यूके में ग्रूमिंग गैंग का जिन्न एक बार फिर से बोतल से बाहर आ गया है और इस बार वह बहुत ही झकझोरने वाले रूप में बाहर आया है। चैनल 4 पर एक डाक्युमेन्ट्री का प्रसारण हो रहा है। ग्रूम्ड नामक इस सीरीज में कई पीड़ितों से बात की गई है और इसके साथ ही यह कुकृत्य करने वाले लोगों को उनके समुदाय की तरफ से मिल रहे समर्थन को भी दिखाया गया है।
इस सीरीज में पत्रकार एन्ना हॉल पांच ऐसी सर्वाइवर लड़कियों से मिलती हैं, जो इस गैंग का शिकार हो चुकी हैं और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन लड़कियों को “बाल वैश्या” तक कहा गया। ब्रिटिश मीडिया द गार्डियन के अनुसार हॉल का यह भी कहना है कि सबसे पीड़ादायक यह है कि यह सब अभी तक चल रहा है।
This Channel 4 documentary is truly shocking and eye opening to complete lack of remorse and empathy to the Grooming Gang victims not just from the vile perpetrators but their family’s and the Pakistani community as well.
No wonder Labour doesn’t want a National Inquiry! pic.twitter.com/ReRpuKzlhC
— Benonwine (@benonwine) May 1, 2025
यह डाक्युमेंट्री पत्रकार एन्ना हॉल ने ही बनाई है। उन्होंने वर्ष 2004 में एज ऑफ द सिटी फिल्म बनाई थी। यह इस मामले पर बनी पहली टीवी फिल्म थी। टीवी पर पहली बार यह आया था कि ग्रूमिंग गैंग क्या होता है। कैसे कुछ पुरुषों के समूह किशोर लड़कियों को शिकार बनाते थे। वे अधिकतर श्वेत होती थीं, केयर सिस्टम में रहती थीं और आरोपी उनके साथ दोस्ती करते थे, उन्हें ड्रिंक और ड्रग्स देते थे और उनके बॉयफ्रेंड बनते थे और उनके साथ सेक्स करके उन्हें दूसरे पुरुषों को पेश करते थे।
द गार्डियन में ऐसी ही पीडिता शैनटेल की कहानी है। शैनटेल अब 32 वर्ष की हैं। वे जब 11 वर्ष की थीं, तब लगभग 20 साल के उनके कथित बॉयफ्रेंड ने उन्हें अपने जाल में फंसाया था। वह और लड़कों के साथ मैनचेस्टर चिल्ड्रन होम के बाहर की दीवार पर बैठता था। उसने उन्हें ग्रूम करना शुरू कर दिया था। कई दिनों तक उन्हें होटल के कमरे में रखा गया और यह क्रम कई वर्षों तक चला। उन्होंने पुलिस से कई बार संपर्क किया, मगर उन्होंने कुछ नहीं किया।
सबसे दुर्भागयपूर्ण बात तो यह है कि इस पूरे गैंग का शातिरपन इतना अधिक था कि इसमें अधिकारियों ने बच्चियों को ही यह कहकर दोषी ठहरा दिया कि यह उनकी लाइफस्टाइल चॉइस है। बच्चियों की पीड़ा को न ही सुना गया और न ही देखा गया। एरिन को 12 वर्ष की उम्र में ग्रूम किया गया और 13 वर्ष की उम्र में उनके साथ बलात्कार किया गया। जब पुलिस के पास वे लोग गए तो यह कहा गया कि यह एरिन की लाइफ स्टाइल चॉइस है।
हॉल की इस फिल्म की लगातार चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया पर इस फिल्म को लेकर लोग सजग हैं और कह रहे हैं कि इतनी महत्वपूर्ण फिल्म को उन सभी को देखना चाहिए जो अब तक इसे नकारते आ रहे थे और जिन्होनें बच्चियों की पीड़ा को समझा और जाना ही नहीं। दरअसल जब-जब यह मामला उछला तब इसे राजनीतिक कारणों से प्रेरित बताया दिया गया। चूंकि इसमें अधिकांशत: पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम या फिर पाकिस्तानी पुरुष ही सम्मिलित थे, तो न्याय की आवाज उठाना नस्लीय हमला हो जाता था। जो भी इन अपराधियों के खिलाफ आवाज उठाता था, उसे इस्लामोफोबिक कहा जाता था।
इस फिल्म में हॉल ने दिखाया है कि इन और इनके जैसी हजारों लड़कियों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिस और अन्य अधिकारियों ने इन लड़कियों और इनके जैसी हजारों लड़कियों को कहाँ और कैसे निराश किया। उन्होनें तमाम प्रमाणों के होने के बाद भी, एक तरह से इन लड़कियों के प्रति अपनी आँखें मूँद ली। जो भी टीम ऐसे मामलों की छानबीन करने के लिए जो भी टास्क फोर्स बनाए गए थे, उन्हें बंद कर दिया गया।
ऐसी ही एक टास्कफोर्स थी, ऑपरेशन ऑगस्टा। इसका गठन तब किया गया था जब वर्ष 2003 में एक 15 वर्षीय विक्टोरिया अगोलिया की मौत बलात्कार और एक एशियाई बड़े उम्र के आदमी द्वारा जबरन हेरोइन इंजेक्ट करने के कारण हुई थी। इसकी जांच डिटेक्टिव कांस्टेबल मैगी ओलिवर के नेतृत्व में आगे बढ़ रही थी, जिसमें कुछ ही हफ्तों में यह पता चल गया था कि ग्रूमिंग गैंग्स के प्रमाण मिले हैं। उस समय लगभग 97 बाल बलात्कारियों का पता लगाया था। मगर जैसे ही मैगी ओलिवर छुट्टी पर गईं, इस टास्कफोर्स को बंद कर दिया गया।
इस मामले में टाइम्स न्यूज़पेपर के लेखों के लिए स्रोत बनी जेनी सीनियर ने कहा कि उन्होंने जिस होम ऑफिस रिपोर्ट को बनाने में सहायता की थी, उसे एकदम स्पष्ट कारणों से दफन कर दिया गया और उन्हें एक नहीं कई बार कहा गया कि वे सांस्कृतिक बहुलता की नाव को रोकने का प्रयास न करें।
सांस्कृतिक बहुलता के नाम पर यूके की हजारों लड़कियों को दशकों तक बलात्कार और सामूहिक बलात्कार का शिकार होने दिया गया। चूंकि हजारों लड़कियों का शोषण करने वाले लोग पाकिस्तानी मूल के थे और मजहब से इस्लामिक थे, तो इस्लामोफोबिक का तमगा न लग जाए, यह डर इतना भयानक था कि उसके नीचे बच्चियों के बलात्कार, हिंसा और तस्करी की सारी खबरें दब गईं।
यह दशकों से दबी हुई पीड़ा है और उससे भी बड़ा दुर्भाग्य आज भी यही है कि आवाज उठाने वालों को ही दोषी ठहराया जा रहा है। सर्वाइवर अभी भी सदमे में हैं। जो मर गईं वे अभी भी न्याय की तलाश में है। इस फिल्म को देखने के बाद वेस्ट मेनचेस्टर पुलिस ने लिखित में माफी मांगी है। पुलिस की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया है कि पुलिस ने अपना काम ठीक से नहीं किया और जिसके कारण असंख्य बच्चियों को असहनीय पीड़ा से होकर गुजरना पड़ा।
After the screening of Groomed on Channel 4 the Greater Manchester @gmpolice have issued an apology for "a clear failure to listen" to victims of Pakistani rape gangs.
Over 97 suspects were identified by @MaggieOliverUK & the investigation was discontinued. Some cite cost, some… pic.twitter.com/Cy4jBMhpcv
— David Atherton (@daveatherton) May 2, 2025
हालांकि इस डाक्युमेन्ट्री की कुछ क्लिप्स ही बिना रजिस्ट्रेशन के देख सकते हैं। मगर जो क्लिप्स मौजूद हैं, उनमें यह और भी हैरान करने वाला दिख रहा है कि जिस समुदाय के आदमियों ने मासूम श्वेत लड़कियों के साथ इस सीमा तक जघन्य अपराध किये, उस समुदाय की महिलाएं अपने समुदाय के आदमियों के पक्ष में प्रदर्शन कर रही थीं। वे बैनर उठाए हई थीं कि innocent until proven guilty, अर्थात जब तक दोष सिद्ध नहीं, तब तक निर्दोष हैं। पीड़िताओं को ही अजीबोगरीब नामों से संबोधित किया जा रहा था।
अब सोशल मीडिया पर मांग उठ रही है कि इस फिल्म को कीर स्टार्मर को दिखाया जाना चाहिए, जिससे कि उन्हें पता चले कि वे किस अपराध की जांच के लिए इनकार कर रहे हैं। परंतु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस समस्या के विषय में ब्रिटेन की लेबर पार्टी को पता नहीं है? दुर्भाग्य से इस कांड की एक-एक असलियत हर राजनीतिक दल को पता है, परंतु वोटबैंक की राजनीति के चलते सरकार इस पर शायद ही कोई कदम उठाएगी।

















