ग्रूमिंग गैंग की कहानी और इस्लामोफोबिया का सच
पिछले दिनों ब्रिटिश सांसद रूपर्ट लोव ने संसद में कई पीड़िताओं की दर्दनाक कहानियां बताईं। उन्होंने बताया ग्रूमिंग गैंग के लोगों ने वर्षों तक नाबालिग लड़कियों का शोषण किया। इसमें बड़ी संख्या में आरोपी पाकिस्तानी मूल के हैं। इस गैंग ने श्वेत और नाबालिग ईसाई लड़कियों को चिह्नित कर उन्हें अपना शिकार बनाया। बर्बरता ऐसी कि एक ईसाई किशोरी के साथ 700 लोगों ने बलात्कार किया। जब ऐसी जघन्य घटनाएं सामने आती हैं तो यह स्वाभाविक प्रश्न है कि यह सब क्यों हुआ और ऐसा करने वाले लोग कौन हैं?
जैसे भारत में कट्टरपंथी मजहबी मानसिकता वाले मुसलमान युवकों द्वारा छद्म हिंदू नाम नाम रखकर हिंदू लड़कियों को प्रेम में के जाल में फंसाकर उनका यौन शोषण किया जाता है, उन्हें कन्वर्जन करने के लिए मजबूर किया जाता है, इसी तरह ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग के लोग कम उम्र की श्वेत ईसाई बच्चियों के साथ दरिंदगी करते हैं। योजनाबद्ध तरीके से पाकिस्तानी मूल के मुसलमान किशोरियों को बहलाते हैं, फुसलाते हैं, उन्हें महंगे-महंगे उपहार देते हैं और जब वे किशोरियां उनके जाल में फंस जाती हैं, तो उनके साथ दुष्कर्म किया जाता है, बाद में उन्हें वेश्यावृत्ति में झोंक दिया जाता है। इन किशोरियों ने अपनी आपबीती में यह सारी बातें कहीं, जिनकी गूंज ब्रिटिश संसद में सुनाई दी।
कब सामने आए ये मामले?
नाबालिग किशोरियों के साथ यौन शोषण किए जाने का यह क्रम पिछले 25 वर्ष से ब्रिटेन में चल रहा है। इसके पीछे मुसलमानों का ईसाइयों से श्रेष्ठता की भावना और श्वेत ईसाई लड़कियों का शोषण करने की मानसिकता है।
वास्तव में, इस कांड की सुगबुगाहट बहुत पहले से ही थी। कुछ रिपोर्ट के अनुसार सन् 1955 में ऐसी छिटपुट घटनाएं हुई थीं। कुछ लोगों ने नब्बे के दशक में तो खुलकर इस समस्या के प्रति आगाह भी किया था। यह तथ्य सामने आया कि ब्रिटेन में विशेषकर रोदरहैम के सहायता केंद्रों से लड़कियों को कुछ खास टैक्सी चालक लेकर जाते थे। तब अधिकारियों ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया और लापरवाही बरती गई।
हालांकि, यह मामला वर्ष 2001 में चर्चा में आया, जब इस विषय में पहली औपचारिक रिपोर्ट स्थानीय युवा सेवा केंद्र के अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तैयार की। उन्होंने पुलिस और काउंसिल को बताया कि कुछ स्थानीय गिरोह संगठित रूप से कम उम्र की लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। लेकिन तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया क्योंकि उन्हें डर था कि इससे ब्रिटेन में नस्लवाद बढ़ेगा और उन पर इस्लाम-फोबिक होने का ठप्पा लग सकता है।
उसके बाद वर्ष 2004 में इस विषय पर चैनल-4 के लिए एक वृत्तचित्र का निर्माण किया गया। इसका प्रदर्शन रुकवा दिया गया। क्योंकि इससे नस्लीय तनाव फैल सकता है, ऐसा भय था। पर यह बात अधिक दिनों तक दबाई नहीं जा सकती। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 में ‘द टाइम्स‘ के पत्रकार एंड्रयू नॉरफॉक ने इस पूरे षड्यंत्र का खुलासा किया। इस कारण उन्हें नस्लवादी कहा गया, इसके बावजूद उनकी बातों को लोगों ने गंभीरता से लेना शुरू किया।
उसके बाद मीडिया में इस खबर पर चर्चा और बढ़ी। अब अन्य अखबारों और सांसदों ने इस मामले पर प्रश्न पूछना आरंभ किया कि आखिर ब्रिटेन की सरकारी संस्थाएं चुप क्यों हैं? पुनः एक बार फिर वर्ष 2014 में एलेक्सिस जे. की रिपोर्ट के बाद तहलका मचा कि समस्या कितनी गंभीर थी? उनकी रिपोर्ट में केवल रोदरहैम में 1997-2013 के बीच कम-से-कम 1400 बच्चियों के यौन शोषण की कहानी थी।
कई शहरों में हुईं घटनाएं
इसके बाद 2015 में बारोनेस के.सी. रिपोर्ट में यह सामने आया कि रोदेरहैम की काउंसिल ने कैसे काम किया और कैसे वह लड़कियों की बात सुनने में विफल रही। अधिकारियों ने जानबूझ कर जानकारियों को दबाया। इससे लोगों के भीतर और भी ज्यादा गुस्सा बढ़ा। यह सवाल उठने लगा कि क्या यह केवल रोदेरहैम की घटना है या फिर अन्य शहरों में भी इस तरह की शोषण की गतिविधियां चल रही हैं। क्योंकि जहां जनसांख्यिकी में परिवर्तन हुआ, वहां पर हिंसा की छुटपुट खबरें आती रहीं। जब और जांच हुई तो ज्ञात हुआ कि इस तरह की अमानवीय गतिविधियां और भी कई शहरों में चल रही हैं। यह एक गंभीर समस्या बन चुकी है। रोचडेल, न्यूकैसल, टेलफोर्ड जैसे शहरों में भी इसी तरह की घटनाएं सामने आईं।
उसके बाद वर्ष 2020 संसद में इस विषय पर बहसें हुईं और अंततः सरकार को जांच आरंभ करानी पड़ी, जिसके परिणाम स्वरूप इस पूरे सुनियोजित और व्यवस्थित बाल शोषण का सबसे घिनौना सच सामने आया।
वामपंथियों की चुप्पी
यह और भी दुखद बात है कि जैसे-जैसे इस पूरे प्रकरण की परतें खुलीं तो यह सामने आया कि ब्रिटेन के कुछ नेता अपनी लाडली बेटियों के साथ खड़े न होकर उनका शोषण करने वालों के साथ खड़े थे। पहले तो लेबर पार्टी के नेतृत्व वाली समिति ने इस पूरे प्रकरण को “इस्लामोफोबिया” कहकर नकार दिया और ब्रिटिश मुसलमान नेता भी अपराधियों के साथ खड़े दिखे।
2017 में लेबर पार्टी की सांसद सारा चैंपियन ने ‘द सन‘ में लिखा कि ‘‘ब्रिटेन के ग्रूमिंग गैंग में अधिकतर पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुष हैं”। इस लेख के प्रकाशन के बाद लेबर पार्टी ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया और उन पर नस्लवादी होने का आरोप लगाया गया। इस लेख के प्रत्योत्तर में ब्रैडफॉर्ड वेस्ट की लेबर सांसद नाज शाह ने कहा कि यह जानबूझ कर मुसलमान युवकों को निशाना बनाए जाने का नस्लवादी विमर्श है। सभी मुसलमान पुरुष एक से नहीं होते।
लंदन के मेयर सादिक खान ने साल 2017-22 के बीच कई बार दोहराया कि “ग्रूमिंग गैंग केवल मुसलमानों की समस्या नहीं है, यह सभी समुदायों की समस्या है। केवल मुस्लिम समुदायों के लोगों को ही बलि का बकरा नहीं बनाया जाना चाहिए।”
मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन के पूर्व प्रवक्ता मिकदाद वारसी ने भी मीडिया से कहा कि ग्रूमिंग गैंग को मुसलमानों और पाकिस्तान के साथ जोड़कर इस्लामोफोबिया फैलाया जा रहा है। जबकि लेबर सांसद यासमीन कुरेशी का कहना था कि बाल शोषण सभी समुदायों में होता है। ब्रिटिश मुसलमानों की सर्वदलीय संसदीय समिति ने वर्ष 2019 में इस्लामोफोबिया को परिभाषित किया कि ग्रूमिंग गैंग जैसे शब्द मुसलमानों को सामूहिक रूप से बदनाम कर रहे हैं। ऐसे शब्द मुसलमानों पर मजहबी हमला है।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि दशकों से व्यवस्थित बाल शोषण की शिकार मासूम बच्चियों को ही कठघरे में खड़ा किया गया। जहां पूरे समाज और देश को उन बच्चियों के साथ खड़ा होना चाहिए था, वहां उन्हें पुलिस और कुछ संस्थाओं द्वारा “चाइल्ड प्रोसटीट्यूट” संबोधित कर प्रताड़ित किया गया। यह शब्दावली अपने-आप मेें दुष्कर्म और यौन शोषण की पीड़िताओं को ही दोषी ठहराती है। इस तरह उन्हें न्याय से और दूर कर दिया गया।
पुलिस की मिलीभगत की कई रिपोर्ट्स में सामने आई है कि जब भी लड़कियां पुलिस के पास अपनी शिकायत लेकर गईं तो उन्हें ही “चाइल्ड प्रॉस्टिट्यूट” कहकर अपमानित किया या फिर कई ऐसे मामले में इन बच्चियों को ड्रग्स रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया या जो लड़कियां अपने शोषण से प्रताड़ित होकर उत्तेजित हो जाती तो उन्हें ‘असामाजिक तत्व’ कहकर भी गिरफ्तार किया गया।
सामने आई कहानियां
एक तरफ जहां लेबर, लेफ्ट, मुसलमान नेता और वामपंथी मीडिया ग्रूमिंग गैंग को नकारते रहे, तो वहीं दूसरी तरफ पीड़िताओं ने लंबी लड़ाई लड़ी और उन्होंने तमाम अवरोधों को दरकिनार करके इस पूरे षडयंत्र का खुलासा किया। तब यह सच सामने आया कि कैसे पाकिस्तानी मुसलमान पुरुष श्वेत ईसाई बच्चियों का यौन शोषण करते हैं।
रोदेरहैम की सारा एक ऐसी ही पीड़िता है। वह 13 वर्ष की उम्र में इस गिरोह का शिकार हुई थी। कम से कम 600-700 लोगों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि जब उसके पिता ने अपनी बेटी के साथ हो रहे इस यौन शोषण की शिकायत पुलिस से की तो उन्हें ही गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आरोप लगाया गया कि वह सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ रहे हैं। सारा ने अपनी आपबीती में बताया कि लड़कियों को कुत्ते के पिंजरे में बंद किया जाता था।
पीड़िताओं की कहानियां दिल दहला देने वाली हैं। एक पीड़िता सामंथा ने बताया, ”किशोरावस्था में ही इस गिरोह के लोगों ने उन्हें शराब और ड्रग्स के जाल में फंसाया और फिर वर्षों तक उसका यौन शोषण किया गया। जब इस संबंध में उसने पुलिस को शिकायत की तो उसे ही असामाजिक तत्व कहकर गिरफ्तार कर लिया गया।”
ऑक्सफोर्ड की लूसी की भी कहानी कुछ इसी तरह की है। उसे पार्टी और शराब के बहाने इस जाल में फंसाया गया। उसे अस्पताल में मदद मांगने पर चिकित्सकों ने बिना किसी उपचार के छुट्टी दे दी थी। रोदेरहैम की एम्मा बचपन से ही अपराधियों के निशाने पर आ गई थी। पुलिस ने उसे भी “चाइल्ड प्रॉस्टिट्यूट” कहा था। शेफील्ड की जेसिका ने अदालत में गवाही दी थी कि कैसे पुलिस ने उससे जबरदस्ती अपराध स्वीकार करवाया, क्योंकि उसे धमकी दी गई थी कि सच बोलने पर उसके परिवार को मार डाला जाएगा।
लौरा की भी कहानी कुछ ऐसी ही है कि उसे बचपन से ही अपराधियों ने निशाना बनाया और जब उसने शिकायत की तो यह कहा गया कि वह सांप्रदायिक तनाव फैला रही है। ऐसी एक नहीं अनेक पीड़िताओं की कहानियां हैं।
किशोरियां होती थीं निशाना
उल्लेखनीय है कि ग्रूमिंग गैंग के पाकिस्तानी मूल के पुरुष गैर मुस्लिम लड़कियों को फंसाने का एक पैटर्न अपनाते थे। सबसे पहले वे कम उम्र की किशोर लड़कियों को चुनते थे, जिनके परिवार में तनाव या आर्थिक समस्या होती थी, ताकि भावनात्मक लाभ आसानी से उठाया जा सके। उसके बाद लड़की से दोस्ती करते थे और भरोसा जमाने के लिए उनके साथ प्यार भरी बातें करते थे और उन्हें महंगे-महंगे उपहार देते थे। इसके साथ ही उन्हें ड्रग्स और शराब का भी आदी बना देते थे। उन्हें टैक्सी में आस-पास के शहरों में घुमाने ले जाते, फिर धीरे धीरे जब ड्रग्स और शराब की लत के कारण वे उनपर निर्भर हो जाती थीं, तो उनका यौन शोषण का खेल शुरू होता था।
पहले फंसाने वाला लड़का ही उस लड़की के साथ दुराचार करता था। इसके बाद एक या दो अपराधी किसी न किसी बहाने से उसके साथ दुष्कर्म करते थे। उसके बाद उन्हें धीरे-धीरे पूरे गिरोह के हवाले कर दिया जाता। कई मामलों में तो गिरोह पाकिस्तानी मुसलमान परिवार ही चला रहा होता था। उनमें पाकिस्तानी परिवार की महिलाएं भी शामिल पाई गईं। पीड़ित लड़कियों को लगातार एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाते और वे सैकड़ों लोगों की हवस का शिकार बनती थीं। इतना ही नहीं, उन्हें धमकियां दी जाती कि अगर मुंह खोला तो उन्हें व उनके परिवार को मार डाला जाएगा।

















