफएमएफ का कहना है, “इस्लाम को पॉलिटिकल इस्लामवाद और कट्टरपंथ को एक जैसा मानकर चलना खतरनाक ही नहीं है, बल्कि यह देश के लिए भी प्रतिकूल है। इन निराधार आरोपों के पीछे इस्लाम और मुसलमानों पर धब्बा लगाने की मंशा है। केन्द्रीय गृहमंत्री ब्रूनो रिटेलो ने तो पिछले दिनों चेताया भी था कि इस्लामवाद संस्थानों में घुसपैठ करने की कोशिश कर रहा है, जिसका अंतिम उद्देश्य पूरे फ्रांसीसी समाज को शरिया कानून के तहत लाना है। अगले साल फ्रांस में नगरपालिका चुनाव होने वाले हैं। रिटेलो, जो एक कट्टरपंथी नेता माने जाते हैं, ने कहा है कि वे उम्मीदवारों में इस्लामवादियों के नाम होने की संभावना को लेकर चिंतित हैं। फ्रांस के वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलेंचन ने चेतावनी दी कि “इस्लामोफोबिया ने एक सीमा पार कर ली है।”
रिपोर्ट लिखने वाले अधिकारियों ने फ्रांस के 10 अलग-अलग क्षेत्रों और चार अन्य यूरोपीय देशों का दौरा करके निष्कर्ष निकाला कि मुस्लिम ब्रदरहुड मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में अपना प्रभाव खो रहा है, और इसलिए तुर्की और कतर से मिलने वाले धन से यूरोप को निशाना बना रहा है। उन्होंने लिखा, “यूरोप में खुद को स्थापित करने के लिए विचारधारा को पश्चिमी बाना ओढ़ाने के बाद, (मुस्लिम ब्रदरहुड) एक हिंसक कट्टरवाद को छिपाते हुए पाषाणकालीन इस्लामी चाल—चलन की जड़ें जमाने की कोशिश कर रहा है।”

















