नक्सली : नक्सलवाद पर रणनीतिक जीत
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नक्सलवाद पर रणनीतिक जीत

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, जिसमें 54 नक्सली गिरफ्तार किए गए और 84 ने आत्मसमर्पण किया, संकेत देता है कि वामपंथी आतंकवाद अब अंतिम सांसें गिन रहा

Written byअशोक कुमारअशोक कुमार
Jun 2, 2025, 02:45 pm IST
inमत अभिमत, छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में शीर्ष नक्सली बसवा राजू सहित 27 नक्सलियों को ढेर करने के बाद जिला रिजर्व गार्ड के जवान।

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में शीर्ष नक्सली बसवा राजू सहित 27 नक्सलियों को ढेर करने के बाद जिला रिजर्व गार्ड के जवान।

21 मई को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दशकों से चले आ रहे नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष में ऐतिहासिक उपलब्धि की घोषणा की। 30 वर्ष में पहली बार महासचिव रैंक के नक्सली कमांडर को खत्म किया गया। इसे गृहमंत्री ने अभूतपूर्व सफलता करार दिया। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, जिसमें 54 नक्सली गिरफ्तार किए गए और 84 ने आत्मसमर्पण किया, संकेत देता है कि वामपंथी आतंकवाद अब अंतिम सांसें गिन रहा है। सरकार की नीति अब स्पष्ट है- जो हिंसा का मार्ग चुनेंगे, उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब मिलेगा; जो हथियार छोड़कर मुख्यधारा में आना चाहेंगे, उन्हें अवसर दिया जाएगा।

अशोक कुमार
उपकुलपति, हरियाणा खेल विश्विवद्यालय एवं पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तराखंड

गृह मंत्रालय ने मार्च 31, 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने की समयसीमा तय की है। संकेत साफ हैं कि अब स्थिति सरकार के पक्ष में है। 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिसे भारत की ‘सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती’ कहा था, वह नक्सलवाद अब हार रहा है। नक्सलियों ने नेपाल के पशुपतिनाथ से आंध्र प्रदेश के तिरुपति तक एक रेड कॉरिडोर स्थापित करने की योजना बनाई थी। 2013 में 126 जिले नक्सली चपेट में थे। लेकिन मार्च 2025 तक यह संख्या घटकर केवल 18 रह गई थी, जिनमें से सिर्फ 6 जिलों को ही ‘सबसे अधिक प्रभावित’ श्रेणी में रखा गया है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के दुष्प्रचार के आगे नहीं झुकेगी, जो हथियारबंद नक्सलियों के पक्ष में खड़े हैं, जो लोकतांत्रिक रास्ता अपनाने की बजाय बंदूक के बल पर सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं।

सरकार की बहुआयामी रणनीति, जिसे एक दशक से अधिक समय से लगातार अपनाया गया है, अत्यधिक प्रभावशाली सिद्ध हुई है। गृह मंत्रालय द्वारा 2017 से अपनाई गई ‘समाधान’ रणनीति को निरंतरता और दृढ़ता से लागू करने के कारण जमीनी सफलता मिली है। इसमें ठोस सुरक्षा संबंधी कार्ययोजना के साथ विकासात्मक पहल भी शामिल है। इस योजना के तहत मुख्य लक्ष्य निर्धारित कर उनकी नियमित रूप से निगरानी करने से भी बड़ा अंतर आया है।

पूर्व की रणनीतिक सीमाएं

2010 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में प्रतिनियुक्ति के दौरान मुझे ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के अंतर्गत नक्सलियों से भारत के लंबे संघर्ष की जटिलताओं को प्रत्यक्ष देखने का अवसर मिला था। समस्या की गंभीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 2010 में दंतेवाड़ा जिले में एक सीआरपीएफ गश्ती दल पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया, जिसमें 76 जवान बलिदान हो गए थे। इससे उनकी रणनीतिक योजना, कौशल, समन्वय और हथियारों की क्षमता का पता चला था। ऐसे हमलों ने केंद्रीय बलों को पूर्णतया रक्षात्मक नीति अपनाने पर मजबूर कर दिया। बीजापुर और दंतेवाड़ा में हालात इतने खराब थे कि कोई भी गतिविधि करने से पहले घात और हमलों से बचने के लिए ‘रोड ओपनिंग पार्टी’ तैनात करनी पड़ती थी। इलाके में बारूदी सुरंगें बिछी रहती थीं, बम धमाके या अचानक फायरिंग का खतरा हमेशा बना रहता था।

परिणामस्वरूप, सुरक्षा बल रक्षात्मक हो गए और अपने शिविरों तक सीमित हो गए, जिससे नक्सल विरोधी अभियानों में बाधा आई। इससे एक ओर सुरक्षाबलों का मनोबल कमजोर हुआ, दूसरी ओर लोगों का सुरक्षाबलों पर भरोसा भी डगमगाया। इससे हुआ यह कि खुफिया सूचनाएं पूरी तरह से बंद हो गईं। जनजातीय समाज के लोगों को नक्सलियों और सुरक्षाबलों के बीच चयन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। जहां एक ओर पुलिस एवं सरकार उन्हें सुरक्षा का व्यावहारिक विकल्प देने में विफल रही, वहीं नक्सली उन्हें यह विश्वास दिलाने में सफल रहे कि वे उनके लिए जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं। लिहाजा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे इलाकों में नक्सलियों का नियंत्रण पूरी तरह से स्थापित हो गया था। उन्होंने सरकार की विकास योजनाओं जैसे- सड़क निर्माण, टेलीफोन नेटवर्क और बिजली लाइनों के विस्तार को भी रोक दिया, ताकि अपने नियंत्रण वाले तथाकथित ‘मुक्त क्षेत्रों’ पर उनकी पकड़ बनी रहे।

रक्षात्मक रणनीति से आक्रामक रणनीति की ओर पिछले दशक में नक्सलवाद के विरुद्ध मिली सफलता का श्रेय विकासोन्मुखी रणनीति एवं सुरक्षा संबंधित रणनीति, दोनों को दिया जा सकता है। सरकार की लक्षित विकासपरक पहलों ने लोगों का सरकार पर विश्वास बहाल करने में अहम भूमिका निभाई है। बीते एक दशक में सड़क संपर्क और टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क में भारी सुधार हुआ है, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल द्वारा किए गए सिविक एक्शन कार्यक्रमों ने स्थानीय लोगों के दिलों में जगह बनाई है। ‘रोशनी योजना’ जनजातीय युवाओं के कौशल विकास व रोजगार प्राप्त करने मददगार रही है।

नक्सलियों को मुख्यधारा में लाना

अब जबकि संचालनात्मक स्तर पर स्थिति सुरक्षाबलों के पक्ष में है, स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए अगला चरण नक्सलियों को मुख्यधारा में शामिल करने पर केंद्रित होना चाहिए। जमीनी लड़ाई जीतना सिर्फ आधी सफलता है, नक्सलियों का पुनर्वास और उनका मुख्यधारा में एकीकरण दीर्घकालिक शांति के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्हें आत्मसमर्पण करने और लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

आगे की राह

केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा निर्धारित 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने की समयसीमा अब नजदीक दिखाई दे रही है, लेकिन हमें अतिविश्वासी नहीं होना चाहिए। हमें हथियारबंद कट्टर नक्सलियों पर लगातार दबाव बनाए रखना होगा और उनके वित्तीय नेटवर्क को ध्वस्त करना होगा, क्योंकि नक्सली रंगदारी और संरक्षण वसूली से धन प्राप्त करते हैं।

नक्सलवाद की समस्या केवल सुरक्षा से जुड़ी नहीं है, बल्कि यह विकास और सुशासन से भी जुड़ी हुई है। भले ही सुरक्षाबल नक्सलियों के संचालनात्मक ढांचे को नष्ट कर दें, लेकिन जब तक मूल मुद्दों का समाधान नहीं किया जाएगा, नक्सलवादियों के पुनर्गठन का खतरा बना रहेगा। माओवादी विचारधारा को फिर से उभरने का अवसर न मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए अगला चरण लोकोन्मुखी सरकार, भूमि अधिकार, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और आर्थिक उत्थान पर केंद्रित होना चाहिए। दोहरी रणनीति का जारी रहना अत्यावश्यक है। सतत सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ एक मजबूत विकास केंद्रित रणनीति बनानी होगी, जो नक्सलवाद के मूल कारणों को खत्म कर माओवादी विचारधारा को पुनः पनपने न दे।

अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण है नक्सली विचारधारा का मजबूती से प्रतिकार करना। लड़ाई केवल हथियारबंद नक्सलियों से नहीं है, बल्कि एक विचारधारा से भी है। बसवा राजू जैसे लोगों को समाप्त किया जा सकता है, लेकिन उनकी विचारधारा को नहीं। पुनर्गठन की कोई संभावना न रहे, इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें हर मोर्चे पर अत्यंत सतर्क और सक्रिय रहना होगा। हमें नक्सली प्रचार का प्रभावी रूप से नियमित प्रतिकार करना होगा। दिल और दिमाग की यह लड़ाई अंततः बंदूक से नहीं, बल्कि विकास और शासन की खामियों को दूर कर, वंचित वर्गों के उत्थान के लिए लगातार कार्य कर के ही जीती जा सकती है।

समन्वित सुरक्षा उपाय

विकासात्मक पहलों के साथ-साथ सरकार ने सुरक्षा के मोर्चे पर भी बहुत योजनाबद्ध, समन्वित और दृढ़ता के साथ कार्रवाई की है। जिन कारकों ने बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वे कुछ इस तरह हैं:

  • 1.केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन। पहली बार केंद्रीय गृह मंत्री ने स्वयं नेतृत्व करते हुए बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया।
  • 2.केंद्रीय और राज्य बलों के बीच एकीकृत कमान संरचना के माध्यम से बेहतर समन्वय।
  • 3.जिला रिजर्व ग्रुप ने गेम चेंजर की भूमिका निभाई। इसमें अधिकतर आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सली होते हैं, जिन्हें इलाके की गहरी जानकारी होती है और जिनके स्थानीय लोगों से संबंध होते हैं। इससे खुफिया जानकारी जुटाने और बेहतर रणनीति बनाने में बड़ी मदद मिली।
  • 4.दूरदराज के इलाकों में सुरक्षा शिविरों की स्थापना और थानों का सुदृढ़ीकरण।
  • 5.तकनीकी सहायता, विशेषकर ड्रोन और सैटेलाइट इमेजिंग द्वारा निगरानी, जिससे घात लगाकर हमलों की घटनाएं काफी कम हो गईं।
Topics: नक्सलवादपाञ्चजन्य विशेषऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्टवामपंथी आतंकवादनक्सली विचारधारानक्सली बसवा
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