आज वीर सावरकर जी की जयंती है। सावरकर का नाम आते ही हर देशभक्त के रोएं खड़े हो जाते हैं। सावरकर जी के पूरे देश के क्रान्तिकारियों के घष्ठि संबंध थे और पंजाब के क्रान्तिकारी भी उनके कम मुरीद नहीं थे। वीर सावरकर अपनी आत्मकथा ‘मेरा आजीवन कारावास’ में वे पंजाब के क्रान्तिकारियों के बारे में लिखते हैं –
‘यद्यपि भाई परमानन्द (गदर पार्टी के नेता) ही मेरे व्यक्तिगत परिचित थे किन्तु उनमें से अधिकांश मुझे या मेरे कार्यों को जानते थे। जेल में आते ही वे मुझसे मिलने को आतुर हो जाते थे। यद्यपि जेल अधिकारी यह भरसक प्रयास करते थे कि वे मेरे सम्पर्क में न आ पायें किन्तु उनकी अधिक संख्या को देखते हुए उन्हें मुझसे दूर रखना असम्भव ही था। कुछ ही दिनों में उनका (भाई परमानन्द जी का) मेरा सम्पर्क शुरू हो गया। उन्होंने मुझे बताया कि अमरीका से प्रकाशित समाचार पत्र ‘गदर’ ने मेरी चर्चित पुस्तक ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ का हिन्दी, उर्दू तथा पंजाबी में अनुवाद प्रकाशित किया है।
अमरीका में ‘गदर’ आन्दोलन के प्रमुख नेता पं. जगतराम भी लाहौर षड्यंत्र काण्ड के अभियुक्त थे। उन्होंने मृत्युदण्ड की सजा सुनने पर भी अपना बचाव करने से यह कह कर इनकार कर दिया था कि ‘जब मैंने सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपनाया है तो बचाव कैसा?’ उन्होंने मुझे बताया था- ‘‘मैं राजनीति से सर्वथा अनभिज्ञ तथा आरामपूर्वक जीवन बिताने वाला व्यक्ति था। किन्तु एक दिन मेरे हाथ आपका ग्रन्थ ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पड़ गया। उसे मैंने पूरे दिन और पूरी रात पढ़ डाला। उसे पढक़र मेरा जीवन बदल गया और उसी समय मैंने संकल्प लिया कि अपने राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए शेष जीवन अर्पित कर दूंगा। आपकी पुस्तक के कारण ही आज मैं आपके बीच हूं।’’ यह सुनकर मैंने मजाक में कहा-‘‘तब तो मेरी पुस्तक अण्डमान भेजे जाने के ‘टिकट’ का काम करती है।’
मुझे कोल्हू में जोते जाने का प्रचार अमरीका में किस प्रकार हुआ, यह मुझे कुछ सिख बन्धुओं ने रोचक किस्से के रूप में बताया। उन्होंने बताया-‘‘अमरीका से प्रकाशित होने वाले क्रान्तिकारियों के समाचारपत्र में आपका कोल्हू चलाते हुए एक रेखांकित प्रकाशित हुआ। सडक़ पर एक लडक़े के हाथ में मैंने वह चित्र देखा तो, उसे देखकर मेरे हृदय को भारी आघात लगा तथा आंखों में आंसू आ गए। मेरे मन में विचार आया कि एक ओर अपनी मातृभूमि, अपने राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए सावरकर जी आदि क्रान्तिकारी कोल्हू में जुत रहे हैं तो दूसरी ओर हम खाने-पीने, मौज उड़ाने में मस्त हैं।’’
इन सिखों ने सुख-सम्पत्ति को लात मार दी तथा भारत आकर वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रान्तिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए। राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर, सजा देकर उन्हें अण्डमान भेज दिया गया। पंजाब से जुड़े देश के महान क्रान्तिकारी भगत सिंह, सावरकर को एक आदर्श के रूप में देखते थे। कलकत्ता से निकलने वाले साप्ताहिक ‘मतवाला’ के 15 और 22 नवम्बर, 1924 के अंक में ‘विश्वप्रेम’ के नाम से भगत सिंह का लेख प्रकाशित हुआ जिसमें वह कहते हैं, ‘विश्व प्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी,कट्टर अराजकतावादी कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नही समझते- वही वीर सावरकर..’ यह लेख बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लिखा गया था। (भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज, पृष्ठ 93)
जिन दिनों भगत सिंह ने यह लेख लिखा, उन दिनों सावरकर रत्नागिरी में नजरबन्द थे। उन पर राजनीतिक गतिविधयों में भाग लेने को लेकर प्रतिबन्ध लगा हुआ था। मराठी इतिहासकार य.दि. फडक़े के अनुसार, भगत सिंह ने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के विषय में सावरकर की किताब ‘1857-इण्डिपेण्डेंस समर’ का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया और क्रान्तिकारियों में इसका प्रचार किया था।
(शोध सावरकराञ्चा, य. दि. फडके, श्रीविद्या प्रकाशन, पुणे)
सावरकर की एक और पुस्तक ‘हिन्दूपदपादशाही’ से भी भगत सिंह ने प्रेरणा ली थी। अपनी जेल डायरी में उन्होंने इस पुस्तक से कई उद्धरण लिए हैं जो इस प्रकार हैं … ‘उस बलिदान की सराहना केवल तभी की जाती है जब बलिदान वास्तविक हो या सफलता के लिए अनिवार्य रूप से अनिवार्य हो. लेकिन जो बलिदान अन्तत: सफलता की ओर नहीं ले जाता है, वह आत्मघाती है और इसलिए मराठा युद्धनीति में उसका कोई स्थान नहीं था।’ (पृष्ठ 257)
‘वीरता के कार्य किए बिना, वीरता का प्रदर्शन किए बिना, साहस के साथ इतिहास बनाये बिना इतिहास लिखना हमारे वक्त का एक बुरा सपना है। वीरता को वास्तविकता बनाने का अवसर न मिलना हमारे लिए अफसोस की बात है।’ (पृष्ठ 265-266)
‘राजनीतिक दासता को कभी भी आसानी से उखाड़ फेंका जा सकता है। लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्व के बन्धनों को तोडऩा मुश्किल है।’ (पृष्ठ 272-273)
23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई। उस समय सावरकर ने कविता लिखी कि :-
हा, भगत सिंह, हाय हा!
चढ़ गया फांसी पर तू वीर हमारे लिये हाय हा!
राजगुरु तू, हाय हा!
वीर कुमार, राष्ट्रसमर में हुआ शहीद
हाय हा! जय जय हा !
रत्नागिरी में सावरकर के घर पर हमेशा भगवा झण्डा फहराया जाता था। लेकिन भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव के बलिदान के अगले दिन उनके घर पर काला झण्डा लहरा रहा था। भगत सिंह के साथियों जैसे भगवतीचरण वोरा आदि ने भी भगत सिंह व अन्य क्रान्तिकारियों पर सावरकर और उनके साहित्य के प्रभाव में विस्तार से लिखा है जो राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज’ में उपलब्ध है।
पंजाब के महान क्रान्तिकारी मदन लाल ढींगरा तो वीर सावरकर को अपना गुरु ही मानते थे। इंजीनियरिंग पढऩे की महत्वाकांक्षा के चलते जुलाई 1906 में इग्लैंड पहुंचे। वहां उन्हें शीघ्र ही प्रवेश मिल गया। खाली समय में वे लंदन की सडक़ों पर घूमा करते थे। उन दिनों सावरकर इंग्लैंड में ही थे। एक दिन लंदन की सडक़ों पर घूमते हुए मदन लाल इंडिया हाउस पहुंचे तो वहां पर वीर सावरकर का भाषण सुनकर अत्यंत प्रभावित हुए।
सावरकर को सुनने के बाद उनमें भी देशभक्ति की प्रबल भावना हिलोरें लेने लगीं। उन दिनों इंग्लैंड में कर्जन वायली नामक एक ब्रिटिश अधिकारी प्रवासी भारतीय छात्रों की जासूसी करने के कारण काफी कुख्यात हो चुका था। भारतीय छात्रों को उससे इतनी घृणा हो गयी थी कि वे उसे अवसर मिलते ही समाप्त कर देना चाहते थे। मदनलाल यह कार्य अपने हाथों से सम्पन्न करना चाहते थे। उन्हें अवसर भी मिला किन्तु उन्हें इसके लिए बेहद कठिन परीक्षा से भी गुजरना पड़ा। वीर सावरकार ने उनकी परीक्षा ली जिसमें वह पास हुए और फिर मदन लाल का पूरा जीवन ही बदल गया।
सावरकर की योजना से मदनलाल इण्डिया हाउस छोडक़र एक अंग्रेज परिवार में रहने लगे। उन्होनें अंग्रेजो से मित्रता बढ़ाई पर गुप्त रूप से वह शस्त्र संग्रह उनका अभ्यास तथा शस्त्रों को भारत भेजने के काम में सावरकार जी के साथ में लगे रहे। ब्रिटेन में भारत सचिव का सहायक कर्जन वायली था। वह विदेशों में चल रही भारतीय स्वतंत्रता की गतिविधियों को कुचलने में स्वयं को गौरवान्वित समझता था। मदनलाल को उसे समाप्त करने का काम सौंपा गया। मदनलाल ने एक रिवाल्वर और पिस्तौल खरीद ली। वह अंग्रेज समर्थन संस्था इण्डियन नेशनल एसोसिएशन के सदस्य बन गए। एक जुलाई 1909 को इस संस्था के वार्षिकोत्सव में कर्जन वायली मुख्य अतिथि था। मदनलाल भी सूट और टाई पहनकर मंच के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गये उनकी जेब में पिस्तौल रिवाल्वर व दो चाकू थे। कार्यक्रम समाप्त होते ही मदनलाल ने मंच के पास जाकर कर्जन वायली के सीने और चेहरे पर गोलियां दाग दीं। वह नीचे गिर गया। मदनलाल को पकड़ लिया गया। 5 जुलाई को इस हत्या की निंदा की एक सभा हुई। पर सावरकर ने वहां निंदा प्रस्ताव पारित नहीं होने दिया। उन्हें देखकर लोग भय से भाग गये।
जब ढींगरा पर मुकदमा प्रारम्भ हो गया। मदनलाल ने कहा- मैंने जो किया है वह बिल्कुल ठीक किया है। भगवान से मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा जन्म फिर से भारत में ही हो। उन्होंने एक लिखित वक्तव्य भी दिया। शासन ने उसे वितरित नहीं किया। पर उसकी एक प्रति सावरकर के पास भी थी। उन्होंने उसे प्रसारित करवा दिया। इससे ब्रिटिश राज्य की पूरी दुनिया में भारी बदनामी हो गयी। 17 अगस्त, 1909 को पेण्टनविला जेल में मदनलाल धींगरा ने भारतमाता की जय बोलते हुए फांसी का फंदा चूम लिया।
असल में वीर सावरकर केवल क्रान्तिकारी ही नहीं बल्कि महान विचारक व उस समय के समस्त क्रान्तिकारियों व देशभक्तों के प्रेरणास्रोत थे। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर भारत माँ के अनेक वीर सपूतों ने अपना तन, मन और धन देश के नाम कर दिया। वीर सावरकर को देशभक्तों व देशभक्ति की गंगौत्री कहना अतकथनी नहीं होगा।

















