महाराणा प्रताप और बाबा श्रीचंद जी: राष्ट्रप्रेम और हिंदुत्व की प्रेरणा
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महाराणा प्रताप और बाबा श्रीचंद जी: राष्ट्रप्रेम और हिंदुत्व की प्रेरणा

महाराणा प्रताप को बाबा श्रीचंद जी से मिली राष्ट्रप्रेम और हिंदुत्व की प्रेरणा ने हल्दीघाटी की लड़ाई में मुगलों को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जानें कैसे बाबा श्रीचंद जी ने उदयपुर में महाराणा को आशीर्वाद और मार्गदर्शन दिया।

Written byराकेश सैनराकेश सैन
May 29, 2025, 12:23 pm IST
inराजस्थान
महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप

भारत के इतिहास में राष्ट्र पुुरुष महारणा प्रताप का नाम मुर्दा शरीरों में भी जान फूंकने वाला रहा है। उन्होंने कभी अधीनता स्वीकार नहीं की, घास की रोटियां खाईं पर मुगलों के सामने नहीं झुके बल्कि कम संसाधानों के बाद भी अकबर की सेना को हल्दीघाटी की लड़ाई में धूल चटाई। महाराणा प्रताप को देशभक्ति की प्रेरणा देने वालों में अनेक महापुरुषों के नाम है और इनमें एक नाम है श्री गुरु नानक देव जी के सपुत्र बाबा श्रीचंद जी का, जिन्होंने उदासीन सम्प्रदाय की स्थापना की।

जिस तरह श्री गुरु नानक देव जी ने अपने समय में अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई और देश-विदेश में घूम-घूम कर धर्म की स्थापना की उसी तरह उनके सपुत्र बाबा श्रीचन्द जी ने भी देश-विदेशों के विभिन्न हिस्सों में पदयात्राएं कीं। उन्होंने विधर्मियों के खिलाफ देशवासियों को एकजुट किया और राष्ट्र की बिखरी हुई शक्ति को एकजुट करने का काम किया। इसी प्रयास में बाबा श्रीचंद जी मारवाड़ में महाराणा प्रताप से भी मिले और उन्हें जीत का आशीर्वाद दिया।

पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मनमोहन सहगल अपनी पुस्तक शिवस्वरूप श्रीचन्द्र (सन 2000 संस्करण) में बताते हैं कि -अपनी यात्राओं के दौरान मारवाड़ के उदयपुर पहुँचने पर बाबा श्रीचन्द जी ने एकलिंग महादेव के मन्दिर के निकट ही धूना जमाया। सिन्ध प्रान्त में बाबा श्रीचन्द जी द्वारा हिन्दुओं के पक्ष में किए प्रयास, धर्म-प्रचार एवं मुसलमानों के अहेतु की अत्याचारों का डट कर विरोध आदि बातें हवा के घोड़े पर सवार मारवाड़ में भी पहुँची।

मारवाड़, जो उस समय हिन्दुत्व की प्रज्वलित ज्योति का संरक्षक समझा जाता था, आचार्य श्री श्रीचन्द के आगमन की सूचना मात्र से चमत्कृत हो उठा। मराठवाड़ा की जनता अपने प्रिय अराध्य के दर्शनों की ललक लिए एक लिंग मन्दिर के निकट एकत्रित होने लगी। उदयपुर के राणा के मन्त्री भामहशाह भी आचार्यश्री की कीर्ति से परिचित थे। वह उनके श्रद्धालु हो गये थे और दर्शनों के लिए अत्यधिक उत्सुक थे। उसी ने महाराणा प्रताप को भगवान श्रीचन्द के दर्शनों के लिए प्रेरित किया और अपने साथ उनके धूने पर लेकर आये।
भामहशाह और महाराणा प्रताप ने झुककर भगवान को शीश नवाया और आदर-भाव से निकट बैठ गए। बाबाजी अन्तर्यामी थे, उन्हें दोनों को पहचानते कोई समय न लगा। इधर-उधर की कुछ बातचीत के बाद बाबा श्रीचन्द जी ने महाराणा प्रताप को स्पष्ट शब्दों में हिन्दू जाति और राष्ट्र के रक्षक के रूप में स्थापित करते हुए उसकी आगामी योजना को रूपायित कर डाला।

भगवान ने राणा प्रताप को सूर्यवंश का वर्तमान आलोक सम्बोधित करते हुए समझाया, ‘तुम श्रीराम के वंशज हो। सूर्यवंशी श्रीराम ने अकेले और साधनहीन होते हुए भी साहस और उत्साह का दामन थामकर सत्पथ का अनुसरण करते हुए दैत्यराज रावण जैसे शत्रु से टकरा जाने का सामथ्र्य जुटा लिया था, श्रीराम को सत्पथ पर बढ़ते देखकर अनेक सहयोगी उनकी सहायता के लिए उनसे आ मिले थे और परिणामत: श्रीराम विजयी हुए थे। इस कथांश से हमें विश्वास होता है कि साहसी और उत्साही जीव कभी भी अकेले नहीं होते, विजयश्री सदैव उनके चरण चूमती है। ठीक यही स्थिति तुम्हारी भी है। तुम्हारा मस्तक मुसलमानों के सामने आज तक नहीं झुका, भविष्य में भी वह इसी प्रकार उन्नत रहना चाहिए।

अपने को अकेले मत समझो, समूची हिन्दू जाति तुम्हारे साथ है। तुम्हारे ही साहस और उत्साह के बूते पर राजस्थान मुसलमानों के तथाकथित गौरव को धूल चटा रहा है। राष्ट्रप्रेम, देशभक्ति, हिन्दुत्व और भारतश्री के सच्चे प्रेरक और रक्षक बनकर तुम्हें मुसलमानों के अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लौहस्तम्भ की भान्ति अटल रहना है। कहावत है न कि ईश्वर उसकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करता है। भगवान् एकलिंग महादेव तुम्हारे सहायी हैं, इसलिए तुम्हारे प्रत्येक प्रयास में तुम्हें सफलता मिलेगी। अपने पूर्वजों बप्पा रावल और संग्राम सिंह को याद करो। वे टूट तो गए, कभी झुके नहीं। राजस्थान की तो रमणियों ने कभी शत्रु की अधीनता को अंगीकार नहीं किया। कर्मदेवी की कृपाण की झंकार आज भी प्रदेश में गुंजार करती है, पद्मिनी का आत्मबलिदान आज भी ललनाओं का अमर सिन्दूर बना है और तुम्हारी अटलता भी इसी प्रकार युग-युग की कहानी बन जाएगी।

तुम्हें इतनी बातें समझाने को मेरा मन इसलिए हुआ, कि मैं भी तुम्हारी तरह क्षत्रिय वंश से सम्बद्ध हूं। सूर्यवंशी होने के नाते मेरे मन में बड़े वलवले पैदा होते हैं, किन्तु श्रौत-चतुर्थाश्रमी होने के कारण मुझे अपनी भावनाओं को तुम सरीखे परमवीरों के माध्यम से व्यवहार में रखना होता है। मेरा विश्वास है, तुम मेरी अटूट धारणा को कभी मिटने न दोगे। मेरा अशीर्वाद तुम्हारे साथ है।’ भगवान श्रीचन्द के उद्गार सुनकर राणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की, ‘वह प्राण रहते कभी विधर्मियों के सम्मुख न झुकेगा और रक्त की अन्तिम बून्द तक अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध लड़ेगा।’ राणा की इस प्रतिज्ञा से भगवान को सन्तोष हुआ और उन्होंने आशीष देकर राणा और मन्त्री को विदा किया। जाते जाते यह भी कहा, ‘कभी भीड़ पड़े तो मुझे याद करना, मैं अपने सामर्थ्य के अनुसार सहायी हूँगा।’

भगवान श्रीचन्द जी की यह वाणी कालक्रमानुसार सत्य सिद्ध हुई। राजस्थान के सभी राजाओं ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली, किन्तु महाराणा नहीं झुके। भगवान श्रीचन्द जी तो अन्तर्यामी थे। स्थिति को समझते थे, इसलिए उन्होंने स्वप्न में भामहशाह को दर्शन देकर संगृहीत धन को राष्ट्र-अर्थ खर्च करने की प्रेरणा दी। इसी प्रेरणा से परिचालित भामहशाह अपनी संचित लक्ष्मी के सदुपयोग के लिए जंगल में परेशान राणा के पास उपस्थित हुआ और अपना पूरा संचित धन उनके चरणों पर रखकर बोला, ‘आप इस धन से पुन: सेना एकत्र करें और मुगलों के दाँत खट्टे कर दें।’ चिंता की बात है कि शस्त्र और शास्त्र के मेलजोल वाली इस घटना को भारत के इतिहास में स्थान नहीं मिल पाया है।

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के अपने विचार हैं, आवश्यक नहीं इसे पॉञ्चजन्य इससे सहमत हो)

Topics: Maharana Pratapहल्दीघाटीमहाराणा प्रतापpatriotismबाबा श्रीचंदराष्ट्रप्रेमएकलिंग महादेवBaba Shrichandहिंदुत्वEkling MahadevHindutvaHaldighati
राकेश सैन
राकेश सैन
वरिष्ठ पत्रकार। पंजाब के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। [Read more]
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