इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं, अपितु विषम परिस्थितियों पर मानवीय चेतना की विजय गाथा है। वीर विनायक दामोदर सावरकर का जीवन इसी अदम्य चेतना और अडिग आत्मबल का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। जब उनकी सर्वस्व, भारतमाता परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ गई थीं, तब विराट दुःख को सहर्ष अपनाते हुए वे विकराल काल से टकराने के लिए उठ खड़े हुए। सातों समुद्रों पर राज करने वाली ब्रिटिश सत्ता को ललकारते हुए वे उस पर टूट पड़े। सावरकर का आत्मबल कोई साधारण मानसिक दृढ़ता नहीं थी, यह वह अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक रूपांतरण था जिसने अंततः परतंत्र भारतमाता को विमुक्त करने की सुदृढ़ नींव रखी। परिणामस्वरूप, उनकी जीवनयात्रा ‘कालजयी’ और ‘मृत्युंजय’ बन गई।
कालेपानी की चुनौती और यक्ष प्रश्न
पचास वर्ष के कालेपानी की क्रूर सजा सुनने के बाद भी सावरकर डिगे नहीं। उन्होंने अदम्य विश्वास के साथ तत्कालीन व्यवस्था से प्रतिप्रश्न किया, “पचास साल? पचास वर्ष तक अंग्रेजों का शासन यहां टिक भी सकेगा क्या?” अंदमान की वह भयानक कालकोठरी, वह भीषण एकांत, वह पाशविक प्रताड़ना और अमानवीय यातनाएं उन्होंने आखिर किस आंतरिक शक्ति के बल पर सहन की होंगी? इतना बड़ा साहस और धैर्य उनमें कहां से आया होगा और कैसे विकसित हुआ होगा? इस प्रकार के प्रश्न किसी भी संवेदनशील और चिंतनशील व्यक्ति के मन में उठना स्वाभाविक है।
आत्मबल की परिभाषा
इस अलौकिक मानसिक शक्ति को ही हम सामान्यतः ‘आत्मबल’ कहते हैं। मार्सेल्स की ऐतिहासिक और विश्व-प्रसिद्ध छलांग के बाद वीर सावरकर ने जो कालजयी कविता लिखी थी, उसका शीर्षक भी ‘आत्मबल’ ही था। यदि इस आत्मबल को सैद्धांतिक रूप से परिभाषित करना हो, तो कहा जा सकता है-“घोर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने ध्येय पर अडिग रहते हुए, लक्ष्य की ओर ले जाने वाला मार्ग खोज निकालना ही वास्तव में आत्मबल है।”
बचपन से ही उनकी यह दृढ़ धारणा थी कि ‘मेरे विचार चाहे प्रवाह के विपरीत ही क्यों न हों, मैं अपने वाक्-चातुर्य से दूसरों को उन्हें स्वीकार करने के लिए बाध्य कर सकता हूं। जैसा मैं बोलता हूं, वैसा ही आचरण मुझे करना चाहिए ताकि दूसरों को भी वैसा ही करने की प्रेरणा मिले। मैंने बोलना चाहिए और लोगों ने उसका अनुसरण करना चाहिए। मैं किसी महान और भव्य कार्य को पूरा करने के लिए ही जन्मा हूं।’ इस प्रकार, उनके भीतर नेतृत्व गुणों को दर्शाने वाली एक अत्यंत प्रभावी आत्म-छवि (स्व-प्रतिमा) थी।
उनकी इस आत्म-छवि को उनके पिता (अण्णा), बड़े भाई क्रांतिवीर बाबाराव सावरकर और उनके मित्र-मंडल से हमेशा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहन मिलता रहा। उनके बड़े भाई का तो स्पष्ट मानना था कि उनका ‘तात्या’ (वीर सावरकर) एक अवतारी पुरुष है और वह किसी दैवीय कार्य को पूरा करने के लिए ही आया है। उनके लगभग सभी मित्र, यहां तक कि उम्र में उनसे दोगुने-तिगुने बड़े शुभचिंतक भी उनके प्रति आदरयुक्त श्रद्धा रखते थे।
सावरकर का यह कथन- “मेरी मित्रता का मुख्य उद्देश्य मेरे विचारों का प्रचार था, मेरा मित्र वही हो सकता है जो स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करे और राष्ट्र-गौरव के रंग में रंगा हो।” उसी आत्म-छवि का परिचायक है । उनकी इस आत्म-छवि का एक-दूसरा पहलू यह भी था कि वे कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना इतने धैर्य के साथ करना चाहते थे कि लोग उनके साहस की सराहना करें। अपनी भाभी को लिखे एक पत्र में वे लिखते हैं, ‘देश की परतंत्रता के इस कठिन काल में हमारा व्यवहार और राष्ट्र के प्रति समर्पण ऐसा गौरवशाली होना चाहिए, जिसे देखकर इतिहास के ऋ षि-मुनि भी विस्मित हो जाएं। हमारे तपस्वी पूर्वज और हमारी आने वाली पीढ़ियां दोनों गर्व से “साधु! साधु!” (धन्य हो! धन्य हो!) पुकार उठें।’ उनके इस प्रचंड आत्मबल के रहस्य का एक बड़ा कारण यह था कि उन्हें अपनी क्षमताओं और मर्यादाओं (सीमाओं) की सटीक जानकारी थी। इसी समझ से उनकी एक अनोखी स्वभावगत विशेषता ने जन्म लिया, जो दूसरों को भले ही विक्षिप्त लग सकती थी। परंतु वास्तव में वह उनके उचित नकारात्मक और उचित सकारात्मक दृष्टिकोण का एक परस्पर-पूरक मिश्रण थी।
चला गया था मृत्यु का डर
सन् 1899 में, जब वे लगभग सोलह वर्ष के थे, तब उनके जन्मग्राम भगूर (जिला नासिक) में महामारी (प्लेग) की विभीषिका फैली थी। उस दौर में इस महामारी का कोई अचूक इलाज तो था ही नहीं, बल्कि किसी से इस बीमारी का जिक्र करना भी आफत को बुलावा देना था। यदि प्रशासन को घर में किसी के बीमार होने की भनक लग जाती, तो इलाज तो दूर, अंग्रेज पुलिस और सिपाही तुरंत वहां पहुंच जाते और घरवालों को जबरन घर से बाहर खदेड़ देते थे। वे घर का सामान बाहर फेंक देते और घर की छत तक तोड़ देते थे। देखते ही देखते हंसता-खेलता परिवार बेघर होकर दर-बदर भटकने को मजबूर हो जाता था।
दूसरी ओर, यदि कोई इस डर से अपनी तकलीफ छुपाता और चुपचाप सहन करता, तो अच्छा-भला हट्टा-कट्टा व्यक्ति भी तीन-चार दिनों के भीतर दम तोड़ देता था।
सावरकर के पड़ोस में रहने वाला एक व्यक्ति भी ऐसे ही अचानक तेज बुखार आने से मर गया। उसके मरते समय की चीखें और मरण-स्वर छोटे से विनायक ने रातभर सीढ़ियों पर बैठकर सुने थे। उन्हें अपने मित्र राणू शिंपी का भी ऐसा ही हश्र याद आने लगा। राणू के बीस-पच्चीस सदस्यों का भरा-पूरा परिवार अब श्मशान बन चुका था। उसकी मां भी महामारी की चपेट में आ गई थी, जिससे उसके दोनों पैर लकवाग्रस्त (लूले) हो गए थे। परिवार के अन्य लोगों को संक्रमण न हो, इसलिए उसे एक पेड़ से बांधकर अलग रख दिया गया था, जहां चींटियों के काटने और तड़पने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु का ऐसा भयावह तांडव उन्होंने इतनी कोमल आयु में देखा था। उनके अपने शब्दों में कहें तो, “उस समय केवल मृत्यु ही निश्चित थी, जीवन की स्थिरता तो पलभर के लिए भी महसूस नहीं हो रही थी।”
मृत्यु की उस भयावह छाया में, पड़ोसी की अंतिम सांसों की आवाज सुनते हुए विनायक के मन में विचारों का बवंडर उठने लगा, ‘यदि यह महामारी हमारे घर में भी आ गई तो? इस बीमारी से यदि बड़े भाई मर गए… तो अण्णा (उनके पिता) कितना विलाप करेंगे! लेकिन, यदि अण्णा ही चल बसे तो पुलिस हमें घर से बाहर खदेड़ देगी। उस स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए? और, यदि मैं ही मर गया तो…?’ इस प्रकार के अनेकों विदारक विचार उनके मन में आने लगे। ऐसी विषम परिस्थितियों में इस तरह के विचार सामान्यतः हम सभी के मन में भी उठते हैं, लेकिन हम उन्हें ‘अशुभ या अपशकुन’ कहकर तुरंत मन से झटक देते हैं। परंतु, सावरकर की विशेषता इसी मानसिकता में थी; वे इन अशुभ आशंकाओं को संभावित ‘वास्तविकता’ मानकर, उस संकट से निपटने की योजना पहले से ही बनाने लगते थे।
उस रात उनके मन में आई वह भयावह आशंका दुर्भाग्य से सच साबित हुई। अण्णा महामारी (प्लेग) की चपेट में आ गए और उनकी बीमारी तेजी से बढ़ती चली गई। विनायक की माता जी का देहांत पहले ही हो चुका था, इसलिए अण्णा ही उनके लिए माता और पिता दोनों थे। अब उन्हीं को इस जानलेवा महामारी ने ग्रसित कर लिया था। संकट के उस दौर में सावरकर के बड़े भाई (बाबाराव) भी वहां उपस्थित नहीं थे। इसके बावजूद, मात्र सोलह वर्ष के किशोर विनायक ने बड़े धैर्य के साथ पिता का उपचार शुरू किया।
तभी संकट ने और विकराल रूप ले लिया, उनके छोटे भाई नारायण को भी महामारी के तेज बुखार ने जकड़ लिया। ऊपर के कमरे में साक्षात् मृत्यु से जूझते पिता और नीचे के कमरे में उसी मौत की छाया में तड़पता छोटा भाई—विनायक इन दोनों के बीच अकेले खड़े थे।
इसी बीच बीमारी के उन्माद (भ्रम) में अण्णा का मानसिक संतुलन डगमगा गया और वे पागलों की तरह पानी मांगने लगे। विनायक ने कहीं पढ़ा था कि प्लेग के मरीज को पानी नहीं देना चाहिए। परंतु अण्णा कुछ भी सुनने की स्थिति में नहीं थे और उन पर नियंत्रण पाना छोटे से विनायक के लिए असंभव हो रहा था। किसी तरह कलेजा कड़ा करके विनायक ने उन्हें ऊपर के कमरे में बंद किया और खुद सीढ़ियों पर आकर बैठ गया। कमरे के भीतर अण्णा प्यास से व्याकुल होकर चिल्ला रहे थे, “तात्या, बाल! अरे, कोई तो मुझे पानी दो रे!”
‘पानी मांगने वाले किसी भी व्यक्ति को कभी मना नहीं करना चाहिए’—ऐसे संस्कारों में पले-बढ़े और मृत्यु के बाद भी माता-पिता के मुख में गंगाजल डालने वाली संस्कृति में जन्मे उस छोटे से विनायक की मानसिक स्थिति, पिता की उस व्याकुल कर देने वाली पुकार को सुनकर कैसी हुई होगी, इसकी कल्पना भी झकझोर देती है। दुख की बात यह थी कि इस घटना के मात्र चौथे ही दिन अण्णा का देहांत हो गया, जिससे विनायक के मन की वह व्यथा और भी गहरी तथा अमिट बन गई। सावरकर जी ने स्वयं आगे चलकर इस घटना का स्मरण करते हुए लिखा था— “अण्णा का वह प्यास से व्याकुल होकर चिल्लाना— ‘तात्या, बाल! अरे, कोई तो मुझे पानी दो रे!’— मुझे आज भी हूबहू सुनाई देता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उनकी उस आर्त पुकार को प्रतिसाद देकर सीधे उन्हीं से मिलने चला जाऊं।”
इतनी कम उम्र में मृत्यु को इतने भयानक रूप में और इतने करीब से देखने के कारण, उनके मन से मौत का सारा डर हमेशा के लिए गायब हो गया और देश की स्वतंत्रता के प्रति उनकी ध्येय-दृष्टि और भी अधिक सुदृढ़ तथा संकल्पित हो गई । उनका मानना था कि यदि कोई यह मानकर चलता है कि परिस्थितियां हमेशा उसके अनुकूल रहेंगी, लेकिन भविष्य में यदि इसके विपरीत घटित होता है, तो उस व्यक्ति के भीतर तीव्र निराशा (भग्नाशा) पैदा होगी। यदि वह यह मानकर चले कि परिस्थितियां विपरीत और प्रतिकूल ही रहेंगी, तो संकट के समय उसे मानसिक आघात की तीव्रता बहुत कम महसूस होगी।
यदि वीर सावरकर ने यह अयोग्य सकारात्मक (Inappropriate Positive) विचार पाला होता कि महामारी से उनके अण्णा ठीक हो जाएंगे, हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय उनके पक्ष में आएगा, या उन्हें पचास वर्ष के कालेपानी की भयानक सजा नहीं भुगतनी पड़ेगी, तो इन लगभग असंभव बातों के विपरीत घटित होते ही वे भीतर से पूरी तरह टूट जाते। वे हताश होकर अपनी किस्मत या ईश्वर को कोसने लगते। यदि वे इस ‘अयोग्य सकारात्मकता’ के भ्रम में जीते, तो उन्होंने जिन ऐतिहासिक संकटों का सामना जिस अदम्य साहस और हिम्मत के साथ किया, वैसा निश्चित ही कभी नहीं कर पाते।
जानते थे आजीवन कारावास मिलेगा
लंदन में गिरफ्तार होने के बाद, उन्होंने मन में यह बात पूरी तरह स्वीकार कर ली थी कि उन्हें आजीवन कारावास की सजा होगी। यहां तक कि उन्होंने उस कारावास के दौरान एक महाकाव्य लिखने का संकल्प भी पहले से ही कर रखा था। परंतु, जैसे ही जेल से भागने का जरा सा भी अवसर मिला, उन्होंने मार्सेल्स के समुद्र में वह विश्वविख्यात छलांग लगा दी और इस मामले को एक अंतर्राष्ट्रीय विवाद बनाकर खुद को छुड़ाने का भगीरथ प्रयास किया। मार्सेल्स के तट पर पुनः बंदी बनाए जाने के बाद, कोई भी सामान्य व्यक्ति तीव्र अवसाद की गहराइयों में टूट जाता, किंतु सावरक असाधारण थे।
उन्होंने उस घोर हताशा के क्षणों में न केवल खुद को संभाला, बल्कि अपनी प्रसिद्ध कविता ‘आत्मबल’ की रचना कर उस गहरे अवसाद को अदम्य उत्साह की दीक्षा दे दी। यही नहीं, पकड़े जाने के बाद जब ब्रिटिश पुलिस के सिपाही उन पर लाठियां और बंदूकें तानकर मारने दौड़े, तब सावरकर तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने निर्भीकता से उनकी आंखों में आंखें डालकर चेतावनी दी,”मैं तो देश के लिए मरने ही निकला हूं। यदि आज मर भी गया, तो मुझे कोई परवाह नहीं। लेकिन आप लोग तो केवल अपना पेट पालने और परिवार चलाने के लिए पुलिस की नौकरी कर रहे हैं। यदि आपने मुझ पर हाथ उठाया, तो मैं चुप नहीं बैठूंगा। मरते-मरते कम से कम आप में से एक को तो अपने साथ लेकर ही मरूंगा। अपने पीछे बिलखते अपने परिवार के बारे में सोचिए!” इस सिंहगर्जना ने पुलिसकर्मियों के भीतर तक कंपकंपी पैदा कर दी और वे तुरंत शांत हो गए।
कर्त्तव्य बोध और स्थितप्रज्ञता
क्रोध के उस भयानक वातावरण को शांत करने के कुछ ही क्षणों बाद, सावरकर के चेहरे पर एक सहज मुस्कान तैर गई। उन्होंने उन्हीं पुलिसकर्मियों को ढाढस बंधाते हुए और सांत्वना देते हुए कहा:”भागने का प्रयास करना मेरा कर्त्तव्य था, और मुझे पकड़ना आपका कर्त्तव्य था। हम दोनों ने ही ईमानदारी से अपने-अपने कर्त्तव्य का पालन किया है। फिर अब मन में किसी बात का दुःख या मलाल कैसा?”
निरंतर रहे सक्रिय
दर्शनशास्त्र के गहन अध्ययन, योगाभ्यास और बचपन के कड़वे अनुभवों के कारण उनके भीतर एक अनूठी ‘समदृष्टि’ उत्पन्न हो गई थी। यही समदृष्टि अंदमान की उस बेहद हीन और पशुवत परिस्थितियों में उनके बहुत काम आई। जहाज में गंदे और मल-मूत्र के पीपों के पास सोते समय हो, या जेल के क्रूर जमादार के सामने निर्वस्त्र होकर नहाने की प्रताड़ना, हर मोड़ पर उनका यह समत्व भाव उनके आत्मबल को बनाए रखता था।
















