मलेशिया में क्यों स्थानीय मुसलमान ही हुए रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ?
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मलेशिया में क्यों स्थानीय मुसलमान ही हुए रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ?

उम्माह के आधार पर तो मुसलमान एक ही कौम है और कोई भेदभाव नहीं होता है, फिर ऐसा क्यों है कि वे अपने ही मजहबी रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Jun 8, 2026, 09:25 am IST
inविश्व
(प्रतीकात्मक चित्र)

(प्रतीकात्मक चित्र)

मलेशिया में स्थानीय मुसलमान म्यांमार के शरणार्थी रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ इंटरनेट पर अभियान चलाए हुए हैं। वे कई तरह से प्रश्न उठा रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को बाहर निकालने की अपील है। परंतु उम्माह के आधार पर तो मुसलमान एक ही कौम है और कोई भेदभाव नहीं होता है, फिर ऐसा क्यों है कि वे अपने ही मजहबी रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं?

क्या है मामला?

दरअसल, म्यांमार से भागकर रोहिंग्या मुसलमान मलेशिया में शरण लेकर रह रहे हैं। वे दया के आधार पर रह रहे हैं, लेकिन काफी समय से वहां इनके विरोध में माहौल बन रहा है। हाल ही में यह विरोध और तेज हो गया जब बकरीद पर रोहिंग्या समुदाय द्वारा बड़े पैमाने पर मवेशियों की कुर्बानी दी गई। 27 मई को सेलंगोर में जलन बेसर सेलयांग बारू के पास रहने वाले लोगों ने कुर्बानी के बाद सफाई को लेकर चिंता जताई और शिकायत की कि पशुओं का खून और अवशेष पास के ही नाले में फेंक दिए गए।

कुर्बानी के बाद भारी मात्रा में गंदगी फैली है। मलेशिया के मुसलमानों ने ऑनलाइन याचिका दायर की कि इन लोगों को मलेशिया से हटाया जाए। इस पर लाखों लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं। क्या यहां मजहबी समानता का मामला नहीं आता है? क्यों मुसलमानों को ही मुसलमान ऐसे लगने लगे हैं, जो उनके संसाधनों पर कब्जा करने के लिए आ गए हैं?

विवाद का कारण केवल गंदगी ही नहीं है। विवाद का कारण यह है कि चूंकि मलेशिया में इन लोगों को नौकरी आदि करने का अधिकार नहीं है और यह पूरी तरह से दया पर ही निर्भर हैं, तो आखिर इन लोगों के पास इतने सारे पैसे कहाँ से आए कि कुर्बानी के लिए इन्होंने इतने जानवर खरीद लिए?

जैसे ही कुर्बानी की खबर फैली वैसे ही सोशल मीडिया में लोगों ने बातें करना शुरू कर दी कि आखिर जो समुदाय खुद कई तरह की सहायता पर निर्भर है, उसके पास पशु खरीदने के लिए संसाधन कहां से आए? और इसके साथ ही पुरानी शिकायतें भी आने लगीं कि ये लोग मलेशिया के संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं और स्थानीय नागरिकों के लिए बनी नौकरियों पर निशाना साध रहे हैं।

रोहिंग्या कार्यकर्ताओं ने कहा “सब झूठ है!”

जहां मलेशिया के मुसलमानों का यह कहना है कि रोहिंग्या मुसलमानों ने कम से कम 60 पशुओं की कुर्बानी दी और उसके कारण गंदगी हुई और ये पशु उनके पास कैसे और कहाँ से आए तो वहीं रोहिंग्या कार्यकर्ताओं का यह कहना है कि यह ट्रेंड है कि कुछ भी हो तो रोहिंग्या मुसलमानों पर ही आरोप लगाया जाता है। चूंकि म्यांमार से आए इन लोगों के पास अपनी कोई भूमि नहीं है, तो ये लोग आसान शिकार होते हैं। इनका कहना है कि इन लोगों पर तमाम तरह के आरोप लगाए जाते है, जैसे कि अपराध बढ़ गए हैं या फिर सफाई नहीं है या फिर पैसे कहाँ से आए और यह अक्सर होता रहता है?

एक निजी संस्थान से कानून की पढ़ाई कर रही और विदेश से पढ़ाई के लिए धन पा रही नूर सदेक का कहना है कि जब भी कोई मामला किसी एक रोहिंग्या का उठता है या फिर कोई एक आदमी इस समुदाय से गलत करता हुआ पाया जाता है तो पूरे समुदाय के प्रति घृणा फैल जाती है।

क्या है ऑनलाइन याचिका में?

यह देखना रोचक है कि आखिर ऑनलाइन याचिका में क्या है? उस याचिका में कहा गया है कि रोहिंग्या आबादी के बढ़ने से बुनियादी ढांचे और सामाजिक सेवाओं पर दबाव पड़ता है। इसमें सरकार से तीसरे देश में बसाने और म्यांमार के पास ही शरणार्थियों को ज़्यादा मदद देने जैसे विकल्पों पर विचार करने को कहा गया है।
इस समुदाय की बढ़ती आबादी को लेकर सोशल मीडिया पर आवाज उठाने वाले इजजुन शाह ने लिखा कि “पहले हमने उनकी मदद की, मगर समय के साथ वे अपने दोस्तों और परिवार वालों को भी यहाँ ला रहे हैं?”

वहीं रोहिंग्या मुसलमानों की ओर से भी यह कहा जा रहा है कि मलेशिया के मुसलमान उन्हें हटाना चाहते हैं। उनकी वेबसाइट के अनुसार मलेशिया से कुछ लोग उस समुदाय को नष्ट करना चाहते हैं, जो अपनी जान बचाने के लिए एक देश से दूसरे देश भटक रहा है।

सोशल मीडिया पर लोग प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या कारण है कि एक मुसलमान समुदाय को दूसरा मुसलमान समुदाय ही अपने देश में शरण देने के खिलाफ क्यों है? क्या उम्माह यही है?

 

Topics: रोहिंग्या मुसलमानमुसलमानमलेशियाउम्माह
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