वामपंथी और सेकुलर तत्व अक्सर ऐसा विमर्श खड़ा करने का प्रयास करते हैं कि जनजातीय समाज में देवी की आराधना नहीं की जाती। यह सिर्फ और सिर्फ जनजातीय समाज को हिंदुत्व से भटकाने का प्रयास है। वास्तव में जनजातीय समाज हमेशा से देवी पूजन करता आया है।

श्रीजानकीरमण महाविद्यालय जबलपुर में इतिहास के प्रोफेसर
भारत का हृदय स्थल संस्कारधानी है, जहां जनजातीय संस्कृति की आत्मा बसती है। यही वह नगर है जहां आज भी जनजातीय समाज हिंदू संस्कृति के ऐक्य भाव को समाहित कर मां भगवती की उपासना करता है। पूजन पद्धति भले अलग हो लेकिन ऐसे कई मंदिर हैं जहां सैकड़ों वर्षों से जनजातीय समाज के लोग अनवरत पूजन करने पहुंचते हैं। मध्यप्रदेश के जबलपुर में जनजातीय समाज के लोग सैकड़ों वर्षो से खेरमाई माता का पूजन करते आ रहे हैं।
गोंड संस्कृति में खेरमाई माता को पूजा जाता है। इन्हीं मंदिरों में गैर जनजातीय लोग भी नवरात्र पर्व पर विशेष आराधना करने पहुंचते हैं। खेरमाई माता मंदिर को पहले खेरो माता के नाम से जाना जाता था जो ग्राम देवी के रूप में पूजी जाती हैं। बसाहट के अनुसार मंदिरों की संख्या भी बढ़ती गई। जबलपुर में मां बड़ी खेरमाई मंदिर भानतलैया और मां बूढ़ी खेरमाई (खेरदाई) मंदिर हैं। यहां सैकड़ों वर्षो से पूजन होता आ रहा है। उपनगरीय क्षेत्रों में भी खेरमाई माता की स्थापना की गई है जिन्हें छोटी खेरमाई माता के नाम से जाना जाता है।
जनजाति संस्कृति का केंद्र
भारत के मानचित्र पर जबलपुर केंद्र बिंदु तो है ही, इसे जनजाति संस्कृति का केंद्र भी माना जाता है। यही वह शहर है जहां आज भी जनजातीय समाज मां दुर्गा की उपासना करता है। देखा जाए तो जनजातीय संस्कृति जबलपुर के लिए एक उपहार है। हिन्दू संस्कृति में जनजातीय समाज में बड़ा देव को मूल माना गया है, जिन्हें आमजन भगवान शिव के रूप में पूजते हैं।
जनजातीय समुदाय भी हिंदू ही हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है। भारतीय संस्कृति में देवी पूजा को मुख्य माना गया है और वही जनजातीय समाज में प्रकृति पूजन के रूप में शिरोधार्य है। यही कारण है कि जनजातीय लोग प्रकृति की उपासना करते हुए वन प्रदेशों में रहे। संस्कारधानी को देखा जाए तो वह अपने आप में एक संस्कृति है जहां हर तरह के के उत्सव देखने मिलते हैं। इसलिए आचार्य विनोबा भावे ने इसे संस्कारधानी का नाम दिया। यह एक शाश्वत नगरी है।
प्रकृति से जुड़ी है मूर्ति पूजा
जनजातीय समाज प्रकृति पूजन को प्रधानता देते हैं लेकिन उसमें उसमें प्रकृति के तत्वों से ही मिलकर बनी मूर्ति की स्थापना कर पूजन शुरू हुआ। नगर के प्राचीन मंदिरों की बात करें तो यह कहीं न कहीं गोंड संस्कृति से जुड़ा रहा। यही कारण है कि गोंड शासकों ने जहां शहर में कुओं, तालाब और बावड़ियों का निर्माण कर प्रकृति की उपासना की वहीं मंदिरों का भी जीर्णोद्धार कराकर उन्हें संरक्षित किया।
गोंड राजा ने बनवाया था खेरमाई मंदिर
बड़ी खेरमाई मंदिर, भानतलैया के बारे में तथ्य है कि सन् 1290 में कड़ा और मानिकपुर के तुर्क सूबेदार अलाउद्दीन खिलजी से एक बार गोंड राजा मदन शाह परास्त होकर यहां खेरमाई मां की शिला के पास बैठ गए। उन्हें आध्यात्मिक अनुभूति हुई। पूजा के बाद उनमें अद्भुत शक्ति का संचार हुआ और राजा मदन शाह ने तुर्क सेना पर आक्रमण कर अलाउद्दीन खिलजी को परास्त कर खदेड़ दिया। 500 वर्ष पूर्व गोंड राजा संग्रामशाह ने मढ़िया की स्थापना कराई थी। शहर अब महानगर हो गया है लेकिन आज भी मां खेरमाई (खेरदाई) का ग्राम देवी के रूप में पूजन किया जाता है। सन् 1652 में पहला जवारा चल समारोह (नवरात्र के दौरान कलश स्थापना के लिए निकाली जाने वाली शोभायात्रा) गोंड शासक हृदयशाह ने आयोजित किया था। इसमें बाना (एक तरह का अस्त्र होता है, जिसमें पान का पत्ता लगाकर एक गाल को छेदते हुए दूसरे गाल से बाहर निकाला जाता है। यह शौर्य और माता के लिए आस्था का प्रतीक होता है। यह परंपरा 373 वर्ष से जारी है।

मां धूमावती की आराधना
चार खंभा स्थित मां धूमावती मंदिर को बूढ़ी खेरमाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां लगभग 1500 साल से लोग आराधना कर रहे हैं। खास बात यह है कि यहां बाना चढ़ाने की विशेष परंपरा है। प्रार्थना पूरी होने पर भक्त विशेष रूप से बानों को मां के चरणों में अर्पित करते हैं। सबसे बड़े बाने को एक साथ 11 लोग पहनकर जवारा विसर्जन चल समारोह में निकलते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर आस्था प्रदर्शित करने के लिए नुकीले बाना छेदने की प्रथा सन् 1480 से गोंडवाना के महा प्रतापी राजा संग्राम शाह ने प्रारंभ की थी और चल समारोह में स्वयं बाना धारण किया था, तब से 545 वर्ष हो गए यह परंपरा हर वर्ष विस्तृत रूप लेते जा रही है।
महालक्ष्मी का रूप हैं मालादेवी
जबलपुर के सबसे पुराने हिस्से में स्थित ‘गढ़ा ब्राह्मण मोहल्ला’ में मालादेवी की प्रतिमा 14 सौ साल से है। मालादेवी का पूजन छठी शताब्दी से हो रहा है। ये कल्चुरी, हैहय और चंदेल जैसे क्षत्रिय वंशों की कुलदेवी हैं। माला देवी भगवती महालक्ष्मी के स्वरूप में हैं। वीरांगना महारानी दुर्गावती नियमित रूप से उनकी आराधना करती थीं। वर्तमान स्थल के सामने राजा शंकर शाह का महल था, राजा शंकर शाह सुबह सबसे पहले भगवती के दर्शन करते थे। पहले मढ़िया में केवल एक पत्थर और वहां बानों को ही लोग पूजते थे, परन्तु 10वीं शताब्दी में पत्थर की मूर्ति स्थापित की गई थी। अभी भी वही मूर्ति पूजी जा रही है। माला देवी गढ़ा कटंगी के गोंड राजवंश की आराध्या थीं। आज वह जनसाधारण की पूज्य देवी हैं।
शक्ति उपासना का सर्वोच्च पर्व
सनातन धर्म और संस्कृति शाश्वत है। दुनिया में विविध पंथ हैं लेकिन कहीं ऐसा नहीं मिलता जिसमें नारी को शक्ति के रूप अभिव्यक्त किया गया हो। विश्व में भारत से ही जनजातीय समाज और संस्कृति का आरंभ हुआ। उनके हमारे आदिदेव फड़ापेन और भगवान् शिव एक ही हैं, अर्थात अद्वैत है। शम्भू महादेव दूसरे शब्दों में शम्भू शेक (महादेव की 88 पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है – प्रथम..शंभू-मूला, द्वितीय-शंभू-गौरा और अंतिम शंभू-पार्वती) ही हैं शंभू मादाव (अपभ्रंश – महादेव) ही हैं। संपूर्ण भारतवर्ष में नवरात्र का उत्सव विविध रूपों में शक्ति की उपासना का सर्वोच्च पर्व है।
नवरात्र पर्व में जनजातीय समाज की उपासना पद्धति हिन्दू संस्कृति के चित्रफलक में प्रकृति के विविध रंग भरती है। हमारा मूल एक ही है, इसलिए अपकारी शक्तियों द्वारा बांटने का कुत्सित प्रयास कभी फलीभूत नहीं होगा। वामपंथियों और तथाकथित सेकुलरों द्वारा जनजातीय समाज में मूर्ति पूजा का निषेध बताना मूर्खता है, क्योंकि मूर्तियां निर्गुण की उपासना की प्रतीक हैं।
गोंड समाज में खेरो माता, भील समाज में नवणी पूजा, कोरकू समाज में देव दशहरा, झारखंड में दसांय नृत्य से उपासना,मध्य प्रदे के कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में डूंगरी माता, गुजरात के जौनसार-बावर में अष्टमी पूजन, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में जइया पूजा, गुमला जिले में श्रीबड़ा दुर्गा मंदिर का पूजन प्रमाण हैं।
भारत में नवरात्र पर्व का यह अद्वैत भाव अद्भुत एवं अद्वितीय होने के साथ मार्गदर्शी भी है।















